श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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वक्तव्यका सामान्यतम आभास भी देखा नहीं जाता है। दूसरी ओर श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (मध्यलीला १/२०७-२०८) में-“शुनि' महाप्रभु कहे,-शुन, दबिरखास। तुमि दुईभाई मोर पुरातन दास॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप'-'सनातन'।”—इस प्रकार श्रीरूप-सनातनके विषयमें नाम परिवर्तनका उल्लेख स्पष्ट दिखायी देता है। वहाँपर 'प्रकाशानन्द-उद्धार' दो बार विस्ताररूपसे वर्णन होनेपर भी उनका नाम-परिवर्तन एक भी पयारमें प्रकाशित ना रहनेके कारण प्रकाशानन्दका प्रबोधानन्दमें रूपान्तरकी कल्पना नितान्त ही निरर्थक है। कोई कहते हैं-श्रीप्रबोधानन्दपादके दैन्यवशतः उनके विषय प्रकाश करनेके लिये निषेध करनेपर, यह नाम उल्लेखित नहीं हुआ है। इस निषेध आज्ञामें कोई सन्देह नहीं है; यह सत्य है, किन्तु इस विषयमें यदि श्रीप्रबोधानन्द ही पहले प्रकाशानन्द थे, तो 'प्रकाशानन्द-उद्धार' प्रसङ्ग प्रबोधानन्दपादके सम्बन्धमें ही होनेपर ग्रन्थकार उसे सम्पूर्णरूपसे गोपन रखते। यदि कहो, वह उद्धार-लीला विशेष गुरुत्वपूर्ण होनेके कारण अवश्य ही उल्लेख-योग्य है, ऐसा होनेपर हमारा यह कथन है कि, उस समय यदि प्रकाशानन्दका नाम परिवर्तन हुआ होता, तो वह (नाम-परिवर्तन) उस उद्धार-लीलाका ही अपरिहार्य (जिसे छोड़ा नहीं जा सकता) अङ्ग होनेपर वह कभी भी अप्रकाशित नहीं रह सकता था। श्रीप्रकाशानन्दके उद्धारके बाद महाप्रभुका उनको वृन्दावनमें भेजना भी नितान्त ही काल्पनिक है। प्रकाशानन्द-उद्धारके समय श्रील सनातन गोस्वामी काशीमें उपस्थित थे। महाप्रभुने काशीसे पुरी यात्रा करनेसे पहले उनको वृन्दावन जानेके लिये आदेश किया था, यह श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी वर्णित उस 'उद्धार-लीला' में दो स्थानोंमें देखा जाता है,—“लोक-निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन।” (आदिलीला ७/१६०) और “सनातने कहिला—तुमि याह वृन्दावन।” (मध्यलीला २५/१७५)। यदि वहाँपर महाप्रभु प्रकाशानन्दका उद्धार करनेके बाद उन्हें वृन्दावन भेजते, तो ग्रन्थकारका इस बातको गोपन करनेका कोई कारण नहीं हो सकता। अपितु उस प्रसङ्गका ध्यानपूर्वक पाठ करनेसे देखा जाता है कि, श्रीप्रकाशानन्द अपने सजातीय शिष्योंको लेकर गौरप्रेममें प्लावित हरिकीर्त्तनसे मुखरित 'द्वितीय नदीया नगर' के रूपमें परिणत उसी काशीमें ही परमसुखसे नाम-सङ्कीर्त्तन और श्रीमद्भागवत आलोचनामें ही मग्न हुए थे। (चैतन्यचरितामृत मध्यलीला २५/१५८-१६०)— “सब काशीवासी करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥ संन्यासी, पण्डित करे भागवत-विचार। वाराणशीपुर प्रभु करिला निस्तार॥ वाराणशी हैल द्वितीय नदीया नगर॥” इसलिये वहाँपर श्रीतपनमिश्रादि गौरभक्तोंकी भाँति श्रीप्रकाशानन्दका भी काशी-परित्यागका कोई कारण नहीं था। श्रीमद् प्रबोधानन्द-रचित 'श्रीचैतन्यचन्द्रामृत'-ग्रन्थके विभिन्न श्लोकों और विशेषतः उनके 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ज्ञानमार्ग तथा मायावादके उल्लेखके कारण कोई-कोई विचार करते हैं कि वे पहले काशीके मायावादी प्रकाशानन्द थे। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें ग्रन्थकारने महाप्रभुकी असमोध्वं महिमाको अन्वय-व्यतिरेकके रूपमें विचार करते हुए
४४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत