श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिपादन करते हैं। 'तत्' और 'त्वम्'—इन दो पदोंके भी अपने अर्थ लोप करके निर्विशेष वस्तुके स्वरूपको स्थापन करनेसे मुख्यार्थ (अभिधा-गत अर्थ) का परित्याग होता है। उनका एक-तात्पर्य निश्चित करनेके लिये 'वह एक देवदत्त' न्यायसे लक्षणा-दोष नहीं होता ('एकतात्पर्य' के अर्थसे त्वं-पदार्थ रूप जीवका अन्तर्यामि-सूत्रमें सर्वकारण-रूप तत्-पदार्थ परब्रह्मका जीवात्मत्वसे विरोध नहीं होता)। × × और भी यह है कि अर्थभेद और उसके संसर्ग-विशेषसे प्रकाशित, पद और वाक्यकी स्वरूपतासे जो प्रमाणरूप शब्द प्राप्त होता है, उससे शब्दकी निर्विशेष-वस्तुके परिचय ज्ञापनकी सामर्थ्य नहीं होनेपर निर्विशेष वस्तुमें 'शब्द'-प्रमाण नहीं होता, ऐसा कहना होगा। 'निर्विशेष' आदि शब्द किन्तु किसी विशेषणके द्वारा विशिष्ट रूपसे ज्ञात वस्तुके सम्बन्धमें अन्य अवगत वस्तुकी विशेषताकी निषेधकता मात्र ज्ञापन करता है॥ १४०॥ (२) श्रवणादि साधन-भक्ति ही उपाय अथवा 'अभिधेय' :— भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये करि उपाय। श्रवणादि भक्ति—कृष्णप्राप्त्येरे सहाय॥ १४१॥ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' नाम। साधनभक्ति हैते हय प्रेमेर उद्गम॥ १४२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १४१-१४२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन भगवत्-तत्त्वके चरणोंका आश्रय पानेके उपाय साधन-भक्तिको सभी वेदोंमें 'अभिधेय' कहा गया है। श्रवणादि नवधा-साधनभक्तिसे श्रीकृष्णप्रेमका उद्गम होता है॥ १४१-१४२॥ (३) श्रीकृष्णप्रेम ही उपेय, 'प्रयोजन' अथवा पञ्चम पुरुषार्थ :— कृष्णेर चरणे यदि हय अनुराग। कृष्णबिनु अन्यत्र तार नाहि रहे राग॥ १४३॥ पञ्चमपुरुषार्थ सेइ प्रेम-महाधन। कृष्णेर माधुर्य-रस कराय आस्वादन॥ १४४॥ प्रेमा हैते कृष्ण हय निज भक्तवश। प्रेमा हैते पाय कृष्णेर सेवा-सुखरस॥ १४५॥ अनुवाद—यदि एक बार श्रीकृष्णके चरणोंमें अनुराग हो जाता है, तो श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कहीं भी साधकका अनुराग नहीं रहता है। वही श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम पुरुषार्थ है। वह प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्य-रसका आस्वादन कराता है। प्रेमसे ही श्रीकृष्ण अपने भक्तके द्वारा वशीभूत हो जाते हैं। प्रेमसे भक्तको श्रीकृष्णका सेवा-सुखरस मिलता है॥ १४३-१४५॥ सम्बन्धामिधेय-प्रयोजन ही ब्रह्मसूत्रके प्रतिपाद्य :— सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन-नाम। एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे पर्यवसान॥”१४६॥ सातवाँ अध्याय | ४४३