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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

प्रतिपादन करते हैं। 'तत्' और 'त्वम्'—इन दो पदोंके भी अपने अर्थ लोप करके निर्विशेष वस्तुके स्वरूपको स्थापन करनेसे मुख्यार्थ (अभिधा-गत अर्थ) का परित्याग होता है। उनका एक-तात्पर्य निश्चित करनेके लिये 'वह एक देवदत्त' न्यायसे लक्षणा-दोष नहीं होता ('एकतात्पर्य' के अर्थसे त्वं-पदार्थ रूप जीवका अन्तर्यामि-सूत्रमें सर्वकारण-रूप तत्-पदार्थ परब्रह्मका जीवात्मत्वसे विरोध नहीं होता)। × × और भी यह है कि अर्थभेद और उसके संसर्ग-विशेषसे प्रकाशित, पद और वाक्यकी स्वरूपतासे जो प्रमाणरूप शब्द प्राप्त होता है, उससे शब्दकी निर्विशेष-वस्तुके परिचय ज्ञापनकी सामर्थ्य नहीं होनेपर निर्विशेष वस्तुमें 'शब्द'-प्रमाण नहीं होता, ऐसा कहना होगा। 'निर्विशेष' आदि शब्द किन्तु किसी विशेषणके द्वारा विशिष्ट रूपसे ज्ञात वस्तुके सम्बन्धमें अन्य अवगत वस्तुकी विशेषताकी निषेधकता मात्र ज्ञापन करता है॥ १४०॥ (२) श्रवणादि साधन-भक्ति ही उपाय अथवा 'अभिधेय' :— भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये करि उपाय। श्रवणादि भक्ति—कृष्णप्राप्त्येरे सहाय॥ १४१॥ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' नाम। साधनभक्ति हैते हय प्रेमेर उद्गम॥ १४२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १४१-१४२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन भगवत्-तत्त्वके चरणोंका आश्रय पानेके उपाय साधन-भक्तिको सभी वेदोंमें 'अभिधेय' कहा गया है। श्रवणादि नवधा-साधनभक्तिसे श्रीकृष्णप्रेमका उद्गम होता है॥ १४१-१४२॥ (३) श्रीकृष्णप्रेम ही उपेय, 'प्रयोजन' अथवा पञ्चम पुरुषार्थ :— कृष्णेर चरणे यदि हय अनुराग। कृष्णबिनु अन्यत्र तार नाहि रहे राग॥ १४३॥ पञ्चमपुरुषार्थ सेइ प्रेम-महाधन। कृष्णेर माधुर्य-रस कराय आस्वादन॥ १४४॥ प्रेमा हैते कृष्ण हय निज भक्तवश। प्रेमा हैते पाय कृष्णेर सेवा-सुखरस॥ १४५॥ अनुवाद—यदि एक बार श्रीकृष्णके चरणोंमें अनुराग हो जाता है, तो श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कहीं भी साधकका अनुराग नहीं रहता है। वही श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम पुरुषार्थ है। वह प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्य-रसका आस्वादन कराता है। प्रेमसे ही श्रीकृष्ण अपने भक्तके द्वारा वशीभूत हो जाते हैं। प्रेमसे भक्तको श्रीकृष्णका सेवा-सुखरस मिलता है॥ १४३-१४५॥ सम्बन्धामिधेय-प्रयोजन ही ब्रह्मसूत्रके प्रतिपाद्य :— सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन-नाम। एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे पर्यवसान॥”१४६॥ सातवाँ अध्याय | ४४३

[ ७/१४६-१४९ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीन अर्थोंमें ही वेदान्तके सभी सूत्रोंका पर्यवसान है अर्थात् उनमें इन तीन विषयोंका ही वर्णन है॥”१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं कौन हूँ? और यह जड़ ब्रह्माण्ड क्या है? एवं भगवत्-वस्तु क्या है? तथा हमारा आपसमें क्या सम्बन्ध है?—इन चार प्रश्नोंका सद्-अर्थ पानेसे 'सम्बन्ध-ज्ञान' होता है। जिसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त हो गया है, उस पुरुषका कर्त्तव्य क्या है? उस कर्त्तव्यको जाननेके बाद उस कर्त्तव्यके अवलम्बनको ही सभी शास्त्रोंके 'अभिधेय' के रूपमें जानना होगा। कर्त्तव्य अनुष्ठानके पश्चात् जो फल प्राप्त किया जाता है, उसीका नाम ही 'प्रयोजन' है। ब्रह्मसूत्रमें ये तीन अर्थ ही उपदिष्ट हुए हैं॥१४६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। सभी सूत्रोंकी व्याख्या सुनकर संन्यासियोंकी स्तुति :- एइमत सर्वसूत्रेर् व्याख्यान शुनिया। सकल संन्यासी कहे विनय करिया॥ १४७॥ “वेदमय-मूर्त्ति तुमि,—साक्षात् नारायण। क्षम अपराध,—पूर्वे ये कैलुँ निन्दन॥”१४८॥ अनुवाद—इस प्रकार सब (वेदान्त) सूत्रोंकी मुख्य अर्थके द्वारा व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी विनयपूर्वक कहने लगे— “आप वेदोंकी साक्षात् मूर्त्ति हैं और साक्षात् नारायण हैं। हम लोगोंने पहले आपकी निन्दा करके जो अपराध किया था, उसे कृपा क्षमा करें॥”१४८॥ उन सबका निरन्तर श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- सेइ हैते संन्यासीर फिरे गेल मन। 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा करये ग्रहण॥ १४९॥ अनुवाद—तबसे सभी संन्यासियोंका हृदय परिवर्तन हो गया और वे सभी 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा जप करने लगे॥ १४९॥ अनुभाष्य—उस समय काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके संन्यासियोंके नेता श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती थे। कोई-कोई भ्रमवशतः इनके साथ श्रीरङ्गक्षेत्रवासी, बादमें काम्यवनवासी श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीको एक करनेका प्रयास करते हैं। श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीपाद महीशूर देशसे आये रङ्गक्षेत्रप्रवासी रामानुजीय त्रिदण्डी स्वामी हैं। वे 'श्रीचैतन्यान्द्रामृत', 'राधारससुधानिधि', 'सङ्गीतमाधव', 'वृन्दावनशतक', 'नवद्वीपशतक' आदि ग्रन्थोंके प्रणेता हैं। व्येङ्कटभट्ट, तिरुमलय भट्ट और प्रबोधानन्द, ये तीन भाई हैं। श्रीमन्महाप्रभुने इनको १४३३ शकाब्दमें चातुर्मास्यके समय रामानुजीय सम्प्रदायमें दीक्षितके रूपमें देखा था। अल्प समय बाद १४३५ शकाब्दमें काशीमें उनको शाङ्कर-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त देखना नितान्त अयौक्तिक है। इस विषयमें श्रीभक्तिरत्नाकर-ग्रन्थ द्रष्टव्य है॥ १४९॥ अमृतानुकणा—'कोई-कोई मायावादी काशीवासी प्रकाशानन्दके साथ वैष्णवाग्रगण्य प्रबोधानन्दको एक करनेके लिये प्रयास करते हैं, किन्तु हम उनकी बातमें किसी भी प्रकार विश्वास नहीं ४४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१४९ ] कर पाये। क्योंकि प्रकाशानन्द-नामक मायावादी काशीवासी संन्यासीके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यभागवत मध्यखण्ड तृतीय अध्यायमें इस प्रकार उल्लेख है— “एइरूपे नवद्वीपे प्रभु विश्वम्भर। भक्तिमुखे भासे लइ सर्व अनुचर॥३॥ गुप्त वाक्ये तुष्ट हइ' वराह-ईश्वर। वेदप्रति क्रोध करि बलये उत्तर॥३५॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेई बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड॥३७॥ बाखानये—वेद मोर, विग्रह ना माने।” ३८क। अर्थात् “इस प्रकार महाप्रभु नवद्वीपमें अपने परिकरोंके साथ भक्तिसुखके आनन्दमें डूबे जा रहे थे। उन्होंने एक दिन मुरारि गुप्तके घरमें अपना वराहरूप प्रकट किया और मुरारि गुप्तकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए। तभी वेदोंके प्रति क्रोध प्रकाशित करते हुए बोले,—काशीमें बेटा प्रकाशानन्द पढ़ाता है; पढ़ाता क्या है, मेरे शरीरके खण्ड-खण्ड करता है। वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरा विग्रह नहीं मानता।” (‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृतम्’ ग्रन्थकी श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद कृत ‘भूमिका’)—“यह घटना १४२५ शकाब्द और १४३० शकाब्दके बीचमें सङ्घटित हुई। महाप्रभुने १४३३ शकाब्दमें श्रीरङ्गम्में शुभागमनकर (श्रीव्येङ्कट भट्टादि) तीनों भाईयोंमें श्रीप्रबोधानन्दपादको देखा था। वे लोग उस समय ‘श्री’-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीरामानुजीय वैष्णव थे। इसलिये वे विशिष्टाद्वैतवादी नित्य श्रीनारायण-विग्रहके सेवक थे; और प्रकाशानन्द—उस समय शङ्कर-प्रवर्त्तित मायावादके अग्रगण्य सेवक थे। इन दो व्यक्तियोंको एक करनेकी चेष्टा या एक समान करनेका प्रयास पागलपन मात्र है। ×× श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके परमाराध्य चाचा और गुरुदेवको नित्यसिद्ध भक्तकुलचूड़ामणि ना कहकर विष्णु-वैष्णव विरोधी मायावादी और बद्धजीव कहकर लाञ्छना एवं निन्दा करनेसे भीषण नरकगामी वैष्णव-अपराध होता है। ×× श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वतीने अपने दैन्य और विनयके वशमें होकर श्रीगोपालभट्टके द्वारा अपनी व्यक्तिगत कथाकी श्रीचैतन्यचरितामृतमें आलोचना करनेके लिये निषेध किया था और श्रील कविराज गोस्वामीने उनके आदेशका उल्लङ्घन नहीं किया, इस कारण अभी यह विपत्ति दिखायी दे रही है।” कोई-कोई अपनी नवीनता प्रकाश करनेके लिये ‘भक्तमाल’ नामक एक सहजिया-ग्रन्थका उदाहरण देकर कहते हैं कि महाप्रभुने ही स्वयं श्रीप्रकाशानन्दका नाम ‘प्रबोधानन्द’ रखकर उनको वृन्दावन भेजा था। पुनः कोई-कोई उस वाक्यकी अप्रामाणिकता और भी परिस्फुट करनेके लिये ‘अद्वैतप्रकाश’ नामक एक अवैध-ग्रन्थका आश्रय लेते हैं,—जहाँपर काशीमें प्रकाशानन्द नहीं, प्रबोधानन्दके ही उद्धारका वर्णन हुआ है। और भी श्रीचैतन्यमहाप्रभुके विषयमें सर्वापेक्षा प्रामाणिक ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवत, श्रीचैतन्यचरितामृत आदि ग्रन्थोंमें काशीमें प्रबोधानन्द-उद्धार अथवा प्रकाशानन्दके नामका कोई परिवर्त्तनादि तिलमात्र भी दिखायी नहीं देता है। विशेषतः जहाँपर श्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिखण्डके सातवें अध्याय और मध्यखण्डके पचीसवें अध्यायमें दो बार ‘प्रकाशानन्द-उद्धार’ का विस्तृतरूपसे वर्णन हुआ है, और भी वहाँपर इस प्रकार सातवाँ अध्याय | ४४५

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वक्तव्यका सामान्यतम आभास भी देखा नहीं जाता है। दूसरी ओर श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (मध्यलीला १/२०७-२०८) में-“शुनि' महाप्रभु कहे,-शुन, दबिरखास। तुमि दुईभाई मोर पुरातन दास॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप'-'सनातन'।”—इस प्रकार श्रीरूप-सनातनके विषयमें नाम परिवर्तनका उल्लेख स्पष्ट दिखायी देता है। वहाँपर 'प्रकाशानन्द-उद्धार' दो बार विस्ताररूपसे वर्णन होनेपर भी उनका नाम-परिवर्तन एक भी पयारमें प्रकाशित ना रहनेके कारण प्रकाशानन्दका प्रबोधानन्दमें रूपान्तरकी कल्पना नितान्त ही निरर्थक है। कोई कहते हैं-श्रीप्रबोधानन्दपादके दैन्यवशतः उनके विषय प्रकाश करनेके लिये निषेध करनेपर, यह नाम उल्लेखित नहीं हुआ है। इस निषेध आज्ञामें कोई सन्देह नहीं है; यह सत्य है, किन्तु इस विषयमें यदि श्रीप्रबोधानन्द ही पहले प्रकाशानन्द थे, तो 'प्रकाशानन्द-उद्धार' प्रसङ्ग प्रबोधानन्दपादके सम्बन्धमें ही होनेपर ग्रन्थकार उसे सम्पूर्णरूपसे गोपन रखते। यदि कहो, वह उद्धार-लीला विशेष गुरुत्वपूर्ण होनेके कारण अवश्य ही उल्लेख-योग्य है, ऐसा होनेपर हमारा यह कथन है कि, उस समय यदि प्रकाशानन्दका नाम परिवर्तन हुआ होता, तो वह (नाम-परिवर्तन) उस उद्धार-लीलाका ही अपरिहार्य (जिसे छोड़ा नहीं जा सकता) अङ्ग होनेपर वह कभी भी अप्रकाशित नहीं रह सकता था। श्रीप्रकाशानन्दके उद्धारके बाद महाप्रभुका उनको वृन्दावनमें भेजना भी नितान्त ही काल्पनिक है। प्रकाशानन्द-उद्धारके समय श्रील सनातन गोस्वामी काशीमें उपस्थित थे। महाप्रभुने काशीसे पुरी यात्रा करनेसे पहले उनको वृन्दावन जानेके लिये आदेश किया था, यह श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी वर्णित उस 'उद्धार-लीला' में दो स्थानोंमें देखा जाता है,—“लोक-निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन।” (आदिलीला ७/१६०) और “सनातने कहिला—तुमि याह वृन्दावन।” (मध्यलीला २५/१७५)। यदि वहाँपर महाप्रभु प्रकाशानन्दका उद्धार करनेके बाद उन्हें वृन्दावन भेजते, तो ग्रन्थकारका इस बातको गोपन करनेका कोई कारण नहीं हो सकता। अपितु उस प्रसङ्गका ध्यानपूर्वक पाठ करनेसे देखा जाता है कि, श्रीप्रकाशानन्द अपने सजातीय शिष्योंको लेकर गौरप्रेममें प्लावित हरिकीर्त्तनसे मुखरित 'द्वितीय नदीया नगर' के रूपमें परिणत उसी काशीमें ही परमसुखसे नाम-सङ्कीर्त्तन और श्रीमद्भागवत आलोचनामें ही मग्न हुए थे। (चैतन्यचरितामृत मध्यलीला २५/१५८-१६०)— “सब काशीवासी करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥ संन्यासी, पण्डित करे भागवत-विचार। वाराणशीपुर प्रभु करिला निस्तार॥ वाराणशी हैल द्वितीय नदीया नगर॥” इसलिये वहाँपर श्रीतपनमिश्रादि गौरभक्तोंकी भाँति श्रीप्रकाशानन्दका भी काशी-परित्यागका कोई कारण नहीं था। श्रीमद् प्रबोधानन्द-रचित 'श्रीचैतन्यचन्द्रामृत'-ग्रन्थके विभिन्न श्लोकों और विशेषतः उनके 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ज्ञानमार्ग तथा मायावादके उल्लेखके कारण कोई-कोई विचार करते हैं कि वे पहले काशीके मायावादी प्रकाशानन्द थे। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें ग्रन्थकारने महाप्रभुकी असमोध्वं महिमाको अन्वय-व्यतिरेकके रूपमें विचार करते हुए

