भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 479

(छाः उः १/१/१, १/४/१)— “ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति हृद्गायति। तस्योपव्याख्यानम्” अर्थात् “भक्त साधक ओम् (अ-उ-म) को उद्गीथ् (परमात्माका तीन अक्षरोंका नाम) जानकर उनका अनुशीलन करेंगे। पहले इस ओम् (अ-उ-म) का उच्चारण करके वेदाध्ययन आरम्भ करेंगे।” (अथर्वशिखा २)— “प्रणवः सर्वान् प्राणान् प्रणामयति नामयति, चैतस्मात् प्रणवश्चतुर्द्धाऽवस्थित इति वेद देवयोनिर्ध्येयाश्चेति संवर्त्ता सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयति, तारणात् तानि सर्वाणीति विष्णुः सर्वान् जयति।” अर्थात् “प्रणव ही सभी प्राणोंको प्राणवान और नामयुक्त (ज्ञेय) बनाता है। इस प्रकार प्रणव चार रूपोंमें स्थित है—वेद, देवयोनि, ध्येय और संवर्त्ता। सम्पूर्ण दुःखोंसे तारण करनेवालेको संवर्त्ता कहते हैं। विष्णु ही सबको तारते हैं, इसलिये वे संवर्त्ता कहलाते हैं। वे सर्वोर्ध्व (सबसे ऊपर) विराजमान हैं।” (माण्डूक्य १)— “ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्; तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव, यच्चान्यत्रिक-कालातीतं तदप्योङ्कार एव।” अर्थात् “ॐ वेद अथवा उपनिषद्का रहस्य प्रकाशक शब्दब्रह्म है और यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो सृष्टिके पूर्व वर्तमान हैं, भविष्य अर्थात् प्रलयके अन्तमें भी जिनकी नित्य अवस्थिति है, उनका ही प्रकाशक शब्दब्रह्मस्वरूप ॐकार है।” (तैः, शिः, ८वाँ अ.)— “ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्व। ओमिति सामानि गायन्ति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मैवापाप्नोति।” अर्थात् “यह ॐ ब्रह्म है। यह ॐ ही सब कुछ है। ॐ के साथ ही सभी साम-गान होता है। ॐ के साथ ही ब्राह्मण पढ़ाना आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि मुझे ब्रह्मकी प्राप्ति हो तथा वे ब्रह्मको प्राप्त करते हैं।” श्रीभगवत् संदर्भ (संख्या-४८) में- “श्रुतौ च प्रणवमुद्दिश्य-“ओमित्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम, यस्मादुच्चार्यमाण एव संसारभयात् तारयति, तस्मादुच्यते तार इति।” तस्माद् भगवत्स्वरूपमेव नाम। स्पष्टोश्लोकं श्रीमन्नारदपञ्चरात्रेऽष्टाक्षरमुद्दिश्य-“व्यक्तं हि भगवानेव साक्षान्नारायणः स्वयम्। अष्टाक्षर-स्वरूपेण मुखेषु परिवर्त्तते॥” इति; माण्डूक्योपनिषत्सु (४/४-७) च प्रणवमुद्दिश्य-“ॐकार एवेदं सर्वम्। ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्।” “प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः। अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः॥ सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च। एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम्॥ प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदये स्थितम्। सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति॥ अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः। ॐकारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः॥” न तु परमेश्वरस्यैव तत्तद्योग्यतासम्भवाद् वर्णमात्रस्य तथोक्तिः स्तुतिरूपैवेति मन्तव्यम्। अवतारान्तरवत् परमेश्वरस्यैव वर्णरूपेणावतारोऽयमिति अस्मिन्नर्थे तेनैव श्रुतिवलेनाङ्गीकृते तदभेदेन तत्-सम्भवात्। तस्मान्नामनामिनोरभेद एव।” अर्थात् ‘ॐ’ यही परब्रह्मका सबसे श्रेष्ठ घनिष्ठ (मधुरतम) नाम है; उच्चारणके आरम्भसे ही जो जीवको संसार-भयसे परित्राण करता है, इसलिये वह ‘तार’ नामसे भी प्रसिद्ध है। [श्रीधरस्वामिपादने श्रीमद्भागवतकी अपनी टीकाके प्रारम्भमें, ॐकारसे आरम्भ होनेके कारण