श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/७१-७३ ] महाप्रभुकी दैन्योक्ति प्रकाशानन्दकी धारणाके अनुकूल होनेके कारण वह ध्यानपूर्वक महाप्रभुकी बात सुनने लगा। महाप्रभु यदि पहले ही प्रकाशानन्दकी बातका प्रतिवाद करके अपने पाण्डित्य, ध्यान एवं वेदान्त-पाठादिकी अपेक्षा श्रीनाम-सङ्कीर्त्तनके प्राधान्यको प्रमाणित करने लगते, तो घमण्डी प्रकाशानन्दके अभिमानको चोट पहुँचती तथा महाप्रभुके प्रति उसकी विरक्ति और अवज्ञा और भी बढ़ जाती । तब वह धैर्य और ध्यान देकर महाप्रभुकी बातको नहीं सुनता। इसलिये महाप्रभुने इस दैन्यसे जैसे 'सूई होकर घुसी और कुल्हाड़ी होकर बाहर निकली'-इस न्यायसे प्रतिपक्षको जय करनेका एक अपूर्व कौशल दिखाया। विशेषतः यही वैष्णवोचित व्यवहारका भी परिचायक है॥७१॥ 'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि वेदान्ताधिकार। 'कृष्णमन्त्र' जप' सदा, -एइ मन्त्र सार ॥ ७२ ॥ मन्त्र और महामन्त्र-श्रीनाममें लीलाकी विचित्रता :- कृष्णमन्त्र हैते हबे संसार-मोचन। कृष्णनाम हैते पाबे कृष्णेर चरण ॥ ७३ ॥ अनुवाद- 'तुम मूर्ख हो, वेदान्तमें तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिये इस 'कृष्णमन्त्र' का सदा जप करो, यह वेदान्तका सार है। श्रीकृष्णमन्त्रके (गुरुसे प्राप्त दीक्षामन्त्रके) जपसे इस भौतिक संसारसे मुक्ति मिल जाती है (अर्थात् अपने स्वरूपका ज्ञान होता है) और श्रीकृष्णनामसे (मुख्य फल प्रेमके द्वारा) श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवाकी प्राप्ति होती है॥७२-७३॥ अनुभाष्य- जीव जिस समय दिव्यज्ञान प्राप्त करता है, उस समय द्वितीयाभिनिवेशसे मुक्त होकर अधोक्षज-सेवामें प्रवृत्त होता है। मुकुन्दसेवा ही बाह्यजगत्की चेष्टा-निवृत्तिका एकमात्र उपाय और उपेय है। जीव मन्त्र जप करते-करते अप्राकृत अनुभूतिके फलसे बाह्य भोगमय जगत्-प्रतीतिसे निरस्त होकर पाँच प्रकार रतियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी रतिका आश्रयकर सामग्रीके संयोगसे रससेवा-प्रभावसे विशुद्ध सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें भजनीयका आस्वादन करता है। वैसा अनुष्ठान दोनों उपाधियोंका भोगमात्र नहीं है अर्थात् प्राकृत स्थूल और सूक्ष्म देहके भोगका विषय नहीं है। नाम-नामी अभिन्न हैं-इस दिव्यज्ञान-लाभके लिये आनुष्ठानिकभावसे वास्तवरूपमें उसमें अवस्थित होनेपर ही नामकीर्त्तनकारी साक्षात् श्रीकृष्णसेवा प्राप्त करते हैं। उस समय उनकी चतुर्थ्यन्तपद या वैयाकरणकी सम्बन्ध-निर्णायिका भाषा शिथिल हो जाती है अर्थात् श्रीकृष्ण नाममें चतुर्थ्यन्तपद ना लगाकर उच्चारण करे, जैसे 'कृष्णाय'के स्थानपर 'कृष्ण' ही कहे, तो भी सम्बोधनकी पदोद्दिष्ट वास्तव वस्तु (अर्थात् नामके द्वारा नामी) तत्क्षणात् सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें अवरुद्ध हो जाती है। उस समय सम्बोधन-पदके द्वारा अबाध (बाधारहित) सेवा करनेकी योग्यता प्राप्त होती है। सभी शास्त्र और सभी दिव्यज्ञानात्मक मन्त्र जीवको सम्पूर्ण रूपसे मुक्त करवाकर साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें नियुक्त कराते हैं। [महाप्रभुने कहा] मुझ मूर्खने इन सब बातोंका श्रीगुरुदेवसे श्रवण किया है। उन्होंने यह भी उपदेश दिया था कि श्रीव्यासोक्त “लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत-संहिताम्" आदि नामभजनके सोपानरूप श्रीमद्भागवत आदिका अध्ययन, अध्यापना और विचार, नामसेवाके तात्पर्यमें ही पर्यवसित होते हैं। नाम और सातवाँ अध्याय | ४०३