श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
७/७१-७३ ] महाप्रभुकी दैन्योक्ति प्रकाशानन्दकी धारणाके अनुकूल होनेके कारण वह ध्यानपूर्वक महाप्रभुकी बात सुनने लगा। महाप्रभु यदि पहले ही प्रकाशानन्दकी बातका प्रतिवाद करके अपने पाण्डित्य, ध्यान एवं वेदान्त-पाठादिकी अपेक्षा श्रीनाम-सङ्कीर्त्तनके प्राधान्यको प्रमाणित करने लगते, तो घमण्डी प्रकाशानन्दके अभिमानको चोट पहुँचती तथा महाप्रभुके प्रति उसकी विरक्ति और अवज्ञा और भी बढ़ जाती । तब वह धैर्य और ध्यान देकर महाप्रभुकी बातको नहीं सुनता। इसलिये महाप्रभुने इस दैन्यसे जैसे 'सूई होकर घुसी और कुल्हाड़ी होकर बाहर निकली'-इस न्यायसे प्रतिपक्षको जय करनेका एक अपूर्व कौशल दिखाया। विशेषतः यही वैष्णवोचित व्यवहारका भी परिचायक है॥७१॥ 'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि वेदान्ताधिकार। 'कृष्णमन्त्र' जप' सदा, -एइ मन्त्र सार ॥ ७२ ॥ मन्त्र और महामन्त्र-श्रीनाममें लीलाकी विचित्रता :- कृष्णमन्त्र हैते हबे संसार-मोचन। कृष्णनाम हैते पाबे कृष्णेर चरण ॥ ७३ ॥ अनुवाद- 'तुम मूर्ख हो, वेदान्तमें तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिये इस 'कृष्णमन्त्र' का सदा जप करो, यह वेदान्तका सार है। श्रीकृष्णमन्त्रके (गुरुसे प्राप्त दीक्षामन्त्रके) जपसे इस भौतिक संसारसे मुक्ति मिल जाती है (अर्थात् अपने स्वरूपका ज्ञान होता है) और श्रीकृष्णनामसे (मुख्य फल प्रेमके द्वारा) श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवाकी प्राप्ति होती है॥७२-७३॥ अनुभाष्य- जीव जिस समय दिव्यज्ञान प्राप्त करता है, उस समय द्वितीयाभिनिवेशसे मुक्त होकर अधोक्षज-सेवामें प्रवृत्त होता है। मुकुन्दसेवा ही बाह्यजगत्की चेष्टा-निवृत्तिका एकमात्र उपाय और उपेय है। जीव मन्त्र जप करते-करते अप्राकृत अनुभूतिके फलसे बाह्य भोगमय जगत्-प्रतीतिसे निरस्त होकर पाँच प्रकार रतियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी रतिका आश्रयकर सामग्रीके संयोगसे रससेवा-प्रभावसे विशुद्ध सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें भजनीयका आस्वादन करता है। वैसा अनुष्ठान दोनों उपाधियोंका भोगमात्र नहीं है अर्थात् प्राकृत स्थूल और सूक्ष्म देहके भोगका विषय नहीं है। नाम-नामी अभिन्न हैं-इस दिव्यज्ञान-लाभके लिये आनुष्ठानिकभावसे वास्तवरूपमें उसमें अवस्थित होनेपर ही नामकीर्त्तनकारी साक्षात् श्रीकृष्णसेवा प्राप्त करते हैं। उस समय उनकी चतुर्थ्यन्तपद या वैयाकरणकी सम्बन्ध-निर्णायिका भाषा शिथिल हो जाती है अर्थात् श्रीकृष्ण नाममें चतुर्थ्यन्तपद ना लगाकर उच्चारण करे, जैसे 'कृष्णाय'के स्थानपर 'कृष्ण' ही कहे, तो भी सम्बोधनकी पदोद्दिष्ट वास्तव वस्तु (अर्थात् नामके द्वारा नामी) तत्क्षणात् सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें अवरुद्ध हो जाती है। उस समय सम्बोधन-पदके द्वारा अबाध (बाधारहित) सेवा करनेकी योग्यता प्राप्त होती है। सभी शास्त्र और सभी दिव्यज्ञानात्मक मन्त्र जीवको सम्पूर्ण रूपसे मुक्त करवाकर साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें नियुक्त कराते हैं। [महाप्रभुने कहा] मुझ मूर्खने इन सब बातोंका श्रीगुरुदेवसे श्रवण किया है। उन्होंने यह भी उपदेश दिया था कि श्रीव्यासोक्त “लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत-संहिताम्" आदि नामभजनके सोपानरूप श्रीमद्भागवत आदिका अध्ययन, अध्यापना और विचार, नामसेवाके तात्पर्यमें ही पर्यवसित होते हैं। नाम और सातवाँ अध्याय | ४०३
[ ७/७२-७४ नामी, जो अभिन्न वस्तु हैं और मायाप्रयास-रहित व्यक्तियोंके लिये ही एकमात्र ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) है—यही गुरुपादपद्मसे प्राप्त दिव्यज्ञान है। श्रीगुरुपादपद्मके आश्रयसे पहले तक (श्रीकृष्ण और अपने) साम्बन्धिक-विचारसे मैं मूर्ख था, किन्तु सेवोन्मुख होकर ही बन्धमोक्षविदकी (बन्धनसे मुक्त होनेकी प्रक्रियाके ज्ञाताकी) चेष्टा अपनेमें देख पा रहा हूँ। 'कृष्णनाम'—शब्दसे यहाँपर नामाभास अथवा नामापराध उद्दिष्ट नहीं हुआ है॥७३॥ अमृतानुकणिका—वेदान्तका सार कृष्णमन्त्र ही समस्त साधनोंका सार है और वेदान्तका भी सार है। (हःभःविः-१/१५५-१५६)— “मन्त्रास्तु कृष्णदेवस्य साक्षाद्भगवतो हरेः। सर्वावतारबीजस्य सर्वतो वीर्य्यवत्तमाः॥ सर्वेषां मन्त्रवर्याणां श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते। विशेषात् कृष्णमनवो भोगमोक्षैकसाधनम्॥” अर्थात् “समस्त अवतारोंके बीजस्वरूप साक्षात् भगवान् हरि श्रीकृष्णदेवके मन्त्रसमूह अत्यधिक प्रभाव सम्पन्न हैं। समस्त श्रेष्ठ मन्त्रोंमें वैष्णव मन्त्र ही श्रेष्ठ हैं, विशेषतः श्रीकृष्णमन्त्र भोग-मोक्षको प्रदान करनेवाला है।” (हःभःविः-१/१५८-१५९)— “कृष्ण एव परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह। स्मृतिमात्रेण तेषां वै भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ तत्रापि भगवत्तं स्वां तन्वतो गोपलीलया। तस्य श्रेष्ठतमा मन्त्रास्तेष्वप्यष्टादशाक्षरः॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण ही सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। श्रीकृष्ण स्मरणमात्रसे ही भुक्ति एवं मुक्ति प्रदान करते हैं। तथापि अपनी भगवत्ताका प्रकाश गोपलीलासे ही करते हैं। उनका ही श्रेष्ठतम मन्त्र—अष्टदशाक्षर मन्त्र है।” अष्टाक्षर मन्त्रके प्रसङ्गमें (हःभःविः-१/१३१) में भी कहा है कृष्णमन्त्र ही “सर्ववेदान्तसारार्थः” है।” महाप्रभु भङ्गीसे मायावादी संन्यासियोंको जतला रहे हैं कि श्रीकृष्णमन्त्र समस्त साधनोंका सार होनेसे ध्यान और वेदान्त-पाठादि साधन अङ्गोंका अनुष्ठान निष्प्रयोजनीय है, इसलिये वे ध्यान अथवा वेदान्तका पाठ नहीं करते हैं॥७२॥ कलियुगमें श्रीकृष्णनाम ही एकमात्र उपास्य :- नाम बिना कलिकालॆ नाहि आर धर्म। सर्वमन्त्रसार नाम,—एइ शास्त्रमर्म॥७४॥ अनुवाद—कलियुगमें नामके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। सभी मन्त्रोंका सार यह श्रीकृष्णनाम ही है, यही शास्त्रोंका निगूढ़ अर्थ है॥७४॥ अनुभाष्य—सत्य, त्रेता और द्वापर, इन तीनों युगोंमें श्रौतपन्थाका आदर था, किन्तु इस कलिकालकी प्रवृत्तिके साथ अश्रौत या तर्कपन्था उत्पन्न हुआ है। वास्तव-सत्यके (शिष्य-परम्पराके द्वारा) अवरोहणके विषयमें सन्देह करके इन्द्रियज्ञानकी प्रबलतामें जिस तर्कपन्थाकी उत्पत्ति हुई है, वह श्रुतिविरोधी है। श्रीकृष्णनाम वैकुण्ठवस्तु होनेके कारण वास्तव-वस्तु श्रीकृष्णके साथ ४०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/७४ ] सम्पूर्ण अभिन्न है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण वास्तववस्तु श्रीकृष्ण जिस प्रकार नित्य, शुद्ध, पूर्ण, मुक्त, चैतन्यरसविग्रह और अप्राकृत चिन्तामणि हैं, वैकुण्ठनाम भी ठीक उसी प्रकार है। कृष्णेतर प्राकृत नामसे पृथक् होनेपर भी श्रीकृष्णनाम स्वयं वैकुण्ठवस्तु है। इस नाममें तर्कपन्थियोंका कोई अधिकार नहीं है। एकमात्र नामभजनसे ही स्थूल और सूक्ष्म, औपाधिक धर्म-द्वय निरस्त होता है। इसलिये तर्कपन्थाकी प्रबलताके समय अन्य प्रकारके कुण्ठ-धर्मसमूह (जागतिक धर्म) भी तर्कपन्थामें बाधक होते हैं। केवल स्वयं नाम ही तर्कपन्थियोंके तर्कातीत नामी वस्तु हैं। वैकुण्ठवस्तुका नाम ही प्राकृत भोगचिन्तापर मननधर्मोंसे जीवोंको त्राण करनेमें समर्थ कहा गया है—इसलिये यह सर्वमन्त्रोंका सार है। जड़वस्तुका नाम, रूप, गुण, भाव और क्रिया—ये सभी तर्कपन्थाके अधीन हैं, किन्तु वैकुण्ठवस्तु उस प्रकार नहीं है। उस वैकुण्ठनामका अप्राकृत रूप, गुण, परिकर-वैशिष्ट्य और लीला अद्वयज्ञानमें अवस्थित है। मायावादी लोग इन्द्रिय-ज्ञानसे वस्तुके नाम, रूप, गुणमें भेद मानकर द्वैतविचारके हेयत्वमें अधःपतित होते हैं। इसलिये उनके उपदेष्टा “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, और “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” अर्थात् “यह सब कुछ ही ब्रह्म है” आदि महावाक्योंके द्वारा उनको प्राकृत-विचारसे मुक्त करते हैं। श्रीनामाश्रयके अतिरिक्त नामापराधके द्वारा कभी भी इन्द्रियोंके भोगमय तर्कपन्थासे छुटकारा नहीं पाया जा सकता॥७४॥ मन्त्रमाहात्म्य (नारदपञ्चरात्रमें)— “त्रयो वेदाः षडङ्गानि छन्दांसि विविधाः सुराः। सर्वमष्टाक्षरान्तःस्थं यच्चान्यदपि वाङ्मयम्। सर्ववेदान्तसारार्थः संसारार्णवतारणः॥” अर्थात् “अष्टाक्षर मन्त्रके अन्दर ही तीनों वेद, उनके छह अङ्ग (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और छन्द), विविध छन्द (वैदिक साहित्य) और सभी देवता तथा जो कुछ और भी अन्य वाङ्मय है, वह सब समाहित है। यह अष्टाक्षर मन्त्र सभी वेदान्तोंका सार है और संसार समुद्रसे तारनेवाली नौका है।” (कलिसन्तरणोपनिषद्)— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोड़शकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परोपायाः सर्ववेदेषु दृश्यते॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे; ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता।” मुण्डकोपनिषद्भाष्ये श्रीमध्वधृतवचनम्— “द्वापरीयैर्यजैर्विष्णुः पञ्चरात्रैश्च केवलम्। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” सातवाँ अध्याय | ४०५
[ ७/७२-७६ अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” 'कृष्णमन्त्र' और 'कृष्णनाम' सम्बन्धमें श्रीजीवगोस्वामी प्रभु भक्तिसन्दर्भमें (२८४ संख्या)— “ननु भगवन्नामात्मका एव मन्त्राः; तत्र विशेषेण नमः शब्दाद्यलङ्कृताः श्रीभगवता श्रीमदृषिभिश्चाहितशक्तिविशेषाः, श्रीभगवता सममात्मसम्बन्धविशेषप्रतिपादकाश्च। तत्र केवलानि श्रीभगवन्नामान्यपि निरपेक्षाण्येव परमपुरुषार्थफलपर्यन्तदानसमर्थानि। ततो मन्त्रेषु नामतोऽप्यधिकसामर्थ्ये लब्धे कथं दीक्षाद्यपेक्षा? उच्यते-यद्यपि स्वरूपतो नास्ति, तथापि प्रायः स्वभावतो देहादिसम्बन्धेन कदर्यशीलानां विक्षिप्तचित्तानां जनानां तत्सङ्कोचीकरणाय श्रीमदृषिप्रभृतिभिरर्चनमार्गे क्वचित् क्वचित् काचित् काचिन्मर्यादा स्थापितास्ति।” “यदि कहो, — 'मन्त्रसमूह तो भगवन्नामात्मक है; मन्त्रकी विशेषता यह है कि मन्त्र भगवन्नामके साथ 'नमः', 'स्वाहा' शब्दादिके द्वारा भूषित अर्थात् नामानुगत्य भावयुक्त है। मन्त्रोंमें भगवान्की इच्छासे श्रीनारदादि ऋषियोंने शक्तिविशेष समर्पित की है। मन्त्रसमूह श्रीभगवान्के साथ मन्त्रोच्चारणकारीका सम्बन्धविशेष स्थापित करते हैं। मन्त्रमें भगवान्के जो अन्यभाव-अपेक्षारहित नामसमूह हैं (अर्थात् नमः, स्वाहा आदि शब्दोंसे अलङ्कृत ना होकर भी तथा ऋषियोंके द्वारा समर्पित शक्तिकी अपेक्षा ना रखते हुए भी), वे ही परमपुरुषार्थफल (श्रीकृष्णप्रेम) तक दान करनेमें समर्थ हैं। ऐसा होनेपर नामकी अपेक्षा मन्त्रको अधिक समर्थ कहकर नामकीर्तनकारीकी उस मन्त्रमें दीक्षाकी अपेक्षा क्यों है?' इसके उत्तरमें कह रहे हैं- 'यद्यपि नामकारीकी दीक्षाकी अपेक्षा स्वरूपतः नहीं है, तथापि प्रायः ही स्वाभाविक भोगपर देहादि सम्बन्ध रहनेके कारण बुरे स्वभावसे विक्षिप्तचित्तवाले मानवगणकी उस-उस बुरे स्वभाव और चित्तकी चञ्चलताको सङ्कुचित करनेके लिये श्रीनारदादि ऋषिओंने अर्चनमार्गमें कहीं-कहीं मन्त्रमें कुछ-कुछ मर्यादाकी स्थापना की है।' बद्धजीवके जड़-अहङ्काररूप भोगकी निवृत्तिके लिये मन्त्रसिद्धिकी आवश्यकता है। 'नमः' शब्दमें 'म'कारका अर्थ - अहङ्कार है; 'न'कारका अर्थ-तन्निवृत्ति (उससे निवृत्ति) है, अर्थात् मन्त्रसिद्धिके फलसे जीवको अप्राकृत अनुभूति लाभ होती है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने भी 'नामाष्टक'में - 'अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं' कहकर हरिनामको आह्वान किया है॥७२-७४॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। कण्ठे करि' एइ श्लोक करिह विचारे ॥ ७५ ॥ अनुवाद- यह कहकर मेरे गुरुदेवने मुझे एक श्लोक सिखलाया और कहा कि इसे कण्ठस्थ करके इसपर विचार करो ॥ ७५ ॥ हरेर्नाम श्लोक :- बृहन्नारदीय वचन (३८/१२६) - हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ ७६ ॥ अनुवाद - कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ ७६ ॥ ४०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/७६-८२ ] अमृतप्रवाह भाष्य—कलियुगमें हरिनामके अतिरिक्त और गति नहीं है; हरिनाम ही एकमात्र गति है॥७६॥ अनुभाष्य—[सत्ययुगे ध्यानरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [त्रेतायां यज्ञे यज्ञेश्वरयजनरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [द्वापरे अर्चनरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव। [विशेषतः] कलौ अन्यथा गतिः नास्त्येव (अन्य-साधनानां निरर्थकत्वात्)। श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें ध्यान नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; त्रेतायुगमें यज्ञेश्वर भगवान्के उद्देश्यसे यज्ञके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें यज्ञ नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; द्वापरयुगमें अर्चनके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें अर्चन नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; विशेषतः कलियुगमें अन्य सभी साधन निरर्थक हैं॥७६॥ नामग्रहणका फल :— एइ आज्ञा पाञा नाम लइ अनुक्षण। नाम लैते लैते मोर भ्रान्त हैल मन॥७७॥ धैर्य धरिते नारि, हैलाम उन्मत्त। हासि, कान्दि, नाचि, गाइ, यैछे मदमत्त॥७८॥ अनुवाद—गुरुदेवकी यह आज्ञा पाकर मैं निरन्तर नामका जप करने लगा। नाम लेते-लेते मेरा मन भ्रान्त हो गया अर्थात् नामके अतिरिक्त सब कुछकी विस्मृति हो गयी। तभीसे मैं धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ। मैं उन्मत्त होकर पागल व्यक्तिकी भाँति कभी हँसता, रोता, नाचता और गाता हूँ॥७७-७८॥ तबे धैर्य धरि' मने करिलाम विचार। कृष्णनामे ज्ञानाच्छन्न हइल आमार॥७९॥ नामग्रहणके फलस्वरूप निज-अवस्थाके दर्शनसे विस्मय :— पागल हइलाङ् आमि, धैर्य नाहि मने। एत चिन्ति' निवेदिलाम गुरुर चरणे॥८०॥ 'किवा मन्त्र दिला गोसाञि, किवा तार बल। जपिते जपिते मन्त्र करिल पागल॥८१॥ हासाय, नाचाय, मोरे कराय क्रन्दन।' एत शुनि' गुरु मोरे बलिला वचन॥८२॥ अनुवाद—तब मैंने कुछ धैर्य धारण करके मनमें विचार किया कि इस श्रीकृष्णनामसे मेरा ज्ञान ढक गया है। नाम ग्रहण करते-करते मैं पागल हो गया हूँ और मनमें धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ। ऐसा सोचकर मैंने श्रीगुरुदेवसे निवेदन किया—'हे गुरुदेव ! आपने कैसा मन्त्र दिया है और कैसा उसका बल है, जपते-जपते जिसने मुझे पागल कर दिया है? कभी यह मन्त्र मुझे हँसाता है, कभी नचाता है और कभी रुलाता है।' यह सुनकर मेरे गुरुदेव बोले॥७९-८२॥ सातवाँ अध्याय | ४०७
[ ७/८३-८५ श्रीकृष्णनामका धर्म :- 'कृष्णनाम-महामन्त्रेर एइ त' स्वभाव। येइ जपे, तार कृष्णे उपजये भाव॥८३॥ अनुवाद—'श्रीकृष्णनाम महामन्त्रका यही स्वभाव है। जो इस महामन्त्रका जप करता है, यह उसमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न कर देता है॥८३॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके नाम गान करनेसे वही श्रीनाम शिष्यके कर्णकुहरमें (कानोंमें) प्रविष्ट होता है। श्रीगुरुदेवके अनुसरणमें सुने हुए श्रीनामको श्रद्धाके साथ हृदयमें स्थापितकर जपके द्वारा नामकी पूजा की जाती है। श्रीनाम पूजित होनेपर वे स्वयं ही अपने स्वाभाविक धर्मका विस्तारकर नामजपकारीको कीर्त्तनका अधिकार प्रदान करते हैं। उसी समयमें ही वे (नामजपकारी) नाम गान करके समग्र जगत्को शिष्य करनेमें समर्थ होते हैं। जगत् नामकीर्त्तनके शासन प्रभावसे श्रीकृष्णनाम-जप आरम्भ करता है। जपते-जपते जपकारीकी हास्य, क्रन्दन, नृत्य और कीर्त्तनादि नामभजनकी प्रणाली परिस्फुट होती है। परन्तु कोई-कोई मूर्खतावशतः “हरेकृष्ण” सोलह नाम-बतीस अक्षरको महामन्त्र ना जानकर उसे केवल जप्यमन्त्र मानकर उस महामन्त्रके (उच्च) कीर्त्तनमें बाधा प्रदान अर्थात् निषेध करते हैं। इसलिये प्रेमको प्राप्त किये हुए व्यक्ति श्रीकृष्णनाम गान करके भक्तोंके साथ श्रीकृष्णनामका सम्यक् कीर्त्तन अर्थात् सभी मिलकर सङ्कीर्त्तन करते हैं; उस प्रकार कीर्त्तनके फलस्वरूप जगत्के सभी लोग श्रीकृष्णनामका उपदेश लाभ करते हैं। नाम-श्रवण, नाम-कीर्त्तनके साथ ही साथ नाम-स्मरण होता है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम जपके प्रभावसे श्रीकृष्णवस्तुमें सेवाप्रवृत्तिका उदय होता है—इसीको ही 'भाव' नामसे कहा जाता है। जातभाव लोग अविद्या-बन्धनग्रस्त तथा अनर्थयुक्त नहीं होते हैं। वे लोग जातरति हैं, इसलिये भावके साथ चार सामग्रियोंके सम्मिलनमें उदित रसका आस्वादन करते हैं। भावकी घनीभूत अवस्था ही 'प्रेम' है। श्रीकृष्णनाम—महामन्त्र है। पाञ्चरात्रिक मन्त्रसमूह—'मन्त्र' नामसे जाने जाते हैं। भगवन्नाम 'महामन्त्र' के रूपमें प्रसिद्ध है॥८३॥ चतुर्वर्ग और श्रीकृष्णप्रेम :- कृष्णविषयक प्रेमा—परम पुरुषार्थ। यार आगे तृणतुल्य चारि पुरुषार्थ॥८४॥ पञ्चम पुरुषार्थ—प्रेमानन्दामृतसिन्धु। ब्रह्मादि आनन्द यार नहे एक बिन्दु॥८५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णविषयक प्रेम प्राप्त करना ही परम पुरुषार्थ है, जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ तिनकेकी भाँति हैं। पञ्चम पुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेम आनन्दके अमृतका समुद्र है, जिसके एक बिन्दुके साथ भी ब्रह्मानन्दकी तुलना नहीं हो सकती॥८४-८५॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेम जीव-प्रयोजनका सर्वश्रेष्ठ भाव है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी जीवके प्रयोजनके साथ पञ्चम पुरुषार्थ प्रेमकी तुलना करनेपर तारतम्यसे भुक्ति-मुक्तिकामियोंके द्वारा प्राप्त वस्तुओंको नश्वर और नगण्य रूपमें जाना जा सकता है। नश्वर उपाधिगत ४०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/८४-८५ ] अस्मितामें (अर्थात् इस नश्वर देहमें 'मैं' के भावमें) बुभुक्षु (भुक्तिकामी) और मुमुक्षु (मुक्तिकामी) का धर्म अवस्थित है। परन्तु भगवत्प्रेम आत्माका नित्य, अविकृत धर्म है; इसलिये भुक्ति-मुक्तिरूप चतुर्वर्गके प्रयोजन-विचारका मूल्य प्रेमकी तुलनामें कुछ भी नहीं है॥८४॥ अमृताणुकणिका-शास्त्रमें चार पुरुषार्थ वर्णित हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गसे प्राप्त जड़सुखसे चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षके द्वारा प्राप्त ब्रह्मसुखका अपूर्व वैशिष्ट्य है। यह ब्रह्मसुख निर्विशेष ब्रह्मानन्द है। निर्विशेष ब्रह्ममें स्वरूपशक्तिका विलास नहीं होनेसे आनन्दकी वैचित्री नहीं है। आस्वादन-चमत्कारिताकी वैचित्री भी नहीं है। यह ब्रह्मसुख केवल आनन्दसत्ता मात्र है। इसलिये ब्रह्मानन्द लोभनीय होनेपर भी परम लोभनीय वस्तु नहीं है। वह वस्तु क्या है? जिस वस्तुमें ब्रह्मतत्त्वकी चरमतम अभिव्यक्ति है, वही परम लोभनीय वस्तु है। श्रुतिमें ब्रह्मको रसस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मकी स्वाभाविक स्वरूपशक्तिकी अभिव्यक्तिके तारतम्यके अनुसार ही रसका भी तारतम्य होता है। रसका विकास जितना अधिक होगा आस्वाद्यका, आस्वादन-चमत्कारिताका और लोभनीयताका विकास भी उतना अधिक होगा। निर्विशेष ब्रह्ममें शक्तिका विकास न्यूनतम होनेके कारण रसका भी न्यूनतम विकास है। शक्तिके असमोध्र्व विकासके कारण श्रीकृष्णमें रसका चरमतम विकास है। इसलिये श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादनजनित आनन्द निर्विशेष-ब्रह्मानन्दकी अपेक्षा कोटि-कोटि गुना अधिक लोभनीय है। श्रीमद्भागवत (१/७/१०)- “आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥” अर्थात् “ब्रह्मानन्द-सुखमें मग्न एवं आत्मामें ही रमण करनेके कारण जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है, वे मुनिगण भी क्रोध-मोह-अहङ्कारादिसे मुक्त होकर निष्काम भावसे अमित-विक्रम श्रीहरिकी भक्ति करते रहते हैं, क्योंकि भगवान् श्रीहरिके गुण ही ऐसे हैं जिससे वे आत्मारामगणोंको भी आकर्षित कर लेते हैं।” इस माधुर्यका आकर्षण इतना अधिक है कि पतिव्रता शिरोमणि लक्ष्मी भी इसके प्रति आकर्षित हो जाती हैं। श्रीकृष्णकी असमोध्र्व माधुरीका आस्वादन करनेका एकमात्र उपाय प्रेमाभक्ति है। ब्रह्म-सायुज्य-प्राप्त जीवोंमें भी इस प्रेमकी प्राप्तिके लिये भजनकी कथा सुनी जाती है। “मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते। नृसिंहतापनी (२/५/१६) का शङ्करभाष्य।” मुक्त पुरुषोंके भगवद्भजनकी बात वेदान्तमें भी देखी जाती है। “आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्॥ ब्रह्मसूत्र ४/१/१२॥” इसके गोविन्द भाष्यमें लिखा है-किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तितक उपासना कर्त्तव्य है' और किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तिके बाद भी उपासना कर्त्तव्य है।' इस परस्पर विरुद्ध उपदेशकी मीमांसाके उद्देश्यसे ही व्यासदेवजीने इस वेदान्त सूत्रमें कहा है-'आप्रायणात्'-मुक्तिलाभ तक उपासना अवश्य ही करनी चाहिये। 'तत्रापि'-मोक्षावस्थामें भी अर्थात् मुक्तिलाभके बाद भी उपासना करनी होगी। 'हि'-क्योंकि, 'दृष्टम्'-श्रुतियोंमें सब समय ही उपासनाकी विधि दिखलायी देती है। मुक्तावस्थामें भी उपासनाका कारण यह है कि श्रुतियाँ कहती हैं-सर्वावस्थामें ही सब समय ही (इसलिये मुक्तावस्थामें भी) उपासना करेंगे, जैसे सौपर्ण सातवाँ अध्याय | ४०९
[ ७/८४-८८ श्रुतिमें कहा है—'सर्वदा एनम् उपासित यावद्विमुक्तिः। मुक्ता अपि हि एनम् उपासते॥' प्रश्न हो सकता है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान कहाँ लिखा है और फल भी क्या है? इसके उत्तरमें कह रहे है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान ना होनेपर भी और विधान नहीं है—ऐसा कहकर फलकी बात ना उठनेपर भी वस्तुके सौन्दर्य प्रभावसे ही मुक्त व्यक्ति भजनमें प्रवृत्त होते हैं। जैसे पीलियाका रोगी मिश्री खानेके फलस्वरूप पीलिया ठीक हो जानेपर भी मिश्रीके मिठासकी ओर आकृष्ट होकर उसकी मिश्री खानेकी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि भगवान्के सौन्दर्य, माधुर्य आदिके द्वारा आकृष्ट होकर मुक्त व्यक्ति भी भगवद्भजन करते हैं। “मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्॥” इस (१/३/२) वेदान्तसूत्रसे यही बात जानी जाती है। इस सूत्रके अर्थमें श्रीजीव गोस्वामीने लिखा है—“मुक्तानामेव सतामुपसृप्यं ब्रह्म यदि स्यात्तदेवाक्लेशेन सङ्गच्छते। अर्थात् ब्रह्ममुक्त-साधुओंकी उपसृप्य अर्थात् गति, इस प्रकार अर्थ करनेपर ही अक्लेशसे अर्थसङ्गति होती है। सर्वसम्वादिनी। १३० पृः।" उक्त सूत्रके माधवभाष्यमें भी कहा गया है, “मुक्तानां परमा गतिः।—ब्रह्म मुक्त पुरुषोंकी भी परमा गति है।” इन सबसे भी समझा जाता है—रसस्वरूप परब्रह्मकी उपासनाके लिये मुक्त पुरुषोंकी लालसा जाग्रत होती है। इस परम लोभनीय वस्तुके आस्वादनका एकमात्र उपाय प्रेम है, इसलिये यह चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। इस श्रीकृष्णप्रेमरूपी पुरुषार्थके द्वारा जो वस्तु प्राप्त की जाती है, वह ही चरमतम काम्य वस्तु है, इसलिये यह पुरुषार्थ भी परम पुरुषार्थ है॥८४॥ श्रीकृष्णनामका फल :— कृष्णनामेर फल—'प्रेमा,' सर्वशास्त्रे कय। भाग्ये सेइ प्रेमा तोमाय करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—सभी शास्त्र कहते हैं कि प्रेम ही श्रीकृष्णनामका फल है। परम सौभाग्यसे तुम्हारे भीतर यह प्रेम उदित हुआ है॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'धर्म', 'अर्थ', 'काम', 'मोक्ष',—ये चार प्रकारके पुरुषार्थ हैं। श्रीकृष्णप्रेम पञ्चम पुरुषार्थ है। इसके एक बिन्दुके साथ मोक्षकी प्रथमावस्था ब्रह्मानन्दादिकी तुलना नहीं हो सकती। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष,—ये सब श्रीकृष्णनामके फल नहीं हैं। सभी शास्त्रोंके अनुसार श्रीकृष्णप्रेम ही श्रीकृष्णनामका एकमात्र फल है॥८४-८६॥ श्रीकृष्णप्रेमका धर्म :— प्रेमार स्वभावे करे चित्त-तनु क्षोभ। कृष्णेर चरण-प्राप्त्ये उपजाय लोभ॥८७॥ प्रेमार स्वभावे भक्त हासे, कान्दे, गाय। उन्मत्त हइया नाचे, इति-उति धाय॥८८॥ अनुवाद—प्रेमका यह स्वभाव है कि वह साधकके चित्त और शरीरको क्षोभित करके उनमें दिव्य लक्षणोंको प्रकाश करता है तथा उसके हृदयमें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्तिका लोभ उत्पन्न करता है। प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी गान करता है और कभी पागलकी भाँति नाचता तथा कभी इधर-उधर भागता है॥८७-८८॥ ४१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अनुभाष्य - श्रीकृष्णप्रेमहीन अभक्तगण जो अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता दिखाकर हास्य, क्रन्दन, नृत्य और गीत आदिमें उन्मत्त होते हैं, यह उनके अमङ्गल प्राप्तिका ही परिचय मात्र है। कृत्रिम शारीरिक और इन्द्रिय-चाञ्चल्य भजनशील साधकोंके लिये सम्पूर्णरूपसे परित्यागका विषय है। आत्माकी स्वाभाविकी वृत्तिके उदयमें जो भाव और प्रेम उपस्थित होता है, उससे ही हास्य, क्रन्दन, गान, नृत्य और उत्कण्ठा उदित होते हैं। ये सभी सेवोन्मुख भक्तकी अकृत्रिम (स्वाभाविक) चेष्टा है। अजातप्रेम व्यक्तियोंकी भक्तोंकी उच्चपदवी ग्रहण करनेकी धृष्टता जगत्में अनर्थ या जञ्जाल लाती है। श्रील जीवप्रभुकृत प्रीतिसन्दर्भ (संख्या ६६)में- “भगवत्प्रीतिरूपा वृत्तिर्मायादिमयी न भवति; किन्तु स्वरूपशक्त्यानन्दरूपा, यदानन्दापराधीनः श्रीभगवानपीति।” तथा (संख्या ६९)में- “तदेवं प्रीतिलक्षणं चित्तद्रवस्तस्य च रोमहर्षादिकम्। कथञ्चिज्जातेऽपि चित्तद्रवे रोमहर्षादिके वा न चेदाशयशुद्धिस्तदापि न भक्तेः सम्यगाविर्भाव इति ज्ञापितम्। आशयशुद्धिर्नाम चान्यतात्पर्य परित्यागः प्रीतितात्पर्यञ्च। अतएवानिमित्ता स्वाभाविकी चेति तद्विशेषणम्।” भगवत्-प्रेमरूपी वृत्ति कभी भी मायामयी नहीं, अपितु आनन्दरूपा स्वरूपशक्ति है; क्योंकि श्रीभगवान् भी आनन्द-पराधीन हैं। वैसा होनेपर इस प्रकार प्रीतिका लक्षण ही चित्तका द्रवित होना और उसके फलस्वरूप रोमहर्षादि विकारका प्रकट होना है। कुछ परिमाणमें चित्त-द्रवित या रोमहर्षादि होनेपर भी अन्तःकरण-शुद्ध ना होनेपर भक्तिका सम्यक् आविर्भाव नहीं हुआ है, ऐसा समझना होगा। 'अन्तःकरण-शुद्धि' का अर्थ श्रीकृष्णसेवासे इतर अन्य तात्पर्यका परित्याग और श्रीकृष्णसे प्रीति-तात्पर्य है। इसलिये 'अहैतुकी' और 'स्वाभाविकी' इसका विशेषण है॥८८॥ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु, गदगद, वैवर्ण्य। उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥८९॥ एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे नाचाय। कृष्णेर आनन्दामृतसागरे भासाय ॥ ९० ॥ अनुवाद - स्वेद अर्थात् शरीरमें पसीना आना, कम्प, रोमाञ्च अर्थात् रोमावली पुलकित होना, नेत्रोंसे अश्रु बहना, वाणी गद्गद् होना, वैवर्ण्य अर्थात् रङ्गका परिवर्तित होना - ये सात्त्विकभाव और उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष और दैन्य - ये व्यभिचारीभाव, इस भावोंमें प्रेम भक्तोंको नचाता है और उन्हें श्रीकृष्णके आनन्दामृतरूपी समुद्रमें डुबो देता है ॥ ८९-९० ॥ शिष्यके प्रति गुरुका कर्त्तव्योपदेश :- भाल हैल, पाइले तुमि परमपुरुषार्थ। तोमार प्रेमेते आमि हैलाङ कृतार्थ ॥ ९१ ॥ नाच, गाओ, भक्तसङ्गे कर सङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम उपदेशि' तार' सर्वजन ॥ ९२ ॥ अनुवाद - यह बहुत अच्छा हुआ कि तुमने परमपुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त किया है और
[ ७/९१-९४ तुम्हारे इस प्रेम प्राप्त होनेसे मैं भी कृतार्थ हो गया हूँ। अब नाचो-गाओ और भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन करो। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करो॥'९१-९२॥ अनुभाष्य-जिन लोगोंने श्रीगुरुदेवकी दृष्टिमें अधिकार प्राप्त किया है, उन्हींको ही श्रीगुरुदेव सजातीय-आशयस्निग्ध भजनपरायण हरिभक्तोंके साथ नृत्य, गीत और सङ्कीर्तनादिमें अधिकार प्रदान करते हैं। वे लोग ही श्रीगुरुदेवका पदानुसरण करके अपने भजन-ज्ञानसे जगत् उद्धार कार्योंमें नियुक्त होते हैं। अनधिकारी व्यक्ति निर्जनमें श्रीकृष्णनाम जप करेंगे। इस प्रकार उपासनामें अन्यके साथ सङ्गादि नहीं है। अधिकार होनेपर ही जनसङ्ग अशुभफल नहीं ला सकता; पक्षान्तरमें, बहिर्मुखलोग भी नामकी कृपा प्राप्त करनेमें समर्थ होते हैं। इस प्रसङ्गमें-“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः”* या “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्ध कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”** आदि श्लोक आलोच्य हैं॥९२॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। भागवतेर सार एइ-बले बारे बारे॥९३॥ अनुवाद-श्रीगुरुदेवने यह कहकर मुझे एक श्लोक सिखलाया और बार-बार कहा कि यह श्लोक श्रीमद्भागवतका सार है॥९३॥ महाभागवतकी अवस्था :- श्रीमद्भागवत (११/२/४०) एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥९४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥९४॥ अनुभाष्य-वसुदेवजीके द्वारा श्रीनारद मुनिसे भगवद्धर्म सुननेकी इच्छा करनेपर उन्होंने ऋषभदेवके नौ पुत्र नवयोगेन्द्र और विदेहराज निमिके उपाख्यानका वर्णन किया। इस प्रसङ्गमें नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम 'कवि'ने निमि महाराजसे कहा- *“श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये।” (भाः १०/३३/३१) **“विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य' कहलाता है।” (भःरःसिः १/२/२५५) ४१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
एवंव्रतः (श्रवणकीर्त्तनादिरूपं सेवनव्रतं यस्य सः) स्वप्रियनामकीर्त्या (स्वस्य प्रियस्य भगवतः नामकीर्त्तनादिना) जातानुरागः (जातः अनुरागः यस्य सः जातरतिः, अतएव) द्रुतचित्तः (उत्कण्ठितहृदयः) उन्मादवत् लोकबाह्यः (लोकानां बाह्यः हास्यनिन्दास्तुत्यादिषु अपेक्षारहितः सन्) उच्चैः हसति, अथो रोदिति, रौति (क्रोशति), गायति, नृत्यति च। श्लोक-भावानुवाद—जिसने श्रीकृष्णविषयक श्रवण-कीर्तनादि सेवाव्रत धारण किया है, अपने प्रियतम श्रीकृष्णके नाम-कीर्तनादिसे वह जातरति भक्त हृदयमें प्रबल उत्कण्ठाके कारण लोगोंके हास्य-निन्दा-स्तुति आदिसे अनपेक्षित उन्मत्तकी भाँति कभी उच्च हास्य, कभी रोदन, कभी चीत्कार, कभी गान और नृत्य करता है॥९४॥ अमृतानुकणिका—'एवंव्रत'-इस प्रकार भजन करते-करते उसके फलस्वरूप प्रेमभक्तियोगमें संसार-धर्मसे अतीत चेष्टाएँ-इस प्रकार व्रत जिनका है, उन्हें यहाँ एवंव्रत कहा गया है। भक्तिके अङ्गोंमें भी नाम-सङ्कीर्तन सर्वोत्कृष्ट है। 'स्वप्रियनामकीर्त्या'—अपने प्रिय नामके कीर्तनके द्वारा। स्वप्रिय नाम शब्दके दो प्रकार अर्थ हो सकते हैं—अपने प्रिय जो श्रीकृष्ण हैं उनका नाम अथवा अपना प्रिय जो भगवत्-नाम; श्रीहरिके असंख्य नाम हैं, उनमेंसे जो नाम जिस भक्तको सर्वपेक्षा प्रिय है, वही नाम। जैसे श्रीहरिभक्तिविलास (११/३०४)— “सर्वार्थशक्तियुक्तस्य देवदेवस्य चक्रिणः। यथाभिरोचते नाम तत् सर्वार्थेषु कीर्त्तयेत्॥” अर्थात् “भगवान् देवादेव चक्रधारी सर्वार्थ-शक्तिविशिष्ट हैं, इसलिये अपने अभिरुचि अनुरूप उनके नामोंका कीर्तन विषय-सिद्धि हेतु करना चाहिये।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामी लिखते हैं— “यस्य च यन्नाम्नि प्रीतिः तेन तदेव सेव्य, तेनैव तस्य सर्वार्थसिद्धिरित्याह।” अर्थात् “जिसकी जिस नाममें प्रीति है, वही उसके सेव्य हैं और उन्हींसे उसकी सर्वार्थ सिद्धि होती है।” निरन्तर नामकीर्तनके फलसे चित्तकी समस्त मलिनता पूर्णतया दूर होकर जिसके चित्तमें प्रेमका आविर्भाव होता है, उसे ही जातानुराग अथवा जातप्रेम भक्त कहते हैं। “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय। श्रवणादि-शुद्ध चित्ते करये उदय॥” 'द्रुतचित्त'—प्रेमके उदय होनेपर श्रीकृष्ण दर्शन प्राप्तिकी भक्तके हृदयमें बलवती उत्कण्ठा जाग्रत होती है। बलवती तीव्र उत्कण्ठारूप अग्निके तापसे भक्तका चित्त द्रवीभूत हो जाता है। उस तीव्र उत्कण्ठाके फलस्वरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी विषयमें भक्तका अभिनिवेश नहीं रहता। इसलिये वह 'लोकबाह्य'—लोकापेक्षाशून्य अर्थात् मान-अपमान आदि विषयमें असावधान हो जाता है। 'मेरे इस प्रकार आचरणको देखकर लोग क्या कहेंगे?'-इस प्रकारका विचार उसके मनमें नहीं आता। 'उन्मादवत्'—पागलके जैसे। किसी भी प्रकारसे लोकापेक्षा ना करके जो मनमें आये, वही जो व्यक्ति बोलता अथवा करता है, उसको ही लोग साधारणतः उन्मादी या पागल कहते हैं। जातप्रेम भक्तका लक्षण भी उसी प्रकार है, किन्तु वह उन्माद नहीं है। उन्मादित व्यक्तिका और जातप्रेम भक्तका भेद इस प्रकार है—उन्मादित व्यक्तिकी लोक-अनपेक्षा उसकी मस्तिष्ककी विकृतिका फल है। किन्तु जातप्रेम भक्तकी लोक-अनपेक्षा मस्तिष्ककी विकृतिका फल नहीं, परन्तु श्रीकृष्ण विषयमें ऐकान्तिक निविष्ट-चित्तताके कारण अन्य समस्त विषयोंसे अनाकृष्ट
[ ७/९४-९६ होकर श्रीकृष्ण विषयमें चित्तवृत्तिसमूह केन्द्रीभूत होनेका फल है। यद्यपि बाह्य दृष्टिसे दोनोंके लक्षण प्रायः एक जैसे दिखायी देते हैं, तथापि जातप्रेम भक्तको उन्माद ना कहकर उन्मादवत् कहा गया है। जातप्रेम भक्तका हृदय प्रायः श्रीकृष्णकी किसी-न-किसी एक लीलामें आविष्ट रहता है। आविष्ट अवस्थामें उसकी अनुभूति इस प्रकार होती है—जैसे वह श्रीकृष्णकी लीलास्थानमें निकट ही है और लीलाके अनुकूल आचरण भी कर रहा है। उस समय उसको यह ज्ञान नहीं रहता कि वह इस प्राकृतिक ब्रह्माण्डमें है, इसलिये इस जगत्का कोई भी विषय उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता। 'हसति'—हास्योद्दीपक किसी भी लीलाकी स्फूर्तिसे जातप्रेम भक्त कभी भी 'हो-हो' शब्दसे उच्च स्वरसे हँसने लगता है। जैसे बालक श्रीकृष्णने माखनचोरी करनेके लिये किसी गोपीके घरमें प्रवेश किया। गृहस्वामिनी वृद्धा गोपी उनकी आहट पाकर 'माखन चोरको पकड़ो', 'माखन चोरको पकड़ो', कहती हुयी दौड़ती हुई आयी। उसके शब्दोंको सुनकर श्रीकृष्ण भयसे भागनेकी चेष्टा करने लगे। जातप्रेम भक्तके चित्तमें इस लीलाकी स्फूर्ति होनेपर भागते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् अनुभव करके वह हास्यको संवरण नहीं कर पाता और हँसने लगता है। 'रोदिति'—और कभी ऐसी लीलाकी स्फूर्तिमें जब वह श्रीकृष्णके साक्षात् दर्शन करता है, तो स्फूर्तिके तिरोहित होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णको नहीं देख पानेके कारण दुःखसे हाय-हाय श्रीकृष्ण कहाँ गये, अभी तो यहाँ थे, अब कहाँ चले गये? मैने तो अपने हाथमें एक महानिधि प्राप्तकी थी, किस स्थानपर और किस प्रकारसे वह मेरे हाथसे छूट गयी, क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आदि बोलते-बोलते वह आर्त्तिमें रोने लगता है। 'रौति'—कभी श्रीकृष्ण विरहमें अधीर होकर “हे प्रभु! आप कहाँ हो? एक बार दर्शन दे दो, मेरी बातका उत्तर तो दो, आदि बोलते हुए वह कभी चीत्कार करता है। 'गायति'—कभी श्रीकृष्णके रूप, गुण, लीला आदिका गुणगान करते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करता है। 'नृत्यति'—श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करके आनन्दके उद्रेकके कारण नृत्य करने लगता है। यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि जातप्रेम भक्तका हास्य-रोदन-नृत्य-गीत आदि उसकी इच्छाके अधीन नहीं है। भूतग्रस्त व्यक्तिका जैसे अपने ऊपर कोई वश नहीं होता, जातप्रेम भक्त भी अपनी इच्छासे ऐसा आचरण नहीं करता। बाजीगर जैसे पुतलियोंको नचाता है, प्रेम भी वैसे ही जातप्रेम भक्तको नृत्य कराता है। विवश चित्तसे भक्त यह सब करता है, अथवा प्रेमके उदय होनेपर जो अनिर्वचनीय आनन्दका आविर्भाव होता है, उसकी ही प्रेरणासे भक्त कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता है॥९४॥ गुरुकी आज्ञासे भजनमें दृढ़ चेष्टा :— एइ ताँर वाक्ये आमि दृढ़ विश्वास धरि'। निरन्तर कृष्णनाम सङ्कीर्त्तन करि॥९५॥ भजनके फलस्वरूप स्वतः कर्तृत्वमय श्रीनाम-प्रभुकी कृपा :— सेइ कृष्णनाम कभु गाओयाय, नाचाय। गाहि, नाचि नाहि आमि आपन-इच्छाय॥९६॥ ४१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/९५-९७ ] अनुवाद—अपने गुरुदेवके इस वाक्यमें दृढ़तापूर्वक विश्वास रखकर मैं निरन्तर श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करता हूँ। वही श्रीकृष्णनाम कभी मुझसे गान कराता है, तो कभी मुझे नचाता है। मैं अपनी इच्छासे यह नृत्य-गीतादि नहीं करता हूँ॥ ९५-९६॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके वचनोंपर विश्वास ना कर पानेके कारण जो व्यक्ति अपने अधिकारका विपर्यय करते हैं, वे नाम-सङ्कीर्तनमें अधिकार प्राप्त नहीं कर पाते। “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिनकी श्रीभगवान्में पराभक्ति है और श्रीभगवान्के समान ही श्रीगुरुदेवके प्रति भी शुद्धभक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें श्रुतियोंके सभी मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं।” इस श्रुतिवाक्यका समर्थन करते हुए श्रीगौरसुन्दरने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन प्रारम्भ किया था। आनुगत्य धर्मकी रीतिके अनुसार उन्होंने गुरुदेवकी अवज्ञा ना करते हुए निरन्तर ही नामसङ्कीर्तन किया। वैसे श्रीकृष्णनाम-प्रभुके कीर्तनने स्वयं इच्छा-शक्तिका सञ्चालन करते हुए श्रीगौरसुन्दरकी नृत्य-गीत करनेमें रुचि उत्पन्न की थी। श्रीगौरसुन्दरने श्रीनामको कोई जड़पदार्थ समझकर उसके प्रति अनुग्रहपूर्वक कीर्तन नहीं किया। जो लोग अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता-वशतः श्रीकृष्णनामको अपने खिलौनेकी भाँति समझते हैं और श्रीनामसेवाके बदले नामके प्रभु बनकर कर्तृत्व दिखाना चाहते हैं, वे लोग भजनके बदले कर्मफलभोगमें वशीभूत होकर पित्तवृद्धि करवाकर शारीरिक अस्वस्थताको आमन्त्रित करते हैं। (महाप्रभुकी उक्ति)—'मैं हिताहित-विवेकहीन मूर्ख हूँ। वेदान्तका शुद्ध अर्थ अन्वेषण करते समय श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रचारित मायावाद-कुतर्क आकर मेरी नैसर्गिक भजनवृत्तिको नष्ट कर देगा—इसी आशङ्कासे मैंने जाना कि मेरा शाङ्कर-व्याख्यायुक्त वेदान्तमें अधिकार नहीं है। इसलिये मैं श्रीकृष्णमन्त्र जपके द्वारा ही संसारके अनर्थोंसे निवृत्त होकर मुक्तकुलोंके उपास्य श्रीकृष्णनामको ग्रहण करता हूँ जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। विवादमय कलिकालमें नामग्रहणके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। श्रीगुरुदेवसे यह सब आज्ञा प्राप्त करके नामग्रहणके फलसे मैं उन्मत्तप्रायः हो गया था। बादमें पुनः उनसे प्रश्नकर मैं यह जान पाया कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-फल-आकाङ्क्षाकारियोंकी क्षुद्र आशाकी अपेक्षा परम-कल्याणकारी परमपुरुषार्थरूप प्रेमाधिकार प्राप्त होनेपर जीवका जो कल्याण होता है, उसकी तुलना नहीं है। जात-प्रेम व्यक्ति अपने स्वभावसे लोकलज्जाकी उपेक्षाकर उच्चस्वरसे हास्य, रोदन, गान और नर्तनादिके साथ श्रीकृष्णकीर्तन करते हैं, इसीको ही मैं 'भागवतजीवन'के (भक्तके जीवनके) रूपमें जानता हूँ। मैंने कृत्रिमरूपसे कपटताका आश्रयकर कोई कार्य नहीं किया। गुरुदेवके वाक्योंमें दृढ़विश्वासयुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन करता हूँ। श्रीनामने ही मुझे कौपीनधारी वैदान्तिकोंके गाम्भीर्यके प्रतिपक्षमें (विरोधमें) गायक और नर्तक बना दिया। इसमें मेरा स्वतःकर्त्तृत्व या प्रेरणा अल्पमात्र है—यह सब कुछ श्रीनामप्रभुकी कृपा ही है॥ ९५-९६॥ ब्रह्मानन्द और श्रीकृष्णप्रेमानन्दका पार्थक्य :— कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु-आस्वादन। ब्रह्मानन्द तार आगे खातोदक-सम ॥ ९७॥ सातवाँ अध्याय | ४१५
[ ७/९७-१०१ अनुवाद—श्रीकृष्णनाममें जिस आनन्द-समुद्रका आस्वादन होता है, ब्रह्मानन्द उसके सामने एक छोटेसे गड्ढेमें पड़े जलके समान है॥९७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खातोदक'—गड्ढेमें थोड़ासा जल॥९७॥ अनुभाष्य—आदिलीला ६/४३-४४ संख्या द्रष्टव्य है॥९७॥ हरिभक्तिसुधोदय (१४/३६)— त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद-विशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यापि जगद्गुरो॥”९८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्डा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥९८॥ अनुभाष्य—हे जगद्गुरो! त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य (तत् तव साक्षात्कारणेन दर्शनजनितेन यदाह्लादः स एव विशुद्धः मलरहितः अब्धिः समुद्रः तस्मिन् स्थितस्य) मे (मम) ब्राह्माणि (ब्रह्मानुभव-जनितानि) सुखानि अपि गोष्पदायन्ते (गोष्पदविलस्थ-जलवत् प्रतीयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ संन्यासियोंकी चित्तवृत्तिका क्रमशः परिवर्तन और प्रश्न :— प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' संन्यासीर गण। चित्त फिरि' गेल, कहे मधुर वचन॥९९॥ तथापि भक्तिमें सामान्य, किन्तु मायावादमें दृढ़ श्रद्धा :— “ये किछु कहिले तुमि, सर्व सत्य हय। कृष्णप्रेमा सेइ पाय, यार भाग्योदय॥१००॥ कृष्णे भक्ति कर—इहाय सबार सन्तोष। वेदान्त ना शुन केने, तार किवा दोष॥”१०१॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार मधुर वाक्योंको सुनकर संन्यासियोंका हृदय परिवर्तित हो गया और वे मधुर वचनोंसे कुछ कहने लगे—“आपने जो भी कुछ कहा, वह सब सत्य है। जिसका भाग्योदय होता है, वही श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णभक्ति करो, हम सभीका यही मत है, किन्तु आप वेदान्तका श्रवण क्यों नहीं करते हैं, उसमें क्या दोष है?”॥९९-१०१॥ अनुभाष्य—मायावादी लोग श्रीशङ्करपादके शारीरक-भाष्यके उद्दिष्ट शास्त्रको ही 'वेदान्त' कहते हैं; अर्थात् 'वेदान्त' कहनेपर शाङ्करमतावलम्बी उनके आचार्यकृत केवलाद्वैत-मतमूलक भाष्यतात्पर्य-युक्त उपनिषत् और ब्रह्मसूत्रको लक्ष्य करते हैं। सदानन्दयोगी-कृत 'वेदान्तसार' में—“वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्, तदुपकारीणि शारीरक-सूत्रादीनि च॥” ४१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
वस्तुतः ‘वेदान्त’ कहनेपर ‘केवलाद्वैतवाद’ को ही केवल नहीं समझना है। चारों वैष्णवाचार्य भी वेदान्ताचार्य हैं, किन्तु वे शङ्करमतावलम्बी मायावादी नहीं हैं। भेददर्शन-रहित होकर केवलाद्वैत-विचारसे जो अहंग्रहोपासना करते है, उस प्रकारके मायावादपन्थी शुद्धाद्वैत, शुद्धद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत एवं अचिन्त्यभेदाभेदको स्वीकार नहीं करते; अपितु केवलाद्वैत-विचार ही निर्दोष वेदान्तमत है—ऐसा विश्वास करते हैं। प्राकृत शरीर तथा मनके द्वारा जो श्रीकृष्णकी अनित्य सेवा होती है, उससे मायावादी लोग सन्तुष्ट होते हैं, अर्थात् वे लोग श्रीकृष्णभक्तिको मात्र कर्मानुष्ठान-विशेषके रूपमें जानते हैं, इसलिये वह भी ‘अभक्ति’ है, ऐसा कहनेमें उन्हें सन्तोष होता है॥१०१॥ एत शुनि' हासि' प्रभु बलिला वचन। “दुःख ना मानिह यदि, करि निवेदन॥”१०२॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने हँसकर कहा—“यदि आप लोगोंको बुरा ना लगे, तो मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।”॥१०२॥ मायावादी संन्यासियोंकी नम्रता :- इहा शुनि' बले सर्व संन्यासीर गण। “तोमाके देखिये यैछे साक्षात् नारायण॥१०३॥ तोमार वचन शुनि' जुड़ाय श्रवण। तोमार माधुरी देखि' जुड़ाय नयन॥१०४॥ तोमार प्रभावे सबार आनन्दित मन। कभु असङ्गत नहे, तोमार वचन॥”१०५॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी संन्यासी कहने लगे—“आप देखनेमें साक्षात् नारायणकी भाँति हो, आपके वचन सुनकर हमारे कानोंको आनन्द हो रहा है। आपके सौन्दर्यको देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं। आपके प्रभावसे सभीका मन आनन्दित हो रहा है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये, क्योंकि आपके वचन कभी असङ्गत नहीं हो सकते हैं॥”१०३-१०५॥ वेदान्तके सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या :- प्रभु कहे, “वेदान्त सूत्र-ईश्वर-वचन। व्यासरूपे कैल ताहा श्रीनारायण॥१०६॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“वेदान्त-सूत्र साक्षात् ईश्वरकी वाणी है। स्वयं श्रीनारायणने व्यासके रूपमें इसकी रचना की है॥१०६॥ अनुभाष्य-‘सूत्र’— “अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥”(स्कन्द और वायुपुराणमें) अर्थात् “अल्प अक्षरोंसे युक्त, निश्चित (सन्देहरहित), सारयुक्त, सब ओरसे स्पष्ट, अर्थ निर्धारणमें किसी भी प्रकारकी बाधासे रहित एवं निर्दोष (अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असम्भव—ऐसे दोषोंसे दूषित ना हो)—ऐसे वाक्यको सूत्रोंके ज्ञाताजन सूत्र कहते हैं।” सातवाँ अध्याय | ४१७
[ ७/१०६ वेदान्तसूत्र—(१) ब्रह्मसूत्र, (२) शारीरक, (३) व्याससूत्र, (४) बादरायण-सूत्र, (५) उत्तर- मीमांसा और (६) वेदान्तदर्शन आदि विभिन्न नामोंसे परिचित चार अध्याययुक्त, सोलहपादयुक्त सूत्राकारमें ग्रथित ग्रन्थ है। इस ग्रन्थमें प्रत्येक पादमें कुछ अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरणमें पञ्चाङ्ग-न्याय वर्तमान है, —प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपयन और निगमन। और भाष्यमें— “एको विषय सन्देहः पूर्वपक्षावभाषकः। श्लोकोऽपरस्तु सिद्धान्तवादी सङ्गतयः स्फुटाः॥” अर्थात् “एक श्लोक तो सन्देहका विषय होकर पूर्वपक्षको प्रस्तुत करता है और दूसरा श्लोक सिद्धान्तका वर्णन करता है तथा सङ्गतियोंको स्पष्टरूपसे दिखलाता है।” विभिन्न भाष्योंके अनुसार, —इसके १६२-२२३ तक अधिकरण विभाग लक्षित होते हैं; और सूत्र संख्या—५२०-५६० तक है। ‘वेदान्त’ शब्दसे कोषकार ‘हेमचन्द्र’ कहते हैं—ब्राह्मणके साथ उपनिषद् अंश ही ‘वेदान्त’ है—वेदोंका अवशिष्ट अथवा वेदका शेषभाग अर्थात् वेदोंका अन्त। वेदका चरम उद्देश्य जिस शास्त्रमें प्रदर्शित हुआ है, वह भी ‘वेदान्त’ है। उपनिषत् प्रमाणस्वरूपमें जो शास्त्र व्यवहार होते हैं और उसके सहायक जो सूत्रादि हैं, वह भी ‘वेदान्त’ है। ‘वेदान्त-सूत्र’ को तीन प्रस्थानोंमें अन्यतम ‘न्याय-प्रस्थान’ कहा जाता है। उपनिषदोंको ‘श्रुतिप्रस्थान’ और गीता-भागवत-पुराणादिको ‘स्मृतिप्रस्थान’ कहा जाता है। श्रीनारायणके निःश्वाससे वेद प्रपञ्चमें आये। श्रीनारायणके द्वारा कहे गये वेदविस्तार-शास्त्रको ही ‘सात्वत-पञ्चरात्र’ कहा जाता है। श्रीनारायणके आवेशावतार श्रीव्यास अथवा किसी-किसीके मतमें (शः भाः ३/३/३२) ‘अपान्तरतमा’ ऋषिने वेदान्तसूत्रोंको गूँथा है। पञ्चरात्र और वेदान्तमें एक ही अभिमत प्रकाशित हुआ है, —यही श्रीगौरसुन्दरकी उक्ति है। श्रीव्यासरचित होनेके कारण इसको भी श्रीनारायणके ही वाक्यके रूपमें जानना होगा। श्रीव्यासदेवने सूत्र-रचनाके समय और भी सात ऋषियोंके द्वारा प्रणीत वेदान्त-मतकी समालोचना की हैं; जैसे—आत्रेय, आश्मरथ्य, ओडूलोग्मि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि और बादरी। इनके अतिरिक्त पाराशरी और कर्मन्दीभिक्षु—ये दोनों सूत्र भी श्रीव्यासदेवके रचित सूत्रके पूर्ववर्ती ग्रन्थ है। वेदान्तदर्शनके प्रथम दो अध्यायोंमें ‘सम्बन्ध’ ज्ञान, तृतीय अध्यायमें ‘अभिधेय’ साधन-भक्ति और चतुर्थ अध्यायमें ‘प्रयोजनफल’ भगवत्प्रेमकी कथा ही वर्णित हुई है। सूत्रकार व्यासके द्वारा रचित अकृत्रिम वेदान्तभाष्य ‘श्रीमद्भागवत’ है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतके न्यूनाधिक अनुगत चार वैष्णवाचार्योंके प्रणीत भाष्य और उनके सम्प्रदायोंके अधस्तनोंके द्वारा रचित बहुतसी टीकाओंमें वेदान्तकी भगवद्भजन-तत्परता कही गयी है। विष्णुभक्तिरहित निर्विशिष्ट विचारवाले सम्प्रदायोंमें भी इस वेदान्तसूत्रका आदर परिलक्षित होता है। इस वेदान्तके मायिक विचारके द्वारा जो सभी भाष्यादि और उनके अनुगत टीका तथा सन्दर्भादि पाये जाते हैं, वे सब विष्णुसेवा-रहित, वास्तव-सत्यसे भेद-विचारयुक्त हैं॥१०६॥ अमृतानुकणिका—(भाः १/३/२१)— ‘ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात्।’ ४१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१०६-१०९ ] 'इसके बाद सत्रहवें अवतारमें भगवान् श्रीहरि ही पराशरके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे व्यासरूपमें अवतीर्ण हुए हैं।' भागवत (११/१६/२८) में श्रीकृष्णने कहा— 'द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां' 'व्यासोंमें मैं श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हूँ।' विष्णुपुराण (३/४/५) में कहा गया है— 'कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं स्वयंम्' 'श्रीकृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो।' इन समस्त शास्त्र-प्रमाणोंके बलपर ही कहा है—व्यासरूपमें ही श्रीनारायणने ही वेदान्तसूत्रकी रचना की है॥”१०६॥ (१) ईश्वर-वाक्य—चारों दोषोंसे रहित :— भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। ईश्वरेर वाक्ये नाहि दोष एइसब ॥१०७॥ अनुवाद—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष भगवान्के वाक्योंमें नहीं होते हैं॥१०७॥ अनुभाष्य—आदिलीला २/८६ द्रष्टव्य है॥१०७॥ (२) अभिधा (मुख्या)-वृत्तिसे सविशेष-तत्त्व भगवान् ही वेदान्तके द्वारा जानने योग्य :— उपनिषत्-सहित सूत्र कहे येइ तत्त्व। मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ परम महत्त्व॥१०८॥ गौणवृत्तिसे रचित असुरमोहन शाङ्कर-भाष्यके श्रवणसे सर्वनाश :— गौणवृत्त्ये येबा भाष्य करिल आचार्य। ताहार श्रवणे नाश हय सर्व कार्य॥१०९॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्र उपनिषद्के प्रमाणों सहित जो तत्त्व कहते हैं, मुख्यवृत्तिके द्वारा उसका जो अर्थ किया जाता है अर्थात् जो स्पष्ट अर्थ है, वही अर्थ श्रेष्ठ है। गौण-वृत्तिके द्वारा श्रीशङ्कराचार्यने जिस भाष्यकी रचना की है, उसे श्रवण करनेसे वेदान्त-उपनिषद्का तात्पर्य प्रेमाभक्तिका नाश हो जाता है॥१०८-१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उपनिषद्'—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर, ये ग्यारह वेदशिरोमणि उपनिषद् हैं। 'सूत्र'—चार अध्याय, सोलह पाद युक्त सूत्र अर्थात् ब्रह्मसूत्र है। ये दोनों ही शास्त्रोंमें प्रधान हैं॥१०८॥ अनुभाष्य—मुक्तिकोपनिषदमें (३०-३९) वर्णित १०८ उपनिषद्— “ईशकेनकठ-प्रश्नमुण्डकमाण्डुक्य-तित्तिरिः। ऐतरेयश्च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा॥ ब्रह्मकैवल्यजावालश्वेताश्वो हंस आरुणिः। गर्भो नारायणो हंसो बिन्दुनादशिरः शिखा॥ मैत्रायणी कौषितकी वृहज्जावालतापनी। कालाग्निरुद्रमैत्रेयी सुबालक्षुरिमन्त्रिका॥ सातवाँ अध्याय | ४१९
[ ७/१०८-१०९
सर्वसारं निरालम्बं रहस्यं वज्रसूचिकम्। तेजो नादध्यानविद्यायोगतत्त्वात्मबोधकम्॥ परिव्राट् त्रिशिखी सीता चूड़ा निर्वाणमण्डलम्। दक्षिण शरभं स्कन्दं महानारायणाद्वयम्॥ रहस्यं रामतपनं वासुदेवञ्च मुद्गलम्। शाण्डिल्यं पैङ्गलं भिक्षुमहच्छारीरकं शिखा॥ तुरीयातीतसंन्यासपरिव्राजाक्षमालिका। अव्यक्तैकाक्षरं पूर्णा सूर्याक्षाध्यात्मकुण्डिका॥ सावित्र्यात्मा पाशुपतं परंब्रह्मावधूतकम्। त्रिपुरातापनं देवी त्रिपुरा कठभावना। हृदयं कुण्डली-भस्मरुद्राक्षगणदर्शनम्॥ तारसारमहावाक्यपञ्चब्रह्माग्नि होत्रकम्। गोपालतपनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम्॥ शाठ्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम्। कलिजावालिसौभाग्यरहस्येकाश्रुमुक्तिका॥" अर्थात् ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरिय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, कैवल्य, जावाल, श्वेताश्वतर, हंस, आरूणि, गर्भ, नारायण, परमहंस, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, अथर्व शिरा, अथर्व शिखा, मैत्रायणी, कौषितकी ब्राह्मण, वृहज्जावाल, कालाग्निरुद्र, मैत्रेय, सुबाल, क्षुरिका, मन्त्रिका, सर्वसार, निरालम्ब, राम रहस्य, वज्रसूचिका, तेजो बिन्दु, नाद बिन्दु, ध्यान बिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, आत्मबोध, नारद परिव्राजक, त्रिशिखी ब्राह्मण, सीता, योग चूड़ामणि, निर्वाण, मण्डल ब्राह्मण, दक्षिणामूर्ति, शरभ, स्कन्द, महानारायण, अद्वय तारक, शुकरहस्य, रामतापनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैङ्गल, भिक्षुक, महा, शारीरक, योग शिखा, तुरीयातीत अवधूत, संन्यास, परमहंस-परिव्राजाक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, अन्नपूर्णा, सूर्य, अक्षी, अध्यात्म, कुण्डिका, सावित्रि, आत्मा, पाशुप्रात ब्राह्मण, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापनी, देवी, त्रिपुरा, कठ रुद्र, भावना, रुद्र हृदय, योग कुण्डलिनी, भस्म जावाल, रुद्राक्ष जावाल, गणपति, तारसार, महावाक्य, पञ्चब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, गोपालतापनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, वराह, शाठ्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड़, कलिसन्तरण, जाबालि, सौभाग्य लक्ष्मी, सरस्वती रहस्य, बह्वृच, दर्शन, नृसिंहतापनी और मुक्तिका-ये १०८ उपनिषद् हैं। 'मुख्यवृत्ति' अर्थात् अभिधा-वृत्ति है। जिस शक्तिके द्वारा कोष-व्याकरणादिमें प्रसिद्ध अर्थका बोध होता है, वह 'अभिधा' है। 'गौणवृत्ति' का अर्थ है लक्षणावृत्ति। जिस शक्तिके द्वारा किसी प्रयोजनके लिये अथवा बहुप्रयोगके कारण वास्तविक अर्थसम्बन्धीय अन्य अर्थका बोध होता है, वह 'लक्षणा-वृत्ति' है। 'भाष्य'-जैसे, “सूत्रस्थं पदमादाय वाक्यैः सूत्रानुसारिभिः। स्व-पदानि च वर्णन्त्ये भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥” अर्थात् “भाष्य तत्त्वको जाननेवालोंने उसे भाष्य कहा है जिसमें सूत्रमें स्थित पदोंको लेकर सूत्रका अनुसरण करनेवाले वाक्योंके द्वारा अपने पद (शब्दों) का वर्णन किया जाता है।”
४२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१०८-१०९ ] उपनिषद् एवं सूत्रका प्रतिपाद्य सविशेष-तत्त्व ही श्रेष्ठ है-यह मुख्या (अभिधा) वृत्तिका अवलम्बन करके प्रदर्शित हुआ है। निर्विशेषवादी गौणी (लक्षणा) वृत्तिका अवलम्बन करके जो तत्त्वाभास प्रदर्शन करते हैं, वह 'तत्त्ववाद' के बदले 'मायावाद' नामसे प्रसिद्ध है। श्रीविष्णुस्वामीके शुद्धाद्वैत-विचारको दबाकर श्रीशङ्कराचार्यके केवलाद्वैतविचारका व्यापक प्रचार होने लगा। तब श्रौत-पथका अवलम्बनकर श्रीरामानुजाचार्यने 'विशिष्टाद्वैतवाद' और श्रीमध्वचार्यपादने 'तत्त्ववाद' के द्वारा अतात्त्विकोंके तर्कपन्थामूलक सिद्धान्तका खण्डन किया। महाप्रभुने अभिधा-वृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके अर्थोंका आदर किया है। श्रीशङ्कराचार्यने लक्षणावृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके जिन अर्थोंको अपने भाष्यमें लिखा है, उसके द्वारा सर्वनाश होता है। जैसे पद्मपुराणमें कहा गया है- “शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम्। येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥ अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम्। कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥ सर्वकर्मपरिभ्रंशात्रैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते। परात्म-जीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥” अर्थात् “हे देवि सुनो ! मैं तामस शास्त्रका क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे ज्ञानियोंका भी अधःपतन हो जाता है। वेद वचनोंका लोकनिन्दित हीन अर्थ दिखलाते हुए इस शास्त्रमें कर्मका स्वरूपतः त्याज्यत प्रतिपादित किया गया है। इसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करनेसे ही निष्काम कर्मसे प्राप्त होनेवाले ज्ञान (नैष्कर्म्य) की प्राप्तिका वहाँ वर्णन किया गया है। तथा मेरे द्वारा यहाँ परमात्मा और जीवके ऐक्यका प्रतिपादन किया गया है।” अन्त्यलीला, २/९४-९९ संख्या द्रष्टव्य है॥१०८-१०९॥ अमृतानुकणिका—शब्दकी तीन वृत्तियाँ हैं-मुख्य, लक्षणा और गौणी। किसी भी शब्दकी स्वाभाविक शक्तिके द्वारा जो अर्थ प्रतिपन्न होता है, शब्द उच्चारण करने मात्रसे ही उसका जो अर्थ मनमें उदित होता है, उसे शब्दका मुख्यार्थ कहते हैं। शब्दकी जिस वृत्ति या शक्तिके द्वारा जिस मुख्यार्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसे मुख्यवृत्ति कहते हैं। जैसे 'गौ'-शब्द उच्चारण करनेसे ही, गलकम्बल (गलेके नीचे झूलते मांसपिण्ड), पूँछ, सींग आदि चार पैरोंके जन्तु-विशेषका विचार मनमें आता है। यह जन्तु-विशेष ही गौ-शब्दका मुख्यार्थ है। और गौ-शब्दकी जिस वृत्तिके द्वारा इस अर्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको गौ-शब्दकी मुख्यवृत्ति कहते हैं। जिस धातु और प्रत्ययके योगसे कोई शब्द निष्पन्न होता है, उस धातु और प्रत्ययके अर्थयोगसे शब्दके जो-जो अर्थ प्राप्त होते हैं, वे ही उस शब्दके मुख्यार्थ हैं। और जिस वृत्तिके द्वारा इस मुख्य शब्दकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको ही मुख्यवृत्ति कहते है। मुख्यार्थको 'अभिधावृत्ति' का अर्थ भी कहा जाता है। 'अभिधा' - अभिधा न्यायमते शब्दशक्तिः। मीमांसामते विधिसमवेतविधिव्यापारीभूतपदार्थः। तस्या लक्षणम्-स मुख्योऽर्थस्तत्रस्तत्र मुख्योव्यापारोऽस्याभिधोच्यते। इति शब्दकल्पद्रुमधृत काव्यप्रकाशवचनम्॥ 'लक्षणावृत्ति' - मुख्य अर्थकी सङ्गति ना होनेपर वाच्यसम्बन्धविशिष्ट अन्य पदार्थकी सातवाँ अध्याय | ४२१
[ ७/१०८-१०९
प्रतीतिको लक्षणा कहते है। 'लक्षणा' - "मुख्यार्थबाधे शक्यस्य सम्बन्धे याऽन्यधीर्भवेत्। सा लक्षणा। अलङ्कारकौस्तुभ। २/१२।" जैसे “गङ्गामें घोष वास करते हैं"- यहाँपर गङ्गा-शब्दके मुख्यार्थसे भागीरथी नामक नदी विशेषको समझा जाता है। ऐसा होनेसे मुख्यार्थमें वाक्यका अर्थ इस प्रकार होगा- "भागीरथी नदीके बीचमें घोष वास करते हैं", किन्तु नदीके बीचमें वास करना सम्भव नहीं है। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती। तभी गङ्गा-शब्दका अर्थ गङ्गा-तीर करना होगा, क्योंकि गङ्गा-तीरपर वास करना सम्भव है। गङ्गा-तीरका गङ्गाके साथ सम्बन्धविशिष्ट भी है। ऐसा होनेपर उक्त वाक्यका अर्थ होगा- “गङ्गाके तीरपर घोष वास करते हैं।" यह अर्थ लक्षणावृत्तिके द्वारा प्राप्त अर्थ कहलाता है। मुख्यार्थकी असङ्गति होनेपर ही लक्षणावृत्तिका आश्रय लेना होता है। मुख्यार्थकी सङ्गति होनेपर भी यदि लक्षणावृत्तिसे अर्थ किया जाय, तब उस लक्षणासे प्राप्त अर्थ असङ्गत होगा, क्योंकि इस प्रकार अर्थ करनेकी प्रथा शास्त्र द्वारा अनुमोदित नहीं है। लक्षणाके अनेक प्रकार भेद है। श्रीपाद जीव गोस्वामीने तीन प्रकारके लक्षणाका वर्णन किया है-अजहत्स्वार्था, जहत्स्वार्था और जहदजहत्स्वार्था। “अजहत्स्वार्था-न जहति पदानि स्वार्थं यस्यां सा; अर्थात् जो लक्षणासे पदोंके निज अर्थका परित्याग ना करे।" जैसे-कौओसे दहीकी रक्षा करो। इस प्रकारका आदेश यदि किसीको दिया जाय, तो वह व्यक्ति केवल कौओंसे दहीकी रक्षा करेगा, ऐसा नहीं है। बिल्ली, कुत्ता आदि जो कोई भी दहीको नष्ट करनेके लिये आयेंगे, उन सबसे दहीकी रक्षा करेगा। मूल उद्देश्य है, दहीकी रक्षा करना। यहाँपर कौआ-शब्दके मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती है, क्योंकि मुख्यार्थ ग्रहण करनेसे केवल कौओंके उत्पातसे दहीकी रक्षा करनी है, अन्य किसी जन्तुके उपद्रवसे रक्षा नहीं करनी है, ऐसा आदेशका अभिप्राय नहीं है, क्योंकि फलस्वरूप दहीकी रक्षा नहीं होगी। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर कौआ-शब्दसे कौआ और कौओके समान उपद्रवकारी जन्तुओंसे दहीकी रक्षा करनी होगी। यहाँपर कौआ-शब्दका अर्थ कौआ तो है ही, परन्तु कौआ-शब्दसे दही नष्ट करने वाले अन्य जन्तुओंको भी समझना होगा। यहाँ कौआ-शब्द अपना अर्थ त्याग ना करके अर्थकी और भी व्यापकता धारण करता है। यह 'अजहत्स्वार्था' लक्षणाका दृष्टान्त है। “जहत्स्वार्था-जहति पदानि स्वार्थं यस्याम्; अर्थात् जिस लक्षणापें पदसमूह अपने अर्थका परित्याग करते हैं, उनको जहत्स्वार्था लक्षणा कहते है।" जैसे “मंचाः क्रोशन्ति"-मंच चीत्कार कर रहा है, यह वाक्यका मुख्यार्थ है, किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि मंच कभी चीत्कार नहीं कर सकता। तब मंच-शब्दके मुख्यार्थका त्याग करके अर्थात् मंच-शब्दका मंच अर्थ ना ग्रहण करके 'मंचस्थ-पुरुष' अर्थ ग्रहण करना होगा; मंचपर स्थित लोग चीत्कार कर रहे हैं, इस प्रकारसे अर्थ ग्रहण करना होगा। मंचपर विराजमान लोगोंका मंचके साथ सम्बन्ध है, इसलिये यहाँपर लक्षणा है और मूल शब्द मंचका त्याग किया है, इसे 'जहत्स्वार्था' लक्षणा कहते हैं। "जहदजहत्स्वार्था-वाच्यार्थैकदेशत्यागेनै कदेशवृत्तिर्लक्षणा; अर्थात् जिस लक्षणामें किसी भी शब्दके मुख्यार्थका एक अंश त्याग करके अन्य अंश ग्रहण करना होता है, उसको जहदजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं।" मायावादियोंने तत्त्वमसि वाक्यका इसी जहदजहत्-लक्षणाका आश्रय लेकर अर्थ किया है। तत्त्वमसि-तत् (वह ब्रह्म) त्वम् (तुम)
४२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत