भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 459

वस्तुतः ‘वेदान्त’ कहनेपर ‘केवलाद्वैतवाद’ को ही केवल नहीं समझना है। चारों वैष्णवाचार्य भी वेदान्ताचार्य हैं, किन्तु वे शङ्करमतावलम्बी मायावादी नहीं हैं। भेददर्शन-रहित होकर केवलाद्वैत-विचारसे जो अहंग्रहोपासना करते है, उस प्रकारके मायावादपन्थी शुद्धाद्वैत, शुद्धद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत एवं अचिन्त्यभेदाभेदको स्वीकार नहीं करते; अपितु केवलाद्वैत-विचार ही निर्दोष वेदान्तमत है—ऐसा विश्वास करते हैं। प्राकृत शरीर तथा मनके द्वारा जो श्रीकृष्णकी अनित्य सेवा होती है, उससे मायावादी लोग सन्तुष्ट होते हैं, अर्थात् वे लोग श्रीकृष्णभक्तिको मात्र कर्मानुष्ठान-विशेषके रूपमें जानते हैं, इसलिये वह भी ‘अभक्ति’ है, ऐसा कहनेमें उन्हें सन्तोष होता है॥१०१॥ एत शुनि' हासि' प्रभु बलिला वचन। “दुःख ना मानिह यदि, करि निवेदन॥”१०२॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने हँसकर कहा—“यदि आप लोगोंको बुरा ना लगे, तो मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।”॥१०२॥ मायावादी संन्यासियोंकी नम्रता :- इहा शुनि' बले सर्व संन्यासीर गण। “तोमाके देखिये यैछे साक्षात् नारायण॥१०३॥ तोमार वचन शुनि' जुड़ाय श्रवण। तोमार माधुरी देखि' जुड़ाय नयन॥१०४॥ तोमार प्रभावे सबार आनन्दित मन। कभु असङ्गत नहे, तोमार वचन॥”१०५॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी संन्यासी कहने लगे—“आप देखनेमें साक्षात् नारायणकी भाँति हो, आपके वचन सुनकर हमारे कानोंको आनन्द हो रहा है। आपके सौन्दर्यको देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं। आपके प्रभावसे सभीका मन आनन्दित हो रहा है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये, क्योंकि आपके वचन कभी असङ्गत नहीं हो सकते हैं॥”१०३-१०५॥ वेदान्तके सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या :- प्रभु कहे, “वेदान्त सूत्र-ईश्वर-वचन। व्यासरूपे कैल ताहा श्रीनारायण॥१०६॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“वेदान्त-सूत्र साक्षात् ईश्वरकी वाणी है। स्वयं श्रीनारायणने व्यासके रूपमें इसकी रचना की है॥१०६॥ अनुभाष्य-‘सूत्र’— “अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥”(स्कन्द और वायुपुराणमें) अर्थात् “अल्प अक्षरोंसे युक्त, निश्चित (सन्देहरहित), सारयुक्त, सब ओरसे स्पष्ट, अर्थ निर्धारणमें किसी भी प्रकारकी बाधासे रहित एवं निर्दोष (अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असम्भव—ऐसे दोषोंसे दूषित ना हो)—ऐसे वाक्यको सूत्रोंके ज्ञाताजन सूत्र कहते हैं।” सातवाँ अध्याय | ४१७

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