श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/१०६-१०९ ] 'इसके बाद सत्रहवें अवतारमें भगवान् श्रीहरि ही पराशरके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे व्यासरूपमें अवतीर्ण हुए हैं।' भागवत (११/१६/२८) में श्रीकृष्णने कहा— 'द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां' 'व्यासोंमें मैं श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हूँ।' विष्णुपुराण (३/४/५) में कहा गया है— 'कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं स्वयंम्' 'श्रीकृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो।' इन समस्त शास्त्र-प्रमाणोंके बलपर ही कहा है—व्यासरूपमें ही श्रीनारायणने ही वेदान्तसूत्रकी रचना की है॥”१०६॥ (१) ईश्वर-वाक्य—चारों दोषोंसे रहित :— भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। ईश्वरेर वाक्ये नाहि दोष एइसब ॥१०७॥ अनुवाद—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष भगवान्के वाक्योंमें नहीं होते हैं॥१०७॥ अनुभाष्य—आदिलीला २/८६ द्रष्टव्य है॥१०७॥ (२) अभिधा (मुख्या)-वृत्तिसे सविशेष-तत्त्व भगवान् ही वेदान्तके द्वारा जानने योग्य :— उपनिषत्-सहित सूत्र कहे येइ तत्त्व। मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ परम महत्त्व॥१०८॥ गौणवृत्तिसे रचित असुरमोहन शाङ्कर-भाष्यके श्रवणसे सर्वनाश :— गौणवृत्त्ये येबा भाष्य करिल आचार्य। ताहार श्रवणे नाश हय सर्व कार्य॥१०९॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्र उपनिषद्के प्रमाणों सहित जो तत्त्व कहते हैं, मुख्यवृत्तिके द्वारा उसका जो अर्थ किया जाता है अर्थात् जो स्पष्ट अर्थ है, वही अर्थ श्रेष्ठ है। गौण-वृत्तिके द्वारा श्रीशङ्कराचार्यने जिस भाष्यकी रचना की है, उसे श्रवण करनेसे वेदान्त-उपनिषद्का तात्पर्य प्रेमाभक्तिका नाश हो जाता है॥१०८-१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उपनिषद्'—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर, ये ग्यारह वेदशिरोमणि उपनिषद् हैं। 'सूत्र'—चार अध्याय, सोलह पाद युक्त सूत्र अर्थात् ब्रह्मसूत्र है। ये दोनों ही शास्त्रोंमें प्रधान हैं॥१०८॥ अनुभाष्य—मुक्तिकोपनिषदमें (३०-३९) वर्णित १०८ उपनिषद्— “ईशकेनकठ-प्रश्नमुण्डकमाण्डुक्य-तित्तिरिः। ऐतरेयश्च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा॥ ब्रह्मकैवल्यजावालश्वेताश्वो हंस आरुणिः। गर्भो नारायणो हंसो बिन्दुनादशिरः शिखा॥ मैत्रायणी कौषितकी वृहज्जावालतापनी। कालाग्निरुद्रमैत्रेयी सुबालक्षुरिमन्त्रिका॥ सातवाँ अध्याय | ४१९