भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

[ ७/१२८ श्रीमद्भागवतको 'ताराङ्कुर' नाम दिया है।] इसलिये श्रीनाम साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। अष्टाक्षर मन्त्रको उद्देश्य करके श्रीनारदपञ्चरात्रमें स्पष्टरूपसे कहा है,—"यह प्रसिद्ध है कि भगवान् श्रीनारायण स्वयं ही अष्टाक्षरस्वरूपमें जीवोंके मुखमें साक्षात् उदित होते हैं।" प्रणवको उद्देश्य करके माण्डूक्योपनिषदमें भी— "चित्-दर्शनमें जो कुछ दिखलायी देता है, सब कुछ ही ओंकार—'ॐ' यही अक्षर है।" "ब्रह्मका और एक अविर्भाव—प्रणव है; उसे परमवस्तु कहा जाता है। वह अपूर्व, अबाध, अबाह्य, परम और अव्यय है। वह सभीका आदि, मध्य और अन्त है। इस प्रकारसे प्रणवको जानकर जीव अमृत भोग करता है। सभीके हृदयमें अवस्थित प्रणवको ईश्वर-स्वरूप जानना चाहिये। ॐ-कारको सर्वव्यापी विभु अर्थात् विष्णु-स्वरूप माननेसे बुद्धिमान् व्यक्तिको और शोक करना नहीं पड़ता अर्थात् उसकी और शूद्रता नहीं रहती। ॐ जड़-मात्राहीन होकर भी अनन्त-मात्रायुक्त हैं; उनसे ही जड़ीय द्वैतज्ञानका उपशम होकर अद्वयज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये वे परममङ्गल-स्वरूप हैं।" यहाँ पर ऐसा विचार नहीं करना चाहिये कि परमेश्वरके लिये (प्रणव) अवताररूपमें ये सभी मङ्गल विधान असम्भव होनेके कारण एक जड़ीय वर्ण या अक्षरमात्रकी इस प्रकार उक्तिमें वास्तव सत्य नहीं है—यह केवल स्तुतिरूप मात्र है। वास्तवमें, परमेश्वरके अन्यान्य अवतारोंकी भाँति यह प्रणव ही उनका एक वर्णरूपी अवतार है; क्योंकि यह अर्थ पूर्वोक्त श्रुतिवचनके बलसे ही स्वीकृत होकर उनसे अभिन्न होनेके कारण तत्सम्भावना-हेतु यही अर्थ ही ठीक है। इसलिये भगवान्का नाम और नामी-भगवान्—परस्पर अभिन्न हैं, इसमें सन्देह नहीं है। ॐ अथवा प्रणव ही वेदका निदानस्वरूप महावाक्य हैं। प्रति वैदिक मन्त्रके आदिमें और अन्तमें प्रणव निहित हैं। प्रणव—ईश्वरस्वरूप है। "अकारेणोच्यते कृष्णः सर्वलोकैक-नायकः। उकारेणोच्यते राधा मकारो जीववाचकः॥" अर्थात् अ-कार उच्चारणसे सर्वलोकोंके नायक श्रीकृष्ण, उ-कार उच्चारणसे उनकी स्वरूपशक्ति श्रीराधाको समझना चाहिये तथा म-कार जीव-वाचक है॥ १२८॥ अमृतानुकणिका—वर्णनीय विषयसमूह जिस वाक्यमें होता है, उसको महावाक्य कहते हैं। श्रीरामचन्द्रके सम्बन्धमें समस्त वर्णनीय विषय रामायणमें हैं। इसलिये 'रामायण' श्रीराम-विषयक महावाक्य हुआ। इसी प्रकार महाभारत कुरु-पाण्डवों सम्बन्धी महावाक्य है। किन्तु रामायण, महाभारतादि अपेक्षित महावाक्य हैं—विशेष-विशेष विषयके सम्बन्धमें महावाक्य मात्र हैं। किन्तु निरपेक्ष महावाक्य वह होगा जो प्राकृत और अप्राकृत जगत्का जहाँ जो कुछ भी है, उस समस्तको ही लक्ष्य करे, वह समस्त उसके अन्तर्भुक्त हो। श्रील जीवगोस्वामीने सर्वसम्वादिनीमें कहा है,—"वाक्य समुदायको महावाक्य कहते है। उपक्रम (ग्रन्थकी भूमिका), उपसंहार (ग्रन्थके अन्तमें सारांश), अभ्यास (पुनः-पुनः उल्लेख), अपूर्वता (अद्भुत अथवा अज्ञात), फल, अर्थवाद (किसी उद्देश्यका प्रकटीकरण) और उपपत्ति (युक्ति-प्रमाण अथवा सिद्धान्त)—ये सब शास्त्र-तात्पर्य निर्णयके उपाय हैं। अर्थात् उपक्रम और उपसंहारका एकरूपत्व, अभ्यास, अपूर्वता, फल, प्रशंसा और युक्तित्व—इन छह उपायोंके द्वारा ही शास्त्रका तात्पर्य निर्णय करना होता है। इस प्रकारसे अन्वय-व्यतिरेक विचारप्रणालीके ४३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत