श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 487, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें७/१४९ ] कर पाये। क्योंकि प्रकाशानन्द-नामक मायावादी काशीवासी संन्यासीके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यभागवत मध्यखण्ड तृतीय अध्यायमें इस प्रकार उल्लेख है— “एइरूपे नवद्वीपे प्रभु विश्वम्भर। भक्तिमुखे भासे लइ सर्व अनुचर॥३॥ गुप्त वाक्ये तुष्ट हइ' वराह-ईश्वर। वेदप्रति क्रोध करि बलये उत्तर॥३५॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेई बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड॥३७॥ बाखानये—वेद मोर, विग्रह ना माने।” ३८क। अर्थात् “इस प्रकार महाप्रभु नवद्वीपमें अपने परिकरोंके साथ भक्तिसुखके आनन्दमें डूबे जा रहे थे। उन्होंने एक दिन मुरारि गुप्तके घरमें अपना वराहरूप प्रकट किया और मुरारि गुप्तकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए। तभी वेदोंके प्रति क्रोध प्रकाशित करते हुए बोले,—काशीमें बेटा प्रकाशानन्द पढ़ाता है; पढ़ाता क्या है, मेरे शरीरके खण्ड-खण्ड करता है। वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरा विग्रह नहीं मानता।” (‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृतम्’ ग्रन्थकी श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद कृत ‘भूमिका’)—“यह घटना १४२५ शकाब्द और १४३० शकाब्दके बीचमें सङ्घटित हुई। महाप्रभुने १४३३ शकाब्दमें श्रीरङ्गम्में शुभागमनकर (श्रीव्येङ्कट भट्टादि) तीनों भाईयोंमें श्रीप्रबोधानन्दपादको देखा था। वे लोग उस समय ‘श्री’-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीरामानुजीय वैष्णव थे। इसलिये वे विशिष्टाद्वैतवादी नित्य श्रीनारायण-विग्रहके सेवक थे; और प्रकाशानन्द—उस समय शङ्कर-प्रवर्त्तित मायावादके अग्रगण्य सेवक थे। इन दो व्यक्तियोंको एक करनेकी चेष्टा या एक समान करनेका प्रयास पागलपन मात्र है। ×× श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके परमाराध्य चाचा और गुरुदेवको नित्यसिद्ध भक्तकुलचूड़ामणि ना कहकर विष्णु-वैष्णव विरोधी मायावादी और बद्धजीव कहकर लाञ्छना एवं निन्दा करनेसे भीषण नरकगामी वैष्णव-अपराध होता है। ×× श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वतीने अपने दैन्य और विनयके वशमें होकर श्रीगोपालभट्टके द्वारा अपनी व्यक्तिगत कथाकी श्रीचैतन्यचरितामृतमें आलोचना करनेके लिये निषेध किया था और श्रील कविराज गोस्वामीने उनके आदेशका उल्लङ्घन नहीं किया, इस कारण अभी यह विपत्ति दिखायी दे रही है।” कोई-कोई अपनी नवीनता प्रकाश करनेके लिये ‘भक्तमाल’ नामक एक सहजिया-ग्रन्थका उदाहरण देकर कहते हैं कि महाप्रभुने ही स्वयं श्रीप्रकाशानन्दका नाम ‘प्रबोधानन्द’ रखकर उनको वृन्दावन भेजा था। पुनः कोई-कोई उस वाक्यकी अप्रामाणिकता और भी परिस्फुट करनेके लिये ‘अद्वैतप्रकाश’ नामक एक अवैध-ग्रन्थका आश्रय लेते हैं,—जहाँपर काशीमें प्रकाशानन्द नहीं, प्रबोधानन्दके ही उद्धारका वर्णन हुआ है। और भी श्रीचैतन्यमहाप्रभुके विषयमें सर्वापेक्षा प्रामाणिक ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवत, श्रीचैतन्यचरितामृत आदि ग्रन्थोंमें काशीमें प्रबोधानन्द-उद्धार अथवा प्रकाशानन्दके नामका कोई परिवर्त्तनादि तिलमात्र भी दिखायी नहीं देता है। विशेषतः जहाँपर श्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिखण्डके सातवें अध्याय और मध्यखण्डके पचीसवें अध्यायमें दो बार ‘प्रकाशानन्द-उद्धार’ का विस्तृतरूपसे वर्णन हुआ है, और भी वहाँपर इस प्रकार सातवाँ अध्याय | ४४५