श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/९७-१०१ अनुवाद—श्रीकृष्णनाममें जिस आनन्द-समुद्रका आस्वादन होता है, ब्रह्मानन्द उसके सामने एक छोटेसे गड्ढेमें पड़े जलके समान है॥९७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खातोदक'—गड्ढेमें थोड़ासा जल॥९७॥ अनुभाष्य—आदिलीला ६/४३-४४ संख्या द्रष्टव्य है॥९७॥ हरिभक्तिसुधोदय (१४/३६)— त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद-विशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यापि जगद्गुरो॥”९८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्डा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥९८॥ अनुभाष्य—हे जगद्गुरो! त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य (तत् तव साक्षात्कारणेन दर्शनजनितेन यदाह्लादः स एव विशुद्धः मलरहितः अब्धिः समुद्रः तस्मिन् स्थितस्य) मे (मम) ब्राह्माणि (ब्रह्मानुभव-जनितानि) सुखानि अपि गोष्पदायन्ते (गोष्पदविलस्थ-जलवत् प्रतीयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ संन्यासियोंकी चित्तवृत्तिका क्रमशः परिवर्तन और प्रश्न :— प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' संन्यासीर गण। चित्त फिरि' गेल, कहे मधुर वचन॥९९॥ तथापि भक्तिमें सामान्य, किन्तु मायावादमें दृढ़ श्रद्धा :— “ये किछु कहिले तुमि, सर्व सत्य हय। कृष्णप्रेमा सेइ पाय, यार भाग्योदय॥१००॥ कृष्णे भक्ति कर—इहाय सबार सन्तोष। वेदान्त ना शुन केने, तार किवा दोष॥”१०१॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार मधुर वाक्योंको सुनकर संन्यासियोंका हृदय परिवर्तित हो गया और वे मधुर वचनोंसे कुछ कहने लगे—“आपने जो भी कुछ कहा, वह सब सत्य है। जिसका भाग्योदय होता है, वही श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णभक्ति करो, हम सभीका यही मत है, किन्तु आप वेदान्तका श्रवण क्यों नहीं करते हैं, उसमें क्या दोष है?”॥९९-१०१॥ अनुभाष्य—मायावादी लोग श्रीशङ्करपादके शारीरक-भाष्यके उद्दिष्ट शास्त्रको ही 'वेदान्त' कहते हैं; अर्थात् 'वेदान्त' कहनेपर शाङ्करमतावलम्बी उनके आचार्यकृत केवलाद्वैत-मतमूलक भाष्यतात्पर्य-युक्त उपनिषत् और ब्रह्मसूत्रको लक्ष्य करते हैं। सदानन्दयोगी-कृत 'वेदान्तसार' में—“वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्, तदुपकारीणि शारीरक-सूत्रादीनि च॥” ४१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत