श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ ७/१२७-१२८ हुए हैं” (तैः, भूः १ अः), इस वेदवाक्यमें ब्रह्मका उपादानत्व और जीव तथा जड़का उपादेयत्व स्वीकृत हुआ है। परिणाम-वादका यथार्थ मर्म ना समझ पानेसे यह 'जगत्' और 'जीव' पृथक् सत्य तत्त्व हैं, यह समझ नहीं आता है। 'सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः” (छाः ६/८/४) आदि वाक्योंसे स्पष्ट होता है कि 'जीव' और 'जड़जगत्' निश्चितरूपमें सत्यवस्तु हैं। ऐसा कहनेपर ब्रह्ममें विकार होगा—इस निरर्थक भयसे, रस्सीमें साँपकी अथवा सीपमें रजतके भ्रमकी भाँति मिथ्या-स्वरूप जीव और जगत्की कल्पना करना वञ्चना मात्र है। परन्तु माण्डूक्य़ादि उपनिषदमें 'रस्सीमें सर्पबुद्धि' और 'सीपमें रजतबुद्धि', ये जो उदाहरण देखे जाते हैं, वे केवल विशेष स्थितिके लिये हैं। जीव शुद्धचित्कण है। मानव देहप्राप्त जीव इस जड़ शरीरमें जो आत्मबुद्धि करता है, वही 'विवर्त्त' का स्थान है। 'विवर्त्त' की परिभाषा इस प्रकार है—“अतत्त्वतोऽन्यथाबुद्धिर्विवर्त्त इत्युदाहृतः।” अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, उसको वैसी वस्तुके रूपमें माननेका नाम 'विवर्त्त' है। जीवके लिये 'विवर्त्त' एक महादोष है, बद्धजीव उस विवर्त्तबुद्धि-दोषसे दूषित है। इस प्रकारके विवर्त्त-दोषको मूल-विश्वतत्त्वमें और जीवतत्त्वमें आरोपित करना नितान्त निकृष्ट विचार है। अचिन्त्य-शक्तिको भूल जानेपर ही इस प्रकारके भ्रमका उदय होता है। भगवान् जिस प्रकार जगत्के रूपमें परिणत हुए हैं, उसका एक सामान्य दृष्टान्त है। अनेक लोग कहते हैं—प्राकृत जगत्में 'चिन्तामणि' नामक एक निधि है, वह अनेकों प्रकारके रत्नोंको उत्पन्न करके भी स्वयं अविकृत-स्वरूपमें रहती है। एक प्राकृत वस्तुमें यदि इस प्रकार अचिन्त्यशक्ति रहती है, तो ईश्वरकी उससे जो अनन्तगुणा एक अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यका विषय क्या है?॥१२०-१२७॥ वेदवृक्षका बीज प्रणव ही महावाक्य और ईश्वर-स्वरूप :- 'प्रणव' से महावाक्य—वेदेर निदान। ईश्वरस्वरूप प्रणव—सर्वविश्व-धाम ॥ १२८ ॥ अनुवाद—प्रणव (ॐकार) वेदोंका महावाक्य है और वेदके मन्त्रोंका आधार है। प्रणव भगवत्-स्वरूप है और समस्त जगत्का धामस्वरूप (आधार) है॥१२८॥ अनुभाष्य—गीतामें— “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥” (८/१३) अर्थात् “जो व्यक्ति सभी इन्द्रियरूप द्वारोंको विषयोंसे संयमितकर, मनको हृदयमें निरोधकर, भ्रूद्वयके मध्यमें प्राणवायुको स्थापित करते हुए आत्मविषयक समाधिरूप योगस्थैर्यसहित 'ॐ'—इस एकाक्षर ब्रह्मवाचक शब्दका उच्चारण करते-करते तथा मुझे ध्यान करते-करते देहत्यागपूर्वक प्रयाण करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं।” “वेद्यं पवित्रमोङ्कारः” (९/१७) अर्थात् “मैं ज्ञेय वस्तु हूँ, मैं शोधक हूँ, मैं ॐकार हूँ।” “ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः” (१७/२३)। अर्थात् “ब्रह्मके तीन प्रकारके निर्देशक नाम कहे गये हैं—ॐ, तत् और सत्।” ४३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
(छाः उः १/१/१, १/४/१)— “ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति हृद्गायति। तस्योपव्याख्यानम्” अर्थात् “भक्त साधक ओम् (अ-उ-म) को उद्गीथ् (परमात्माका तीन अक्षरोंका नाम) जानकर उनका अनुशीलन करेंगे। पहले इस ओम् (अ-उ-म) का उच्चारण करके वेदाध्ययन आरम्भ करेंगे।” (अथर्वशिखा २)— “प्रणवः सर्वान् प्राणान् प्रणामयति नामयति, चैतस्मात् प्रणवश्चतुर्द्धाऽवस्थित इति वेद देवयोनिर्ध्येयाश्चेति संवर्त्ता सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयति, तारणात् तानि सर्वाणीति विष्णुः सर्वान् जयति।” अर्थात् “प्रणव ही सभी प्राणोंको प्राणवान और नामयुक्त (ज्ञेय) बनाता है। इस प्रकार प्रणव चार रूपोंमें स्थित है—वेद, देवयोनि, ध्येय और संवर्त्ता। सम्पूर्ण दुःखोंसे तारण करनेवालेको संवर्त्ता कहते हैं। विष्णु ही सबको तारते हैं, इसलिये वे संवर्त्ता कहलाते हैं। वे सर्वोर्ध्व (सबसे ऊपर) विराजमान हैं।” (माण्डूक्य १)— “ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्; तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव, यच्चान्यत्रिक-कालातीतं तदप्योङ्कार एव।” अर्थात् “ॐ वेद अथवा उपनिषद्का रहस्य प्रकाशक शब्दब्रह्म है और यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो सृष्टिके पूर्व वर्तमान हैं, भविष्य अर्थात् प्रलयके अन्तमें भी जिनकी नित्य अवस्थिति है, उनका ही प्रकाशक शब्दब्रह्मस्वरूप ॐकार है।” (तैः, शिः, ८वाँ अ.)— “ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्व। ओमिति सामानि गायन्ति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मैवापाप्नोति।” अर्थात् “यह ॐ ब्रह्म है। यह ॐ ही सब कुछ है। ॐ के साथ ही सभी साम-गान होता है। ॐ के साथ ही ब्राह्मण पढ़ाना आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि मुझे ब्रह्मकी प्राप्ति हो तथा वे ब्रह्मको प्राप्त करते हैं।” श्रीभगवत् संदर्भ (संख्या-४८) में- “श्रुतौ च प्रणवमुद्दिश्य-“ओमित्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम, यस्मादुच्चार्यमाण एव संसारभयात् तारयति, तस्मादुच्यते तार इति।” तस्माद् भगवत्स्वरूपमेव नाम। स्पष्टोश्लोकं श्रीमन्नारदपञ्चरात्रेऽष्टाक्षरमुद्दिश्य-“व्यक्तं हि भगवानेव साक्षान्नारायणः स्वयम्। अष्टाक्षर-स्वरूपेण मुखेषु परिवर्त्तते॥” इति; माण्डूक्योपनिषत्सु (४/४-७) च प्रणवमुद्दिश्य-“ॐकार एवेदं सर्वम्। ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्।” “प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः। अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः॥ सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च। एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम्॥ प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदये स्थितम्। सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति॥ अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः। ॐकारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः॥” न तु परमेश्वरस्यैव तत्तद्योग्यतासम्भवाद् वर्णमात्रस्य तथोक्तिः स्तुतिरूपैवेति मन्तव्यम्। अवतारान्तरवत् परमेश्वरस्यैव वर्णरूपेणावतारोऽयमिति अस्मिन्नर्थे तेनैव श्रुतिवलेनाङ्गीकृते तदभेदेन तत्-सम्भवात्। तस्मान्नामनामिनोरभेद एव।” अर्थात् ‘ॐ’ यही परब्रह्मका सबसे श्रेष्ठ घनिष्ठ (मधुरतम) नाम है; उच्चारणके आरम्भसे ही जो जीवको संसार-भयसे परित्राण करता है, इसलिये वह ‘तार’ नामसे भी प्रसिद्ध है। [श्रीधरस्वामिपादने श्रीमद्भागवतकी अपनी टीकाके प्रारम्भमें, ॐकारसे आरम्भ होनेके कारण
[ ७/१२८ श्रीमद्भागवतको 'ताराङ्कुर' नाम दिया है।] इसलिये श्रीनाम साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। अष्टाक्षर मन्त्रको उद्देश्य करके श्रीनारदपञ्चरात्रमें स्पष्टरूपसे कहा है,—"यह प्रसिद्ध है कि भगवान् श्रीनारायण स्वयं ही अष्टाक्षरस्वरूपमें जीवोंके मुखमें साक्षात् उदित होते हैं।" प्रणवको उद्देश्य करके माण्डूक्योपनिषदमें भी— "चित्-दर्शनमें जो कुछ दिखलायी देता है, सब कुछ ही ओंकार—'ॐ' यही अक्षर है।" "ब्रह्मका और एक अविर्भाव—प्रणव है; उसे परमवस्तु कहा जाता है। वह अपूर्व, अबाध, अबाह्य, परम और अव्यय है। वह सभीका आदि, मध्य और अन्त है। इस प्रकारसे प्रणवको जानकर जीव अमृत भोग करता है। सभीके हृदयमें अवस्थित प्रणवको ईश्वर-स्वरूप जानना चाहिये। ॐ-कारको सर्वव्यापी विभु अर्थात् विष्णु-स्वरूप माननेसे बुद्धिमान् व्यक्तिको और शोक करना नहीं पड़ता अर्थात् उसकी और शूद्रता नहीं रहती। ॐ जड़-मात्राहीन होकर भी अनन्त-मात्रायुक्त हैं; उनसे ही जड़ीय द्वैतज्ञानका उपशम होकर अद्वयज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये वे परममङ्गल-स्वरूप हैं।" यहाँ पर ऐसा विचार नहीं करना चाहिये कि परमेश्वरके लिये (प्रणव) अवताररूपमें ये सभी मङ्गल विधान असम्भव होनेके कारण एक जड़ीय वर्ण या अक्षरमात्रकी इस प्रकार उक्तिमें वास्तव सत्य नहीं है—यह केवल स्तुतिरूप मात्र है। वास्तवमें, परमेश्वरके अन्यान्य अवतारोंकी भाँति यह प्रणव ही उनका एक वर्णरूपी अवतार है; क्योंकि यह अर्थ पूर्वोक्त श्रुतिवचनके बलसे ही स्वीकृत होकर उनसे अभिन्न होनेके कारण तत्सम्भावना-हेतु यही अर्थ ही ठीक है। इसलिये भगवान्का नाम और नामी-भगवान्—परस्पर अभिन्न हैं, इसमें सन्देह नहीं है। ॐ अथवा प्रणव ही वेदका निदानस्वरूप महावाक्य हैं। प्रति वैदिक मन्त्रके आदिमें और अन्तमें प्रणव निहित हैं। प्रणव—ईश्वरस्वरूप है। "अकारेणोच्यते कृष्णः सर्वलोकैक-नायकः। उकारेणोच्यते राधा मकारो जीववाचकः॥" अर्थात् अ-कार उच्चारणसे सर्वलोकोंके नायक श्रीकृष्ण, उ-कार उच्चारणसे उनकी स्वरूपशक्ति श्रीराधाको समझना चाहिये तथा म-कार जीव-वाचक है॥ १२८॥ अमृतानुकणिका—वर्णनीय विषयसमूह जिस वाक्यमें होता है, उसको महावाक्य कहते हैं। श्रीरामचन्द्रके सम्बन्धमें समस्त वर्णनीय विषय रामायणमें हैं। इसलिये 'रामायण' श्रीराम-विषयक महावाक्य हुआ। इसी प्रकार महाभारत कुरु-पाण्डवों सम्बन्धी महावाक्य है। किन्तु रामायण, महाभारतादि अपेक्षित महावाक्य हैं—विशेष-विशेष विषयके सम्बन्धमें महावाक्य मात्र हैं। किन्तु निरपेक्ष महावाक्य वह होगा जो प्राकृत और अप्राकृत जगत्का जहाँ जो कुछ भी है, उस समस्तको ही लक्ष्य करे, वह समस्त उसके अन्तर्भुक्त हो। श्रील जीवगोस्वामीने सर्वसम्वादिनीमें कहा है,—"वाक्य समुदायको महावाक्य कहते है। उपक्रम (ग्रन्थकी भूमिका), उपसंहार (ग्रन्थके अन्तमें सारांश), अभ्यास (पुनः-पुनः उल्लेख), अपूर्वता (अद्भुत अथवा अज्ञात), फल, अर्थवाद (किसी उद्देश्यका प्रकटीकरण) और उपपत्ति (युक्ति-प्रमाण अथवा सिद्धान्त)—ये सब शास्त्र-तात्पर्य निर्णयके उपाय हैं। अर्थात् उपक्रम और उपसंहारका एकरूपत्व, अभ्यास, अपूर्वता, फल, प्रशंसा और युक्तित्व—इन छह उपायोंके द्वारा ही शास्त्रका तात्पर्य निर्णय करना होता है। इस प्रकारसे अन्वय-व्यतिरेक विचारप्रणालीके ४३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१२८ ] अवलम्बनसे गतिसामान्यके द्वारा भी महावाक्यके अर्थका निर्णय करना कर्त्तव्य है। श्रील जीवगोस्वामीकी इस उक्तिसे जाना जाता है—वेद-वेदान्त-उपनिषद्-पुराण-इतिहासादिका मुख्य वक्तव्य विषयसमूह सूक्ष्मरूपमें जिसके मध्यमें (बीजके मध्यमें वृक्षके जैसे) अवस्थित, जिसकी बात इन समस्त शास्त्रोंमें अन्वयी और व्यतिरेकी प्रणालीसे तथा उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा भी प्रतिपादित हो, वही महावाक्य है। इस प्रकारका लक्षण एकमात्र प्रणवमें (ओंकार ‘ॐ’ में) ही है और किसी वाक्यमें ही नहीं है। प्रणव या ब्रह्मसे ही समस्त शास्त्रोंका उद्भव हुआ है—सभी श्रुतियाँ यही कहती हैं। मैत्रेयी उपनिषद्— “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् यद् ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेदः अथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम्। (६/३२)॥” अर्थात् चारों वेद, इतिहास, पुराणादि ये प्रणव या ब्रह्मसे प्रादुर्भूत हुए हैं, प्रणवकी ही अभिव्यक्ति हैं, ये समस्त शास्त्र सूक्ष्मरूपमें प्रणवके ही अन्तर्निहित हैं। इसलिये प्रणव ही समस्त शास्त्र-वाक्योंका समष्टि रूप ही है। प्रणव ही महावाक्य है। समस्त शास्त्र ही अन्वयी-व्यतिरेकी भावसे इस प्रणव या ब्रह्मके विषयमें ही कहते हैं, इन समस्त शास्त्रोंमें उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा इन्हीं प्रणव अथवा ब्रह्मको प्रतिपादित किया गया है। इसलिये प्रणव ही महावाक्य है। यह परिदृश्यमान् जगत् और जगत्के जीवसमूह प्रणवसे ही उद्भूत हुए हैं, इसलिये प्रणवके साथ इनका एक नित्य, अकाट्य सम्बन्ध है, इसलिये प्रणव ही सम्बन्ध-तत्त्व है। उपरोक्त श्रुति प्रमाणोंसे यही सूचित होता है। किन्तु किसी कारणसे जगत्में स्थित जीव प्रणवके साथ अपने इस नित्य सम्बन्धकी बात भूल गया है। इसी सम्बन्धकी स्मृतिको जाग्रत करनेके लिये जगत्के सृष्टि-स्थिति-विनाशके एकमात्र कारणरूप प्रणवकी उपासनाकी बात भी श्रुतियोंमें दिखायी देती है। “एष आत्मा श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः”, “सर्वे वेदा यत्पदमानमन्ति” आदि श्रुति वाक्योंमें ब्रह्मस्वरूप प्रणवकी उपासनाके विषयमें कहा गया है। श्रुतियोंके सभी वाक्य प्रणवकी उपासनाके उपदेशसे अभिधेय-तत्त्वकी बात ही कहते हैं। इस उपासनाका क्या फल होगा, यह भी श्रुतियाँ बतलाती हैं। कठोपनिषद्— “एतद् हि एव अक्षरं ब्रह्म एतद् एव अक्षरं परम्। एतद् हि एव अक्षरं ज्ञात्वा यो यद् इच्छति अस्य तत्॥ एतद् आलम्बनं श्रेष्ठम् एतद् आलम्बनं परम्। एतद् आलम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥” अर्थात् “उपासनाके द्वारा प्रणवको जान लेनेपर उनकी उपलब्धि होती है; जो जैसी इच्छा करता है, वह वही लाभ करता है। जीव इच्छा करनेपर प्रणवरूप ब्रह्मके लोकको भी प्राप्त कर सकता है।” इन सब श्रुति-वाक्योंसे प्रणवकी उपासनाके फलस्वरूप प्रयोजन तत्त्वकी बात ही कही गयी है। इस प्रकार यह देखा गया है—सम्बन्ध-तत्त्व, अभिधेय-तत्त्व और प्रयोजन-तत्त्व, प्रणवके ही अन्तर्भुक्त हैं। वेद-वेदान्त-उपनिषदादि समस्त शास्त्रोंका प्रतिपाद्य भी ये तीन तत्त्व ही हैं। ये तीनों तत्त्व ही प्रणवके अन्तर्निहित होनेसे प्रणव ही ‘वाक्यसमुदायः’-रूप महावाक्य है—यही प्रमाणित हुआ है॥१२८॥ सातवाँ अध्याय | ४३९
[ ७/१२९-१३२ ईश्वर-वाच्य, प्रणव-वाचक; 'तत्त्वमसि आदि'- वेदके एक अंशके सूचकमात्र :- सर्वाश्रय ईश्वरेर करि प्रणव उद्देश। 'तत्त्वमसि'-वाक्य हय वेदेर एकदेश ॥ १२९ ॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' सभीके आश्रय ईश्वरको ही लक्ष्य करता है, किन्तु 'तत्त्वमसि' वेदका यह वाक्य एकदेशीय है॥ १२९॥ अनुभाष्य—'तत्त्वमसि' श्रुति—छान्दोग्य उपनिषद् (६/८/१६) में—“स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति” ऐसा देखा जाता है। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित चार वैदिक महावाक्योंमें 'तत्त्वमसि' एक है॥ १२९॥ 'प्रणव' महावाक्य—ताहा करि' आच्छादन। महावाक्ये करि' 'तत्त्वमसिं'र स्थापन ॥ १३० ॥ वेदादि शास्त्रोंमें अभिधा-वृत्तिके द्वारा श्रीकृष्ण ही स्वीकृत :- सर्व वेदसूत्रे करे कृष्णेर अभिधान॥ मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल लक्षणा-व्याख्यान॥ १३१॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' को आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि' को महावाक्यके रूपमें स्थापित किया है। सभी वैदिक सूत्रोंमें अभिधावृत्तिसे श्रीकृष्णको ही प्रतिपाद्यक विषयके रूपमें वर्णन किया गया है, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने शास्त्रोंकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर लक्षणा-वृत्तिका ही व्याख्यान किया है॥ १३०-१३१॥ अनुभाष्य—“वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते॥” अर्थात् वेद, रामायण, पुराण और महाभारत, आदि-अन्त-मध्य सर्वत्र हरिका ही गायन करते हैं॥ १३१॥ निरपेक्ष शब्द-प्रमाण ही सर्वश्रेष्ठ :- स्वतःप्रमाण वेद—प्रमाण-शिरोमणि। लक्षणा करिले स्वतःप्रमाणता-हानि॥ १३२॥ अनुवाद—स्वतः प्रमाणित वेद ही सभी प्रमाणोंके शिरोमणि स्वरूप हैं, किन्तु लक्षणा-वृत्तिसे अर्थको ग्रहण करनेसे स्वतःप्रमाणता लुप्त हो जाती है॥ १३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रणव वेदका मूलवाक्य है, इसलिये वही एकमात्र ब्रह्मवाचक महावाक्य है। 'प्रणव'—ईश्वरके स्वरूपको व्यक्त करनेवाला शब्द है, इसलिये यह ईश्वरका नित्यनाम है। 'सर्वविश्वधाम'—सर्वाश्रय ईश्वरको लक्ष्य करता है। तब जो 'तत्त्वमसि' (छाः ६/८/७), “इदं सर्वं यदयमात्मा”, “ब्रह्मेदं सर्वं” (बृः आः २/५/१), “आत्मैवेदं सर्वं” (छाः ७/२५/२), “नेह नानास्ति किञ्चन” (कठः २/१/११, बृः आः ४/४/१९) आदि वाक्योंको 'महावाक्य' कहा गया है, यह एक बड़ा भ्रम है। क्योंकि उनमें प्रधान-वाक्यके रूपमें 'तत्त्वमसि' एक प्रादेशिक वाक्य मात्र है, इस कारण 'तत्त्वमसि' शब्दमें जो कहा गया है, वह केवल वेदका एकदेश-व्यापी उपदेश ४४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
है। जो वेदका सर्वदेश-व्यापी है, वही महावाक्य है, इसलिये 'प्रणव' के अतिरिक्त और कोई भी 'महावाक्य' नहीं हो सकता। इस तत्त्वको आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि'को महावाक्य कहा है। ऐसे कल्पित महावाक्यका अवलम्बन करके वेदकी सर्वत्र मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधा-वृत्तिको छोड़कर जो लक्षणा अथवा गौणवृत्तिके द्वारा व्याख्या की जा रही है, उसमें सर्ववेदसूत्रके श्रीकृष्णतत्त्व-व्याख्यानको अकारण तिरस्कृत किया जा रहा है। वेद जब स्वतःप्रमाण हैं, तब उसके शब्दार्थोंमें लक्षणावृत्तिको जोड़ना उसके स्वतःसिद्ध प्रमाणको लुप्त करना मात्र है॥१२८-१३२॥ अनुभाष्य—आदिलीला ७/१०८ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१३२॥ शङ्करकी व्याख्या लक्षणा-वृत्तिके आधारपर, अतः काल्पनिक :- एइमत प्रतिसूत्रे सहजार्थ छाड़ि़या। गौणार्थ व्याख्या करे सब कल्पना करिया॥१३३॥ महाप्रभुके द्वारा प्रत्येक सूत्रके शाङ्कर-भाष्यका खण्डन और संन्यासियोंका चमत्कृत होना :- एइमते प्रतिसूत्रे करेन दूषण।” शुनि' चमत्कार हैल संन्यासीर गण॥१३४॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके सभी सूत्रोंके सहज अर्थको छोड़कर अपनी कल्पनाके अनुसार गौणार्थकी व्याख्या की है। इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके प्रत्येक सूत्रको दूषित किया है।” महाप्रभुकी ऐसी व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी चमत्कृत हो गये॥१३३-१३४॥ संन्यासियोंकी स्वीकारोक्ति और साम्प्रदायिक भाव :- सकल संन्यासी कहे,—“शुनह श्रीपाद। तुमि ये खण्डिले अर्थ, ए नहे विवाद॥१३५॥ आचार्य-कल्पित अर्थ,—इहा सबे जानि। सम्प्रदाय-अनुरोधे तत्त्व इहा मानि॥१३६॥ अभिधा-वृत्तिसे व्याख्या करनेके लिये महाप्रभुसे अनुरोध :- मुख्यार्थ व्याख्या कर, देखि तोमार बल।” मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु सूत्रसकल॥१३७॥ अनुवाद—सभी संन्यासी कहने लगे,—“श्रीपाद सुनिये! आपने जो श्रीशङ्कराचार्यके विचारोंका खण्डन किया है, उससे हमारा कोई विवाद नहीं है। यह श्रीशङ्कराचार्यका कल्पित अर्थ है, यह हम सब जानते हैं, किन्तु सम्प्रदायसे जुड़े होनेके कारण हम इसे तत्त्वके रूपमें मानते हैं। आप सूत्रोंकी मुख्यार्थसे व्याख्या कीजिये, तब हम आपका बल देखेंगे।” यह सुनकर महाप्रभु सभी सूत्रोंका मुख्यार्थ करने लगे॥१३५-१३७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे श्रीकृष्णचैतन्य! आपने जो पूर्वोक्त विचारोंको दिखलाकर श्रीशङ्कराचार्यके अर्थका खण्डन किया है, वह निरर्थक विवाद नहीं है अर्थात् भाग्यवान् व्यक्ति ही उसको 'सत्य' के रूपमें ग्रहण करता है॥१३५॥
[ ७/१३८-१४० महाप्रभुकी व्याख्या- (१) भगवान् श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' :- “बृहद्वस्तु 'ब्रह्म' कहि—'श्रीभगवान्'। षड्विधैश्वर्यपूर्ण, परतत्त्वधाम॥ १३८॥ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि मायागन्ध। सकल वेदेर हय भगवान् से 'सम्बन्ध' ॥ १३९॥ ताँरे 'निर्विशेष' कहि, चिच्छक्ति ना मानि'। अर्द्ध स्वरूप ना मानिले पूर्णता हय हानि॥ १४०॥ अनुवाद-बृहद-वस्तु 'ब्रह्म' ही साक्षात् 'श्रीभगवान्' है। वे षडैश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और परतत्त्वके धाम हैं। उनका स्वरूप चिदानन्दमय है और उनका ऐश्वर्य उनकी चित्-शक्तिका विकार है, इसलिये उसमें मायाकी गन्ध भी नहीं है। सभी वेदोंका 'सम्बन्ध' श्रीभगवान्से ही है अर्थात् वेदोंका तात्पर्य भगवान्के साथ 'सम्बन्ध' को जानना ही है। उनको निर्विशेष कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। इस प्रकार उनके आधे स्वरूपको ही मानना वास्तवमें उनके पूर्ण स्वरूपको नकारना है॥ १३८-१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बृहदारण्यक (५/१) में- "पूर्णमदः” आदि वाक्योंमें षडैश्वर्यपूर्ण परतत्त्वको बृहद्-वस्तु कहा गया है। सभी पुराणोंमें भगवत्-शब्दसे उन सभी लक्षणोंका वर्णन हुआ है। इसलिये वेदोंमें जहाँ-जहाँपर 'ब्रह्म' कहा गया है, वहाँ-वहाँपर 'श्रीभगवान्' शब्द देनेपर ही शब्द चरितार्थ होता है अर्थात् शब्दका मुख्यार्थ प्रकाश होता है। इसलिये सम्पूर्ण वेदोंमें भगवान् ही एकमात्र सम्बन्ध हैं। भगवान् निर्विशेष गुणको क्रोड़ीभूत करके नित्य-सविशेष हैं। उनको 'निर्विशेष' कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। ब्रह्म चित्-शक्तियुक्त सविशेष हैं, इसलिये आधे स्वरूपको ना मानना पूर्णको ही नहीं मानना है॥ १३८-१४०॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थसंग्रह'में- “ज्ञानेन धर्मेण स्वरूपमपि निरूपितं, न तु ज्ञानमात्रं ब्रह्मेति कथमिदमवगम्यते इति चेत्? “यः सर्वज्ञः सर्वविद्", इत्यादि ज्ञातृत्व-श्रुतेः, “पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते”, “विज्ञातारमरे केने विजानीयात्" इत्यादि श्रुतिशतसमधिगतमिदं ज्ञानस्य धर्ममात्रत्वाद्धर्ममात्रस्यैकस्य वस्तुत्वप्रतिपादनानुपपत्तेश्च। अतः सत्यज्ञानादिपदानि स्वार्थभूतज्ञानादिविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपादयन्ति। तत्त्वमिति द्वयोरपि पदयोः स्वार्थप्रहाणेन निर्विशेषवस्तु-स्वरूपोपस्थापनपरत्वे मुख्यार्थ-परित्यागश्च। ऐक्य तात्पर्यनिश्चयात्र लक्षणादोषः 'सोऽयं देवदत्तः' इतिवत्। ××अपिच अर्थभेद-तत्संसर्गविशेष- बोधनकृत-पदवाक्यस्वरूपता-लब्धप्रमाणभावस्य शब्दस्य निर्विशेष-वस्तुबोधनासामर्थ्यान्न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः प्रमाणम्। निर्विशेष इत्यादि शब्दास्तु केनचिद्विशेषेण विशिष्टतयावगतस्य वस्तुनो वस्त्वन्तरावगत-विशेषनिषेधकतया बोधकाः।" ज्ञानके द्वारा, धर्मके द्वारा ब्रह्मका स्वरूप निर्णय होता है। 'ब्रह्म केवल ज्ञानमात्र हैं', ऐसा नहीं है। यदि कहो, इससे किस प्रकार अवगत हुआ जाता है? 'जो सर्वज्ञ और सर्वविद् हैं' आदि ब्रह्मके ज्ञातृत्व-विषयक श्रुति, 'इस ब्रह्मकी पराशक्ति वेदोंमें विभिन्न प्रकारकी सुनी जाती है', 'विज्ञाता ब्रह्मको किस रूपमें जाना जाय'- आदि सैंकड़ों श्रुतियोंके द्वारा यह समझा जाता है। ज्ञान-धर्ममात्र है, इसलिये केवल एक धर्ममात्रके द्वारा ही वस्तुत्व (अर्थात् केवल एक ज्ञानमात्रसे ही ब्रह्मत्व) प्रतिपादन होनेसे वह सङ्गत नहीं होता। इसलिये ('सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'- इस प्रकारसे) सत्य, ज्ञानादि सभी पद अपने अर्थभूत ज्ञानादिविशिष्टको ही ब्रह्मके रूपमें ४४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
प्रतिपादन करते हैं। 'तत्' और 'त्वम्'—इन दो पदोंके भी अपने अर्थ लोप करके निर्विशेष वस्तुके स्वरूपको स्थापन करनेसे मुख्यार्थ (अभिधा-गत अर्थ) का परित्याग होता है। उनका एक-तात्पर्य निश्चित करनेके लिये 'वह एक देवदत्त' न्यायसे लक्षणा-दोष नहीं होता ('एकतात्पर्य' के अर्थसे त्वं-पदार्थ रूप जीवका अन्तर्यामि-सूत्रमें सर्वकारण-रूप तत्-पदार्थ परब्रह्मका जीवात्मत्वसे विरोध नहीं होता)। × × और भी यह है कि अर्थभेद और उसके संसर्ग-विशेषसे प्रकाशित, पद और वाक्यकी स्वरूपतासे जो प्रमाणरूप शब्द प्राप्त होता है, उससे शब्दकी निर्विशेष-वस्तुके परिचय ज्ञापनकी सामर्थ्य नहीं होनेपर निर्विशेष वस्तुमें 'शब्द'-प्रमाण नहीं होता, ऐसा कहना होगा। 'निर्विशेष' आदि शब्द किन्तु किसी विशेषणके द्वारा विशिष्ट रूपसे ज्ञात वस्तुके सम्बन्धमें अन्य अवगत वस्तुकी विशेषताकी निषेधकता मात्र ज्ञापन करता है॥ १४०॥ (२) श्रवणादि साधन-भक्ति ही उपाय अथवा 'अभिधेय' :— भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये करि उपाय। श्रवणादि भक्ति—कृष्णप्राप्त्येरे सहाय॥ १४१॥ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' नाम। साधनभक्ति हैते हय प्रेमेर उद्गम॥ १४२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १४१-१४२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन भगवत्-तत्त्वके चरणोंका आश्रय पानेके उपाय साधन-भक्तिको सभी वेदोंमें 'अभिधेय' कहा गया है। श्रवणादि नवधा-साधनभक्तिसे श्रीकृष्णप्रेमका उद्गम होता है॥ १४१-१४२॥ (३) श्रीकृष्णप्रेम ही उपेय, 'प्रयोजन' अथवा पञ्चम पुरुषार्थ :— कृष्णेर चरणे यदि हय अनुराग। कृष्णबिनु अन्यत्र तार नाहि रहे राग॥ १४३॥ पञ्चमपुरुषार्थ सेइ प्रेम-महाधन। कृष्णेर माधुर्य-रस कराय आस्वादन॥ १४४॥ प्रेमा हैते कृष्ण हय निज भक्तवश। प्रेमा हैते पाय कृष्णेर सेवा-सुखरस॥ १४५॥ अनुवाद—यदि एक बार श्रीकृष्णके चरणोंमें अनुराग हो जाता है, तो श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कहीं भी साधकका अनुराग नहीं रहता है। वही श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम पुरुषार्थ है। वह प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्य-रसका आस्वादन कराता है। प्रेमसे ही श्रीकृष्ण अपने भक्तके द्वारा वशीभूत हो जाते हैं। प्रेमसे भक्तको श्रीकृष्णका सेवा-सुखरस मिलता है॥ १४३-१४५॥ सम्बन्धामिधेय-प्रयोजन ही ब्रह्मसूत्रके प्रतिपाद्य :— सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन-नाम। एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे पर्यवसान॥”१४६॥ सातवाँ अध्याय | ४४३
[ ७/१४६-१४९ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीन अर्थोंमें ही वेदान्तके सभी सूत्रोंका पर्यवसान है अर्थात् उनमें इन तीन विषयोंका ही वर्णन है॥”१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं कौन हूँ? और यह जड़ ब्रह्माण्ड क्या है? एवं भगवत्-वस्तु क्या है? तथा हमारा आपसमें क्या सम्बन्ध है?—इन चार प्रश्नोंका सद्-अर्थ पानेसे 'सम्बन्ध-ज्ञान' होता है। जिसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त हो गया है, उस पुरुषका कर्त्तव्य क्या है? उस कर्त्तव्यको जाननेके बाद उस कर्त्तव्यके अवलम्बनको ही सभी शास्त्रोंके 'अभिधेय' के रूपमें जानना होगा। कर्त्तव्य अनुष्ठानके पश्चात् जो फल प्राप्त किया जाता है, उसीका नाम ही 'प्रयोजन' है। ब्रह्मसूत्रमें ये तीन अर्थ ही उपदिष्ट हुए हैं॥१४६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। सभी सूत्रोंकी व्याख्या सुनकर संन्यासियोंकी स्तुति :- एइमत सर्वसूत्रेर् व्याख्यान शुनिया। सकल संन्यासी कहे विनय करिया॥ १४७॥ “वेदमय-मूर्त्ति तुमि,—साक्षात् नारायण। क्षम अपराध,—पूर्वे ये कैलुँ निन्दन॥”१४८॥ अनुवाद—इस प्रकार सब (वेदान्त) सूत्रोंकी मुख्य अर्थके द्वारा व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी विनयपूर्वक कहने लगे— “आप वेदोंकी साक्षात् मूर्त्ति हैं और साक्षात् नारायण हैं। हम लोगोंने पहले आपकी निन्दा करके जो अपराध किया था, उसे कृपा क्षमा करें॥”१४८॥ उन सबका निरन्तर श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- सेइ हैते संन्यासीर फिरे गेल मन। 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा करये ग्रहण॥ १४९॥ अनुवाद—तबसे सभी संन्यासियोंका हृदय परिवर्तन हो गया और वे सभी 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा जप करने लगे॥ १४९॥ अनुभाष्य—उस समय काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके संन्यासियोंके नेता श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती थे। कोई-कोई भ्रमवशतः इनके साथ श्रीरङ्गक्षेत्रवासी, बादमें काम्यवनवासी श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीको एक करनेका प्रयास करते हैं। श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीपाद महीशूर देशसे आये रङ्गक्षेत्रप्रवासी रामानुजीय त्रिदण्डी स्वामी हैं। वे 'श्रीचैतन्यान्द्रामृत', 'राधारससुधानिधि', 'सङ्गीतमाधव', 'वृन्दावनशतक', 'नवद्वीपशतक' आदि ग्रन्थोंके प्रणेता हैं। व्येङ्कटभट्ट, तिरुमलय भट्ट और प्रबोधानन्द, ये तीन भाई हैं। श्रीमन्महाप्रभुने इनको १४३३ शकाब्दमें चातुर्मास्यके समय रामानुजीय सम्प्रदायमें दीक्षितके रूपमें देखा था। अल्प समय बाद १४३५ शकाब्दमें काशीमें उनको शाङ्कर-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त देखना नितान्त अयौक्तिक है। इस विषयमें श्रीभक्तिरत्नाकर-ग्रन्थ द्रष्टव्य है॥ १४९॥ अमृतानुकणा—'कोई-कोई मायावादी काशीवासी प्रकाशानन्दके साथ वैष्णवाग्रगण्य प्रबोधानन्दको एक करनेके लिये प्रयास करते हैं, किन्तु हम उनकी बातमें किसी भी प्रकार विश्वास नहीं ४४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१४९ ] कर पाये। क्योंकि प्रकाशानन्द-नामक मायावादी काशीवासी संन्यासीके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यभागवत मध्यखण्ड तृतीय अध्यायमें इस प्रकार उल्लेख है— “एइरूपे नवद्वीपे प्रभु विश्वम्भर। भक्तिमुखे भासे लइ सर्व अनुचर॥३॥ गुप्त वाक्ये तुष्ट हइ' वराह-ईश्वर। वेदप्रति क्रोध करि बलये उत्तर॥३५॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेई बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड॥३७॥ बाखानये—वेद मोर, विग्रह ना माने।” ३८क। अर्थात् “इस प्रकार महाप्रभु नवद्वीपमें अपने परिकरोंके साथ भक्तिसुखके आनन्दमें डूबे जा रहे थे। उन्होंने एक दिन मुरारि गुप्तके घरमें अपना वराहरूप प्रकट किया और मुरारि गुप्तकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए। तभी वेदोंके प्रति क्रोध प्रकाशित करते हुए बोले,—काशीमें बेटा प्रकाशानन्द पढ़ाता है; पढ़ाता क्या है, मेरे शरीरके खण्ड-खण्ड करता है। वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरा विग्रह नहीं मानता।” (‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृतम्’ ग्रन्थकी श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद कृत ‘भूमिका’)—“यह घटना १४२५ शकाब्द और १४३० शकाब्दके बीचमें सङ्घटित हुई। महाप्रभुने १४३३ शकाब्दमें श्रीरङ्गम्में शुभागमनकर (श्रीव्येङ्कट भट्टादि) तीनों भाईयोंमें श्रीप्रबोधानन्दपादको देखा था। वे लोग उस समय ‘श्री’-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीरामानुजीय वैष्णव थे। इसलिये वे विशिष्टाद्वैतवादी नित्य श्रीनारायण-विग्रहके सेवक थे; और प्रकाशानन्द—उस समय शङ्कर-प्रवर्त्तित मायावादके अग्रगण्य सेवक थे। इन दो व्यक्तियोंको एक करनेकी चेष्टा या एक समान करनेका प्रयास पागलपन मात्र है। ×× श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके परमाराध्य चाचा और गुरुदेवको नित्यसिद्ध भक्तकुलचूड़ामणि ना कहकर विष्णु-वैष्णव विरोधी मायावादी और बद्धजीव कहकर लाञ्छना एवं निन्दा करनेसे भीषण नरकगामी वैष्णव-अपराध होता है। ×× श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वतीने अपने दैन्य और विनयके वशमें होकर श्रीगोपालभट्टके द्वारा अपनी व्यक्तिगत कथाकी श्रीचैतन्यचरितामृतमें आलोचना करनेके लिये निषेध किया था और श्रील कविराज गोस्वामीने उनके आदेशका उल्लङ्घन नहीं किया, इस कारण अभी यह विपत्ति दिखायी दे रही है।” कोई-कोई अपनी नवीनता प्रकाश करनेके लिये ‘भक्तमाल’ नामक एक सहजिया-ग्रन्थका उदाहरण देकर कहते हैं कि महाप्रभुने ही स्वयं श्रीप्रकाशानन्दका नाम ‘प्रबोधानन्द’ रखकर उनको वृन्दावन भेजा था। पुनः कोई-कोई उस वाक्यकी अप्रामाणिकता और भी परिस्फुट करनेके लिये ‘अद्वैतप्रकाश’ नामक एक अवैध-ग्रन्थका आश्रय लेते हैं,—जहाँपर काशीमें प्रकाशानन्द नहीं, प्रबोधानन्दके ही उद्धारका वर्णन हुआ है। और भी श्रीचैतन्यमहाप्रभुके विषयमें सर्वापेक्षा प्रामाणिक ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवत, श्रीचैतन्यचरितामृत आदि ग्रन्थोंमें काशीमें प्रबोधानन्द-उद्धार अथवा प्रकाशानन्दके नामका कोई परिवर्त्तनादि तिलमात्र भी दिखायी नहीं देता है। विशेषतः जहाँपर श्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिखण्डके सातवें अध्याय और मध्यखण्डके पचीसवें अध्यायमें दो बार ‘प्रकाशानन्द-उद्धार’ का विस्तृतरूपसे वर्णन हुआ है, और भी वहाँपर इस प्रकार सातवाँ अध्याय | ४४५
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वक्तव्यका सामान्यतम आभास भी देखा नहीं जाता है। दूसरी ओर श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (मध्यलीला १/२०७-२०८) में-“शुनि' महाप्रभु कहे,-शुन, दबिरखास। तुमि दुईभाई मोर पुरातन दास॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप'-'सनातन'।”—इस प्रकार श्रीरूप-सनातनके विषयमें नाम परिवर्तनका उल्लेख स्पष्ट दिखायी देता है। वहाँपर 'प्रकाशानन्द-उद्धार' दो बार विस्ताररूपसे वर्णन होनेपर भी उनका नाम-परिवर्तन एक भी पयारमें प्रकाशित ना रहनेके कारण प्रकाशानन्दका प्रबोधानन्दमें रूपान्तरकी कल्पना नितान्त ही निरर्थक है। कोई कहते हैं-श्रीप्रबोधानन्दपादके दैन्यवशतः उनके विषय प्रकाश करनेके लिये निषेध करनेपर, यह नाम उल्लेखित नहीं हुआ है। इस निषेध आज्ञामें कोई सन्देह नहीं है; यह सत्य है, किन्तु इस विषयमें यदि श्रीप्रबोधानन्द ही पहले प्रकाशानन्द थे, तो 'प्रकाशानन्द-उद्धार' प्रसङ्ग प्रबोधानन्दपादके सम्बन्धमें ही होनेपर ग्रन्थकार उसे सम्पूर्णरूपसे गोपन रखते। यदि कहो, वह उद्धार-लीला विशेष गुरुत्वपूर्ण होनेके कारण अवश्य ही उल्लेख-योग्य है, ऐसा होनेपर हमारा यह कथन है कि, उस समय यदि प्रकाशानन्दका नाम परिवर्तन हुआ होता, तो वह (नाम-परिवर्तन) उस उद्धार-लीलाका ही अपरिहार्य (जिसे छोड़ा नहीं जा सकता) अङ्ग होनेपर वह कभी भी अप्रकाशित नहीं रह सकता था। श्रीप्रकाशानन्दके उद्धारके बाद महाप्रभुका उनको वृन्दावनमें भेजना भी नितान्त ही काल्पनिक है। प्रकाशानन्द-उद्धारके समय श्रील सनातन गोस्वामी काशीमें उपस्थित थे। महाप्रभुने काशीसे पुरी यात्रा करनेसे पहले उनको वृन्दावन जानेके लिये आदेश किया था, यह श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी वर्णित उस 'उद्धार-लीला' में दो स्थानोंमें देखा जाता है,—“लोक-निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन।” (आदिलीला ७/१६०) और “सनातने कहिला—तुमि याह वृन्दावन।” (मध्यलीला २५/१७५)। यदि वहाँपर महाप्रभु प्रकाशानन्दका उद्धार करनेके बाद उन्हें वृन्दावन भेजते, तो ग्रन्थकारका इस बातको गोपन करनेका कोई कारण नहीं हो सकता। अपितु उस प्रसङ्गका ध्यानपूर्वक पाठ करनेसे देखा जाता है कि, श्रीप्रकाशानन्द अपने सजातीय शिष्योंको लेकर गौरप्रेममें प्लावित हरिकीर्त्तनसे मुखरित 'द्वितीय नदीया नगर' के रूपमें परिणत उसी काशीमें ही परमसुखसे नाम-सङ्कीर्त्तन और श्रीमद्भागवत आलोचनामें ही मग्न हुए थे। (चैतन्यचरितामृत मध्यलीला २५/१५८-१६०)— “सब काशीवासी करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥ संन्यासी, पण्डित करे भागवत-विचार। वाराणशीपुर प्रभु करिला निस्तार॥ वाराणशी हैल द्वितीय नदीया नगर॥” इसलिये वहाँपर श्रीतपनमिश्रादि गौरभक्तोंकी भाँति श्रीप्रकाशानन्दका भी काशी-परित्यागका कोई कारण नहीं था। श्रीमद् प्रबोधानन्द-रचित 'श्रीचैतन्यचन्द्रामृत'-ग्रन्थके विभिन्न श्लोकों और विशेषतः उनके 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ज्ञानमार्ग तथा मायावादके उल्लेखके कारण कोई-कोई विचार करते हैं कि वे पहले काशीके मायावादी प्रकाशानन्द थे। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें ग्रन्थकारने महाप्रभुकी असमोध्वं महिमाको अन्वय-व्यतिरेकके रूपमें विचार करते हुए
४४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१४९ ] कर्ममार्गकी, योगमार्गकी, स्वर्गाभिलाषाकी, शास्त्राभ्यासकी, पुत्र-स्त्री-आसक्त विषयियोंकी, 'अहं-ब्रह्म'वादियोंकी, तपस्वियोंकी, गयाके कर्मकाण्डकी, काशीके ज्ञानकाण्डादिकी तुच्छता दिखलायी है। कभी-कभी उन्होंने स्वयंको भी उन सभी भक्तिके प्रतिकूल आचरणादिमें निमग्न और गौरप्रेमसे वञ्चित कहकर हृदयविदारक विभिन्न प्रकार आत्मग्लानि प्रकाश की है। इसी प्रकार वैष्णवोचित दैन्यका तात्पर्य ना समझकर एवं सरल अन्तःकरणके अभावके कारण वे लोग उक्त ग्रन्थकार (श्रीप्रबोधानन्द) को शुद्धभक्ति प्रतिकूल सभी मार्गोंकी निन्दा करते हुए देखकर भी जब भी ज्ञानमार्गकी बात निन्दाके रूपमें उल्लेख करते देखा है, तभी उनको मायावादीके साँचेमें आबद्धकर काशीके प्रकाशानन्दके रूपमें प्रस्तुत करनेकी चेष्टा की है। वे लोग इस प्रकार स्वयंको तथा दूसरोंको भी ठग रहे हैं। 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ग्रन्थकारने मायावाद-तापसन्तप्त हृदयको राधारस-रूप सुधानिधि (चन्द्र) के द्वारा शीतलकारी गौरसिन्धुका जयगान किया है— “स जयति गौरपयोधिर्मायावादताप-सन्तप्तम्। हृन्नथ उदशीतलयद् यो राधारस-सुधानिधिना॥” (उन लोगोंका कहना है)—'मायावाद-तापसन्तप्तम्'-इसीसे ही क्या ग्रन्थकारका पहले 'काशीवासी मायावादी प्रकाशानन्द' होनेका परिचय प्रकाशित नहीं होता? 'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थमें —जिसमें विशेषरूपसे 'प्रकाशानन्द-उद्धार' वर्णित हुआ है, उसमें कहीं भी प्रकाशानन्दके निकट महाप्रभुके द्वारा 'राधारस' के सम्बन्धमें कोई आलोचना ही करना नहीं देखा जाता है। प्रबलरूपसे निर्विशेष विचारग्रस्त विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीयोंके निकट महाप्रभुने केवल ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्य खण्डनकर वास्तवभाष्यके रूपमें श्रीमद्भागवतको ही स्थापन करते हुए सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनतत्त्वकी व्याख्या की, किन्तु इन सबसे भी श्रेष्ठ जो परमनिगूढ़ 'राधारस'-सम्पुट है, उसका उद्घाटन नहीं किया। प्रकाशानन्द उद्धारके बाद महाप्रभुने मात्र पाँच दिनों तक काशीमें अवस्थानकर पुरीकी यात्रा की थी—“एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा॥” (मध्यलीला २५/१७०)। तत्पश्चात् (महाप्रभु और प्रकाशानन्द) दोनोंके साक्षात्कारका अन्य कोई प्रमाण नहीं पाया जाता है। इसलिये प्रकाशानन्दका मायावाद-सन्तप्त हृदय गौरप्रसादसे शीतल हुआ था, इसमें सन्देह नहीं है, किन्तु वह निश्चितरूपमें 'राधारस'-वशतः नहीं। दूसरी ओर, महाप्रभुने श्रीरङ्गमें दीर्घ चातुर्मास्यकाल रहकर व्येङ्कटभट्ट, त्रिमल्लभट्ट एवं श्रीप्रबोधानन्दपादके निकट भगवान्के ऐश्वर्यविचारकी अपेक्षा माधुर्यविचारकी पराकाष्ठा तथा गोपियोंकी अपार महिमा एवं उनमें श्रीराधाका ही श्रीकृष्णवशीकारित्व (केवल श्रीराधा ही श्रीकृष्णको सम्पूर्णरूपसे वशीभूत कर सकती हैं) प्रकाशकर उनको श्रीलक्ष्मी-नारायणकी उपासनासे क्रमशः गोपीनाथ तथा राधानाथ-श्रीकृष्णके प्रति अनुरक्त किया था। उस समय मुखसे वेदोंको स्वीकार करनेपर भी जीवके नित्य विष्णु-सेवकत्वका परिचय अस्वीकारकर श्रीविष्णुसेवा-विनाशकारी मायावादकी जो भीषण प्रबलता थी, और उससे श्रीनारायण-सेवानिष्ठ प्रबोधानन्दपादका हृदय जो सर्वदा सन्तप्त हो रहा था, वह श्रीगौरसिन्धुसे उदित श्रीराधारस-चन्द्रकी किरणोंसे अर्थात् श्रीराधाकी विष्णुसेवाचेष्टाकी पराकाष्ठा सन्दर्शनसे परमशीतल हुआ था—इसमें सातवाँ अध्याय | ४४७
[ ७/१४९-१५६ कोई सन्देह नहीं है। इसलिये किसी प्रकारसे ही काशीके श्रीप्रकाशानन्द और नित्यसिद्ध भगवत्-पार्षद श्रीप्रबोधानन्दको एक करनेका प्रयास सिद्ध नहीं हो सकता॥ १४९॥ महाप्रभुके द्वारा अपराध-क्षमा और कृपा :- एइमते ताँ-सबार क्षमि' अपराध। सबाकारे कृष्णनाम करिला प्रसाद॥ १५०॥ सबका मिलकर महाप्रसाद-सम्मान :- तबे सब संन्यासी महाप्रभुके लैया। भिक्षा करिलेन सबे, मध्ये बसाइया॥ १५१॥ भिक्षा करि' महाप्रभु आइला वासाघर। हेन चित्र-लीला करे गौराङ्ग-सुन्दर॥ १५२॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने सभीका अपराध क्षमाकर सभीको 'श्रीकृष्ण'-नाम देकर कृपा की। तब सभी संन्यासियोंने महाप्रभुको अपने बीचमें बैठाकर महाप्रसाद ग्रहण किया। महाप्रसाद ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीगौराङ्ग-सुन्दर इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ १५०-१५२॥ महाप्रभुकी वदान्य-लीलासे भक्तोंका आनन्द :- चन्द्रशेखर, तपनमिश्र, आर सनातन। शुनि' देखि' आनन्दित सबाकार मन॥ १५३॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर, श्रीतपनमिश्र और श्रीसनातन गोस्वामी आदि सभी भक्तलोग श्रीमन्महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीलाओंको सुनकर तथा देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ १५३॥ प्रभुके देखिते आइसे सकल संन्यासी। प्रभुर प्रशंसा करे सब वाराणसी॥ १५४॥ महाप्रभुके पदार्पणसे काशी धन्या :- वाराणसीपुरी आइला श्रीकृष्णचैतन्य। पुरीसह सर्वलोक हैल महाधन्य॥ १५५॥ असंख्य लोगोंका महाप्रभु-दर्शन :- लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुके देखिते। महाभिड़ हैल द्वारे, नारे प्रवेशिते॥ १५६॥ अनुवाद-वहाँके सभी संन्यासी महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आने लगे और वाराणसीके सभी लोग महाप्रभुकी प्रशंसा करने लगे। श्रीकृष्णचैतन्यके वाराणसीमें पदार्पण करनेसे वाराणसीपुरी और वहाँके निवासी सभी धन्य हो गये। महाप्रभुके दर्शनके लिये लाखों-लाखों लोग आने लगे। वहाँ इतनी भीड़ हो जाती कि गृहके भीतर प्रवेश करना बहुत कठिन हो जाता था॥ १५४-१५६॥ अमृतानुकणिका—भगवान् विष्णुके आदेशसे असुर-मोहन निर्विशेषवाद प्रचारक शङ्करावतार आचार्य शङ्करने मायावादका प्रचार किया, तो भी वे शुद्ध स्वरूपमें 'वैष्णव' हैं। इसलिये उन ४४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१५४-१६१ ] 'वैष्णवानां यथा शम्भु'—वैष्णवाग्रणी शम्भुके मनोभीष्ट वेदान्तके एकमात्र निगूढ़ सिद्धान्त अचिन्त्यभेदाभेद तत्त्वका शिवक्षेत्रमें प्रचार करके भगवान् श्रीगौरसुन्दरने वैष्णवराज शङ्करकी आन्तरिक अभिलाषा पूर्ण की। शिवके अंशी-तत्त्व सदाशिवातार श्रीअद्वैत प्रभुके जल-तुलसी अर्पण करते हुए हुङ्कारके द्वारा श्रीगौरसुन्दरको धाम और पार्षद सहित प्रपञ्चमें अवतीर्ण करानेकी सार्थकता हुई। वे सब मूढ़ जीव जो वेद-प्रतिपाद्य परमेश्वर विष्णुके परम पादपद्मोंको शिवादि अधीन ईश्वर-तत्त्वोंके सहित समान समझते थे, शिवादि देवताओंको स्वतन्त्र भगवान् कल्पना करके विष्णु और वैष्णवोंके चरणोंमें अपराध सञ्चय कर रहे थे और उसके फलस्वरूप कोई-कोई तो आत्मविनाशरूप निर्विशेष गतिको ही चरम श्रेय मानकर अधःपतित और वञ्चित हुए थे, उनके आदर्शको ग्रहणकर भविष्यमें सुकृतिमान् सत्य-पिपासु व्यक्ति और वञ्चना-वैतरणीमें पतित ना हों, इसलिये ही श्रीगौरसुन्दरने काशीधाममें अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्तका प्रचार किया। वस्तुके अद्वयत्व और शक्तिका वैचित्र्य स्वीकार करनेपर बहु-ईश्वरवाद या वेदोंके एकदेशिक मतका वरण नहीं होता, अपितु वेदोंका सर्वाङ्गीण सिद्धान्त सुन्दर रूपसे मान्य होता है॥ १५४-१५६॥ प्रभु यबे या'न विश्वेश्वर-दर्शने। लक्ष लक्ष लोक आसि' मिले सेइ स्थाने॥ १५७॥ स्नान करिते यबे या'न गङ्गातीरे। ताहाञि सकल लोक हय महाभिड़े ॥ १५८ ॥ हरिकीर्तन करवाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :- बाहु तुलि' प्रभु बले,—बल हरि हरि। हरिध्वनि करे लोक स्वर्गमर्त्त्य भरि' ॥ १५९ ॥ अनुवाद-जब महाप्रभु काशी विश्वेश्वरके दर्शनके लिये जाते, तब भी लाखों-लाखों लोग आकर उनसे मिलते। महाप्रभु जब स्नान करनेके लिये गङ्गातटपर जाते, तब वहाँपर भी लोगोंकी बड़ी भीड़ हो जाती। महाप्रभु जब अपने बाहोंको ऊपर उठाकर 'हरि-हरिबोल' कहते, तब सभी लोग उनके साथ हरिबोल ध्वनि करते और उस हरिध्वनिसे स्वर्ग और मर्त्यलोक गूँज उठते ॥ १५९ ॥ महाप्रभुका काशीत्याग और श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :- लोक निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन ॥ १६० ॥ रात्रि-दिवसे लोकेर शुनि' कोलाहल। वाराणसी छाड़ि' प्रभु आइला नीलाचल ॥ १६१ ॥ अनुवाद-इस प्रकार काशीवासियोंका उद्धार करनेके बाद महाप्रभुकी वहाँसे जानेकी इच्छा हुई। तब उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। रात-दिन लोगोंका कोलाहल सुनकर महाप्रभु वाराणसी छोड़कर नीलाचल अर्थात् जगन्नाथपुरी आ गये॥ १६०-१६१॥ सातवाँ अध्याय | ४४९
[ ७/१६२-१६७ एइ लीला कहिब आगे विस्तार करिया। संक्षेपे कहिलाङ् इहाँ प्रसङ्ग पाइया ॥ १६२ ॥ अनुवाद—इस लीलाका मैं आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। यहाँ प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर मैंने इसका संक्षेपमें वर्णन किया ॥ १६२ ॥ पञ्चतत्त्वके रूपमें महाप्रभुका जगत्-उद्धार :— एइ पञ्चतत्त्वरूपे श्रीकृष्णचैतन्य। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया विश्व कैल धन्य ॥ १६३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने पञ्चतत्त्वके रूपमें श्रीकृष्णका नाम और प्रेम देकर विश्वको धन्य किया ॥ १६३ ॥ स्वयं और प्रचारकोंके द्वारा भारतमें सर्वत्र नामप्रेम-प्रचार तथा लोगोंका उद्धार :— मथुराते पाठाइल रूप-सनातन। दुइ सेनापति कैल भक्ति-प्रचारण ॥ १६४ ॥ नित्यानन्द-गोसाञे पाठाइला गौड़देशे। तँहो भक्ति प्रचारिला अशेष-विशेषे ॥ १६५ ॥ आपने दक्षिण देश करिला गमन। ग्रामे ग्रामे कैला कृष्णनाम-प्रचारण ॥ १६६ ॥ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला भक्तिर प्रचार। कृष्णप्रेम दिया कैला सबार निस्तार ॥ १६७ ॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६४-१६७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा सम्पूर्ण भारतके सभी लोगोंका उद्धार करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने उत्तर-पश्चिमदेशमें मथुरामण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा, गौड़-बङ्गालदेशमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा और स्वयं दक्षिणदेशके सेतुबन्ध तक ग्राम-ग्राममें श्रीकृष्णनामका प्रचार किया तथा श्रीकृष्णप्रेम देकर सबका उद्धार किया॥ १६४-१६७॥ इति अनुभाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—प्रेमके ठाकुर श्रीगौर-नित्यानन्दकी अनन्त प्रेमकी बाढ़ अभी भी अवरुद्ध नहीं हुई है, किसी कालमें अवरुद्ध नहीं होती है। मेघ जैसे क्षुद्र लोगोंके नेत्रोंको आवृत करके उनको कभी-कभी नित्यप्रकाश सूर्यके दर्शनसे वञ्चित करते हैं, किन्तु सूर्य लोकवासी किसी समय भी सूर्यके दर्शनसे वञ्चित नहीं होते, वैसे अणु चैतन्य जीव भी अविद्या-मेघके द्वारा आवृत रहकर गौड़देशमें नित्य प्रकाशमान श्रीगौरनित्यानन्दके तमोधर्मनाशक प्रकाशमाला और सुशीतल चन्द्रिकाराशिकी मधुरिमाकी उपलब्धि नहीं कर पाते। तब प्रेममय महावदान्य परदुःखदुःखी ठाकुर अपने जनोंको प्रेरण करके लोगोंके अविद्यारूपी अन्धकारको दूर करते हैं। जीव तब श्रीगौरसुन्दरकी प्रेमबाढ़में निमग्न होनेका सौभाग्य लाभ करते हैं। श्रीगौरनित्यानन्दकी ४५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१६४-१७१ ] प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो दिया है और कितने ही सज्जन एवं दुर्जन नित्य सेवानन्दमें मग्न हो गये हैं तथा होते रहेंगे॥ १६४-१६६॥ पञ्चतत्त्वकी व्याख्या सुननेसे श्रीगौरतत्त्व-ज्ञान प्राप्ति :- एइ त' कहिल पञ्चतत्त्वेर व्याख्यान। इहार श्रवणे हय चैतन्यतत्त्व-ज्ञान॥ १६८॥ अनुवाद-यहाँतक मैंने पञ्चतत्त्वका वर्णन किया। इसको श्रवण करनेसे श्रीचैतन्यतत्त्वका ज्ञान होता है॥ १६८॥ श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैत-तिन जन। श्रीवास-गदाधर-आदि यत भक्तगण॥ १६९॥ सबाकार पादपद्मे कोटि नमस्कार। यैछे तैछे कहि किछु चैतन्य-विहार॥ १७०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु, इन तीन ईश्वर स्वरूपोंके और श्रीवास-गदाधरादि सभी भक्तोंके चरणकमलोंमें मैं कोटि बार नमस्कार करता हूँ। इनकी कृपासे जिस-किसी प्रकारसे मैं चैतन्य महाप्रभुकी लीलाका कुछ वर्णन कर सका हूँ॥ १६९-१७०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१७१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे पञ्चतत्त्वाख्यान-निरूपणं नाम सप्तम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ १७१॥ इस प्रकार श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका पञ्चतत्त्व-निरूपण नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। सातवाँ अध्याय | ४५१
४५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अक्ष-गोविन्द ] श्लोक सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण] अक्षण्वतां फलमिदं न ४/१५५ | अहमेव क्वचिद् ३/८२ | कंसारातेर्बीजने येन ४/२०२ अगत्येकगतिं नत्वा ७/१ | अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् १/५३ | कंसारिरपि संसारवासना ४/२१९ अङ्गं चन्दनशीतलं ४/२५९ | अहैतुक्यव्यवहिता ४/२०६ | कर्णानन्दि-कलध्वनिर्वहेतु २/२ अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्ग ४/२०२ | आचार्यं मां विजानीया १/४६ | कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र ६/६० अटति यद्भवानह्नि ४/१५३ | आत्मारामस्य तस्येमा ६/७३ | कर्षन् वेणु १/१७ अत्र सर्गो विसर्गश्च २/९१ | आद्योऽवतारः पुरुषः ५/८३ | कलौ नास्त्येव नास्त्येव ७/७६ अथवा बहुनैतेन किं २/२० | आनन्दचिन्मयरसप्रति ४/७२ | कलौ यं विद्वांसः ३/५७ अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्यं १/१३, | आरज्यद्रसनां ४/२६० | कलौ सङ्कीर्त्तनाद्यैः ३/८० ६/५ | आवेश्य तदघं हित्वा ५/३५ | कस्माद्दन्दे प्रियसखि ४/१२५ अनयाराधितो नूनं भगवान् ४/८८ | आसन् वर्णास्त्रयो ३/३६ | कामाद्द्वेषाद् भयात् ५/३५ अनर्पितचरीं चिरात् १/४, ३/४ | इत्युद्धवादयोऽप्येतं ४/१६३ | कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ४/१५३ अनादिरादिर्गोविन्दः २/१०७ | इन्द्रारिव्याकुलं लोकं २/६७, | कृष्णः स्वयं समभवत् ५/१५५ अनुकृत्य रुतैर्जन्तूं ५/१३८ | ५/७९ | कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं ३/५१ अनुग्रहाय भक्तानां ४/३४ | ईश्वरः परमः कृष्णः २/१०७ | कृष्णादन्यः को वा ३/२७ अनुवादमनुक्तवा तु २/७४ | ईशस्य यत्त्रिभिर्हीनं २/५३ | कृष्णोत्कीर्तन-गान २/२ अनेकत्र प्रकटता १/७५ | उच्चैरनिन्ददानन्दम् ४/२०३ | केयं वा कुत आयाता ५/१४० अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं ३/८० | उत्सीदेयुरिमे लोका ३/२४ | क्वचिदपि स कथां नः ६/६७ अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां १/५६ | उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिल ३/५७ | क्वचित् क्रीड़ा-परिश्रान्तं ५/१३९ अपरिकलितपूर्वः ४/१४६ | उपेत्य पथि सुन्दरीतातभि ४/१९६ | क्वाहं तमो-महदहं-ख ५/७२ अपरेयमितस्त्वन्यां ७/११८ | उल्लङ्घितत्रिविधसीमा ३/८८ | क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्ड ५/७२ अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः ६/६३ | ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत १/५४ | क्षौणीभर्त्ता यत्कला १/११, अपारं कस्यापि प्रणयिजन ४/५२, | एकन्तु महत्ः स्रष्टृ ५/१०९ ४/२७५ | एतदीशनमीशस्य २/५५, ५/८७ | गृहेषु द्वयष्टसाहस्रं १/७४ अपि बत मधुपुर्यामार्य ६/६७ | एतावदेव जिज्ञास्यं १/५६ | गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य ४/१५२ अभविष्यदियं वृथा ४/११८ | एते चांशकलाः पुंसः २/६७, | गोप्यस्तपः किमचरन् ४/१५६ अभ्युत्थानमधर्मस्य ३/२२ | ५/७९ | गोलोक एव ४/७२ अयमहमाप हन्त प्रेक्ष्य ४/१४६ | एवं मदर्थोज्झितलोक ४/१७६ | गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि ४/२०३ अविद्या कर्मसंज्ञान्या ७/११९ | एवंव्रतः स्वप्रियनाम ७/९४ | गोविन्दाख्यां हरितनुमितः ५/२२४ श्लोक-सूची | ४५३
[ गौड़-मनसो गौड़ोदये पुष्पवन्तौ १/२, १/८४ | तेषां सततयुक्तानां १/४९ | नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः ४/२०८ चित्रं बतौतदेकेन १/७४ | त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या ४/२१६ | नैवोपयन्त्यपचितिं १/४८ चिन्तामणिप्रकरसद्मसु ५/२२ | त्वं भक्तियोगपरिभावित ३/११० | पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं १/१४, चिन्तामणिर्जयति १/५७ | त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद ७/९८ | ७/६ चैतन्याख्यं प्रकटम् १/५, ४/५५ | त्वां शीलरूपचरितैः ३/८६ | पदालम्भः कं वा ३/६२ जगृहे पौरुषं रूपं ५/८४ | ददामि बुद्धियोगं तं १/४९ | परित्राणाय साधूनां ३/२३ जयतां सुरतौ १/१५ | दशमस्य विशुद्धयर्थं २/९२ | पश्चादहं यदेतच्च १/५३ जानन्ति गोपिकाः पार्थ ४/२१३ | दशमे दशमं लक्ष्यम् २/९५ | पादसम्वाहनं चक्रु जीवभूतां महाबाहो ७/११८ | दास्यास्ते कृपणाय मे ६/७० | पीताम्बरधरः स्रग्वी ५/२१४ ज्ञानं परमगुह्यं मे १/५१ | दिवौकसां सदाराणां १/७३ | प्रख्यातदैवपरमार्थविदां ३/८६ तं तन्मूर्तिः प्रतितरु ४/१२५ | दिष्ट्या यदासीनन्मत्स्नेहो ४/२३ | प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं २/२१ तज्जोषणादाश्वपवर्गं १/६० | दीयमानं न गृह्णन्ति ४/२०७ | प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा १/५५ ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य १/५९ | दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः १/१६ | प्रविष्टेन गृहीतानां १/७२ ततो दुन्दुभयो १/७३ | दृग्भिः पिबन्ति ४/१५६ | प्रयोजनञ्चावतारे ४/२७६ तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः १/१, | दृग्भिर्हृदिकृतमलं ४/१५२ | प्र-शब्देन मोक्ष १/९३ १/३४ | देवी कृष्णमयी प्रोक्ता ४/८३ | प्रायेणात्मसमं शक्त्या १/७७ तत्रापि गोपिकाः पार्थ ४/२१६ | द्रव्यं विकारो गुण ५/८३ | प्रायो मायास्तु मे भर्तु ५/१४० तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु १/५२ | द्वापरे भगवान् श्यामः ३/३९ | प्रेमैव गोपरामाणां काम ४/१६३ तद्ब्रह्मकृष्णयोरेक्यात् ५/३६ | द्वौ भूतसर्गौ लोके ३/९० | बालोऽपि कुरुते शास्त्रं ४/१ तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तं २/१४ | धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र १/९१ | ब्रह्माख्यं धाम ते २/१७ तद्वक्षोरुह-चित्रकेलि ४/११७ | धर्मसंस्थापनार्थाय ३/२३ | ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य ५/१४१ तद्विद्यादात्मनो मायां १/५४ | न च सङ्कर्षणो न ६/१०० | ब्रह्मेति परमात्मेति २/११, २/६३ तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपाद ६/७२ | न तथा मे प्रियतम ६/१०० | भक्तावतारं भक्ताख्यं १/१४, ७/६ तमिममहमजं शरीरभाजां २/२१ | न पारयेऽहं निरवद्य ४/१८० | भक्तावतारमीशं १/१३, ६/५ तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका ४/७० | न मर्त्यबुद्ध्यासूर्येत १/४६ | भजते तादृशीः क्रीड़ा ४/३४ तरेन्नानामतग्राहव्याप्तं २/१ | न युज्यते सदात्मस्थैः २/५५, | भज सखे भवत्किङ्करीः ६/६६ तस्यावतार एवायमद्वैत १/१२, | ५/८७ | भवद्विधा भागवताः १/६३ ६/४ | न ह्यालम्बस्पदं किञ्चित् २/७४ | मङ्गलाचरणं कृष्णचैतन्य ४/२७६ ताभ्यः परं न ४/१८४ | नारायणस्त्वं न हि २/३०, | मङ्गलाचरितैर्दाने रतिर्नः ६/६० तासामाविरभूच्छौरिः ५/२१४ | ३/६८, ६/२२ | मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ १/१५ तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि १/६३ | नारायणोऽङ्गं नरभू २/३०, | मत्सेवया प्रतीतं ते ४/२०८ तुलसीदलमात्रेण ३/१०३ | ३/६८, ६/२२ | मदन्यत् ते न १/६२ तृतीयं सर्वभूतस्थं ५/७७ | निजाङ्गमपि या गोप्यो ४/१८४ | मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि ४/२०५ तेनाटवीमटसि ४/१७३ | निर्धूतामृतमाधुरीपरिमलः ४/२५९ | मनसो वृत्तयो नः ६/५९ ४५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
[header] मनो-सख्य ] [/header]
[column 1] मनोगतिरविच्छिन्ना ४/२०५ मन्माहात्म्यं मत्पर्यां ४/२१३ मन्वन्तरेशानुकथा २/९१ मम वर्त्मानुवर्तन्ते ४/२०, ४/१७८ मया परोक्षं भजता ४/१७६ मयि भक्तिर्हि ४/२३ महाभावस्वरूपेयं ४/७० महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता १/१२, ६/४ मायातीते व्यापिवैकुण्ठ १/८, ५/१३ मायाबलेन भवतापि ३/८८ मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः १/९, ५/५० मितञ्च सारञ्च वचो १/१०६ मुहुरुपचितवक्रिमापि ४/१३१ यं मन्येरन् १/७२ यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैः ३/५१ यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं ४/१७३ यत्पादकल्पतरुपल्लव १/५७ यथा भगवान् ब्रह्मणे १/५० यथा महान्ति भूतानि १/५५ यथा राधा प्रिया विष्णो ४/२१५ यथोत्तरमसौ स्वाद ४/४५ यद्यदाचरति श्रेष्ठः ३/२५ यद्यद्विया त उरुगाय ३/११० यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि १/३, २/५ यदरीणां प्रियाणाञ्च ५/३६ यदा यदा हि धर्मस्य ३/२२ यन्नो विहाय गोविन्दः ४/८८ यस्य प्रभा प्रभवतः २/१४ यस्य प्रसादादज्ञोऽपि ६/१ यस्यांशांशः १/१०, ५/९३ यस्यांशांशांशः १/११, ५/१०९ [/column 1]
[column 2] यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजो ५/१४१ यस्येच्छया तत्स्वरूप ५/१ यस्यैकनिश्वसित-काल ५/७१ यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव १/९, ५/५० या माऽभजन् ४/१८० यावानहं यथाभावो १/५२ ये यथा मां प्रपद्यन्ते ४/२०, ४/१७८ योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं १/४८ योगेश्वरेण कृष्णेन १/७१ रतिवासनया स्वाद्यी ४/४५ राधा कृष्णप्रणयविकृतिः १/५, ४/५५ राधामधाय हृदये ४/२१९ रामादिमूर्त्तिषु कला ५/१५५ रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो १/७१ रुचिं स्वामावव्रे ४/५२, ४/२७५ रूपं यस्योद्भाति १/८, ५/१३ रूपे कंसहरस्य लुब्ध ४/२६० रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थः ४/११६ लक्षणं भक्तियोगस्य ४/२०६ लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रम ५/२२ लोकस्रष्टुः सूतिकाधाम १/१०, ५/९३ वक्त्रं व्रजेशसुतयोः ४/१५५ वदन्ति तत्तत्त्वविदः २/११, २/६३ वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं ५/१ वन्दे गुरुनीशभक्तान् १/१, १/३४ वन्दे तं श्रीमद्वैताचार्य ६/१ वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य १/२, १/८४ वर्णयन्ति महात्मानः २/९२ वाचा सूचितशर्वरी-रति ४/११७ [/column 2]
[column 3] वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां ६/५९ वातवसना य ऋषयः २/१७ विक्रीणीते स्वमात्मानं ३/१०३ विनिर्यासः प्रेम्णो ४/५१ विभुरपि कलयन् सदा ४/१३१ विराट् हिरण्यगर्भश्च २/५३ विश्वेषामनुरञ्जेन ४/२२४ विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं २/२० विष्णुभक्तः स्मृतो दैव ३/९० विष्णुर्महान् स इह यस्य ५/७१ विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता ७/११९ विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि ५/७७ वृषायमाणौ नर्दन्तौ ५/१३८ व्रजजनार्त्तिहन् वीर ६/६६ शुक्लो रक्तस्तथा पीत ३/३६ शेषश्च यस्यांशकलाः १/७, ५/७ श्रीकृष्णाख्यं परं धाम २/९५ श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य ७/१ श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे बालोऽपि २/१ श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे यत्पाद ३/१ श्रीचैतन्यप्रसादेन ४/१ श्रीमद्भागवते महामुनिकृते १/९१ श्रीमान् रासरसारम्भी १/१७ श्रीराधायाः प्रणयमहिमा १/६, ४/२३० श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ १/१६ श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च ३/३९ षडैश्वर्यैः पूर्णो य १/३ सङ्करस्य च कर्त्ता ३/२४ सङ्कर्षणः कारणतोयशायी १/७, ५/७ संगृह्यात्याकरव्रातादशः ३/१ सख्योपेत्योग्रहीत् पाणिं ६/७२ सतां प्रसङ्गान्मम १/६० [/column 3]
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