भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 484

[ ७/१३८-१४० महाप्रभुकी व्याख्या- (१) भगवान् श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' :- “बृहद्वस्तु 'ब्रह्म' कहि—'श्रीभगवान्'। षड्विधैश्वर्यपूर्ण, परतत्त्वधाम॥ १३८॥ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि मायागन्ध। सकल वेदेर हय भगवान् से 'सम्बन्ध' ॥ १३९॥ ताँरे 'निर्विशेष' कहि, चिच्छक्ति ना मानि'। अर्द्ध स्वरूप ना मानिले पूर्णता हय हानि॥ १४०॥ अनुवाद-बृहद-वस्तु 'ब्रह्म' ही साक्षात् 'श्रीभगवान्' है। वे षडैश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और परतत्त्वके धाम हैं। उनका स्वरूप चिदानन्दमय है और उनका ऐश्वर्य उनकी चित्-शक्तिका विकार है, इसलिये उसमें मायाकी गन्ध भी नहीं है। सभी वेदोंका 'सम्बन्ध' श्रीभगवान्से ही है अर्थात् वेदोंका तात्पर्य भगवान्के साथ 'सम्बन्ध' को जानना ही है। उनको निर्विशेष कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। इस प्रकार उनके आधे स्वरूपको ही मानना वास्तवमें उनके पूर्ण स्वरूपको नकारना है॥ १३८-१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बृहदारण्यक (५/१) में- "पूर्णमदः” आदि वाक्योंमें षडैश्वर्यपूर्ण परतत्त्वको बृहद्-वस्तु कहा गया है। सभी पुराणोंमें भगवत्-शब्दसे उन सभी लक्षणोंका वर्णन हुआ है। इसलिये वेदोंमें जहाँ-जहाँपर 'ब्रह्म' कहा गया है, वहाँ-वहाँपर 'श्रीभगवान्' शब्द देनेपर ही शब्द चरितार्थ होता है अर्थात् शब्दका मुख्यार्थ प्रकाश होता है। इसलिये सम्पूर्ण वेदोंमें भगवान् ही एकमात्र सम्बन्ध हैं। भगवान् निर्विशेष गुणको क्रोड़ीभूत करके नित्य-सविशेष हैं। उनको 'निर्विशेष' कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। ब्रह्म चित्-शक्तियुक्त सविशेष हैं, इसलिये आधे स्वरूपको ना मानना पूर्णको ही नहीं मानना है॥ १३८-१४०॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थसंग्रह'में- “ज्ञानेन धर्मेण स्वरूपमपि निरूपितं, न तु ज्ञानमात्रं ब्रह्मेति कथमिदमवगम्यते इति चेत्? “यः सर्वज्ञः सर्वविद्", इत्यादि ज्ञातृत्व-श्रुतेः, “पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते”, “विज्ञातारमरे केने विजानीयात्" इत्यादि श्रुतिशतसमधिगतमिदं ज्ञानस्य धर्ममात्रत्वाद्धर्ममात्रस्यैकस्य वस्तुत्वप्रतिपादनानुपपत्तेश्च। अतः सत्यज्ञानादिपदानि स्वार्थभूतज्ञानादिविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपादयन्ति। तत्त्वमिति द्वयोरपि पदयोः स्वार्थप्रहाणेन निर्विशेषवस्तु-स्वरूपोपस्थापनपरत्वे मुख्यार्थ-परित्यागश्च। ऐक्य तात्पर्यनिश्चयात्र लक्षणादोषः 'सोऽयं देवदत्तः' इतिवत्। ××अपिच अर्थभेद-तत्संसर्गविशेष- बोधनकृत-पदवाक्यस्वरूपता-लब्धप्रमाणभावस्य शब्दस्य निर्विशेष-वस्तुबोधनासामर्थ्यान्न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः प्रमाणम्। निर्विशेष इत्यादि शब्दास्तु केनचिद्विशेषेण विशिष्टतयावगतस्य वस्तुनो वस्त्वन्तरावगत-विशेषनिषेधकतया बोधकाः।" ज्ञानके द्वारा, धर्मके द्वारा ब्रह्मका स्वरूप निर्णय होता है। 'ब्रह्म केवल ज्ञानमात्र हैं', ऐसा नहीं है। यदि कहो, इससे किस प्रकार अवगत हुआ जाता है? 'जो सर्वज्ञ और सर्वविद् हैं' आदि ब्रह्मके ज्ञातृत्व-विषयक श्रुति, 'इस ब्रह्मकी पराशक्ति वेदोंमें विभिन्न प्रकारकी सुनी जाती है', 'विज्ञाता ब्रह्मको किस रूपमें जाना जाय'- आदि सैंकड़ों श्रुतियोंके द्वारा यह समझा जाता है। ज्ञान-धर्ममात्र है, इसलिये केवल एक धर्ममात्रके द्वारा ही वस्तुत्व (अर्थात् केवल एक ज्ञानमात्रसे ही ब्रह्मत्व) प्रतिपादन होनेसे वह सङ्गत नहीं होता। इसलिये ('सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'- इस प्रकारसे) सत्य, ज्ञानादि सभी पद अपने अर्थभूत ज्ञानादिविशिष्टको ही ब्रह्मके रूपमें ४४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत