भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 482

[ ७/१२९-१३२ ईश्वर-वाच्य, प्रणव-वाचक; 'तत्त्वमसि आदि'- वेदके एक अंशके सूचकमात्र :- सर्वाश्रय ईश्वरेर करि प्रणव उद्देश। 'तत्त्वमसि'-वाक्य हय वेदेर एकदेश ॥ १२९ ॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' सभीके आश्रय ईश्वरको ही लक्ष्य करता है, किन्तु 'तत्त्वमसि' वेदका यह वाक्य एकदेशीय है॥ १२९॥ अनुभाष्य—'तत्त्वमसि' श्रुति—छान्दोग्य उपनिषद् (६/८/१६) में—“स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति” ऐसा देखा जाता है। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित चार वैदिक महावाक्योंमें 'तत्त्वमसि' एक है॥ १२९॥ 'प्रणव' महावाक्य—ताहा करि' आच्छादन। महावाक्ये करि' 'तत्त्वमसिं'र स्थापन ॥ १३० ॥ वेदादि शास्त्रोंमें अभिधा-वृत्तिके द्वारा श्रीकृष्ण ही स्वीकृत :- सर्व वेदसूत्रे करे कृष्णेर अभिधान॥ मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल लक्षणा-व्याख्यान॥ १३१॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' को आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि' को महावाक्यके रूपमें स्थापित किया है। सभी वैदिक सूत्रोंमें अभिधावृत्तिसे श्रीकृष्णको ही प्रतिपाद्यक विषयके रूपमें वर्णन किया गया है, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने शास्त्रोंकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर लक्षणा-वृत्तिका ही व्याख्यान किया है॥ १३०-१३१॥ अनुभाष्य—“वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते॥” अर्थात् वेद, रामायण, पुराण और महाभारत, आदि-अन्त-मध्य सर्वत्र हरिका ही गायन करते हैं॥ १३१॥ निरपेक्ष शब्द-प्रमाण ही सर्वश्रेष्ठ :- स्वतःप्रमाण वेद—प्रमाण-शिरोमणि। लक्षणा करिले स्वतःप्रमाणता-हानि॥ १३२॥ अनुवाद—स्वतः प्रमाणित वेद ही सभी प्रमाणोंके शिरोमणि स्वरूप हैं, किन्तु लक्षणा-वृत्तिसे अर्थको ग्रहण करनेसे स्वतःप्रमाणता लुप्त हो जाती है॥ १३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रणव वेदका मूलवाक्य है, इसलिये वही एकमात्र ब्रह्मवाचक महावाक्य है। 'प्रणव'—ईश्वरके स्वरूपको व्यक्त करनेवाला शब्द है, इसलिये यह ईश्वरका नित्यनाम है। 'सर्वविश्वधाम'—सर्वाश्रय ईश्वरको लक्ष्य करता है। तब जो 'तत्त्वमसि' (छाः ६/८/७), “इदं सर्वं यदयमात्मा”, “ब्रह्मेदं सर्वं” (बृः आः २/५/१), “आत्मैवेदं सर्वं” (छाः ७/२५/२), “नेह नानास्ति किञ्चन” (कठः २/१/११, बृः आः ४/४/१९) आदि वाक्योंको 'महावाक्य' कहा गया है, यह एक बड़ा भ्रम है। क्योंकि उनमें प्रधान-वाक्यके रूपमें 'तत्त्वमसि' एक प्रादेशिक वाक्य मात्र है, इस कारण 'तत्त्वमसि' शब्दमें जो कहा गया है, वह केवल वेदका एकदेश-व्यापी उपदेश ४४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत