भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ७/१६२-१६७ एइ लीला कहिब आगे विस्तार करिया। संक्षेपे कहिलाङ् इहाँ प्रसङ्ग पाइया ॥ १६२ ॥ अनुवाद—इस लीलाका मैं आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। यहाँ प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर मैंने इसका संक्षेपमें वर्णन किया ॥ १६२ ॥ पञ्चतत्त्वके रूपमें महाप्रभुका जगत्-उद्धार :— एइ पञ्चतत्त्वरूपे श्रीकृष्णचैतन्य। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया विश्व कैल धन्य ॥ १६३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने पञ्चतत्त्वके रूपमें श्रीकृष्णका नाम और प्रेम देकर विश्वको धन्य किया ॥ १६३ ॥ स्वयं और प्रचारकोंके द्वारा भारतमें सर्वत्र नामप्रेम-प्रचार तथा लोगोंका उद्धार :— मथुराते पाठाइल रूप-सनातन। दुइ सेनापति कैल भक्ति-प्रचारण ॥ १६४ ॥ नित्यानन्द-गोसाञे पाठाइला गौड़देशे। तँहो भक्ति प्रचारिला अशेष-विशेषे ॥ १६५ ॥ आपने दक्षिण देश करिला गमन। ग्रामे ग्रामे कैला कृष्णनाम-प्रचारण ॥ १६६ ॥ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला भक्तिर प्रचार। कृष्णप्रेम दिया कैला सबार निस्तार ॥ १६७ ॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६४-१६७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा सम्पूर्ण भारतके सभी लोगोंका उद्धार करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने उत्तर-पश्चिमदेशमें मथुरामण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा, गौड़-बङ्गालदेशमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा और स्वयं दक्षिणदेशके सेतुबन्ध तक ग्राम-ग्राममें श्रीकृष्णनामका प्रचार किया तथा श्रीकृष्णप्रेम देकर सबका उद्धार किया॥ १६४-१६७॥ इति अनुभाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—प्रेमके ठाकुर श्रीगौर-नित्यानन्दकी अनन्त प्रेमकी बाढ़ अभी भी अवरुद्ध नहीं हुई है, किसी कालमें अवरुद्ध नहीं होती है। मेघ जैसे क्षुद्र लोगोंके नेत्रोंको आवृत करके उनको कभी-कभी नित्यप्रकाश सूर्यके दर्शनसे वञ्चित करते हैं, किन्तु सूर्य लोकवासी किसी समय भी सूर्यके दर्शनसे वञ्चित नहीं होते, वैसे अणु चैतन्य जीव भी अविद्या-मेघके द्वारा आवृत रहकर गौड़देशमें नित्य प्रकाशमान श्रीगौरनित्यानन्दके तमोधर्मनाशक प्रकाशमाला और सुशीतल चन्द्रिकाराशिकी मधुरिमाकी उपलब्धि नहीं कर पाते। तब प्रेममय महावदान्य परदुःखदुःखी ठाकुर अपने जनोंको प्रेरण करके लोगोंके अविद्यारूपी अन्धकारको दूर करते हैं। जीव तब श्रीगौरसुन्दरकी प्रेमबाढ़में निमग्न होनेका सौभाग्य लाभ करते हैं। श्रीगौरनित्यानन्दकी ४५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत