श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/१६४-१७१ ] प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो दिया है और कितने ही सज्जन एवं दुर्जन नित्य सेवानन्दमें मग्न हो गये हैं तथा होते रहेंगे॥ १६४-१६६॥ पञ्चतत्त्वकी व्याख्या सुननेसे श्रीगौरतत्त्व-ज्ञान प्राप्ति :- एइ त' कहिल पञ्चतत्त्वेर व्याख्यान। इहार श्रवणे हय चैतन्यतत्त्व-ज्ञान॥ १६८॥ अनुवाद-यहाँतक मैंने पञ्चतत्त्वका वर्णन किया। इसको श्रवण करनेसे श्रीचैतन्यतत्त्वका ज्ञान होता है॥ १६८॥ श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैत-तिन जन। श्रीवास-गदाधर-आदि यत भक्तगण॥ १६९॥ सबाकार पादपद्मे कोटि नमस्कार। यैछे तैछे कहि किछु चैतन्य-विहार॥ १७०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु, इन तीन ईश्वर स्वरूपोंके और श्रीवास-गदाधरादि सभी भक्तोंके चरणकमलोंमें मैं कोटि बार नमस्कार करता हूँ। इनकी कृपासे जिस-किसी प्रकारसे मैं चैतन्य महाप्रभुकी लीलाका कुछ वर्णन कर सका हूँ॥ १६९-१७०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१७१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे पञ्चतत्त्वाख्यान-निरूपणं नाम सप्तम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ १७१॥ इस प्रकार श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका पञ्चतत्त्व-निरूपण नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। सातवाँ अध्याय | ४५१