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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ ७/९७-१०१ अनुवाद—श्रीकृष्णनाममें जिस आनन्द-समुद्रका आस्वादन होता है, ब्रह्मानन्द उसके सामने एक छोटेसे गड्ढेमें पड़े जलके समान है॥९७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खातोदक'—गड्ढेमें थोड़ासा जल॥९७॥ अनुभाष्य—आदिलीला ६/४३-४४ संख्या द्रष्टव्य है॥९७॥ हरिभक्तिसुधोदय (१४/३६)— त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद-विशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यापि जगद्गुरो॥”९८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्डा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥९८॥ अनुभाष्य—हे जगद्गुरो! त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य (तत् तव साक्षात्कारणेन दर्शनजनितेन यदाह्लादः स एव विशुद्धः मलरहितः अब्धिः समुद्रः तस्मिन् स्थितस्य) मे (मम) ब्राह्माणि (ब्रह्मानुभव-जनितानि) सुखानि अपि गोष्पदायन्ते (गोष्पदविलस्थ-जलवत् प्रतीयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ संन्यासियोंकी चित्तवृत्तिका क्रमशः परिवर्तन और प्रश्न :— प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' संन्यासीर गण। चित्त फिरि' गेल, कहे मधुर वचन॥९९॥ तथापि भक्तिमें सामान्य, किन्तु मायावादमें दृढ़ श्रद्धा :— “ये किछु कहिले तुमि, सर्व सत्य हय। कृष्णप्रेमा सेइ पाय, यार भाग्योदय॥१००॥ कृष्णे भक्ति कर—इहाय सबार सन्तोष। वेदान्त ना शुन केने, तार किवा दोष॥”१०१॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार मधुर वाक्योंको सुनकर संन्यासियोंका हृदय परिवर्तित हो गया और वे मधुर वचनोंसे कुछ कहने लगे—“आपने जो भी कुछ कहा, वह सब सत्य है। जिसका भाग्योदय होता है, वही श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णभक्ति करो, हम सभीका यही मत है, किन्तु आप वेदान्तका श्रवण क्यों नहीं करते हैं, उसमें क्या दोष है?”॥९९-१०१॥ अनुभाष्य—मायावादी लोग श्रीशङ्करपादके शारीरक-भाष्यके उद्दिष्ट शास्त्रको ही 'वेदान्त' कहते हैं; अर्थात् 'वेदान्त' कहनेपर शाङ्करमतावलम्बी उनके आचार्यकृत केवलाद्वैत-मतमूलक भाष्यतात्पर्य-युक्त उपनिषत् और ब्रह्मसूत्रको लक्ष्य करते हैं। सदानन्दयोगी-कृत 'वेदान्तसार' में—“वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्, तदुपकारीणि शारीरक-सूत्रादीनि च॥” ४१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

वस्तुतः ‘वेदान्त’ कहनेपर ‘केवलाद्वैतवाद’ को ही केवल नहीं समझना है। चारों वैष्णवाचार्य भी वेदान्ताचार्य हैं, किन्तु वे शङ्करमतावलम्बी मायावादी नहीं हैं। भेददर्शन-रहित होकर केवलाद्वैत-विचारसे जो अहंग्रहोपासना करते है, उस प्रकारके मायावादपन्थी शुद्धाद्वैत, शुद्धद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत एवं अचिन्त्यभेदाभेदको स्वीकार नहीं करते; अपितु केवलाद्वैत-विचार ही निर्दोष वेदान्तमत है—ऐसा विश्वास करते हैं। प्राकृत शरीर तथा मनके द्वारा जो श्रीकृष्णकी अनित्य सेवा होती है, उससे मायावादी लोग सन्तुष्ट होते हैं, अर्थात् वे लोग श्रीकृष्णभक्तिको मात्र कर्मानुष्ठान-विशेषके रूपमें जानते हैं, इसलिये वह भी ‘अभक्ति’ है, ऐसा कहनेमें उन्हें सन्तोष होता है॥१०१॥ एत शुनि' हासि' प्रभु बलिला वचन। “दुःख ना मानिह यदि, करि निवेदन॥”१०२॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने हँसकर कहा—“यदि आप लोगोंको बुरा ना लगे, तो मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।”॥१०२॥ मायावादी संन्यासियोंकी नम्रता :- इहा शुनि' बले सर्व संन्यासीर गण। “तोमाके देखिये यैछे साक्षात् नारायण॥१०३॥ तोमार वचन शुनि' जुड़ाय श्रवण। तोमार माधुरी देखि' जुड़ाय नयन॥१०४॥ तोमार प्रभावे सबार आनन्दित मन। कभु असङ्गत नहे, तोमार वचन॥”१०५॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी संन्यासी कहने लगे—“आप देखनेमें साक्षात् नारायणकी भाँति हो, आपके वचन सुनकर हमारे कानोंको आनन्द हो रहा है। आपके सौन्दर्यको देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं। आपके प्रभावसे सभीका मन आनन्दित हो रहा है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये, क्योंकि आपके वचन कभी असङ्गत नहीं हो सकते हैं॥”१०३-१०५॥ वेदान्तके सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या :- प्रभु कहे, “वेदान्त सूत्र-ईश्वर-वचन। व्यासरूपे कैल ताहा श्रीनारायण॥१०६॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“वेदान्त-सूत्र साक्षात् ईश्वरकी वाणी है। स्वयं श्रीनारायणने व्यासके रूपमें इसकी रचना की है॥१०६॥ अनुभाष्य-‘सूत्र’— “अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥”(स्कन्द और वायुपुराणमें) अर्थात् “अल्प अक्षरोंसे युक्त, निश्चित (सन्देहरहित), सारयुक्त, सब ओरसे स्पष्ट, अर्थ निर्धारणमें किसी भी प्रकारकी बाधासे रहित एवं निर्दोष (अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असम्भव—ऐसे दोषोंसे दूषित ना हो)—ऐसे वाक्यको सूत्रोंके ज्ञाताजन सूत्र कहते हैं।” सातवाँ अध्याय | ४१७

[ ७/१०६ वेदान्तसूत्र—(१) ब्रह्मसूत्र, (२) शारीरक, (३) व्याससूत्र, (४) बादरायण-सूत्र, (५) उत्तर- मीमांसा और (६) वेदान्तदर्शन आदि विभिन्न नामोंसे परिचित चार अध्याययुक्त, सोलहपादयुक्त सूत्राकारमें ग्रथित ग्रन्थ है। इस ग्रन्थमें प्रत्येक पादमें कुछ अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरणमें पञ्चाङ्ग-न्याय वर्तमान है, —प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपयन और निगमन। और भाष्यमें— “एको विषय सन्देहः पूर्वपक्षावभाषकः। श्लोकोऽपरस्तु सिद्धान्तवादी सङ्गतयः स्फुटाः॥” अर्थात् “एक श्लोक तो सन्देहका विषय होकर पूर्वपक्षको प्रस्तुत करता है और दूसरा श्लोक सिद्धान्तका वर्णन करता है तथा सङ्गतियोंको स्पष्टरूपसे दिखलाता है।” विभिन्न भाष्योंके अनुसार, —इसके १६२-२२३ तक अधिकरण विभाग लक्षित होते हैं; और सूत्र संख्या—५२०-५६० तक है। ‘वेदान्त’ शब्दसे कोषकार ‘हेमचन्द्र’ कहते हैं—ब्राह्मणके साथ उपनिषद् अंश ही ‘वेदान्त’ है—वेदोंका अवशिष्ट अथवा वेदका शेषभाग अर्थात् वेदोंका अन्त। वेदका चरम उद्देश्य जिस शास्त्रमें प्रदर्शित हुआ है, वह भी ‘वेदान्त’ है। उपनिषत् प्रमाणस्वरूपमें जो शास्त्र व्यवहार होते हैं और उसके सहायक जो सूत्रादि हैं, वह भी ‘वेदान्त’ है। ‘वेदान्त-सूत्र’ को तीन प्रस्थानोंमें अन्यतम ‘न्याय-प्रस्थान’ कहा जाता है। उपनिषदोंको ‘श्रुतिप्रस्थान’ और गीता-भागवत-पुराणादिको ‘स्मृतिप्रस्थान’ कहा जाता है। श्रीनारायणके निःश्वाससे वेद प्रपञ्चमें आये। श्रीनारायणके द्वारा कहे गये वेदविस्तार-शास्त्रको ही ‘सात्वत-पञ्चरात्र’ कहा जाता है। श्रीनारायणके आवेशावतार श्रीव्यास अथवा किसी-किसीके मतमें (शः भाः ३/३/३२) ‘अपान्तरतमा’ ऋषिने वेदान्तसूत्रोंको गूँथा है। पञ्चरात्र और वेदान्तमें एक ही अभिमत प्रकाशित हुआ है, —यही श्रीगौरसुन्दरकी उक्ति है। श्रीव्यासरचित होनेके कारण इसको भी श्रीनारायणके ही वाक्यके रूपमें जानना होगा। श्रीव्यासदेवने सूत्र-रचनाके समय और भी सात ऋषियोंके द्वारा प्रणीत वेदान्त-मतकी समालोचना की हैं; जैसे—आत्रेय, आश्मरथ्य, ओडूलोग्मि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि और बादरी। इनके अतिरिक्त पाराशरी और कर्मन्दीभिक्षु—ये दोनों सूत्र भी श्रीव्यासदेवके रचित सूत्रके पूर्ववर्ती ग्रन्थ है। वेदान्तदर्शनके प्रथम दो अध्यायोंमें ‘सम्बन्ध’ ज्ञान, तृतीय अध्यायमें ‘अभिधेय’ साधन-भक्ति और चतुर्थ अध्यायमें ‘प्रयोजनफल’ भगवत्प्रेमकी कथा ही वर्णित हुई है। सूत्रकार व्यासके द्वारा रचित अकृत्रिम वेदान्तभाष्य ‘श्रीमद्भागवत’ है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतके न्यूनाधिक अनुगत चार वैष्णवाचार्योंके प्रणीत भाष्य और उनके सम्प्रदायोंके अधस्तनोंके द्वारा रचित बहुतसी टीकाओंमें वेदान्तकी भगवद्भजन-तत्परता कही गयी है। विष्णुभक्तिरहित निर्विशिष्ट विचारवाले सम्प्रदायोंमें भी इस वेदान्तसूत्रका आदर परिलक्षित होता है। इस वेदान्तके मायिक विचारके द्वारा जो सभी भाष्यादि और उनके अनुगत टीका तथा सन्दर्भादि पाये जाते हैं, वे सब विष्णुसेवा-रहित, वास्तव-सत्यसे भेद-विचारयुक्त हैं॥१०६॥ अमृतानुकणिका—(भाः १/३/२१)— ‘ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात्।’ ४१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१०६-१०९ ] 'इसके बाद सत्रहवें अवतारमें भगवान् श्रीहरि ही पराशरके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे व्यासरूपमें अवतीर्ण हुए हैं।' भागवत (११/१६/२८) में श्रीकृष्णने कहा— 'द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां' 'व्यासोंमें मैं श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हूँ।' विष्णुपुराण (३/४/५) में कहा गया है— 'कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं स्वयंम्' 'श्रीकृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो।' इन समस्त शास्त्र-प्रमाणोंके बलपर ही कहा है—व्यासरूपमें ही श्रीनारायणने ही वेदान्तसूत्रकी रचना की है॥”१०६॥ (१) ईश्वर-वाक्य—चारों दोषोंसे रहित :— भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। ईश्वरेर वाक्ये नाहि दोष एइसब ॥१०७॥ अनुवाद—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष भगवान्‌के वाक्योंमें नहीं होते हैं॥१०७॥ अनुभाष्य—आदिलीला २/८६ द्रष्टव्य है॥१०७॥ (२) अभिधा (मुख्या)-वृत्तिसे सविशेष-तत्त्व भगवान् ही वेदान्तके द्वारा जानने योग्य :— उपनिषत्-सहित सूत्र कहे येइ तत्त्व। मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ परम महत्त्व॥१०८॥ गौणवृत्तिसे रचित असुरमोहन शाङ्कर-भाष्यके श्रवणसे सर्वनाश :— गौणवृत्त्ये येबा भाष्य करिल आचार्य। ताहार श्रवणे नाश हय सर्व कार्य॥१०९॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्र उपनिषद्‌के प्रमाणों सहित जो तत्त्व कहते हैं, मुख्यवृत्तिके द्वारा उसका जो अर्थ किया जाता है अर्थात् जो स्पष्ट अर्थ है, वही अर्थ श्रेष्ठ है। गौण-वृत्तिके द्वारा श्रीशङ्कराचार्यने जिस भाष्यकी रचना की है, उसे श्रवण करनेसे वेदान्त-उपनिषद्‌का तात्पर्य प्रेमाभक्तिका नाश हो जाता है॥१०८-१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उपनिषद्'—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर, ये ग्यारह वेदशिरोमणि उपनिषद् हैं। 'सूत्र'—चार अध्याय, सोलह पाद युक्त सूत्र अर्थात् ब्रह्मसूत्र है। ये दोनों ही शास्त्रोंमें प्रधान हैं॥१०८॥ अनुभाष्य—मुक्तिकोपनिषदमें (३०-३९) वर्णित १०८ उपनिषद्— “ईशकेनकठ-प्रश्नमुण्डकमाण्डुक्य-तित्तिरिः। ऐतरेयश्च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा॥ ब्रह्मकैवल्यजावालश्वेताश्वो हंस आरुणिः। गर्भो नारायणो हंसो बिन्दुनादशिरः शिखा॥ मैत्रायणी कौषितकी वृहज्जावालतापनी। कालाग्निरुद्रमैत्रेयी सुबालक्षुरिमन्त्रिका॥ सातवाँ अध्याय | ४१९

[ ७/१०८-१०९

सर्वसारं निरालम्बं रहस्यं वज्रसूचिकम्। तेजो नादध्यानविद्यायोगतत्त्वात्मबोधकम्॥ परिव्राट् त्रिशिखी सीता चूड़ा निर्वाणमण्डलम्। दक्षिण शरभं स्कन्दं महानारायणाद्वयम्॥ रहस्यं रामतपनं वासुदेवञ्च मुद्गलम्। शाण्डिल्यं पैङ्गलं भिक्षुमहच्छारीरकं शिखा॥ तुरीयातीतसंन्यासपरिव्राजाक्षमालिका। अव्यक्तैकाक्षरं पूर्णा सूर्याक्षाध्यात्मकुण्डिका॥ सावित्र्यात्मा पाशुपतं परंब्रह्मावधूतकम्। त्रिपुरातापनं देवी त्रिपुरा कठभावना। हृदयं कुण्डली-भस्मरुद्राक्षगणदर्शनम्॥ तारसारमहावाक्यपञ्चब्रह्माग्नि होत्रकम्। गोपालतपनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम्॥ शाठ्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम्। कलिजावालिसौभाग्यरहस्येकाश्रुमुक्तिका॥" अर्थात् ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरिय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, कैवल्य, जावाल, श्वेताश्वतर, हंस, आरूणि, गर्भ, नारायण, परमहंस, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, अथर्व शिरा, अथर्व शिखा, मैत्रायणी, कौषितकी ब्राह्मण, वृहज्जावाल, कालाग्निरुद्र, मैत्रेय, सुबाल, क्षुरिका, मन्त्रिका, सर्वसार, निरालम्ब, राम रहस्य, वज्रसूचिका, तेजो बिन्दु, नाद बिन्दु, ध्यान बिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, आत्मबोध, नारद परिव्राजक, त्रिशिखी ब्राह्मण, सीता, योग चूड़ामणि, निर्वाण, मण्डल ब्राह्मण, दक्षिणामूर्ति, शरभ, स्कन्द, महानारायण, अद्वय तारक, शुकरहस्य, रामतापनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैङ्गल, भिक्षुक, महा, शारीरक, योग शिखा, तुरीयातीत अवधूत, संन्यास, परमहंस-परिव्राजाक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, अन्नपूर्णा, सूर्य, अक्षी, अध्यात्म, कुण्डिका, सावित्रि, आत्मा, पाशुप्रात ब्राह्मण, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापनी, देवी, त्रिपुरा, कठ रुद्र, भावना, रुद्र हृदय, योग कुण्डलिनी, भस्म जावाल, रुद्राक्ष जावाल, गणपति, तारसार, महावाक्य, पञ्चब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, गोपालतापनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, वराह, शाठ्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड़, कलिसन्तरण, जाबालि, सौभाग्य लक्ष्मी, सरस्वती रहस्य, बह्वृच, दर्शन, नृसिंहतापनी और मुक्तिका-ये १०८ उपनिषद् हैं। 'मुख्यवृत्ति' अर्थात् अभिधा-वृत्ति है। जिस शक्तिके द्वारा कोष-व्याकरणादिमें प्रसिद्ध अर्थका बोध होता है, वह 'अभिधा' है। 'गौणवृत्ति' का अर्थ है लक्षणावृत्ति। जिस शक्तिके द्वारा किसी प्रयोजनके लिये अथवा बहुप्रयोगके कारण वास्तविक अर्थसम्बन्धीय अन्य अर्थका बोध होता है, वह 'लक्षणा-वृत्ति' है। 'भाष्य'-जैसे, “सूत्रस्थं पदमादाय वाक्यैः सूत्रानुसारिभिः। स्व-पदानि च वर्णन्त्ये भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥” अर्थात् “भाष्य तत्त्वको जाननेवालोंने उसे भाष्य कहा है जिसमें सूत्रमें स्थित पदोंको लेकर सूत्रका अनुसरण करनेवाले वाक्योंके द्वारा अपने पद (शब्दों) का वर्णन किया जाता है।”

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७/१०८-१०९ ] उपनिषद् एवं सूत्रका प्रतिपाद्य सविशेष-तत्त्व ही श्रेष्ठ है-यह मुख्या (अभिधा) वृत्तिका अवलम्बन करके प्रदर्शित हुआ है। निर्विशेषवादी गौणी (लक्षणा) वृत्तिका अवलम्बन करके जो तत्त्वाभास प्रदर्शन करते हैं, वह 'तत्त्ववाद' के बदले 'मायावाद' नामसे प्रसिद्ध है। श्रीविष्णुस्वामीके शुद्धाद्वैत-विचारको दबाकर श्रीशङ्कराचार्यके केवलाद्वैतविचारका व्यापक प्रचार होने लगा। तब श्रौत-पथका अवलम्बनकर श्रीरामानुजाचार्यने 'विशिष्टाद्वैतवाद' और श्रीमध्वचार्यपादने 'तत्त्ववाद' के द्वारा अतात्त्विकोंके तर्कपन्थामूलक सिद्धान्तका खण्डन किया। महाप्रभुने अभिधा-वृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके अर्थोंका आदर किया है। श्रीशङ्कराचार्यने लक्षणावृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके जिन अर्थोंको अपने भाष्यमें लिखा है, उसके द्वारा सर्वनाश होता है। जैसे पद्मपुराणमें कहा गया है- “शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम्। येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥ अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम्। कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥ सर्वकर्मपरिभ्रंशात्रैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते। परात्म-जीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥” अर्थात् “हे देवि सुनो ! मैं तामस शास्त्रका क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे ज्ञानियोंका भी अधःपतन हो जाता है। वेद वचनोंका लोकनिन्दित हीन अर्थ दिखलाते हुए इस शास्त्रमें कर्मका स्वरूपतः त्याज्यत प्रतिपादित किया गया है। इसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करनेसे ही निष्काम कर्मसे प्राप्त होनेवाले ज्ञान (नैष्कर्म्य) की प्राप्तिका वहाँ वर्णन किया गया है। तथा मेरे द्वारा यहाँ परमात्मा और जीवके ऐक्यका प्रतिपादन किया गया है।” अन्त्यलीला, २/९४-९९ संख्या द्रष्टव्य है॥१०८-१०९॥ अमृतानुकणिका—शब्दकी तीन वृत्तियाँ हैं-मुख्य, लक्षणा और गौणी। किसी भी शब्दकी स्वाभाविक शक्तिके द्वारा जो अर्थ प्रतिपन्न होता है, शब्द उच्चारण करने मात्रसे ही उसका जो अर्थ मनमें उदित होता है, उसे शब्दका मुख्यार्थ कहते हैं। शब्दकी जिस वृत्ति या शक्तिके द्वारा जिस मुख्यार्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसे मुख्यवृत्ति कहते हैं। जैसे 'गौ'-शब्द उच्चारण करनेसे ही, गलकम्बल (गलेके नीचे झूलते मांसपिण्ड), पूँछ, सींग आदि चार पैरोंके जन्तु-विशेषका विचार मनमें आता है। यह जन्तु-विशेष ही गौ-शब्दका मुख्यार्थ है। और गौ-शब्दकी जिस वृत्तिके द्वारा इस अर्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको गौ-शब्दकी मुख्यवृत्ति कहते हैं। जिस धातु और प्रत्ययके योगसे कोई शब्द निष्पन्न होता है, उस धातु और प्रत्ययके अर्थयोगसे शब्दके जो-जो अर्थ प्राप्त होते हैं, वे ही उस शब्दके मुख्यार्थ हैं। और जिस वृत्तिके द्वारा इस मुख्य शब्दकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको ही मुख्यवृत्ति कहते है। मुख्यार्थको 'अभिधावृत्ति' का अर्थ भी कहा जाता है। 'अभिधा' - अभिधा न्यायमते शब्दशक्तिः। मीमांसामते विधिसमवेतविधिव्यापारीभूतपदार्थः। तस्या लक्षणम्-स मुख्योऽर्थस्तत्रस्तत्र मुख्योव्यापारोऽस्याभिधोच्यते। इति शब्दकल्पद्रुमधृत काव्यप्रकाशवचनम्॥ 'लक्षणावृत्ति' - मुख्य अर्थकी सङ्गति ना होनेपर वाच्यसम्बन्धविशिष्ट अन्य पदार्थकी सातवाँ अध्याय | ४२१

[ ७/१०८-१०९

प्रतीतिको लक्षणा कहते है। 'लक्षणा' - "मुख्यार्थबाधे शक्यस्य सम्बन्धे याऽन्यधीर्भवेत्। सा लक्षणा। अलङ्कारकौस्तुभ। २/१२।" जैसे “गङ्गामें घोष वास करते हैं"- यहाँपर गङ्गा-शब्दके मुख्यार्थसे भागीरथी नामक नदी विशेषको समझा जाता है। ऐसा होनेसे मुख्यार्थमें वाक्यका अर्थ इस प्रकार होगा- "भागीरथी नदीके बीचमें घोष वास करते हैं", किन्तु नदीके बीचमें वास करना सम्भव नहीं है। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती। तभी गङ्गा-शब्दका अर्थ गङ्गा-तीर करना होगा, क्योंकि गङ्गा-तीरपर वास करना सम्भव है। गङ्गा-तीरका गङ्गाके साथ सम्बन्धविशिष्ट भी है। ऐसा होनेपर उक्त वाक्यका अर्थ होगा- “गङ्गाके तीरपर घोष वास करते हैं।" यह अर्थ लक्षणावृत्तिके द्वारा प्राप्त अर्थ कहलाता है। मुख्यार्थकी असङ्गति होनेपर ही लक्षणावृत्तिका आश्रय लेना होता है। मुख्यार्थकी सङ्गति होनेपर भी यदि लक्षणावृत्तिसे अर्थ किया जाय, तब उस लक्षणासे प्राप्त अर्थ असङ्गत होगा, क्योंकि इस प्रकार अर्थ करनेकी प्रथा शास्त्र द्वारा अनुमोदित नहीं है। लक्षणाके अनेक प्रकार भेद है। श्रीपाद जीव गोस्वामीने तीन प्रकारके लक्षणाका वर्णन किया है-अजहत्स्वार्था, जहत्स्वार्था और जहदजहत्स्वार्था। “अजहत्स्वार्था-न जहति पदानि स्वार्थं यस्यां सा; अर्थात् जो लक्षणासे पदोंके निज अर्थका परित्याग ना करे।" जैसे-कौओसे दहीकी रक्षा करो। इस प्रकारका आदेश यदि किसीको दिया जाय, तो वह व्यक्ति केवल कौओंसे दहीकी रक्षा करेगा, ऐसा नहीं है। बिल्ली, कुत्ता आदि जो कोई भी दहीको नष्ट करनेके लिये आयेंगे, उन सबसे दहीकी रक्षा करेगा। मूल उद्देश्य है, दहीकी रक्षा करना। यहाँपर कौआ-शब्दके मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती है, क्योंकि मुख्यार्थ ग्रहण करनेसे केवल कौओंके उत्पातसे दहीकी रक्षा करनी है, अन्य किसी जन्तुके उपद्रवसे रक्षा नहीं करनी है, ऐसा आदेशका अभिप्राय नहीं है, क्योंकि फलस्वरूप दहीकी रक्षा नहीं होगी। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर कौआ-शब्दसे कौआ और कौओके समान उपद्रवकारी जन्तुओंसे दहीकी रक्षा करनी होगी। यहाँपर कौआ-शब्दका अर्थ कौआ तो है ही, परन्तु कौआ-शब्दसे दही नष्ट करने वाले अन्य जन्तुओंको भी समझना होगा। यहाँ कौआ-शब्द अपना अर्थ त्याग ना करके अर्थकी और भी व्यापकता धारण करता है। यह 'अजहत्स्वार्था' लक्षणाका दृष्टान्त है। “जहत्स्वार्था-जहति पदानि स्वार्थं यस्याम्; अर्थात् जिस लक्षणापें पदसमूह अपने अर्थका परित्याग करते हैं, उनको जहत्स्वार्था लक्षणा कहते है।" जैसे “मंचाः क्रोशन्ति"-मंच चीत्कार कर रहा है, यह वाक्यका मुख्यार्थ है, किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि मंच कभी चीत्कार नहीं कर सकता। तब मंच-शब्दके मुख्यार्थका त्याग करके अर्थात् मंच-शब्दका मंच अर्थ ना ग्रहण करके 'मंचस्थ-पुरुष' अर्थ ग्रहण करना होगा; मंचपर स्थित लोग चीत्कार कर रहे हैं, इस प्रकारसे अर्थ ग्रहण करना होगा। मंचपर विराजमान लोगोंका मंचके साथ सम्बन्ध है, इसलिये यहाँपर लक्षणा है और मूल शब्द मंचका त्याग किया है, इसे 'जहत्स्वार्था' लक्षणा कहते हैं। "जहदजहत्स्वार्था-वाच्यार्थैकदेशत्यागेनै कदेशवृत्तिर्लक्षणा; अर्थात् जिस लक्षणामें किसी भी शब्दके मुख्यार्थका एक अंश त्याग करके अन्य अंश ग्रहण करना होता है, उसको जहदजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं।" मायावादियोंने तत्त्वमसि वाक्यका इसी जहदजहत्-लक्षणाका आश्रय लेकर अर्थ किया है। तत्त्वमसि-तत् (वह ब्रह्म) त्वम् (तुम)

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७/१०८-१०९ ] असि (हो)। तत् शब्दसे सर्वज्ञता आदि गुणविशिष्ट चैतन्यको (ब्रह्मको) लक्ष्य किया गया है; त्वम् पदसे अल्पज्ञ चैतन्यको (जीवको) लक्ष्य किया गया है। चैतन्य स्वरूपसे दोनोंमें कोई भेद नहीं है, किन्तु ब्रह्म सर्वज्ञ और जीव अल्पज्ञ है, इस कारण इनका अभेद स्थापन नहीं किया जा सकता। तत् और त्वम् शब्दके मुख्यार्थसे यहाँपर भेद ही प्रतिपन्न होता है, क्योंकि एक (ब्रह्म) होनेसे सर्वज्ञ और दूसरा (जीव) होनेसे अल्पज्ञ है। इस प्रकार इनमें बहुत भेद है। परन्तु दोनोंका अभेद प्रमाणित करनेके लिये तत् (ब्रह्म)-शब्दके मुख्यार्थसे सर्वज्ञत्व-अंश त्यागकर केवल चैतन्य-अंश ग्रहण करना है और उसी प्रकार त्वम् (जीव)-शब्दके भी मुख्यार्थसे अल्पज्ञत्व-अंश त्याग करके केवल चैतन्य-अंशको ग्रहण करना है। ऐसा करनेसे तत्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है और त्वम्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है; अर्थात् तत् और त्वम् इन दोनों शब्दोंका एक ही चैतन्य-अर्थ मिलता है। दोनोंको चैतन्य कहकर दोनोंके बीचमें कोई भी भेद नहीं रहता। इस प्रकार अर्थ करके मायावादी लोग तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव और ब्रह्मका अभेदत्व प्रमाणित करते हैं। तत्-शब्दके मुख्यार्थ “सर्वज्ञ चैतन्य” से एक अंश “सर्वज्ञ” त्यागकर दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया और त्वम्-शब्दके भी मुख्यार्थ “अल्पज्ञ चैतन्य” से भी एक अंश “अल्पज्ञ” त्याग करके दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया। इसलिये यह 'जहदजहत्स्वार्था' लक्षणा हुआ है। और “चैतन्य” अर्थ ग्रहण करनेसे मुख्यार्थके साथ भी दोनों शब्दोंका सम्बन्ध रहनेपर यह लक्षणा भी हुआ। इसलिये तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव-ब्रह्मके अभेदवाचक अर्थ करनेसे जहदजहत्स्वार्था लक्षणाका ही आश्रय लेना होगा। “गौणीवृत्ति-गौणी चाभिहितार्थलक्षितगुणयुक्ते तत्सदृशे-सर्वसंवादिनीते श्रीजीव; अर्थात् मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर मुख्यार्थका कोई भी एक गुण लेकर मुख्यार्थके सादृश्ययुक्त जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, उसको गौणार्थ कहते हैं और जिस वृत्तिके द्वारा यह अर्थ प्राप्त होता है, उसे 'गौणीवृत्ति' कहते हैं।” जैसे, “सिंहोऽयम् देवदत्तः-यह देवदत्त एक सिंह है।” सिंह-शब्दके मुख्यार्थसे अत्यन्त विक्रमशाली पशुविशेषको समझा जाता है। देवदत्त एक मनुष्य है, उसके चार पैर नहीं हैं, उसकी पूँछ नहीं है, उसके रोम नहीं हैं, सिंहके जैसे उसके केशर नहीं है; इसलिये “देवदत्त एक सिंह है”—वाक्यसे “देवदत्त सिंहके समान एक पशु है” इस प्रकारका अर्थ सङ्गत नहीं होता। अर्थात् सिंह-शब्दका मुख्यार्थ यहाँ ग्रहण नहीं किया जा सकता। तब सिंह-शब्दका मुख्यार्थ त्यागकर सिंहके विक्रमशालीत्व गुणको ग्रहण करके सिंह-शब्दका अर्थ करना होगा-सिंहके समान विक्रमशाली। “यह देवदत्त सिंहके समान विक्रमशाली है”—यही इस वाक्यका अर्थ होगा। विक्रमशालीत्व-अंशमें सिंहके साथ देवदत्तका सादृश्य है। मुख्यार्थके एक गुणको लेकर यह अर्थ करनेपर इसको गौणीवृत्तिमूलक अर्थ कहा जाता है। किसी किसी व्याकरणमें गौणीवृत्तिको एक पृथक् वृत्ति स्वीकार नहीं किया है। उनके अनुसार गौणीवृत्ति भी एक प्रकारसे लक्षणा है। उनके मतमें लक्षणा दो प्रकारकी है-गौणी और शुद्धा। जिस अर्थमें मुख्यार्थके गुण सादृश्य मात्रको ग्रहण किया जाता है, वही गौणी-लक्षणासे प्राप्त अर्थ है। गुण सादृश्यके अतिरिक्त अन्य प्रकारके लक्षणाके द्वारा प्राप्त अर्थको शुद्धालक्षणालब्ध अर्थ कहा जाता है। उपरोक्त “सिंहोऽयम् देवदत्तः” वाक्यके अर्थ-प्रसङ्गमें सातवाँ अध्याय | ४२३

