श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै। जो वेदका सर्वदेश-व्यापी है, वही महावाक्य है, इसलिये 'प्रणव' के अतिरिक्त और कोई भी 'महावाक्य' नहीं हो सकता। इस तत्त्वको आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि'को महावाक्य कहा है। ऐसे कल्पित महावाक्यका अवलम्बन करके वेदकी सर्वत्र मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधा-वृत्तिको छोड़कर जो लक्षणा अथवा गौणवृत्तिके द्वारा व्याख्या की जा रही है, उसमें सर्ववेदसूत्रके श्रीकृष्णतत्त्व-व्याख्यानको अकारण तिरस्कृत किया जा रहा है। वेद जब स्वतःप्रमाण हैं, तब उसके शब्दार्थोंमें लक्षणावृत्तिको जोड़ना उसके स्वतःसिद्ध प्रमाणको लुप्त करना मात्र है॥१२८-१३२॥ अनुभाष्य—आदिलीला ७/१०८ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१३२॥ शङ्करकी व्याख्या लक्षणा-वृत्तिके आधारपर, अतः काल्पनिक :- एइमत प्रतिसूत्रे सहजार्थ छाड़ि़या। गौणार्थ व्याख्या करे सब कल्पना करिया॥१३३॥ महाप्रभुके द्वारा प्रत्येक सूत्रके शाङ्कर-भाष्यका खण्डन और संन्यासियोंका चमत्कृत होना :- एइमते प्रतिसूत्रे करेन दूषण।” शुनि' चमत्कार हैल संन्यासीर गण॥१३४॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके सभी सूत्रोंके सहज अर्थको छोड़कर अपनी कल्पनाके अनुसार गौणार्थकी व्याख्या की है। इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके प्रत्येक सूत्रको दूषित किया है।” महाप्रभुकी ऐसी व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी चमत्कृत हो गये॥१३३-१३४॥ संन्यासियोंकी स्वीकारोक्ति और साम्प्रदायिक भाव :- सकल संन्यासी कहे,—“शुनह श्रीपाद। तुमि ये खण्डिले अर्थ, ए नहे विवाद॥१३५॥ आचार्य-कल्पित अर्थ,—इहा सबे जानि। सम्प्रदाय-अनुरोधे तत्त्व इहा मानि॥१३६॥ अभिधा-वृत्तिसे व्याख्या करनेके लिये महाप्रभुसे अनुरोध :- मुख्यार्थ व्याख्या कर, देखि तोमार बल।” मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु सूत्रसकल॥१३७॥ अनुवाद—सभी संन्यासी कहने लगे,—“श्रीपाद सुनिये! आपने जो श्रीशङ्कराचार्यके विचारोंका खण्डन किया है, उससे हमारा कोई विवाद नहीं है। यह श्रीशङ्कराचार्यका कल्पित अर्थ है, यह हम सब जानते हैं, किन्तु सम्प्रदायसे जुड़े होनेके कारण हम इसे तत्त्वके रूपमें मानते हैं। आप सूत्रोंकी मुख्यार्थसे व्याख्या कीजिये, तब हम आपका बल देखेंगे।” यह सुनकर महाप्रभु सभी सूत्रोंका मुख्यार्थ करने लगे॥१३५-१३७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे श्रीकृष्णचैतन्य! आपने जो पूर्वोक्त विचारोंको दिखलाकर श्रीशङ्कराचार्यके अर्थका खण्डन किया है, वह निरर्थक विवाद नहीं है अर्थात् भाग्यवान् व्यक्ति ही उसको 'सत्य' के रूपमें ग्रहण करता है॥१३५॥