भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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७/१२७ ] (३) शक्ति-परिणत होनेपर भी स्वयं विकार-रहित :— प्राकृत-वस्तुते यदि अचिन्त्यशक्ति हय। ईश्वरेर अचिन्त्यशक्ति,—इथे कि विस्मय॥ १२७॥ अनुवाद—यदि एक प्राकृत वस्तु चिन्तामणिमें ऐसी अचिन्त्यशक्ति है, तो ईश्वरमें भी अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ १२७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीवतत्त्व शक्तिविशेष है। उस जीवतत्त्वको ‘अणुचैतन्य’ रूपमें सिद्ध ना कर ‘ब्रह्म’-रूपमें सिद्ध करनेसे अवश्य ही भ्रममय सिद्धान्त होगा। श्रीशङ्कराचार्यने ईश्वरकी आज्ञाके अनुसार ईश्वरतत्त्वको आच्छादन करनेके अभिप्रायसे जीवतत्त्वके साथ परतत्त्वका ऐक्य स्थापितकर भ्रममय सिद्धान्तका प्रचार किया है। व्याससूत्र अर्थात् वेदान्तसूत्रमें वस्तुतः (शक्ति)-परिणामवाद स्वीकृत हुआ है। श्रीशङ्कराचार्यने परिणाम-वादसे ‘ईश्वरको विकारी कहना होगा’—यह वितर्क उठाया और परिणाम-वाद माननेसे वेदव्यासको ‘भ्रान्त’ मानना होगा—यह युक्ति विचारकर ‘विवर्त्तवाद’ को स्थापित किया। ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्यायके प्रथमपादमें “तदनन्यत्वमारम्भण-शब्दादिभ्यः” इस चौदहवें सूत्रके भाष्यमें “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं” (छाः ६/१/४) आदि वेदवाक्योंका उदाहरण देकर उन्होंने परिणाम-वादको दोषयुक्त विकार-वाद कहकर वितर्क किया है। वास्तवमें ब्रह्मसूत्रमें ईश्वरकी इच्छामात्र उनकी अचिन्त्यशक्तिके कार्य-विकारके रूपमें है, इस प्रकार परिणाम-वाद प्रदर्शित हुआ है। परिणामका लक्षण यह है—“स-तत्त्वतोऽन्यथा-बुद्धिर्विकार इत्युदाहृतः।” एक सत्य-तत्त्वसे अन्य एक सत्य-तत्त्वके उदय होनेपर, उसे अन्य वस्तुके रूपमें मानना ‘विकार’ अर्थात् परिणाम है। ‘ब्रह्म’ एक सत्यवस्तु है, उनसे ‘जीव’रूप एक सत्यवस्तु और ‘मायिक-ब्रह्माण्ड’रूप एक सत्यवस्तु पृथक् रूपमें प्रकट हुई हैं, ऐसा माननेको ब्रह्मका ‘विकार’ या ‘परिणाम’ कहा जाता है। विकार या परिणामका उदाहरण यह है—‘दूध’ एक सत्य पदार्थ है, वही दूध अन्य एक सत्य पदार्थ ‘दही’के रूपमें विकृत होता है। “ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” (छाः ६/८/७) इस प्रकार वेदवाक्यके द्वारा ‘ब्रह्म ही यह जगत् है’, इसमें कोई संशय नहीं होता है। ब्रह्मकी एक अचिन्त्यशक्ति है, वह “परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते” (श्वेः ६/८) वेदवाक्यसे प्रमाणित होता है। उस शक्तिसे ब्रह्मका सत्यधर्म ही जगत्-रूपमें परिणत होता है—इस प्रकारके सिद्धान्तमें किसी प्रकारका दोष नहीं हो सकता। (छाः ६/२/१)—“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, (छाः ६/२/३)—“तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय” अर्थात् “अद्वयज्ञानतत्त्व भगवान्‌की ईक्षणशक्तिसे उनकी इच्छानुसार जगत्‌की समस्त वस्तुओंकी सृष्टि हुई”, (छाः ६/८/४)—“सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः” अर्थात् “हे सौम्य! ब्रह्म ही समस्त जीवोंका एकमात्र मूल आधार हैं”, (छाः ६/८/७)—“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” अर्थात् “वे अनादिरादि ब्रह्म अथवा भगवान् इस पृथ्वीपर सभीके एकमात्र मूल अथवा आधार हैं”; आदि छान्दोग्य-वाक्योंमें वह ब्रह्म अपनी पराशक्तिसे इस चित्-जड़ात्मक जगत्‌के रूपमें परिणत होता है,—यही प्रसिद्ध है। जगत् और जीव ‘उपादेय’ हैं तथा ब्रह्म ‘उपादान’ है। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” अर्थात् “जिनसे ये सब प्राणी उत्पन्न सातवाँ अध्याय | ४३५