[ ७/१०८-११० मुख्यार्थ “विक्रमशाली पशुविशेष” से “पशुविशेष” अंश त्यागकर “विक्रमशाली” अंश ग्रहण किया है, इसलिये इस अर्थको जहदजहत्-लक्षणा अर्थ भी माना गया है। पूर्वोक्त आलोचनासे यह स्पष्ट समझा जाता है कि लक्षणावृत्ति और गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेसे युक्ति और कल्पनाका सहारा लेना होता है। मुख्यवृत्तिमें युक्ति और कल्पनाकी सहायता ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है। साधारणतः जिस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करनेसे शब्द अथवा वाक्यकी अर्थ सङ्गति नहीं होती, उसी स्थानपर ही लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करना होता है। जिस ग्रन्थमें भ्रम-प्रमादादि दोष रहते हैं, ग्रन्थकारकी मर्यादाकी रक्षाके लिये भ्रम-प्रमादादिको ढकनेके उद्देश्यसे उस ग्रन्थकी व्याख्यामें लक्षणावृत्ति या गौणीवृत्ति अवलम्बनका प्रयोजन होता है। किन्तु वेदान्तसूत्रमें ये सब दोष नहीं हैं, इसलिये लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे उसकी व्याख्याका कोई प्रयोजन नहीं है। जिस स्थानपर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है, उस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे ही वास्तव अर्थ प्राप्त होता है; उस स्थानपर अपनी कल्पनाके द्वारा लक्षणा या गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेपर मुख्यार्थ जो वाक्यका वास्तविक अर्थ है, वह प्रच्छन्न हो जाता है। श्रीपाद शङ्कराचार्यने वेदान्त सूत्रका जो भाष्य किया है, उसमें उन्होंने मुख्यवृत्ति त्यागकर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे ही सूत्रोंके अर्थ किये हैं। इससे सूत्रोंके मुख्यार्थ प्रच्छन्न हो गये और उनके कल्पित अर्थको ही प्रधान्य प्राप्त हुआ है। इसलिये शङ्कराचार्यके भाष्य सुननेपर वेदान्तके वास्तविक अर्थको नहीं जाना जा सकता। इसलिये उसको श्रवण करनेसे किसीका भी उपकार तो होगा नहीं, कल्पित व्याख्या सुननेसे वरन् यथेष्ट अपकार ही होगा॥१०८-१०९॥ ताँहार नाहिक दोष, ईश्वर-आज्ञा पाञा। गौणार्थ करिल, मुख्य अर्थ आच्छादिया ॥ ११०॥ अनुवाद—वास्तवमें श्रीशङ्कराचार्यका इसमें कोई दोष नहीं है, उन्होंने भगवान्‌के आदेशसे ही वेदान्तके मुख्य अर्थका आच्छादनकर गौणार्थका प्रचार किया है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये प्रधानशास्त्र (वेदान्तसूत्र और उपनिषद्) मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधावृत्तिके द्वारा जिस तत्त्वकी शिक्षा देते हैं, वही परम महत्वपूर्ण है। श्रीशङ्कराचार्यने इस शास्त्रकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर गौणवृत्ति अर्थात् लक्षणावृत्तिके द्वारा केवलाद्वैतवाद-सिद्धान्तके आधारपर जो भाष्य लिखा है, उसे श्रवण करनेसे सभी परमार्थिक कार्योंका नाश होता है। यदि कहें कि साक्षात् शिवजीके अवतार श्रीशङ्करस्वामीने इस प्रकार अवैध कार्य क्यों किया? तो सुनो, ईश्वरकी आज्ञासे ही इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण उनका दोष नहीं है। जैसे पद्मपुराणमें श्रीमहादेवने पार्वतीजीसे कहा है— “मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते। मयैव कल्पितं देवी कलौ ब्राह्मणरूपिणा॥ ब्रह्मणश्चापरं रूपं निर्गुणं वक्ष्यते मया। सर्वस्वं जगतोऽप्यस्य मोहनार्थं कलौ युगे॥ वेदान्ते तु महाशास्त्रे मायावादमवैदिकम्। मयैव वक्ष्यते देवि जगतां नाशकारणात्॥” ४२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/११०-११३ ] अर्थात् “देवि ! मायावाद अत्यन्त असत्-शास्त्र है। यह बौद्धमत है, वैदिक-वाणियोंकी आड़में प्रच्छन्न रूपसे आर्योंके धर्ममें प्रवेश कर गया है। मैं कलिकालमें ब्राह्मण-मूर्त्ति धारणकर इस मायावादका प्रचार करूँगा। मैं नास्तिकोंको मोहित करनेके लिये भगवान्‌को निराकार और निर्विशेष घोषित करूँगा। इसी प्रकार मैं वेदान्तकी व्याख्या भी मायावादके अनुसार करके जगत्‌के नाशके लिये उन्हें भगवान्‌से दूर कर दूँगा।” शिवपुराणमें भगवत्-वाक्य— “द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु। स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिङ्मुखान् कुरु॥” अर्थात् “कलियुगमें मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे विमुख करो॥”१०८-११०॥ अमृताणुकणिका—गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित “जैवधर्म” का अठारहवाँ अध्याय और श्रीकेशवजी गौड़ीय मठसे प्रकाशित “मायावादकी जीवनी या वैष्णव विजय” ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं॥११०॥ (३) चित्‌विलास-वैभवमय भगवान् ही श्रुति-प्रतिपाद्य :— ‘ब्रह्म’-शब्दे मुख्य अर्थे कहे—‘भगवान्’। चिदैश्वर्य-परिपूर्ण, अनूर्ध्व-समान॥१११॥ ताँहार विभूति, देह, —सब चिदाकार। चिद्विभूति आच्छादिया कहे ‘निराकार’॥११२॥ तत्त्ववस्तुको निराकार और विष्णु-शरीरादिको मायिक-विकार कहना ही ‘मायावाद’ :— चिदानन्द-देह, ताँर स्थान, परिवार। ताँरे कहे,—प्राकृत-सत्त्वेर विकार॥११३॥ अनुवाद—‘ब्रह्म’ शब्दका मुख्य अर्थ है ‘भगवान्’, जो चित्-ऐश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और उनसे बड़ा अथवा उनके समान कोई नहीं है। उनकी विभूतियाँ (धाम-परिकरादि) और विग्रह (शरीर)—ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने उनकी चित्-विभूतियोंको आच्छादनकर उनको ‘निराकार’ बतलाया है। भगवान्‌का शरीर, धाम और परिकर, ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने इनको प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा है॥१११-११३॥ अनुभाष्य—सदानन्दयोगीन्द्रकृत ‘वेदान्तसार’ में— “वस्तु सच्चिदानन्दमद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादि-सकलजड़समूहः अवस्तु। अज्ञानन्तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधिभावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्ति। इदमज्ञानं समष्टिव्यष्ट्यभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते। इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्व-प्रधानम्; एतदुपहितं चैतन्यं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्व-सर्वनियन्तृत्त्वादिगुणकं सदसद्व्यक्तमन्तर्यामिजगत्कारणमीश्वर इति च व्यपदिश्यते। सकलाज्ञानावभासकत्वादस्य सर्वज्ञत्वम्।” शाङ्कर-वेदान्तिक सदानन्दने अपने ‘वेदान्तसार’ ग्रन्थमें संक्षेपमें शङ्करमतका तात्पर्य लिखा है। यह अब शाङ्कर-सम्प्रदायका अतिमान्य प्रामाणिक आधार है। “सच्चिदानन्द अद्वयवस्तु ही ब्रह्म है; अज्ञानादि सभी जड़समूह ही अवस्तु है। ‘अज्ञान’ कहनेपर सत् और असत्‌से पृथक्, अनिर्वचनीय, त्रिगुणात्मक, ज्ञानविरोधी भावरूप जो कुछ हैं, उन्हीं सभीको समझना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ४२५

[ ७/१११-११५ यह अज्ञान समष्टि और व्यष्टि भेदसे एक तथा अनेक रूपोंमें व्यवहृत होता है। यह समष्टि उत्कृष्ट उपाधिविशिष्ट होनेपर 'विशुद्धसत्त्व-प्रधान' नाम प्राप्त करता है। विशुद्धसत्त्व-प्रधान अज्ञानमें प्रतिफलित होनेसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, सदसदव्यक्त, जीवसमूहके अन्तर्यामी, जगत्के कारण 'ईश्वर' नामसे कहलाते हैं। 'ईश्वर'—सभी अज्ञानका प्रकाशक होनेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं।” इनके मतमें, ईश्वरत्व प्राकृत-सत्त्वका अज्ञानसे उत्पन्न विकारमात्र है। जीव मलिन-सत्त्वप्रधान और व्यष्टि-उपाधिविशिष्ट है। मध्यलीला, २५/३३-३४ संख्या द्रष्टव्य हैं॥१११-११३॥ आदेशपालक शङ्करका दोष ना रहनेपर भी उनके भाष्यके श्रवणसे जीवोंका सर्वनाश :- ताँर दोष नाहि, तेंहो आज्ञाकारी दास। आर येइ सुने, तार हय सर्वनाश ॥११४॥ अनुवाद-वेदान्तका इस प्रकार भाष्य करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे भगवान्‌के आज्ञाकारी दास हैं। किन्तु जो इस भाष्यका श्रवण करेगा, उसका सर्वनाश होगा॥११४॥ अनुभाष्य-मध्यलीला ६/१६९ संख्या द्रष्टव्य है॥११४॥ मायाधीश विष्णुको मायिक-मानना ही पाषण्डता :- प्राकृत करिया माने विष्णु-कलेवर। विष्णुनिन्दा आर नाहि इहार उपर ॥११५॥ अनुवाद-विष्णुके सच्चिदानन्दमय दिव्य कलेवरको प्राकृत अर्थात् पञ्चभौतिक माननेसे अधिक विष्णुनिन्दा नहीं हो सकती है॥११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विषयको पढ़ते ही जो अर्थ मुख्यरूपसे अर्थात् स्पष्टरूपसे प्रकाशित होता है, उसे 'मुख्यार्थ' कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद्में- “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते” (५/१) अर्थात् “अप्राकृत सच्चिदानन्द भगवान् जो पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, उनसे जितने अवतार आविर्भूत होते हैं, वे भी पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं।” श्वेताश्वतर उपनिषद्में- “विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणः” अर्थात् “आदिपुरुष भगवान्में विचित्र शक्तियाँ हैं”; “स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात् प्रपञ्च परिवर्ततेऽयम्। धर्मावहं पापनुदं भगेशं” (६/६), अर्थात् “पीपल वृक्षके समान जो संसार अथवा माया है, भगवान् उससे सम्पूर्णरूपसे अतीत हैं अर्थात् संसार वृक्षरूप माया उन्हें कभी भी स्पर्श नहीं कर पाती। वे केवल मायातीत नहीं हैं, अपितु वे मायाधीश हैं। माया उनकी ही बहिरङ्गा शक्ति है और उनके अधीन है। भगवान् स्वयं अप्राकृत गुणोंसे युक्त हैं और वे अपने भक्तोंको मायाके सभी दोषोंसे मुक्त करते हैं”; “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” (३/८) ४२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अर्थात् “जिस प्रकार सूर्य उदित होकर रात्रिके समस्त अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, मैं भी उसी प्रकार भगवान्‌की कृपासे मायाके तमिस्र-अन्धकारसे मुक्त हुआ और तब उनके अप्राकृत स्वरूपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त किया”; “पतिं पतीनां परमं परस्तात्” (६/७) अर्थात् “वे सब ईश्वरोंके ईश्वर हैं और सर्वश्रेष्ठ हैं”; “महान् प्रभुर्वे पुरुषः” (३/१२) अर्थात् “वे सबके प्रभु और परम पुरुष हैं”; “परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते”। (६/८) अर्थात् “उन परमेश्वरकी शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है”। ऋग्वेदमें- “तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” अर्थात् “विष्णु परम भगवान् हैं और बुद्धिमान लोग उसके चरणोंका ध्यान करते हैं”; प्रश्नोपनिषद्में- “स ईक्षांचक्रे” (६/३) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”; ऐतरेये उपनिषद्में- “स ऐक्षत” (१/१/१) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”, “स इमाँल्लोकानसृजत” (१/१/२) अर्थात् “उन्होंने भौतिक जगत्की सृष्टि की”; तलवकार उपनिषद्में- “तद्धैषां विजज्ञौ तभ्यो ह प्रादु-र्बभूव” (३/२); -इस प्रकार बहुतसे वेद वाक्योंको पढ़ने मात्रसे ही षडैश्वर्य-परिपूर्ण, असमोर्ध्व, एक परतत्त्व भगवान् ही प्रतीत होते हैं। तब जो “अपाणिपादः” (श्वेः ३/१९) आदि आकार-निषेध वाक्य पाये जाते हैं, उनके द्वारा उन्हीं भगवान्‌के आकारको चिदाकार, उनके शरीर और विभूतियोंको चिद्विभूति-यही मात्र समझना होगा। मायावादियोंके प्रमुख आचार्योंने भगवान्‌की चिद्विभूतियोंको आच्छादनकर, उनको सत्त्वगुणका विकाररूप 'निराकार' कहकर स्थिर किया है। जब भगवान् स्वयं, उनका धाम और उनके परिकर, सभी प्रकृतिसे अतीत चिदानन्दस्वरूप हैं, तब उनको किस प्रकार प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा जा सकता है? वास्तवमें अप्राकृत चिद्विभूतिमय उनका आकार ही सत्य है। इस प्रकार निराकाररूपमें वर्णन करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका क्या दोष है? क्योंकि वे तो आज्ञाकारी दास हैं। जैसे नारद पञ्चरात्रमें-“माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा।” अर्थात् “मेरे तत्त्वको तुम छुपाओ जिससे यह सृष्टि उत्तरोतर बढ़े।” किन्तु अन्य जो व्यक्ति इस प्रकार व्याख्या श्रवण करेंगे, उनका सर्वनाश होता है। विष्णुकलेवरको 'प्राकृत' माननेकी भाँति विष्णुनिन्दा और हो नहीं सकती॥१११-११५॥

[ ७/११५-११७ अनुभाष्य—सविशेष तत्त्ववस्तु ही विष्णु हैं। विष्णुकी प्रकृति ही प्राकृत जड़-जगत्की मूल है। विवर्तवाद विचारसे निर्विशेष-ब्रह्मकी प्रकृति या मायाशक्तिका वास्तविक अस्तित्व नहीं पाया जाता है। विष्णुमायाके सम्बन्धमें शास्त्रोंने बहुत वर्णन किया है। 'विष्णु'-मायासे उत्पन्न कोई देव-विशेष नहीं हैं। जो लोग इस प्रकार मानते हैं, उनकी विष्णुके विषयमें विपरीत धारणा है। विष्णुकी गणना प्राकृत-देवोंमें कभी भी नहीं हो सकती। जो लोग इस प्रकारसे भ्रान्त होते हैं, वे लोग ही विष्णुको प्राकृत देवताके रूपमें जानते हैं। श्रीभगवान्ने गीता (७/१४) में जीवोंके भवबन्धन-मोचनके लिये कहा है— “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥” अर्थात् “यह जीव-विमोहिनी एवं त्रिगुणात्मिका मेरी बहिरङ्गा शक्ति निश्चय ही दुस्तरा है, परन्तु जो मेरा ही आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस मायाको पार कर जाते हैं।” विष्णु-वैकुण्ठ वस्तु हैं। उनको प्रकृतिसे उत्पन्न देवता माननेसे वस्तुनिर्देश-सम्बन्धमें अपराध होता है—यही उनकी निन्दा है। विष्णु-अधोक्षज वस्तु हैं, उन्हें प्राकृत वस्तुकी भाँति जड़-इन्द्रियोंके द्वारा जाना नहीं जा सकता। उनके देह-देहीके मध्यमें अद्वयज्ञान अवस्थित है (अर्थात् उनकी देह और उन देहीमें कोई भेद नहीं है)। प्राकृत वस्तुओंमें देह-देहीका भेद वर्तमान है। प्राकृत वस्तुएँ भोगकी सामग्री हैं, किन्तु विष्णु नित्यकाल भोक्ता हैं। 'भोक्ता' को 'भोग्य' माननेसे अपराध होता है और जीवोंकी नित्यसेव्य-वस्तुको जीवोंके समान सेवक-ज्ञानसे परिचय देनेसे उनकी निन्दा ही होती है। आदिलीला ७/११२-११३ संख्याका अनुभाष्य और मध्यलीला २५/३५-३९ संख्या द्रष्टव्य हैं॥११५॥ तत्त्व-वस्तु-बृहत्-अग्निसदृश, जीव-उनके चिङ्गारी-कण :— तत्त्व येन ईश्वरेर ज्वलित ज्वलन। जीवेर स्वरूप-यैछे स्फुलिङ्गेर कण॥११६॥ जीव-शक्ति, श्रीकृष्ण-शक्तिमान्-तत्त्व :— जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान्। गीता-विष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण॥११७॥ अनुवाद-वास्तविक तत्त्व यह है कि यदि भगवान्‌को जलती हुई अग्निकी भाँति कहा जाय, तो जीवका स्वरूप उस अग्निके स्फुलिङ्ग-कण अर्थात् चिङ्गारीकी भाँति है। जीवतत्त्व भगवान्‌की तटस्था शक्ति है और श्रीकृष्णतत्त्व शक्तिमान् तत्त्व है। गीता और विष्णुपुराणादि इसके प्रमाण हैं॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ईश्वरके तत्त्वकी जलती हुई अग्निके साथ तुलना करनेसे अनन्त जीवोंकी उस अग्निकी चिङ्गारीके कण-स्वरूप तुलना की जाती है। तात्पर्य यह है कि, ईश्वर-चिन्मय, असीम, जलती हुई अग्निके समान हैं और अनन्त जीव उनसे चिङ्गारीके कण-स्वरूप पृथक् तत्त्व होकर निकले हैं। यहाँपर जीवके स्वरूप गठनमें मायाकी कोई क्रिया ४२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

नहीं है, अर्थात् कोई प्राकृत कार्यकलाप नहीं है। यदि कहो कि इस प्रकार चित्कणोंके गठनका क्या प्रयोजन है? तो सुनो, ईश्वरकी विचित्र स्वरूपशक्तिकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है—असीम-क्रियाप्रवृत्ति और अणु-क्रियाप्रवृत्ति। असीम-क्रियाप्रवृत्तिसे ईश्वर-स्वरूप और चित्जगत्रूप वैकुण्ठतत्त्व है; इस प्रवृत्तिको 'चित्शक्ति' कहा जाता है। अणु-क्रियाप्रवृत्तिसे अणुचैतन्यरूप अनन्त जीव प्रकट होते हैं; इस प्रवृत्तिको 'जीवशक्ति' कहा जाता है। स्वरूप-शक्तिकी यदि ये दो वृत्तियाँ नहीं रहतीं, तो भगवान्की पूर्णतामें कमी आ जाती। पूर्णेश्वर्यमय भगवान्के शक्तिगत अणुक्रियारूप जीवका अस्तित्व अनिवार्य और अत्याज्य है। इसलिये जीवतत्त्वसे ही श्रीकृष्णतत्त्वमें शक्तिमत्ता (विलास) है। जीवतत्त्वके ना रहनेसे श्रीकृष्णकी पूर्ण-शक्तिमत्ता स्वीकृत नहीं होगी। ईशितव्यके (सेवकके) अभावसे ईशिताका (स्वामीका) अभाव होता है॥११७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (७/५)— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥११८॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पञ्चभूतरूप स्थूल-जगत् है तथा मन, बुद्धि और अहङ्कार-रूप लिङ्ग-जगत् है। इस आठ प्रकारसे विभक्त प्रकृति—'अपरा' अथवा 'जड़ा' है; इसका नाम 'माया-प्रकृति' है। इससे पृथक् मेरी और एक 'परा-प्रकृति' है। यही प्रकृति ही जीवस्वरूप होकर इस जगत्में परिपूर्ण है। तात्पर्य यह है,—भगवान् ही एक मात्र वस्तु हैं; उनकी एक 'स्वरूप' अथवा 'आत्म'-शक्ति है। उसी स्वरूप-शक्तिसे पृथक्-प्राय, अर्थात् उसकी छायाकी भाँति जो शक्ति प्रतीत होती है, उसका नाम 'माया-शक्ति' है। स्थूल और लिङ्गमय जड़ ब्रह्माण्डोंकी इस 'माया' से सृष्टि हुई है। जीवतत्त्व मायासे अतीत है। जीवकी शुद्धसत्ता, शुद्ध-अहङ्कार और मनोवृत्ति—सभी मायासे अतीत किसी परा-शक्तिसे गठित है, इसलिये 'जीव' के निर्माण कार्यमें मायाका कोई अधिकार नहीं था। माया-जगत्में प्रविष्ट जीवकी जो जड़-भावान्वित अणुबुद्धि और अहङ्कार प्रतीत हो रहा है, वही केवल मायाका कार्य है। इसी मायाके सम्बन्धसे शुद्ध होकर अपने स्वरूपमें जीवके अवस्थानको 'मुक्ति' कहा जाता है। मुक्ति होनेपर माया-निर्मित अहङ्कार तक नहीं रहता है और जीवकी स्वतःसिद्ध जो भी चिन्मयी वृत्ति है, वह सब शुद्धरूपमें कार्य कर सकती है। इसलिये जीव भगवान्की एक शक्तिविशेष है॥११८॥ अनुभाष्य—इयम् अपरा (अचित्प्रकृतिः जड़त्वात् निकृष्टा)। इतः (जड़प्रकृतेः) अन्यां परां (चिन्मयीं) जीवभूतां (जीवस्वरूपां) मे (मम) प्रकृतिं विद्धि (जानीहि)। हे महाबाहो, यया (चेतनया जीवाख्याया शक्त्या) इदं (जड़ं) जगत् धार्यते (स्वभोगाय गृह्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अचित् प्रकृति जड़ होनेके कारण निकृष्टा है। मेरी अन्य एक जीव-स्वरूपा प्रकृतिको इससे श्रेष्ठ जानो। हे महाबाहो! जीव कहलानेवाली चेतन शक्ति इस जड़ जगत्को अपने भोगके लिये ग्रहण करती है॥११८॥

[ ७/११९-१२० चित्, जीव और माया-ये तीन प्रकारकी विष्णुशक्ति :- विष्णुपुराण (६/७/६०)- विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ११९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है ॥ ११९ ॥ अनुभाष्य-विष्णुशक्ति (विष्णोः स्वरूपशक्तिः) परा (चित्स्वरूपा) प्रोक्ता; तथा क्षेत्रज्ञाख्या (जीवशक्तिः च) परा प्रोक्ता; अन्या अविद्या कर्मसंज्ञा (कर्म यस्याः संज्ञा सा) तृतीया मायाशक्तिः इष्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ ईश्वरको जीवकी भाँति अज्ञानमय-बोध ही मायावाद :- हेन जीवतत्त्व लञा लिखि' परतत्त्व। आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ईश्वर-महत्त्व ॥ १२० ॥ अनुवाद-ऐसे जीवतत्त्वको शङ्कराचार्यने परतत्त्व (ब्रह्म) के रूपमें वर्णन किया है। इसके द्वारा उन्होंने सर्वश्रेष्ठ ईश्वरकी महिमाको आच्छादित कर दिया है ॥ १२० ॥ अनुभाष्य-ईश्वर, जीव और प्रकृतिस्वरूपको अनिर्वचनीय तथा अज्ञानके रूपमें लिखकर शङ्कराचार्यने ईश्वरके अलौकिक श्रेष्ठत्वका आच्छादन किया है। श्रीरामानुजपाद 'वेदान्तसार' में- “ननु 'आत्मा वा इदमग्रासीत्' इति प्राक्सृष्टेः एकत्वावधारणात् कथं सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्टस्य नारायणस्य कारणत्वम् ? उच्यते-'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति। परित्यक्तस्थूलाकाराणां सूक्ष्माकारापत्त्या ब्रह्मणि वृत्तिः प्रतिपाद्यते, न तु स्वरूपनिवृत्तिः; 'अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे देवे एकीभवति' इति तमःशब्द-वाच्यायाः प्रकृतेः परमात्मन्येकीभाव-श्रवणात्। पृथग्ग्रहणरहितत्वेन वृत्तिरेकीभावः; स एव लय-शब्दार्थः; यथा-वृक्षे लीनाः पतङ्गाः, वने लीनाः सारङ्गाः।” यदि कहो, 'जगत् सृष्टिके पहले केवलमात्र आत्मा थीं' (बृः आः १/४/१), ऐसा होनेसे किस प्रकारसे सूक्ष्म चिदचित्-शक्तिविशिष्ट नारायणका जगत्के मूल-कारण होना सम्भव होता ? इसके उत्तरमें कहा जा सकता है, “जिनसे ये भूतसमूह उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा पालित और जिनमें प्रविष्ट होते हैं” (तैः भृः प्रथम अ.) इस तैत्तिरीय-वाक्यसे प्रमाणित होता है कि सभी जीव अपने स्थूल जड़ आकारका परित्यागकर मुक्तावस्थामें सूक्ष्माकार ग्रहणकर ब्रह्ममें अपनी-अपनी वृत्ति (अवस्थिति) प्रमाणित करते हैं, उनका स्वरूप ध्वंस नहीं होता, क्योंकि अविनाशी आत्मा तमः-शब्दवाच्या प्रकृतिमें लीन होनेपर प्रकृतिका ब्रह्मके साथ अभेद (एकीभाव) होता है। उस समय प्रकृतिके साथ ब्रह्मकी पृथक्ता ना रहनेके कारण प्रकृतिका सत्त्व ब्रह्ममें ही अवस्थान करता है। 'लय' शब्दसे इस प्रकार ही समझना होगा जैसे, वृक्षमें स्थित पक्षी अथवा वनमें स्थित मृगसमूह वृक्षमें अथवा वनमें लीन अथवा अन्तर्निविष्ट होते हैं ॥ १२० ॥ ४३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२१ ] 'शक्तिपरिणाम-वाद' ही ब्रह्मसूत्रमें स्वीकृत :- व्यासेर सूत्रेते कहे 'परिणाम'-वाद। 'व्यास भ्रान्त'-बलि' तार उठाइल विवाद ॥१२१॥ अनुवाद—व्यासदेवने वेदान्त-सूत्रमें 'परिणाम'-वाद अर्थात् सब कुछ भगवान्‌की शक्तिका ही रूपान्तरण है, ऐसा कहा है। किन्तु शङ्कराचार्यने व्यासदेवको 'भ्रान्त' कहकर विवाद उठाया है॥१२१॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसूत्रकार श्रीवेदव्यासके “आनन्दमयोऽभ्यासात्” (ब्रः सूः १/१/१२) इस सूत्रको उपलक्ष्यकर “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति” (ब्रः सूः १/१/१९) इस सूत्रकी व्याख्यामें श्रीशङ्कराचार्यने जो लिखा है, उसका मर्मानुवाद—“आनन्दमय-वाक्यमें 'ब्रह्म'-शब्दका संयोग नहीं रहनेके कारण उनको मुख्यब्रह्म नहीं कह सकते। आनन्दमयको यदि 'ब्रह्म' कहा जाय, तो उसे अङ्ग होनेके कारण सविशेषब्रह्म ही कहना पड़ेगा, किन्तु 'आनन्दमय' वाक्यके अन्तमें निर्विशेष-ब्रह्म अभिहित है। आनन्दमय-शब्दसे आनन्द-प्रचुर अर्थात् प्राचुर्य अर्थमें 'मयट्' प्रत्यय (जिस अर्थमें चिद्विलासवादी भागवतोंने प्रयोग किया है, वह) कहनेपर उसमें दुःखका भी अस्तित्व है, ऐसा जाना जाता है; क्योंकि 'आधिक्य' अनुसारमें ही प्रचुर-शब्दका प्रयोग होता है, अल्पता उसका लक्ष्य नहीं रहता। आनन्दमय 'शुद्ध-ब्रह्म' नहीं है, यह कहकर ही श्रुतियोंमें आनन्दमयके अभ्यासकी (पुनः पुनः उक्ति) ना करके 'आनन्दमात्र' का अभ्यास किया है। यदि आनन्दमयका ब्रह्मत्व निश्चित होता, वैसा होनेपर ना होते हुए भी आनन्दमात्रके अभ्यासको आनन्दमयाभ्यास कहकर कल्पना की जा सकती है, किन्तु अङ्ग-सम्बन्ध ना रहनेके कारण आनन्दमयका अब्रह्मत्व ही निश्चित है; इन सभी कारणोंसे एवं “आनन्दं ब्रह्म” आदि श्रुतियोंमें परब्रह्मके विषयमें आनन्द-शब्दका प्रयोग होनेके कारण स्पष्ट समझा जा रहा है कि अन्यान्य श्रुतियोंमें भी 'आनन्दमात्र' ब्रह्म ही अभ्यस्त हुआ है, 'आनन्दमय' अभ्यस्त नहीं हुआ है। यद्यपि “आनन्दमयमात्मानम्” श्रुतियोंमें आनन्दमयका ही अभ्यास दृष्टिगोचर होता है, तथापि अन्नमय आदिके मध्य आनन्दमयका उल्लेख होनेपर आनन्दमयकी भी शुद्धब्रह्म बोधकता परास्त हुई है। 'आनन्दमय' वाक्यके निकट ही “उन्होंने कामना की, मैं बहुत होऊँगा”—इस प्रकार वाक्य रहनेपर भी शुद्धब्रह्मके साथ आनन्दमयके निकट-सम्बन्ध नहीं रहनेके कारण आनन्दमयको शुद्धब्रह्म नहीं समझा जा सकता। उसके बाद “वे ही रस (स्वरूप हैं)” आदि वाक्य भी उसीके सापेक्ष होनेके कारण आनन्दमय-बोधक नहीं हैं। “प्रिय ही उनका मस्तक है” आदि विभिन्न प्रकार अङ्ग-बोधक शब्द ना रहनेके कारण, यह निश्चित हुआ है कि, 'आनन्द' ही मुख्यब्रह्म है, 'आनन्दमय' नहीं। यदि कहो, सविशेष ब्रह्म ही तो उक्त श्रुतिका अभिप्रेत है? इसके उत्तरमें—ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि यह “अवाङ्‌मानसगोचर” अर्थयुक्त श्रुतिके द्वारा निरस्त होता है, इसलिये 'आनन्दमय'-शब्दका 'मयट्'-प्रत्यय विकारबोधक है, प्राचुर्यबोधक नहीं।” श्रीपाद शङ्करने इस प्रकार सूत्रोंकी व्याख्यामें 'मयट्' प्रत्ययको निकाल देनेके लिये अर्थात् इसका व्यर्थता अथवा बाहुल्य दिखानेके लिये एक ही वक्तव्य-विषयको १२-१९ सूत्रोंमें पुनः पुनः कहनेका कितना प्रयास नहीं किया है! इस सम्बन्धमें 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थमें श्रीमद् जीव गोस्वामी प्रभुकी उक्ति— सातवाँ अध्याय | ४३१

[ ७/१२१-१२६ “यदि च सूत्रकारस्य वेदान्तार्थानभिज्ञतां निगूढ़मभिप्रायता, तत्प्रमाद-मार्जन- स्वचातुरी-व्यङ्ग-भङ्ग्या तत् “आनन्दमय”-सूत्रमेवं व्याख्येयम्- 'आनन्दमयः' इत्यत्र "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते इति, तथा विकारसूत्रे (१/१/१३) च 'विकार'-शब्देनावयवः, 'प्राचुर्य'-शब्देन 'सादृश्यं' व्याख्येयम्, तदा सूत्रकारस्याशाब्दिकतैव च प्रसज्येत-तत्तच्छब्दादिभिस्तत्तदर्थानभिधानात्। 'मयट्'-प्रत्यय-विकार-प्राचुर्यशब्दानामनन्तरनिर्दिष्टानामन्यार्थत्वं न वा बालकस्यापि हृदयमारोहति।” “शङ्कराचार्यका भाष्य पाठ करके यह धारणा होती है कि उनका निगूढ़ अभिप्राय यही है कि सूत्रकार श्रीवेदव्यास वेदान्तका अर्थ समझनेमें अनभिज्ञ थे। इसलिये सूत्रकार आचार्य श्रीवेदव्यासके प्रमादका मार्जन करनेके उद्देश्यसे श्रीशङ्करने अपनी चातुर्य शैलीसे 'आनन्दमय' सूत्रकी इस प्रकार व्याख्या की है- 'आनन्दमय' आदि श्रुतिवाक्योंमें "ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा", इस श्रुतिवाक्यमें मुख्यब्रह्म ही 'उपदिष्ट' है; १/१/१३ सूत्रमें विकार-शब्दसे 'अवयव (अङ्ग)' और 'प्राचुर्य' शब्दसे 'सादृश्य' व्याख्या करूँगा। इस प्रकार व्याख्या होनेसे सूत्रकार (व्यासदेव) को जो शब्दज्ञान नहीं था, उसकी ही सम्भावना होती है; क्योंकि, उनके द्वारा व्यवहृत-शब्दके द्वारा वेदान्तका वैसा अर्थ नहीं होता है। मयट्-प्रत्ययसे उत्पन्न विकार-प्राचुर्य-शब्दादिके पश्चात् निर्दिष्ट शब्दसमूहका अन्य अर्थ हो ही क्या सकता है? यह बात तो एक बालकके हृदयमें भी आती है! अर्थात् मयट्-प्रत्ययमें 'विकार' और 'प्राचुर्यार्थ' के अतिरिक्त इसमें अन्य अर्थ जोड़ना ही नितान्त भ्रम है, वह सहज ही समझा जाता है।” मध्यलीला ६/१७०-१७५ एवं मध्यलीला २५/४०-४१ संख्या द्रष्टव्य है॥१२१॥ गुरुको भ्रान्त माननेवाले मायावादियोंका 'विवर्त्तवाद' :- परिणाम-वादे ईश्वर हयेन विकारी। एत कहि' 'विवर्त्त'-वाद स्थापना ये करि॥१२२॥ 'विवर्त्त' के आश्रय :- वस्तुतः परिणाम-वाद-सेइ से प्रमाण। देहे आत्मबुद्धि-हय विवर्त्तेर स्थान॥१२३॥ विवर्त्तवादका खण्डन-(१) अचिन्त्यशक्तिमान् भगवान् :- अविचिन्त्य-शक्तियुक्त श्रीभगवान्। इच्छाय जगद्रूपे पाय परिणाम॥१२४॥ (२) प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त :- तथापि अचिन्त्यशक्त्ये हय अविकारी। प्राकृत चिन्तामणि ताहे दृष्टान्त धरि॥१२५॥ नाना रत्नराशि हय चिन्तामणि हैते। तथापिह मणि रहे स्वरूपे अविकृते॥१२६॥ अनुवाद-श्रीशङ्कराचार्यने यह कहकर कि परिणाम-वाद स्वीकार करनेसे ईश्वरको विकारी स्वीकार करना पड़ेगा, 'विवर्त्त'-वादकी स्थापना की। वास्तवमें परिणाम-वाद ही सभी शास्त्रोंके ४३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२१-१२६ ]

द्वारा प्रमाणित है, किन्तु अपने भौतिक शरीरमें आत्मबुद्धि ही विवर्त्त है। भगवान् अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं और उनकी इच्छासे ही उनकी अचित्-शक्ति जगत्के रूपमें परिणत होती है, किन्तु भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्तिसे अविकारी ही रहते हैं। प्राकृत चिन्तामणि इसका दृष्टान्त है। जिस प्रकार चिन्तामणि नाना प्रकारके रत्नोंको उत्पन्न करती है, तो भी चिन्तामणि अपने स्वरूपमें अविकृत ही रहती है॥१२२-१२६॥ अनुभाष्य—श्रीलजीव गोस्वामीप्रभुने अपने 'परमात्मसन्दर्भ' (५८ संख्यामें)— “तद्वादे हि सर्वमेव जीवादि-द्वैतमज्ञानेनैव स्व-स्वरूपे ब्रह्मणि कल्प्यते इति मतम्। निरहङ्कारस्य केनचिद्धर्म्मान्तरेणापि रहितस्य सर्व-विलक्षणस्य चिन्मात्रस्य ब्रह्मणस्तु नाज्ञानाश्रयत्वं, न चाज्ञानविषयत्वं न च भ्रमहेतुत्वं सम्भवतीति। परमालौकिक-वस्तुत्वादचिन्त्य-शक्तित्वन्तु सम्भवेत्। यत् खलु चिन्तामण्यादावपि दृश्यते, यया त्रिदोषघ्नौषधिवत् परस्परविरोधिनामपि गुणानां धारिण्या तस्य निरवयवत्वादिके सत्यपि सावयवादिकमङ्गीकृतं तत्र शब्दश्वास्ति प्रमाणम्। “विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो, न चान्येषां स्तादृशः स्युः” इत्यादिकः श्वेताश्वतरोपनिषदादौ। “आत्मोश्वरोऽतर्क्यसहस्रशक्तिः” इत्यादिकः श्रीभागवतादिषु। तथा च ब्रह्मसूत्रम् (२/१/२८)—“आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि” इति। तत्र द्वैतान्यथानुपपत्त्यापि ब्रह्मण्यज्ञानादिकं कल्पयितुं न शक्यते, असम्भवादेव। ब्रह्मण्यचिन्त्यशक्ति-सद्भावस्य युक्तिलब्धत्वात् श्रुतत्वाच्च द्वैतान्यथानुपपत्तिश्च दूरे गता। ततश्चाचिन्त्यशक्तिरेव द्वैतोपपत्तौ कारणं पर्यवसीयते। तस्मान्निर्विकारादि-स्वभावेन सतोऽपि परमात्मनोऽचिन्त्यशक्त्या विश्वाकारत्वादिनार परिणामादिकं भवति, चिन्तामणयस्कान्तादीनां सर्वार्थप्रसव-लोहचालनादिवत्। तदेतदङ्गीकृतं श्रीबादरायणेन—(ब्रः सूः २/१/१७) “श्रुतेस्तु शब्द-मूलत्वात्” इति। ततस्तस्य तादृश-शक्तित्वात् प्राकृतवन्माया-शब्दस्येन्द्रजालविद्यावाचित्वमपि न युक्तम्। किन्तु 'मीयते विचित्रं निर्मीयते अनया' इति विचित्रार्थक-शक्तिवाचित्वम्। तस्मात् परमात्मपरिणाम एव शास्त्रसिद्धान्तः। ××तत्र चापरिणतस्यैव सतोऽचिन्त्यया शक्त्या परिणाम इत्यसौ सन्मात्रतावभासमानस्वरूपव्यूहरूप-द्रव्याख्यशक्तिरूपेण परिणमते, न तु स्वरूपेणेति गम्यते। यथैव चिन्तामणिः। ×× अतएव क्वचिदस्य ब्रह्मोपादानत्वं क्वचित् प्रधानोपादानत्वं श्रूयते। ×× पूर्वं खलु वारिदर्शनाद् वार्याकारा वृत्तिर्जातापि तदप्रसङ्गसमये सुप्ता तिष्ठति, तत्तुल्यवस्तुदर्शनेन तु जागर्त्ति, तद्विशेषानुसन्धानं बिना तदभेदेन स्वतन्त्रतामारोपयति, तस्मान्न वारि मिथ्या, न वा तत्स्मरणमयी तदाकारा वृत्तिर्न वा तत्ुल्यं मरीचिकादि वस्तु, किन्तु तदभेदेनारोप एव अयथार्थत्वान्मिथ्या। स्वप्ने च (ब्रः सूः ३/२/३) “मायामात्रन्तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्त-स्वरूपत्वात्” इति न्यायेन जाग्रद्दृष्टवस्त्वाकारायां मनोवृत्तौ परमात्ममाया तद्वस्तवभेदारोपयतीति पूर्ववत्। तस्माद् वस्तुतस्तु न क्वचिदपि मिथ्यात्वम्। शुद्ध आत्मनि परमात्मनि वा तादृश-तदारोप एव मिथ्या, न तु विश्वं मिथ्येति। ×× किञ्च विवर्त्तस्य ज्ञानादिप्रकरणपठितत्वेन गौणत्वात्, परिणामस्य तु स्वप्रकरण-पठितत्वेन मुख्यत्वात् ज्ञानाद्युभयप्रकरण-पठितत्वेन संदंशन्यायसिद्ध-प्राबल्याच्च परिणाम एव श्रीभागवत-तात्पर्यमिति गम्यते।” (अर्थात्) विवर्त्तमें अथवा मिथ्यावादके आश्रयमें ही 'जीवादि सभी द्वितीयभावविशिष्ट तत्त्व' ब्रह्मके निजस्वरूपमें अज्ञानके द्वारा कल्पित हुए हैं। अन्य किसी प्रकारसे धर्मरहित, सर्वविलक्षण, अहङ्कारशून्य, चिन्मात्र ब्रह्मवस्तुकी अज्ञानाश्रयकी योग्यता, अज्ञानविषयपर आश्रित होना और भ्रमित होना कभी सम्भवपर नहीं है। ब्रह्मवस्तु—परम अलौकिक वस्तु हैं, इसलिये उनमें क्षुद्र मानवोंके चिन्तनसे परे अचिन्त्य शक्तिकी सम्भावना है। प्राकृत चिन्तामणि आदि वस्तुओंमें जब अलौकिक शक्ति दिखाई देती है, तब ब्रह्ममें भी अलौकिक शक्ति निश्चय ही अवस्थित है। वात, कफ और पित्त—तीन प्रकार दोष एक साथ एक रोगीमें होनेपर जिस प्रकार परस्पर विरोधी धातुका शोधन करनेके लिये औषधिकी व्यवस्था है, उसी प्रकार परस्पर विरोधी तीन गुणोंको धारण करनेवाली शक्तिके द्वारा ब्रह्मके निराकार होनेपर भी शरीर-अङ्गादि स्वीकृत हैं।

सातवाँ अध्याय | ४३३

[ ७/१२१-१२६ इस विषयमें वेद प्रमाण है- (श्वेताश्वतर उपनिषद्) - "सनातनपुरुष विचित्रशक्ति युक्त हैं; अन्योंमें उनके जैसी शक्तियाँ नहीं है।" श्रीमद्भागवतादिमें भी “आत्मा ईश्वर अतर्क्य, सहस्रशक्तियुक्त है", ऐसा उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रमें भी “आत्मामें इस प्रकार विचित्रता है।" (अद्वैतवादियोंके मतानुसार) ब्रह्ममें द्वैतभावकी सङ्गति ना रहनेके कारण ब्रह्ममें अज्ञानादिकी असम्भावनाकी कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु “ब्रह्म अचिन्त्यशक्ति-समन्वित" इस युक्ति और श्रुतिवाक्यसे उनमें द्वैतकी असङ्गति दूर होती है। ऐसा होनेसे अचिन्त्यशक्ति ही द्वैतोपपत्तिका (द्वैतके औचित्यका) कारण होना ही अवशिष्ट रहता है। इसलिये निर्विकारादि-स्वभावसम्पन्न होनेपर भी परमात्माका अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे विश्वरूपमें परिणामादि सङ्घटित होता है। जिस प्रकार चिन्तामणि स्वयं विकारयुक्त ना होकर सर्वार्थ उत्पन्न करनेमें समर्थ है, चुम्बक स्वयं विकारयुक्त ना होकर अन्य लोहोंको आकर्षण-चालनादि करानेमें समर्थ है, उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु विकृत ना होकर ब्रह्मकी विकारयोग्य शक्ति ही विकृत होकर विश्वाकारमें परिणत होती है। ऐसा होनेपर भी ब्रह्मकी ऐसी शक्ति रहना प्राकृतकी भाँति माया-शब्दकी इन्द्रजालविद्या नहीं है। किन्तु इस मायाके द्वारा विचित्रता निर्मित होती है अर्थात् यह विचित्रताको प्रकाश करनेवाली शक्ति है। इसलिये परमात्माका परिणाम ही यह विश्व है- यही शास्त्रसिद्धान्त है। ×× अपरिणामी सत्यवस्तुकी ही अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे परिणति होती है। स्वयं प्रकाशमान् स्वरूपका ही विस्ताररूप द्रव्यनामक शक्ति है; उसी शक्तिरूपकी ही परिणति होती है, परन्तु स्वरूपका परिणाम नहीं होता। जिस प्रकार चिन्तामणि अपनी शक्तिके द्वारा अनेक पदार्थोंको प्रसव करनेपर भी स्वयं अविकृत ही रहती है। ×× इसलिये कोई-कोई इस विश्वका उपादान 'ब्रह्म' है, फिर कोई-कोई 'प्रधान' को विश्वका उपादान कहते हैं, ऐसा सुना जाता है। ×× जैसे पहले जलको देखकर जलके सम्बन्धमें हृदयमें एक धारणा उदित होती है और जलके अप्रसङ्गके समय वह भाव निद्रित रहता है। परन्तु जलके समान किसी वस्तु (मरीचिका) के दर्शनसे वह वृत्ति जाग्रत हो जाती है। उस वस्तु (मरीचिका) के विशेष अनुसन्धानके बिना उस वस्तुको पूर्व वस्तु (जल) के साथ अभेद कहकर, स्वेच्छापर होकर आरोप करनेसे (मरीचिका जलके समान दिख रही है, इस कारण) जल मिथ्या नहीं हो जाता, अथवा 'जलके समान मरीचिका' आदि वस्तु भी मिथ्या नहीं होती, किन्तु जलके साथ मरीचिकाको अभेद मानना ही अयथार्थ अथवा मिथ्या है। स्वप्नमें भी (ब्रः सूः ३/२/३) “माया-मात्र ही समस्त अप्रकाशित स्वरूप है" - इस न्यायके अवलम्बनसे जाग्रत अवस्थामें देखी वस्तुकी आकाररूपिणी मनोवृत्तमें परमात्माकी माया पूर्व उदाहरणके जैसे उन वस्तुओंके अभेदका आरोप कर देती है, इसलिये वस्तुतः कुछ भी मिथ्या नहीं है। इसलिये शुद्धात्मा परमात्मामें उस प्रकारका आरोप ही मिथ्या है, विश्व मिथ्या नहीं है। ×× और भी विवर्त्तवादका उदाहरण ज्ञानादि-प्रकरणमें उल्लिखित होनेपर वह गौण है और परिणामवादका स्वप्रकरणमें पाठ होनेपर उसे मुख्य कहा गया है। तथा शक्तिपरिणामवादका ज्ञान-प्रकरण और स्वप्रकरण दोनोंमें पठित होनेसे सन्दंश (चिमटा)-न्यायसिद्ध-प्रबलताके कारण शक्ति-परिणामको ही श्रीभागवतका तात्पर्य कहकर जाना जाता है॥१२१-१२६॥ ४३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२७ ] (३) शक्ति-परिणत होनेपर भी स्वयं विकार-रहित :— प्राकृत-वस्तुते यदि अचिन्त्यशक्ति हय। ईश्वरेर अचिन्त्यशक्ति,—इथे कि विस्मय॥ १२७॥ अनुवाद—यदि एक प्राकृत वस्तु चिन्तामणिमें ऐसी अचिन्त्यशक्ति है, तो ईश्वरमें भी अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ १२७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीवतत्त्व शक्तिविशेष है। उस जीवतत्त्वको ‘अणुचैतन्य’ रूपमें सिद्ध ना कर ‘ब्रह्म’-रूपमें सिद्ध करनेसे अवश्य ही भ्रममय सिद्धान्त होगा। श्रीशङ्कराचार्यने ईश्वरकी आज्ञाके अनुसार ईश्वरतत्त्वको आच्छादन करनेके अभिप्रायसे जीवतत्त्वके साथ परतत्त्वका ऐक्य स्थापितकर भ्रममय सिद्धान्तका प्रचार किया है। व्याससूत्र अर्थात् वेदान्तसूत्रमें वस्तुतः (शक्ति)-परिणामवाद स्वीकृत हुआ है। श्रीशङ्कराचार्यने परिणाम-वादसे ‘ईश्वरको विकारी कहना होगा’—यह वितर्क उठाया और परिणाम-वाद माननेसे वेदव्यासको ‘भ्रान्त’ मानना होगा—यह युक्ति विचारकर ‘विवर्त्तवाद’ को स्थापित किया। ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्यायके प्रथमपादमें “तदनन्यत्वमारम्भण-शब्दादिभ्यः” इस चौदहवें सूत्रके भाष्यमें “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं” (छाः ६/१/४) आदि वेदवाक्योंका उदाहरण देकर उन्होंने परिणाम-वादको दोषयुक्त विकार-वाद कहकर वितर्क किया है। वास्तवमें ब्रह्मसूत्रमें ईश्वरकी इच्छामात्र उनकी अचिन्त्यशक्तिके कार्य-विकारके रूपमें है, इस प्रकार परिणाम-वाद प्रदर्शित हुआ है। परिणामका लक्षण यह है—“स-तत्त्वतोऽन्यथा-बुद्धिर्विकार इत्युदाहृतः।” एक सत्य-तत्त्वसे अन्य एक सत्य-तत्त्वके उदय होनेपर, उसे अन्य वस्तुके रूपमें मानना ‘विकार’ अर्थात् परिणाम है। ‘ब्रह्म’ एक सत्यवस्तु है, उनसे ‘जीव’रूप एक सत्यवस्तु और ‘मायिक-ब्रह्माण्ड’रूप एक सत्यवस्तु पृथक् रूपमें प्रकट हुई हैं, ऐसा माननेको ब्रह्मका ‘विकार’ या ‘परिणाम’ कहा जाता है। विकार या परिणामका उदाहरण यह है—‘दूध’ एक सत्य पदार्थ है, वही दूध अन्य एक सत्य पदार्थ ‘दही’के रूपमें विकृत होता है। “ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” (छाः ६/८/७) इस प्रकार वेदवाक्यके द्वारा ‘ब्रह्म ही यह जगत् है’, इसमें कोई संशय नहीं होता है। ब्रह्मकी एक अचिन्त्यशक्ति है, वह “परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते” (श्वेः ६/८) वेदवाक्यसे प्रमाणित होता है। उस शक्तिसे ब्रह्मका सत्यधर्म ही जगत्-रूपमें परिणत होता है—इस प्रकारके सिद्धान्तमें किसी प्रकारका दोष नहीं हो सकता। (छाः ६/२/१)—“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, (छाः ६/२/३)—“तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय” अर्थात् “अद्वयज्ञानतत्त्व भगवान्‌की ईक्षणशक्तिसे उनकी इच्छानुसार जगत्‌की समस्त वस्तुओंकी सृष्टि हुई”, (छाः ६/८/४)—“सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः” अर्थात् “हे सौम्य! ब्रह्म ही समस्त जीवोंका एकमात्र मूल आधार हैं”, (छाः ६/८/७)—“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” अर्थात् “वे अनादिरादि ब्रह्म अथवा भगवान् इस पृथ्वीपर सभीके एकमात्र मूल अथवा आधार हैं”; आदि छान्दोग्य-वाक्योंमें वह ब्रह्म अपनी पराशक्तिसे इस चित्-जड़ात्मक जगत्‌के रूपमें परिणत होता है,—यही प्रसिद्ध है। जगत् और जीव ‘उपादेय’ हैं तथा ब्रह्म ‘उपादान’ है। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” अर्थात् “जिनसे ये सब प्राणी उत्पन्न सातवाँ अध्याय | ४३५