श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१२७-१२८ हुए हैं” (तैः, भूः १ अः), इस वेदवाक्यमें ब्रह्मका उपादानत्व और जीव तथा जड़का उपादेयत्व स्वीकृत हुआ है। परिणाम-वादका यथार्थ मर्म ना समझ पानेसे यह 'जगत्' और 'जीव' पृथक् सत्य तत्त्व हैं, यह समझ नहीं आता है। 'सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः” (छाः ६/८/४) आदि वाक्योंसे स्पष्ट होता है कि 'जीव' और 'जड़जगत्' निश्चितरूपमें सत्यवस्तु हैं। ऐसा कहनेपर ब्रह्ममें विकार होगा—इस निरर्थक भयसे, रस्सीमें साँपकी अथवा सीपमें रजतके भ्रमकी भाँति मिथ्या-स्वरूप जीव और जगत्की कल्पना करना वञ्चना मात्र है। परन्तु माण्डूक्य़ादि उपनिषदमें 'रस्सीमें सर्पबुद्धि' और 'सीपमें रजतबुद्धि', ये जो उदाहरण देखे जाते हैं, वे केवल विशेष स्थितिके लिये हैं। जीव शुद्धचित्कण है। मानव देहप्राप्त जीव इस जड़ शरीरमें जो आत्मबुद्धि करता है, वही 'विवर्त्त' का स्थान है। 'विवर्त्त' की परिभाषा इस प्रकार है—“अतत्त्वतोऽन्यथाबुद्धिर्विवर्त्त इत्युदाहृतः।” अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, उसको वैसी वस्तुके रूपमें माननेका नाम 'विवर्त्त' है। जीवके लिये 'विवर्त्त' एक महादोष है, बद्धजीव उस विवर्त्तबुद्धि-दोषसे दूषित है। इस प्रकारके विवर्त्त-दोषको मूल-विश्वतत्त्वमें और जीवतत्त्वमें आरोपित करना नितान्त निकृष्ट विचार है। अचिन्त्य-शक्तिको भूल जानेपर ही इस प्रकारके भ्रमका उदय होता है। भगवान् जिस प्रकार जगत्के रूपमें परिणत हुए हैं, उसका एक सामान्य दृष्टान्त है। अनेक लोग कहते हैं—प्राकृत जगत्में 'चिन्तामणि' नामक एक निधि है, वह अनेकों प्रकारके रत्नोंको उत्पन्न करके भी स्वयं अविकृत-स्वरूपमें रहती है। एक प्राकृत वस्तुमें यदि इस प्रकार अचिन्त्यशक्ति रहती है, तो ईश्वरकी उससे जो अनन्तगुणा एक अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यका विषय क्या है?॥१२०-१२७॥ वेदवृक्षका बीज प्रणव ही महावाक्य और ईश्वर-स्वरूप :- 'प्रणव' से महावाक्य—वेदेर निदान। ईश्वरस्वरूप प्रणव—सर्वविश्व-धाम ॥ १२८ ॥ अनुवाद—प्रणव (ॐकार) वेदोंका महावाक्य है और वेदके मन्त्रोंका आधार है। प्रणव भगवत्-स्वरूप है और समस्त जगत्का धामस्वरूप (आधार) है॥१२८॥ अनुभाष्य—गीतामें— “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥” (८/१३) अर्थात् “जो व्यक्ति सभी इन्द्रियरूप द्वारोंको विषयोंसे संयमितकर, मनको हृदयमें निरोधकर, भ्रूद्वयके मध्यमें प्राणवायुको स्थापित करते हुए आत्मविषयक समाधिरूप योगस्थैर्यसहित 'ॐ'—इस एकाक्षर ब्रह्मवाचक शब्दका उच्चारण करते-करते तथा मुझे ध्यान करते-करते देहत्यागपूर्वक प्रयाण करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं।” “वेद्यं पवित्रमोङ्कारः” (९/१७) अर्थात् “मैं ज्ञेय वस्तु हूँ, मैं शोधक हूँ, मैं ॐकार हूँ।” “ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः” (१७/२३)। अर्थात् “ब्रह्मके तीन प्रकारके निर्देशक नाम कहे गये हैं—ॐ, तत् और सत्।” ४३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत