श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१४६-१४९ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीन अर्थोंमें ही वेदान्तके सभी सूत्रोंका पर्यवसान है अर्थात् उनमें इन तीन विषयोंका ही वर्णन है॥”१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं कौन हूँ? और यह जड़ ब्रह्माण्ड क्या है? एवं भगवत्-वस्तु क्या है? तथा हमारा आपसमें क्या सम्बन्ध है?—इन चार प्रश्नोंका सद्-अर्थ पानेसे 'सम्बन्ध-ज्ञान' होता है। जिसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त हो गया है, उस पुरुषका कर्त्तव्य क्या है? उस कर्त्तव्यको जाननेके बाद उस कर्त्तव्यके अवलम्बनको ही सभी शास्त्रोंके 'अभिधेय' के रूपमें जानना होगा। कर्त्तव्य अनुष्ठानके पश्चात् जो फल प्राप्त किया जाता है, उसीका नाम ही 'प्रयोजन' है। ब्रह्मसूत्रमें ये तीन अर्थ ही उपदिष्ट हुए हैं॥१४६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। सभी सूत्रोंकी व्याख्या सुनकर संन्यासियोंकी स्तुति :- एइमत सर्वसूत्रेर् व्याख्यान शुनिया। सकल संन्यासी कहे विनय करिया॥ १४७॥ “वेदमय-मूर्त्ति तुमि,—साक्षात् नारायण। क्षम अपराध,—पूर्वे ये कैलुँ निन्दन॥”१४८॥ अनुवाद—इस प्रकार सब (वेदान्त) सूत्रोंकी मुख्य अर्थके द्वारा व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी विनयपूर्वक कहने लगे— “आप वेदोंकी साक्षात् मूर्त्ति हैं और साक्षात् नारायण हैं। हम लोगोंने पहले आपकी निन्दा करके जो अपराध किया था, उसे कृपा क्षमा करें॥”१४८॥ उन सबका निरन्तर श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- सेइ हैते संन्यासीर फिरे गेल मन। 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा करये ग्रहण॥ १४९॥ अनुवाद—तबसे सभी संन्यासियोंका हृदय परिवर्तन हो गया और वे सभी 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा जप करने लगे॥ १४९॥ अनुभाष्य—उस समय काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके संन्यासियोंके नेता श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती थे। कोई-कोई भ्रमवशतः इनके साथ श्रीरङ्गक्षेत्रवासी, बादमें काम्यवनवासी श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीको एक करनेका प्रयास करते हैं। श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीपाद महीशूर देशसे आये रङ्गक्षेत्रप्रवासी रामानुजीय त्रिदण्डी स्वामी हैं। वे 'श्रीचैतन्यान्द्रामृत', 'राधारससुधानिधि', 'सङ्गीतमाधव', 'वृन्दावनशतक', 'नवद्वीपशतक' आदि ग्रन्थोंके प्रणेता हैं। व्येङ्कटभट्ट, तिरुमलय भट्ट और प्रबोधानन्द, ये तीन भाई हैं। श्रीमन्महाप्रभुने इनको १४३३ शकाब्दमें चातुर्मास्यके समय रामानुजीय सम्प्रदायमें दीक्षितके रूपमें देखा था। अल्प समय बाद १४३५ शकाब्दमें काशीमें उनको शाङ्कर-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त देखना नितान्त अयौक्तिक है। इस विषयमें श्रीभक्तिरत्नाकर-ग्रन्थ द्रष्टव्य है॥ १४९॥ अमृतानुकणा—'कोई-कोई मायावादी काशीवासी प्रकाशानन्दके साथ वैष्णवाग्रगण्य प्रबोधानन्दको एक करनेके लिये प्रयास करते हैं, किन्तु हम उनकी बातमें किसी भी प्रकार विश्वास नहीं ४४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत