श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१०६ वेदान्तसूत्र—(१) ब्रह्मसूत्र, (२) शारीरक, (३) व्याससूत्र, (४) बादरायण-सूत्र, (५) उत्तर- मीमांसा और (६) वेदान्तदर्शन आदि विभिन्न नामोंसे परिचित चार अध्याययुक्त, सोलहपादयुक्त सूत्राकारमें ग्रथित ग्रन्थ है। इस ग्रन्थमें प्रत्येक पादमें कुछ अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरणमें पञ्चाङ्ग-न्याय वर्तमान है, —प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपयन और निगमन। और भाष्यमें— “एको विषय सन्देहः पूर्वपक्षावभाषकः। श्लोकोऽपरस्तु सिद्धान्तवादी सङ्गतयः स्फुटाः॥” अर्थात् “एक श्लोक तो सन्देहका विषय होकर पूर्वपक्षको प्रस्तुत करता है और दूसरा श्लोक सिद्धान्तका वर्णन करता है तथा सङ्गतियोंको स्पष्टरूपसे दिखलाता है।” विभिन्न भाष्योंके अनुसार, —इसके १६२-२२३ तक अधिकरण विभाग लक्षित होते हैं; और सूत्र संख्या—५२०-५६० तक है। ‘वेदान्त’ शब्दसे कोषकार ‘हेमचन्द्र’ कहते हैं—ब्राह्मणके साथ उपनिषद् अंश ही ‘वेदान्त’ है—वेदोंका अवशिष्ट अथवा वेदका शेषभाग अर्थात् वेदोंका अन्त। वेदका चरम उद्देश्य जिस शास्त्रमें प्रदर्शित हुआ है, वह भी ‘वेदान्त’ है। उपनिषत् प्रमाणस्वरूपमें जो शास्त्र व्यवहार होते हैं और उसके सहायक जो सूत्रादि हैं, वह भी ‘वेदान्त’ है। ‘वेदान्त-सूत्र’ को तीन प्रस्थानोंमें अन्यतम ‘न्याय-प्रस्थान’ कहा जाता है। उपनिषदोंको ‘श्रुतिप्रस्थान’ और गीता-भागवत-पुराणादिको ‘स्मृतिप्रस्थान’ कहा जाता है। श्रीनारायणके निःश्वाससे वेद प्रपञ्चमें आये। श्रीनारायणके द्वारा कहे गये वेदविस्तार-शास्त्रको ही ‘सात्वत-पञ्चरात्र’ कहा जाता है। श्रीनारायणके आवेशावतार श्रीव्यास अथवा किसी-किसीके मतमें (शः भाः ३/३/३२) ‘अपान्तरतमा’ ऋषिने वेदान्तसूत्रोंको गूँथा है। पञ्चरात्र और वेदान्तमें एक ही अभिमत प्रकाशित हुआ है, —यही श्रीगौरसुन्दरकी उक्ति है। श्रीव्यासरचित होनेके कारण इसको भी श्रीनारायणके ही वाक्यके रूपमें जानना होगा। श्रीव्यासदेवने सूत्र-रचनाके समय और भी सात ऋषियोंके द्वारा प्रणीत वेदान्त-मतकी समालोचना की हैं; जैसे—आत्रेय, आश्मरथ्य, ओडूलोग्मि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि और बादरी। इनके अतिरिक्त पाराशरी और कर्मन्दीभिक्षु—ये दोनों सूत्र भी श्रीव्यासदेवके रचित सूत्रके पूर्ववर्ती ग्रन्थ है। वेदान्तदर्शनके प्रथम दो अध्यायोंमें ‘सम्बन्ध’ ज्ञान, तृतीय अध्यायमें ‘अभिधेय’ साधन-भक्ति और चतुर्थ अध्यायमें ‘प्रयोजनफल’ भगवत्प्रेमकी कथा ही वर्णित हुई है। सूत्रकार व्यासके द्वारा रचित अकृत्रिम वेदान्तभाष्य ‘श्रीमद्भागवत’ है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतके न्यूनाधिक अनुगत चार वैष्णवाचार्योंके प्रणीत भाष्य और उनके सम्प्रदायोंके अधस्तनोंके द्वारा रचित बहुतसी टीकाओंमें वेदान्तकी भगवद्भजन-तत्परता कही गयी है। विष्णुभक्तिरहित निर्विशिष्ट विचारवाले सम्प्रदायोंमें भी इस वेदान्तसूत्रका आदर परिलक्षित होता है। इस वेदान्तके मायिक विचारके द्वारा जो सभी भाष्यादि और उनके अनुगत टीका तथा सन्दर्भादि पाये जाते हैं, वे सब विष्णुसेवा-रहित, वास्तव-सत्यसे भेद-विचारयुक्त हैं॥१०६॥ अमृतानुकणिका—(भाः १/३/२१)— ‘ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात्।’ ४१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत