श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/१२८ ] अवलम्बनसे गतिसामान्यके द्वारा भी महावाक्यके अर्थका निर्णय करना कर्त्तव्य है। श्रील जीवगोस्वामीकी इस उक्तिसे जाना जाता है—वेद-वेदान्त-उपनिषद्-पुराण-इतिहासादिका मुख्य वक्तव्य विषयसमूह सूक्ष्मरूपमें जिसके मध्यमें (बीजके मध्यमें वृक्षके जैसे) अवस्थित, जिसकी बात इन समस्त शास्त्रोंमें अन्वयी और व्यतिरेकी प्रणालीसे तथा उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा भी प्रतिपादित हो, वही महावाक्य है। इस प्रकारका लक्षण एकमात्र प्रणवमें (ओंकार ‘ॐ’ में) ही है और किसी वाक्यमें ही नहीं है। प्रणव या ब्रह्मसे ही समस्त शास्त्रोंका उद्भव हुआ है—सभी श्रुतियाँ यही कहती हैं। मैत्रेयी उपनिषद्— “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् यद् ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेदः अथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम्। (६/३२)॥” अर्थात् चारों वेद, इतिहास, पुराणादि ये प्रणव या ब्रह्मसे प्रादुर्भूत हुए हैं, प्रणवकी ही अभिव्यक्ति हैं, ये समस्त शास्त्र सूक्ष्मरूपमें प्रणवके ही अन्तर्निहित हैं। इसलिये प्रणव ही समस्त शास्त्र-वाक्योंका समष्टि रूप ही है। प्रणव ही महावाक्य है। समस्त शास्त्र ही अन्वयी-व्यतिरेकी भावसे इस प्रणव या ब्रह्मके विषयमें ही कहते हैं, इन समस्त शास्त्रोंमें उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा इन्हीं प्रणव अथवा ब्रह्मको प्रतिपादित किया गया है। इसलिये प्रणव ही महावाक्य है। यह परिदृश्यमान् जगत् और जगत्के जीवसमूह प्रणवसे ही उद्भूत हुए हैं, इसलिये प्रणवके साथ इनका एक नित्य, अकाट्य सम्बन्ध है, इसलिये प्रणव ही सम्बन्ध-तत्त्व है। उपरोक्त श्रुति प्रमाणोंसे यही सूचित होता है। किन्तु किसी कारणसे जगत्में स्थित जीव प्रणवके साथ अपने इस नित्य सम्बन्धकी बात भूल गया है। इसी सम्बन्धकी स्मृतिको जाग्रत करनेके लिये जगत्के सृष्टि-स्थिति-विनाशके एकमात्र कारणरूप प्रणवकी उपासनाकी बात भी श्रुतियोंमें दिखायी देती है। “एष आत्मा श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः”, “सर्वे वेदा यत्पदमानमन्ति” आदि श्रुति वाक्योंमें ब्रह्मस्वरूप प्रणवकी उपासनाके विषयमें कहा गया है। श्रुतियोंके सभी वाक्य प्रणवकी उपासनाके उपदेशसे अभिधेय-तत्त्वकी बात ही कहते हैं। इस उपासनाका क्या फल होगा, यह भी श्रुतियाँ बतलाती हैं। कठोपनिषद्— “एतद् हि एव अक्षरं ब्रह्म एतद् एव अक्षरं परम्। एतद् हि एव अक्षरं ज्ञात्वा यो यद् इच्छति अस्य तत्॥ एतद् आलम्बनं श्रेष्ठम् एतद् आलम्बनं परम्। एतद् आलम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥” अर्थात् “उपासनाके द्वारा प्रणवको जान लेनेपर उनकी उपलब्धि होती है; जो जैसी इच्छा करता है, वह वही लाभ करता है। जीव इच्छा करनेपर प्रणवरूप ब्रह्मके लोकको भी प्राप्त कर सकता है।” इन सब श्रुति-वाक्योंसे प्रणवकी उपासनाके फलस्वरूप प्रयोजन तत्त्वकी बात ही कही गयी है। इस प्रकार यह देखा गया है—सम्बन्ध-तत्त्व, अभिधेय-तत्त्व और प्रयोजन-तत्त्व, प्रणवके ही अन्तर्भुक्त हैं। वेद-वेदान्त-उपनिषदादि समस्त शास्त्रोंका प्रतिपाद्य भी ये तीन तत्त्व ही हैं। ये तीनों तत्त्व ही प्रणवके अन्तर्निहित होनेसे प्रणव ही ‘वाक्यसमुदायः’-रूप महावाक्य है—यही प्रमाणित हुआ है॥१२८॥ सातवाँ अध्याय | ४३९