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७/१४९ ] कर्ममार्गकी, योगमार्गकी, स्वर्गाभिलाषाकी, शास्त्राभ्यासकी, पुत्र-स्त्री-आसक्त विषयियोंकी, 'अहं-ब्रह्म'वादियोंकी, तपस्वियोंकी, गयाके कर्मकाण्डकी, काशीके ज्ञानकाण्डादिकी तुच्छता दिखलायी है। कभी-कभी उन्होंने स्वयंको भी उन सभी भक्तिके प्रतिकूल आचरणादिमें निमग्न और गौरप्रेमसे वञ्चित कहकर हृदयविदारक विभिन्न प्रकार आत्मग्लानि प्रकाश की है। इसी प्रकार वैष्णवोचित दैन्यका तात्पर्य ना समझकर एवं सरल अन्तःकरणके अभावके कारण वे लोग उक्त ग्रन्थकार (श्रीप्रबोधानन्द) को शुद्धभक्ति प्रतिकूल सभी मार्गोंकी निन्दा करते हुए देखकर भी जब भी ज्ञानमार्गकी बात निन्दाके रूपमें उल्लेख करते देखा है, तभी उनको मायावादीके साँचेमें आबद्धकर काशीके प्रकाशानन्दके रूपमें प्रस्तुत करनेकी चेष्टा की है। वे लोग इस प्रकार स्वयंको तथा दूसरोंको भी ठग रहे हैं। 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ग्रन्थकारने मायावाद-तापसन्तप्त हृदयको राधारस-रूप सुधानिधि (चन्द्र) के द्वारा शीतलकारी गौरसिन्धुका जयगान किया है— “स जयति गौरपयोधिर्मायावादताप-सन्तप्तम्। हृन्नथ उदशीतलयद् यो राधारस-सुधानिधिना॥” (उन लोगोंका कहना है)—'मायावाद-तापसन्तप्तम्'-इसीसे ही क्या ग्रन्थकारका पहले 'काशीवासी मायावादी प्रकाशानन्द' होनेका परिचय प्रकाशित नहीं होता? 'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थमें —जिसमें विशेषरूपसे 'प्रकाशानन्द-उद्धार' वर्णित हुआ है, उसमें कहीं भी प्रकाशानन्दके निकट महाप्रभुके द्वारा 'राधारस' के सम्बन्धमें कोई आलोचना ही करना नहीं देखा जाता है। प्रबलरूपसे निर्विशेष विचारग्रस्त विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीयोंके निकट महाप्रभुने केवल ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्य खण्डनकर वास्तवभाष्यके रूपमें श्रीमद्भागवतको ही स्थापन करते हुए सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनतत्त्वकी व्याख्या की, किन्तु इन सबसे भी श्रेष्ठ जो परमनिगूढ़ 'राधारस'-सम्पुट है, उसका उद्घाटन नहीं किया। प्रकाशानन्द उद्धारके बाद महाप्रभुने मात्र पाँच दिनों तक काशीमें अवस्थानकर पुरीकी यात्रा की थी—“एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा॥” (मध्यलीला २५/१७०)। तत्पश्चात् (महाप्रभु और प्रकाशानन्द) दोनोंके साक्षात्कारका अन्य कोई प्रमाण नहीं पाया जाता है। इसलिये प्रकाशानन्दका मायावाद-सन्तप्त हृदय गौरप्रसादसे शीतल हुआ था, इसमें सन्देह नहीं है, किन्तु वह निश्चितरूपमें 'राधारस'-वशतः नहीं। दूसरी ओर, महाप्रभुने श्रीरङ्गमें दीर्घ चातुर्मास्यकाल रहकर व्येङ्कटभट्ट, त्रिमल्लभट्ट एवं श्रीप्रबोधानन्दपादके निकट भगवान्‌के ऐश्वर्यविचारकी अपेक्षा माधुर्यविचारकी पराकाष्ठा तथा गोपियोंकी अपार महिमा एवं उनमें श्रीराधाका ही श्रीकृष्णवशीकारित्व (केवल श्रीराधा ही श्रीकृष्णको सम्पूर्णरूपसे वशीभूत कर सकती हैं) प्रकाशकर उनको श्रीलक्ष्मी-नारायणकी उपासनासे क्रमशः गोपीनाथ तथा राधानाथ-श्रीकृष्णके प्रति अनुरक्त किया था। उस समय मुखसे वेदोंको स्वीकार करनेपर भी जीवके नित्य विष्णु-सेवकत्वका परिचय अस्वीकारकर श्रीविष्णुसेवा-विनाशकारी मायावादकी जो भीषण प्रबलता थी, और उससे श्रीनारायण-सेवानिष्ठ प्रबोधानन्दपादका हृदय जो सर्वदा सन्तप्त हो रहा था, वह श्रीगौरसिन्धुसे उदित श्रीराधारस-चन्द्रकी किरणोंसे अर्थात् श्रीराधाकी विष्णुसेवाचेष्टाकी पराकाष्ठा सन्दर्शनसे परमशीतल हुआ था—इसमें सातवाँ अध्याय | ४४७

[ ७/१४९-१५६ कोई सन्देह नहीं है। इसलिये किसी प्रकारसे ही काशीके श्रीप्रकाशानन्द और नित्यसिद्ध भगवत्-पार्षद श्रीप्रबोधानन्दको एक करनेका प्रयास सिद्ध नहीं हो सकता॥ १४९॥ महाप्रभुके द्वारा अपराध-क्षमा और कृपा :- एइमते ताँ-सबार क्षमि' अपराध। सबाकारे कृष्णनाम करिला प्रसाद॥ १५०॥ सबका मिलकर महाप्रसाद-सम्मान :- तबे सब संन्यासी महाप्रभुके लैया। भिक्षा करिलेन सबे, मध्ये बसाइया॥ १५१॥ भिक्षा करि' महाप्रभु आइला वासाघर। हेन चित्र-लीला करे गौराङ्ग-सुन्दर॥ १५२॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने सभीका अपराध क्षमाकर सभीको 'श्रीकृष्ण'-नाम देकर कृपा की। तब सभी संन्यासियोंने महाप्रभुको अपने बीचमें बैठाकर महाप्रसाद ग्रहण किया। महाप्रसाद ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीगौराङ्ग-सुन्दर इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ १५०-१५२॥ महाप्रभुकी वदान्य-लीलासे भक्तोंका आनन्द :- चन्द्रशेखर, तपनमिश्र, आर सनातन। शुनि' देखि' आनन्दित सबाकार मन॥ १५३॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर, श्रीतपनमिश्र और श्रीसनातन गोस्वामी आदि सभी भक्तलोग श्रीमन्महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीलाओंको सुनकर तथा देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ १५३॥ प्रभुके देखिते आइसे सकल संन्यासी। प्रभुर प्रशंसा करे सब वाराणसी॥ १५४॥ महाप्रभुके पदार्पणसे काशी धन्या :- वाराणसीपुरी आइला श्रीकृष्णचैतन्य। पुरीसह सर्वलोक हैल महाधन्य॥ १५५॥ असंख्य लोगोंका महाप्रभु-दर्शन :- लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुके देखिते। महाभिड़ हैल द्वारे, नारे प्रवेशिते॥ १५६॥ अनुवाद-वहाँके सभी संन्यासी महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आने लगे और वाराणसीके सभी लोग महाप्रभुकी प्रशंसा करने लगे। श्रीकृष्णचैतन्यके वाराणसीमें पदार्पण करनेसे वाराणसीपुरी और वहाँके निवासी सभी धन्य हो गये। महाप्रभुके दर्शनके लिये लाखों-लाखों लोग आने लगे। वहाँ इतनी भीड़ हो जाती कि गृहके भीतर प्रवेश करना बहुत कठिन हो जाता था॥ १५४-१५६॥ अमृतानुकणिका—भगवान् विष्णुके आदेशसे असुर-मोहन निर्विशेषवाद प्रचारक शङ्करावतार आचार्य शङ्करने मायावादका प्रचार किया, तो भी वे शुद्ध स्वरूपमें 'वैष्णव' हैं। इसलिये उन ४४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१५४-१६१ ] 'वैष्णवानां यथा शम्भु'—वैष्णवाग्रणी शम्भुके मनोभीष्ट वेदान्तके एकमात्र निगूढ़ सिद्धान्त अचिन्त्यभेदाभेद तत्त्वका शिवक्षेत्रमें प्रचार करके भगवान् श्रीगौरसुन्दरने वैष्णवराज शङ्करकी आन्तरिक अभिलाषा पूर्ण की। शिवके अंशी-तत्त्व सदाशिवातार श्रीअद्वैत प्रभुके जल-तुलसी अर्पण करते हुए हुङ्कारके द्वारा श्रीगौरसुन्दरको धाम और पार्षद सहित प्रपञ्चमें अवतीर्ण करानेकी सार्थकता हुई। वे सब मूढ़ जीव जो वेद-प्रतिपाद्य परमेश्वर विष्णुके परम पादपद्मोंको शिवादि अधीन ईश्वर-तत्त्वोंके सहित समान समझते थे, शिवादि देवताओंको स्वतन्त्र भगवान् कल्पना करके विष्णु और वैष्णवोंके चरणोंमें अपराध सञ्चय कर रहे थे और उसके फलस्वरूप कोई-कोई तो आत्मविनाशरूप निर्विशेष गतिको ही चरम श्रेय मानकर अधःपतित और वञ्चित हुए थे, उनके आदर्शको ग्रहणकर भविष्यमें सुकृतिमान् सत्य-पिपासु व्यक्ति और वञ्चना-वैतरणीमें पतित ना हों, इसलिये ही श्रीगौरसुन्दरने काशीधाममें अचिन्त्यभेदाभेद-सिद्धान्तका प्रचार किया। वस्तुके अद्वयत्व और शक्तिका वैचित्र्य स्वीकार करनेपर बहु-ईश्वरवाद या वेदोंके एकदेशिक मतका वरण नहीं होता, अपितु वेदोंका सर्वाङ्गीण सिद्धान्त सुन्दर रूपसे मान्य होता है॥ १५४-१५६॥ प्रभु यबे या'न विश्वेश्वर-दर्शने। लक्ष लक्ष लोक आसि' मिले सेइ स्थाने॥ १५७॥ स्नान करिते यबे या'न गङ्गातीरे। ताहाञि सकल लोक हय महाभिड़े ॥ १५८ ॥ हरिकीर्तन करवाकर महाप्रभुके द्वारा लोगोंका उद्धार :- बाहु तुलि' प्रभु बले,—बल हरि हरि। हरिध्वनि करे लोक स्वर्गमर्त्त्य भरि' ॥ १५९ ॥ अनुवाद-जब महाप्रभु काशी विश्वेश्वरके दर्शनके लिये जाते, तब भी लाखों-लाखों लोग आकर उनसे मिलते। महाप्रभु जब स्नान करनेके लिये गङ्गातटपर जाते, तब वहाँपर भी लोगोंकी बड़ी भीड़ हो जाती। महाप्रभु जब अपने बाहोंको ऊपर उठाकर 'हरि-हरिबोल' कहते, तब सभी लोग उनके साथ हरिबोल ध्वनि करते और उस हरिध्वनिसे स्वर्ग और मर्त्यलोक गूँज उठते ॥ १५९ ॥ महाप्रभुका काशीत्याग और श्रीसनातनको वृन्दावन भेजना :- लोक निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन ॥ १६० ॥ रात्रि-दिवसे लोकेर शुनि' कोलाहल। वाराणसी छाड़ि' प्रभु आइला नीलाचल ॥ १६१ ॥ अनुवाद-इस प्रकार काशीवासियोंका उद्धार करनेके बाद महाप्रभुकी वहाँसे जानेकी इच्छा हुई। तब उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको वृन्दावन जानेकी आज्ञा दी। रात-दिन लोगोंका कोलाहल सुनकर महाप्रभु वाराणसी छोड़कर नीलाचल अर्थात् जगन्नाथपुरी आ गये॥ १६०-१६१॥ सातवाँ अध्याय | ४४९

[ ७/१६२-१६७ एइ लीला कहिब आगे विस्तार करिया। संक्षेपे कहिलाङ् इहाँ प्रसङ्ग पाइया ॥ १६२ ॥ अनुवाद—इस लीलाका मैं आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। यहाँ प्रसङ्ग उपस्थित होनेपर मैंने इसका संक्षेपमें वर्णन किया ॥ १६२ ॥ पञ्चतत्त्वके रूपमें महाप्रभुका जगत्-उद्धार :— एइ पञ्चतत्त्वरूपे श्रीकृष्णचैतन्य। कृष्ण-नाम-प्रेम दिया विश्व कैल धन्य ॥ १६३ ॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुने पञ्चतत्त्वके रूपमें श्रीकृष्णका नाम और प्रेम देकर विश्वको धन्य किया ॥ १६३ ॥ स्वयं और प्रचारकोंके द्वारा भारतमें सर्वत्र नामप्रेम-प्रचार तथा लोगोंका उद्धार :— मथुराते पाठाइल रूप-सनातन। दुइ सेनापति कैल भक्ति-प्रचारण ॥ १६४ ॥ नित्यानन्द-गोसाञे पाठाइला गौड़देशे। तँहो भक्ति प्रचारिला अशेष-विशेषे ॥ १६५ ॥ आपने दक्षिण देश करिला गमन। ग्रामे ग्रामे कैला कृष्णनाम-प्रचारण ॥ १६६ ॥ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला भक्तिर प्रचार। कृष्णप्रेम दिया कैला सबार निस्तार ॥ १६७ ॥ अनुवाद—अनुभाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६४-१६७॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेमके द्वारा सम्पूर्ण भारतके सभी लोगोंका उद्धार करनेके उद्देश्यसे महाप्रभुने उत्तर-पश्चिमदेशमें मथुरामण्डलमें श्रीरूप-सनातनके द्वारा, गौड़-बङ्गालदेशमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा और स्वयं दक्षिणदेशके सेतुबन्ध तक ग्राम-ग्राममें श्रीकृष्णनामका प्रचार किया तथा श्रीकृष्णप्रेम देकर सबका उद्धार किया॥ १६४-१६७॥ इति अनुभाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। अमृतानुकणिका—प्रेमके ठाकुर श्रीगौर-नित्यानन्दकी अनन्त प्रेमकी बाढ़ अभी भी अवरुद्ध नहीं हुई है, किसी कालमें अवरुद्ध नहीं होती है। मेघ जैसे क्षुद्र लोगोंके नेत्रोंको आवृत करके उनको कभी-कभी नित्यप्रकाश सूर्यके दर्शनसे वञ्चित करते हैं, किन्तु सूर्य लोकवासी किसी समय भी सूर्यके दर्शनसे वञ्चित नहीं होते, वैसे अणु चैतन्य जीव भी अविद्या-मेघके द्वारा आवृत रहकर गौड़देशमें नित्य प्रकाशमान श्रीगौरनित्यानन्दके तमोधर्मनाशक प्रकाशमाला और सुशीतल चन्द्रिकाराशिकी मधुरिमाकी उपलब्धि नहीं कर पाते। तब प्रेममय महावदान्य परदुःखदुःखी ठाकुर अपने जनोंको प्रेरण करके लोगोंके अविद्यारूपी अन्धकारको दूर करते हैं। जीव तब श्रीगौरसुन्दरकी प्रेमबाढ़में निमग्न होनेका सौभाग्य लाभ करते हैं। श्रीगौरनित्यानन्दकी ४५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१६४-१७१ ] प्रेमकी बाढ़ने जगत्को डुबो दिया है और कितने ही सज्जन एवं दुर्जन नित्य सेवानन्दमें मग्न हो गये हैं तथा होते रहेंगे॥ १६४-१६६॥ पञ्चतत्त्वकी व्याख्या सुननेसे श्रीगौरतत्त्व-ज्ञान प्राप्ति :- एइ त' कहिल पञ्चतत्त्वेर व्याख्यान। इहार श्रवणे हय चैतन्यतत्त्व-ज्ञान॥ १६८॥ अनुवाद-यहाँतक मैंने पञ्चतत्त्वका वर्णन किया। इसको श्रवण करनेसे श्रीचैतन्यतत्त्वका ज्ञान होता है॥ १६८॥ श्रीचैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैत-तिन जन। श्रीवास-गदाधर-आदि यत भक्तगण॥ १६९॥ सबाकार पादपद्मे कोटि नमस्कार। यैछे तैछे कहि किछु चैतन्य-विहार॥ १७०॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैतप्रभु, इन तीन ईश्वर स्वरूपोंके और श्रीवास-गदाधरादि सभी भक्तोंके चरणकमलोंमें मैं कोटि बार नमस्कार करता हूँ। इनकी कृपासे जिस-किसी प्रकारसे मैं चैतन्य महाप्रभुकी लीलाका कुछ वर्णन कर सका हूँ॥ १६९-१७०॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥१७१॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे पञ्चतत्त्वाख्यान-निरूपणं नाम सप्तम-परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ १७१॥ इस प्रकार श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डका पञ्चतत्त्व-निरूपण नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। सातवाँ अध्याय | ४५१

४५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अक्ष-गोविन्द ] श्लोक सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और तृतीय चरण] अक्षण्वतां फलमिदं न ४/१५५ | अहमेव क्वचिद् ३/८२ | कंसारातेर्बीजने येन ४/२०२ अगत्येकगतिं नत्वा ७/१ | अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् १/५३ | कंसारिरपि संसारवासना ४/२१९ अङ्गं चन्दनशीतलं ४/२५९ | अहैतुक्यव्यवहिता ४/२०६ | कर्णानन्दि-कलध्वनिर्वहेतु २/२ अङ्गस्तम्भारम्भमुत्तुङ्ग ४/२०२ | आचार्यं मां विजानीया १/४६ | कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र ६/६० अटति यद्भवानह्नि ४/१५३ | आत्मारामस्य तस्येमा ६/७३ | कर्षन् वेणु १/१७ अत्र सर्गो विसर्गश्च २/९१ | आद्योऽवतारः पुरुषः ५/८३ | कलौ नास्त्येव नास्त्येव ७/७६ अथवा बहुनैतेन किं २/२० | आनन्दचिन्मयरसप्रति ४/७२ | कलौ यं विद्वांसः ३/५७ अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्यं १/१३, | आरज्यद्रसनां ४/२६० | कलौ सङ्कीर्त्तनाद्यैः ३/८० ६/५ | आवेश्य तदघं हित्वा ५/३५ | कस्माद्दन्दे प्रियसखि ४/१२५ अनयाराधितो नूनं भगवान् ४/८८ | आसन् वर्णास्त्रयो ३/३६ | कामाद्द्वेषाद् भयात् ५/३५ अनर्पितचरीं चिरात् १/४, ३/४ | इत्युद्धवादयोऽप्येतं ४/१६३ | कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ४/१५३ अनादिरादिर्गोविन्दः २/१०७ | इन्द्रारिव्याकुलं लोकं २/६७, | कृष्णः स्वयं समभवत् ५/१५५ अनुकृत्य रुतैर्जन्तूं ५/१३८ | ५/७९ | कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं ३/५१ अनुग्रहाय भक्तानां ४/३४ | ईश्वरः परमः कृष्णः २/१०७ | कृष्णादन्यः को वा ३/२७ अनुवादमनुक्तवा तु २/७४ | ईशस्य यत्त्रिभिर्हीनं २/५३ | कृष्णोत्कीर्तन-गान २/२ अनेकत्र प्रकटता १/७५ | उच्चैरनिन्ददानन्दम् ४/२०३ | केयं वा कुत आयाता ५/१४० अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं ३/८० | उत्सीदेयुरिमे लोका ३/२४ | क्वचिदपि स कथां नः ६/६७ अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां १/५६ | उपास्यञ्च प्राहुर्यमखिल ३/५७ | क्वचित् क्रीड़ा-परिश्रान्तं ५/१३९ अपरिकलितपूर्वः ४/१४६ | उपेत्य पथि सुन्दरीतातभि ४/१९६ | क्वाहं तमो-महदहं-ख ५/७२ अपरेयमितस्त्वन्यां ७/११८ | उल्लङ्घितत्रिविधसीमा ३/८८ | क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्ड ५/७२ अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः ६/६३ | ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत १/५४ | क्षौणीभर्त्ता यत्कला १/११, अपारं कस्यापि प्रणयिजन ४/५२, | एकन्तु महत्ः स्रष्टृ ५/१०९ ४/२७५ | एतदीशनमीशस्य २/५५, ५/८७ | गृहेषु द्वयष्टसाहस्रं १/७४ अपि बत मधुपुर्यामार्य ६/६७ | एतावदेव जिज्ञास्यं १/५६ | गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्य ४/१५२ अभविष्यदियं वृथा ४/११८ | एते चांशकलाः पुंसः २/६७, | गोप्यस्तपः किमचरन् ४/१५६ अभ्युत्थानमधर्मस्य ३/२२ | ५/७९ | गोलोक एव ४/७२ अयमहमाप हन्त प्रेक्ष्य ४/१४६ | एवं मदर्थोज्झितलोक ४/१७६ | गोविन्दप्रेक्षणाक्षेपि ४/२०३ अविद्या कर्मसंज्ञान्या ७/११९ | एवंव्रतः स्वप्रियनाम ७/९४ | गोविन्दाख्यां हरितनुमितः ५/२२४ श्लोक-सूची | ४५३

[ गौड़-मनसो गौड़ोदये पुष्पवन्तौ १/२, १/८४ | तेषां सततयुक्तानां १/४९ | नेच्छन्ति सेवया पूर्णाः ४/२०८ चित्रं बतौतदेकेन १/७४ | त्रैलोक्ये पृथिवी धन्या ४/२१६ | नैवोपयन्त्यपचितिं १/४८ चिन्तामणिप्रकरसद्मसु ५/२२ | त्वं भक्तियोगपरिभावित ३/११० | पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं १/१४, चिन्तामणिर्जयति १/५७ | त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद ७/९८ | ७/६ चैतन्याख्यं प्रकटम् १/५, ४/५५ | त्वां शीलरूपचरितैः ३/८६ | पदालम्भः कं वा ३/६२ जगृहे पौरुषं रूपं ५/८४ | ददामि बुद्धियोगं तं १/४९ | परित्राणाय साधूनां ३/२३ जयतां सुरतौ १/१५ | दशमस्य विशुद्धयर्थं २/९२ | पश्चादहं यदेतच्च १/५३ जानन्ति गोपिकाः पार्थ ४/२१३ | दशमे दशमं लक्ष्यम् २/९५ | पादसम्वाहनं चक्रु जीवभूतां महाबाहो ७/११८ | दास्यास्ते कृपणाय मे ६/७० | पीताम्बरधरः स्रग्वी ५/२१४ ज्ञानं परमगुह्यं मे १/५१ | दिवौकसां सदाराणां १/७३ | प्रख्यातदैवपरमार्थविदां ३/८६ तं तन्मूर्तिः प्रतितरु ४/१२५ | दिष्ट्या यदासीनन्मत्स्नेहो ४/२३ | प्रतिदृशमिव नैकधार्कमेकं २/२१ तज्जोषणादाश्वपवर्गं १/६० | दीयमानं न गृह्णन्ति ४/२०७ | प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा १/५५ ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य १/५९ | दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः १/१६ | प्रविष्टेन गृहीतानां १/७२ ततो दुन्दुभयो १/७३ | दृग्भिः पिबन्ति ४/१५६ | प्रयोजनञ्चावतारे ४/२७६ तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः १/१, | दृग्भिर्हृदिकृतमलं ४/१५२ | प्र-शब्देन मोक्ष १/९३ १/३४ | देवी कृष्णमयी प्रोक्ता ४/८३ | प्रायेणात्मसमं शक्त्या १/७७ तत्रापि गोपिकाः पार्थ ४/२१६ | द्रव्यं विकारो गुण ५/८३ | प्रायो मायास्तु मे भर्तु ५/१४० तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु १/५२ | द्वापरे भगवान् श्यामः ३/३९ | प्रेमैव गोपरामाणां काम ४/१६३ तद्ब्रह्मकृष्णयोरेक्यात् ५/३६ | द्वौ भूतसर्गौ लोके ३/९० | बालोऽपि कुरुते शास्त्रं ४/१ तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तं २/१४ | धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र १/९१ | ब्रह्माख्यं धाम ते २/१७ तद्वक्षोरुह-चित्रकेलि ४/११७ | धर्मसंस्थापनार्थाय ३/२३ | ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य ५/१४१ तद्विद्यादात्मनो मायां १/५४ | न च सङ्कर्षणो न ६/१०० | ब्रह्मेति परमात्मेति २/११, २/६३ तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपाद ६/७२ | न तथा मे प्रियतम ६/१०० | भक्तावतारं भक्ताख्यं १/१४, ७/६ तमिममहमजं शरीरभाजां २/२१ | न पारयेऽहं निरवद्य ४/१८० | भक्तावतारमीशं १/१३, ६/५ तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका ४/७० | न मर्त्यबुद्ध्यासूर्येत १/४६ | भजते तादृशीः क्रीड़ा ४/३४ तरेन्नानामतग्राहव्याप्तं २/१ | न युज्यते सदात्मस्थैः २/५५, | भज सखे भवत्किङ्करीः ६/६६ तस्यावतार एवायमद्वैत १/१२, | ५/८७ | भवद्विधा भागवताः १/६३ ६/४ | न ह्यालम्बस्पदं किञ्चित् २/७४ | मङ्गलाचरणं कृष्णचैतन्य ४/२७६ ताभ्यः परं न ४/१८४ | नारायणस्त्वं न हि २/३०, | मङ्गलाचरितैर्दाने रतिर्नः ६/६० तासामाविरभूच्छौरिः ५/२१४ | ३/६८, ६/२२ | मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ १/१५ तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि १/६३ | नारायणोऽङ्गं नरभू २/३०, | मत्सेवया प्रतीतं ते ४/२०८ तुलसीदलमात्रेण ३/१०३ | ३/६८, ६/२२ | मदन्यत् ते न १/६२ तृतीयं सर्वभूतस्थं ५/७७ | निजाङ्गमपि या गोप्यो ४/१८४ | मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि ४/२०५ तेनाटवीमटसि ४/१७३ | निर्धूतामृतमाधुरीपरिमलः ४/२५९ | मनसो वृत्तयो नः ६/५९ ४५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

[header] मनो-सख्य ] [/header]


[column 1] मनोगतिरविच्छिन्ना ४/२०५ मन्माहात्म्यं मत्पर्यां ४/२१३ मन्वन्तरेशानुकथा २/९१ मम वर्त्मानुवर्तन्ते ४/२०, ४/१७८ मया परोक्षं भजता ४/१७६ मयि भक्तिर्हि ४/२३ महाभावस्वरूपेयं ४/७० महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता १/१२, ६/४ मायातीते व्यापिवैकुण्ठ १/८, ५/१३ मायाबलेन भवतापि ३/८८ मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः १/९, ५/५० मितञ्च सारञ्च वचो १/१०६ मुहुरुपचितवक्रिमापि ४/१३१ यं मन्येरन् १/७२ यज्ञैः सङ्कीर्त्तनप्रायैः ३/५१ यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं ४/१७३ यत्पादकल्पतरुपल्लव १/५७ यथा भगवान् ब्रह्मणे १/५० यथा महान्ति भूतानि १/५५ यथा राधा प्रिया विष्णो ४/२१५ यथोत्तरमसौ स्वाद ४/४५ यद्यदाचरति श्रेष्ठः ३/२५ यद्यद्विया त उरुगाय ३/११० यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि १/३, २/५ यदरीणां प्रियाणाञ्च ५/३६ यदा यदा हि धर्मस्य ३/२२ यन्नो विहाय गोविन्दः ४/८८ यस्य प्रभा प्रभवतः २/१४ यस्य प्रसादादज्ञोऽपि ६/१ यस्यांशांशः १/१०, ५/९३ यस्यांशांशांशः १/११, ५/१०९ [/column 1]

[column 2] यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजो ५/१४१ यस्येच्छया तत्स्वरूप ५/१ यस्यैकनिश्वसित-काल ५/७१ यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव १/९, ५/५० या माऽभजन् ४/१८० यावानहं यथाभावो १/५२ ये यथा मां प्रपद्यन्ते ४/२०, ४/१७८ योऽन्तर्बहिस्तनुभृतामशुभं १/४८ योगेश्वरेण कृष्णेन १/७१ रतिवासनया स्वाद्यी ४/४५ राधा कृष्णप्रणयविकृतिः १/५, ४/५५ राधामधाय हृदये ४/२१९ रामादिमूर्त्तिषु कला ५/१५५ रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो १/७१ रुचिं स्वामावव्रे ४/५२, ४/२७५ रूपं यस्योद्भाति १/८, ५/१३ रूपे कंसहरस्य लुब्ध ४/२६० रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थः ४/११६ लक्षणं भक्तियोगस्य ४/२०६ लक्ष्मीसहस्रशतसम्भ्रम ५/२२ लोकस्रष्टुः सूतिकाधाम १/१०, ५/९३ वक्त्रं व्रजेशसुतयोः ४/१५५ वदन्ति तत्तत्त्वविदः २/११, २/६३ वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं ५/१ वन्दे गुरुनीशभक्तान् १/१, १/३४ वन्दे तं श्रीमद्वैताचार्य ६/१ वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य १/२, १/८४ वर्णयन्ति महात्मानः २/९२ वाचा सूचितशर्वरी-रति ४/११७ [/column 2]

[column 3] वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां ६/५९ वातवसना य ऋषयः २/१७ विक्रीणीते स्वमात्मानं ३/१०३ विनिर्यासः प्रेम्णो ४/५१ विभुरपि कलयन् सदा ४/१३१ विराट् हिरण्यगर्भश्च २/५३ विश्वेषामनुरञ्जेन ४/२२४ विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं २/२० विष्णुभक्तः स्मृतो दैव ३/९० विष्णुर्महान् स इह यस्य ५/७१ विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता ७/११९ विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि ५/७७ वृषायमाणौ नर्दन्तौ ५/१३८ व्रजजनार्त्तिहन् वीर ६/६६ शुक्लो रक्तस्तथा पीत ३/३६ शेषश्च यस्यांशकलाः १/७, ५/७ श्रीकृष्णाख्यं परं धाम २/९५ श्रीचैतन्यं लिख्यतेऽस्य ७/१ श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे बालोऽपि २/१ श्रीचैतन्यप्रभुं वन्दे यत्पाद ३/१ श्रीचैतन्यप्रसादेन ४/१ श्रीमद्भागवते महामुनिकृते १/९१ श्रीमान् रासरसारम्भी १/१७ श्रीराधायाः प्रणयमहिमा १/६, ४/२३० श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ १/१६ श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च ३/३९ षडैश्वर्यैः पूर्णो य १/३ सङ्करस्य च कर्त्ता ३/२४ सङ्कर्षणः कारणतोयशायी १/७, ५/७ संगृह्यात्याकरव्रातादशः ३/१ सख्योपेत्योग्रहीत् पाणिं ६/७२ सतां प्रसङ्गान्मम १/६० [/column 3]


[footer] श्लोक-सूची | ४५५ [/footer]

[ सत्त्वं-ह्लादिनी सत्त्वं विशुद्धं वसुदेव ४/६६ | सहाया गुरवः शिष्या ४/२१२ | स्वच्छन्दं व्रजसुन्दरीभि ४/२२४ सत्त्वे च तस्मिन् ४/६६ | साधवो हृदयं मह्यं १/६२ | स्वभक्तेभ्यः शुद्धां ३/६५ सत्यं वदामि ते पार्थ ४/२१२ | सालोक्य-सार्टि-सारूप्य ४/२०७ | स्वयं विश्रामयत्यार्यं ५/१३९ सदोपास्यः श्रीमान् ३/६५ | सिद्धलोकस्तु तमसः पारे ५/३९ | स्वरूपमन्याकारं यत्तस्य १/७७ सन्त एवास्य छिन्दन्ति १/५९ | सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्न ५/३९ | हरिः पुरटसुन्दर १/४, ३/४ सन्त्ववतारा बहवः ३/२७ | सुखानि गोष्पदायन्ते ७/९८ | हरिभक्तिं ग्राहयामि ३/८२ संन्यासकृच्छमः शान्तो ३/४९ | सुरेशानां दुर्गं गति ४/५१ | हरेरेष न चेदवातरिष्य ४/१९८ सम्भूतं षोड़शकलमादौ ५/८४ | सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो ३/४९ | हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव ७/७६ स यत्प्रमाणं कुरुते ३/२५ | सोऽपि कैशोरक-वयो ४/१९६ | हसत्यथो रोदिति रौति ७/९४ सरहस्यं तदङ्गञ्च १/५१ | सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः १/६, | हा नाथ रमण प्रेष्ठ ६/७० सर्वगोपीषु सैवैका ४/२१५ | ४/२३० | ह्लादतापकरी मिश्रा ४/६३ सर्वथा तत्स्वरूपैव १/७५ | स्तन-स्तबकसञ्चरन् ४/१९६ | ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त ४/६३ सर्वलक्ष्मीमयी सर्वकान्तिः ४/८३ | स्मितालोकः शोकं ३/६२ सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्वा तपसा ६/७३ | स्मेरां भङ्गीत्रय-परिचितां ५/२२४ ४५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची

[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]

स्तम्भ १सन्दर्भस्तम्भ २सन्दर्भस्तम्भ ३सन्दर्भ
अंश-अवतार, आर१/६५अतएव 'कृष्ण'-शब्द२/८२अद्वैत-आचार्य-कोटि६/२०
अंश-अवतार-पुरुष१/६६अतएव गोपीगणेर नाहि४/१७२अद्वैत आचार्य गोसाञि३/७३, ५/१४७, ६/६
'अंश' ना कहिया, केने६/२४अतएव चैतन्य गोसाञि२/११०अद्वैत आचार्य प्रकट३/९४
अंश-शक्त्यावेशरूपे२/९८अतएव तुमि हओ२/३९अद्वैत आचार्य-प्रभुर१/३९
अंश' हैते 'अङ्ग', यात६/२४अतएव नाम हैल अद्वैत६/२८अद्वैत, नित्यानन्द३/७१, ६/१०३
अंशांशि-रूपे शास्त्रे५/१५४अतएव निस्तारिला५/२०९अद्वैत-प्रसादे लोक६/११२
अंशिनी राधा हैते४/७६अतएव विष्णु तखन४/१३अद्वैत-महिमा अनन्त६/११३
अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ६/९६अतएव ब्रह्मवाक्ये२/५८अद्वैत-रूपे 'उपादान'६/१६
अंशेर अंश येइ, 'कला'५/७३अतएव भक्तगणे करि४/२३७अधम जीवेर यैछे५/१५८
अकृष्णवरणे ताँर३/५६अतएव मधुर रस कहि४/४६अधमेरे दिल प्रभु५/२३०
अगण्य, अनन्त यत५/६७अतएव 'राधिका'-नाम४/८७अनन्त, अपार-तार५/५२
अग्नि, ज्वालाते-यैछे४/९७अतएव श्रीकृष्णचैतन्य५/१३३'अनन्त' कहिते नारे५/४७
अग्निशक्त्ये लौह यैछे५/६०अतएव विप्र आगे२/७८अनन्त ब्रह्माण्ड बहु२/४३
अङ्ग-उपाङ्ग-नाम३/५९अतएव समस्तेर४/९५अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि६/८
अङ्गप्रभा, अंश२/६अतएव सर्वपूज्या,४/८९अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र६/७७
'अङ्ग'-शब्दे अंश३/७, ३/६७, ६/२१अतएव सूर्य ताँर२/२७अनन्तरूपे एकरूप२/१००
'अङ्ग'-शब्देर अर्थ३/६६अतएव सेइ भाव४/५०अनन्त वैभव ताँर५/११५
अङ्गने बसिया तेंहो५/१६९अतएव सेइ सुख४/१९५अनन्तशय्याते ताँहा५/१००
अङ्गेर अवयव३/६७, ७१अतएव हओ तुमि२/४२अनन्त स्फटिके यैछे२/१९
अङ्गोपाङ्ग अस्त्र३/६६अति गूढ़ हेतु सेइ४/१०४अनायासे हय निज१/२१
अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण३/७२अतिहीन-ज्ञाने करे४/२४अनुकूलवाते यदि पाय४/२५३
अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ५/९०अतृप्त हइया करे४/१५०अनुवाद आगे, पाछे२/७
अज्ञान-तमेर नाम१/९०अत्यन्त निगूढ़ एइ४/१६०'अनुवाद' कहि तारे२/७६
अतएव अधीश्वर तुमि२/४१अथवा, कृष्णके तिँहो३/५३अनुवाद ना कहिया२/७५
अतएव आर सब६/८२अथवा भक्तेर वाक्य५/१२७अनेक प्रकाश हय१/७६
अतएव कहि किछु४/२३२'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण४/१३८अन्तरङ्ग-भक्त करि'७/१७
अतएव काम-प्रेमे४/१७१अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु२/६५अन्तरात्मा-रूपे तिँहो५/८५
अतएव कृष्ण मूल५/६१अद्वितीय, नन्दात्मज७/७
अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर६/३२

[footer] पद्य-सूची | ४५७

[ अन्त-आमार

अन्तर्धान करि' मने ३/१३ अन्तर्धान कैल प्रभु ५/१९६ अन्तर्यामी, भक्तश्रेष्ठ १/४७ अन्य अवतारे सब ३/६४ अन्येरे आछुक कार्य ६/१०५ अन्येरे का कथा, व्रजे ६/५४ अन्येरे सङ्गमे आमि ४/२५८ अन्योन्ये विलासे रस ४/५६ अपराध क्षम, मोरे २/३३ अपराध क्षमाइते २/३१ अपराध क्षमाइल, डुबिल ७/३७ अपवित्र स्थाने बैस ७/६३ अपूर्व माधुरी कृष्णेर ४/१५७ अलौकिक कर्म ३/८४ अवतरि' कैल एबे ६/२६ अवतरि' प्रभु प्रचारिल ४/१०२ अवतार-अवतारी ५/१२८ अवतारकाले दोंहे ५/१५३ अवतारगणेर भक्तभावे ६/१०९ अवतार सब-पुरुषेर २/७० अवतारी कृष्ण यैछे ४/७६ अवतारी नारायण, कृष्ण २/६१ अवतारीर देहे सब २/११२ अवतारेर आर एक ४/१०३ अवतारेर एइ वाञ्छा ४/२२१ अवतीर्ण हञा करेन ३/६ अवतीर्ण हैला कृष्ण ३/२९ अवतीर्ण हैला गौर ३/११२ अवधूत गोसाञिर एक ५/१६१ अविचिन्त्य-शक्तियुक्त ७/१२४ अविदग्ध विधि ४/१५० अभक्त-उष्ट्र 'अयन'-शब्देते कहे २/३८ “अर्धकुक्कुटी-न्याय” ५/१७६

अर्ध स्वरूप ना मानिले ७/१४० अशेष-विशेष कैल ४/२२५ अष्टादशाक्षर-मन्त्रे करे ५/२२१ अष्टाविंश चतुर्युगे ३/१० असमोध्वर्माधुर्य ४/२४२ असम्भव নহে, सत्य २/११४, ५/१३० असुरसंहार-आनुषङ्ग ४/३६ असुरस्वभाव कृष्णे ३/८९

आकार-स्वरूप-भेदे ४/७९ आकारे त' भेद नाहि १/६९ आगे अनुवाद कहि २/७५ आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ७/१२० आचार्य-कल्पित अर्थ ७/१३६ आचार्य गोसाञि ३/९१, ५/१४८ आचार्य गोसाञि चैतन्येर ६/३६ आचार्य गोसाञिर गुण ६/३५ आचार्य-गोसाञिरे प्रभु ६/३९ आचार्यचरणे मोर कोटि ६/११४ आचार्य-हुङ्कारे पाप ३/७५ आजानुलम्बित-भुज ३/४४ आत्म-सुख-दुःखे ४/१७४ आत्मान्तर्यामी याँरे २/१८ आत्मा हैते कृष्ण, भक्ते ६/९९ आत्मा हैते कृष्णेर भक्त ६/९८ आत्मैन्द्रियप्रीति-वाञ्छा ४/१६५ आद्य-अवतार करे ५/५६ आद्य कायव्यूह, कृष्ण ५/५ आद्यावतार, महापुरुष ५/८२ आनन्दसमुद्रे डुबे, किछुइ ४/२५४ आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे ४/६२ आनन्दे विह्वल आमि ५/१९४

आनिया कृष्णेरे करों ३/१०१ आनुषङ्ग-कर्म एइ ४/१४ आनुषङ्गे कैल सब ४/२२३ आनेर कि कथा, बलदेव ६/७४ आपन-माधुर्य-पाने ६/१०५ आपना आस्वादिते ४/१४८, ७/११ आपनाके करेन ताँर ६/४१ आपनाके बड़ माने ४/२२ आपनाके भृत्य करि' ५/१३७ आपना लुकाइते कृष्ण ३/८७ आपणार एक अंश ५/५५ आपणार कथा लिखि ५/२३३ आपनि आचरि' ३/२०, ९८, ४/४१ आपनि करिमु भक्तभाव ३/२० आपनि श्रीकृष्ण यदि ३/९८ आपने आस्वादे प्रेम ४/३९ आपने करेन कृष्णलीलार ५/९ आपने दक्षिण देश ७/१६६ आपने चैतन्यरूपे २/१०९ आपने ना कैले धर्म ३/२१ आपने पुरुष-विश्वेर ६/१६ आपने प्रकाशानन्द ७/६५ आमाके आनन्द दिबे ४/२३९ आमाके त' ये ये भक्त ४/१९ आमा बिना अन्ये ३/२६ आमार आलये अहोरात्र ५/१६२ आमार दर्शने कृष्ण ४/१९१ आमार दर्शने राधा सुखे ४/२५० आमार व्रजेर रस सेइ ४/२५७ आमार माधुर्य ४/१४१, १४३ आमार माधुर्यामृत ४/१३९ आमार मोहिनी राधा ४/२६१

४५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

आमार-एइ ]

आमार सङ्गे राधा ४/२५५ आमारे ईश्वर माने ४/१८ आमा हइते आनन्दित ४/२३९ आमा हैते कोटिगुण ४/१३३ आमा हैते गुणी बड़ ४/२४१ आमा हैते यार हय ४/२४० आमा हैते राधा पाय ४/२६२ आमि गोप, तुमि २/३४ आमि त' जगते बसि ५/८९ आमि यैछे परस्पर ४/१२७ आमिह ना जानि ४/३० आर यत सब देख ७/८ आयाम, विस्तार, दुइ ५/९७ आर अद्भुत-चित्त १/१०१ आर अर्धे कैल ५/९८ आर एक अङ्ग ताँर ६/३६ आर एक अद्भुत गोपी ४/१८४ आर एक एक मूर्त्ये ६/२० आर एक गोपीप्रेमेर ४/१९७ आर एक शुन ताँर ५/१५८ आर एक हेतु, शुन ४/६ आर दिने गेला प्रभु ७/५८ आर भागवत-भक्त १/९९ आर यत चैतन्य ४/२२८ आर यत सब, -ताँर ६/८१ आर येइ सुने, तार ७/११४ आर विशेषणे तार ३/५५ आर शुद्धभक्त कृष्ण ४/२०४ आर सब अवतार ४/१० आर सब गोपीगण ४/२१७ आर सब परिषद ५/१४३ आराम, आवास, यज्ञ ५/१२३ आरे आरे कृष्णदास ५/१९५ आवेशे आपन भाव ४/१०९

आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि २/८६ आश्चर्य भाण्डार, प्रेम ७/२४ आश्रयजातीय सुख ४/१३४ आश्रय जानिते कहि २/९३ आसि' निवेदन करे चरणे ७/५३ आस्वादिते हय लोभ ४/१४४

इ इच्छाय अनन्तमूर्त्ति ६/९ इच्छाय जगद्रूपे पाय ७/१२४ इथिमध्ये चन्द्रशेखर ७/४९ इत्थे किछु अपराध ना ६/११४ इथे भक्तभाव धरे चैतन्य ७/१२ इथे यत जीव २/४४ इदानीं द्वापरे तिँहो ३/३८ इहाँ आइस, गोसाँई ७/६३ इहाके कहिये कृष्णेर १/७० इहा जानि' रामदासेर ५/१७४ इहार श्रवणे हय चैतन्य ७/१६८ इहा वड किबा सुख ४/२३६ इहा शुनि' बले सर्व ७/१०३ इहा शुनि रहे प्रभु ईषत् ७/५२ इहा हैते कृष्णे २/११७ इहाँ त' द्विभुज २/२९ इहाँ वेणु धरे, तिँहो २/२९

ई ईश्वर-सारूप्य पाय ६/३१ ईश्वरस्वरूप भक्त १/६१ ईश्वरस्वरूप प्रणव ७/१२८ ईश्वरे अभेद, तेजि 'अद्वैत' ६/२५ ईश्वरेर 'अङ्ग', अंश ६/२३ ईश्वरेर अचिन्त्यशक्ति ७/१२७ ईश्वरेर अवतार १/६५

ईश्वरेर वाक्ये नाहि ७/१०७ ईश्वरेर शक्ति हय १/७९ ईश्वरेर शक्त्ये तबे हुये ६/१९ ईश्वरेर सेवा बिना नाहि ५/१२०

उ उछलिल प्रेमवन्या ७/२५ 'उठ', 'उठ' बलि' मोरे ५/१८३ उठि' ताँर रूप देखि' ५/१८३ उठिला संन्यासी सब ७/६१ उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे ४/२५३ उत्सवान्ते गेला तिँहो ५/१७२ उत्तम, अधम, किछु ५/२०८ उन्मत्त हइया नाचे, इति ७/८८ उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व ७/८९ उपनिषत्-सहित सूत्र ७/१०८ उपनिषद् कहे ताँरे २/१२ उपपुराणेह शुनि ३/८१ उपर्युधो व्यापियाछे ५/१८ 'उपादान' अद्वैत करेन ६/१७ उपासना-भेदे जानि २/२७ उपेक्षा करिया कारो ना ७/४३ उपेक्षा करिया कैल मथुरा ७/४४ उलूके ना देखे ३/८५ उल्लास-उपरि लेखों ५/१६०

ए ए अर्थ ना जानि' २/६० ए नवेर उत्पत्ति २/९३ एइ आज्ञा पाञा नाम ७/७७ एइ एक, शुन आर ४/१३७ एइ एक हेतु, शुन २/३९ एइ चन्द्र सूर्य दुइ १/१०२ एइ चिन्ति' रहे कृष्ण ४/१३६

पद्य-सूची | ४५९

[ एइ-एसब एइ छह गुरु १/३७ | एइमत सर्वसूत्रे ७/१४७ | एकलि राधाते ताहा ४/२४१ एइ छह तत्त्वेर १/३३ | एइमते ताँ-सबार क्षमि' ७/१५० | एकले ईश्वर-तत्त्व चैतन्य ७/१० एइ छह तैं हों १/४३ | एइमते नानारूप करे २/६२ | एक वस्तु मागों, देह ७/५३ एइ छह-रूपे हय २/१०० | एइरूपे नित्यानन्द ५/१३४ | एकात्तर चतुर्युगे ३/८ एइ त' कहिल ताँर ५/१७९ | एइ लागि' करे ४/१८३ | एके त' प्रकाश हय १/६८ एइ त' गीतार अर्थ ५/९० | एइ वाञ्छा यैछे ४/३६ | एकेते विश्वास, अन्ये ना ५/१७६ 'एइ त' द्वितीय सूत ५/१७० | एइ शुद्धभक्ति लञा ४/२७ | एके मानि' आरे ना ५/१७७ एइ त' सिद्धान्त ३/२१ | एइ श्लोक तत्त्व-लक्षण २/५९ | एत कहि' विवर्त्त-वाद ७/१२२ एइ त' स्वरूपगण २/१०४ | एइ श्लोकेर अर्थे तुमि २/६६ | एत चिन्ति' निवे दिलाम ७/८० एइ ताँर वाक्ये आमि ७/९५ | एइ सब गुण लञा ३/४७ | एत बलि' एक श्लोक ७/७५ एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे ७/१४६ | एइ सब रसनिय्यास ४/३२ | एत बलि' एक श्लोक ७/९३ एइ तिन ठाकुर १/१९ | एइ सब शास्त्रागम ३/३८ | एत बलि' नाचे गाय ५/१७१ एइ तिन तत्त्व ७/१३, १५ | एइ सब हय श्रीकृष्णोर ६/९४ | एत बलि' नाचे, गाय ६/८५ एइ तिन तृष्णा मोर ४/२६६ | एइ सुखे गोपीर ४/१९१ | एत बलि' मने किछु ७/३३ एइ तिन लोके कृष्ण ५/२५ | एइ सुखे मग्न रहे वृक्ष ४/२५२ | एत भावि' आचार्य ३/१०६ एइ दुइ हेतु हैते ४/१६ | एइ हेतु गोपी-प्रेमे ४/१९५ | एत भावि' कलिकाले ३/२९ 'एइ देह कैलुँ आमि ४/१८२ | एक अङ्गाभासे करे ५/६६ | एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे ७/९० एइ द्वारे करिब ४/३२ | एक अङ्गे जाड्य ताँर ५/१६६ | एत मूर्त्तिभेद करि' कृष्ण ५/१२४ एइ पश्चतत्त्वरूपे ७/१६३ | एक अद्भुत समकाले १/१०१ | एत लञा सृजे पुरुष ६/१३ एइ प्रेमद्वारे नित्य ४/१३९ | एकइ चिच्छक्ति ताँर ४/६१ | एत शुनि' गुरु मोरे ७/८२ एइ बलि' प्रेरिला मोरे ५/१९६ | एकइ विग्रह, किन्तु २/२८ | एत शुनि' हासि' प्रभु ७/१०२ एइभावे येइ मोरे ४/२१ | एकइ विग्रह यदि १/६९, १/७६ | ए तिनेर चरण १/१९ एइमत अनुभव आमार ४/२४९ | एकइ स्वरूप ताँर ५/१९ | 'एते'-शब्दे अवतारेर २/८० एइ मत गाय, नाचे ६/५० | एकइ स्वरूप दों हे ५/५ | ए दर्पणेर आगे नव ४/१४१ एइ मत गीतातेह पुनः ५/८८ | एक एक मूर्त्ये करेन ६/९ | ए देह-दर्शन-स्पर्शे ४/१८३ एइ मत चैतन्य-कृष्ण ४/३७ | एक कणा स्पर्शि मात्र ५/१५७ | ए विरोधेर एकमात्र देखि ४/१८९ एइ मत चैतन्यगोसाञि ५/१४३ | एक कृष्ण-सर्वसेव्य ६/८१ | एमते कृष्णेरे ३/१०८ एइ मत जगतेर सुखे ४/२४८ | एक नित्यानन्द बिनु ५/२०७ | एमन निर्गुण-मोरे ५/२०७ एइ मत दुइ भाइ १/८९ | एक भागवत बड़ १/९९ | ए माधुर्यामृत सदा येइ ४/१४९ एइमत परस्पर पड़े ४/१९३ | एक महाप्रभु, आर प्रभु ७/१४ | एसब कृष्णेर शुद्ध ४/६५ एइ मत पूर्वे कृष्ण ४/११९ | एकमात्र 'अंशी' -कृष्ण ६/९६ | एसब पण्डितलोक परम ६/४९ एइमते प्रतिसूत्रे करेन ७/१३४ | एक मुख्यतत्त्व, तिन २/६४ | एसब प्रमाणे जानि ५/१२६ एइमत प्रतिसूत्रे सहस्रार्थ ७/१३३ | एक लक्ष्मीगण १/७९, ४/७४ | एसब लइया करेन ६/३८ एइमत भक्तभाव करि' ४/४१ | एकला ईश्वर कृष्ण ५/१४२ | एसब लइया चैतन्यप्रभुर ६/३८ ४६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

एसब-कृष्ण ] एसब शुनिया प्रभु हासे ७/४३ | कलियुगे कृष्ण-नाम ३/५० | कृष्ण-आलिङ्गन पाइनु ४/२५२ ए सब सिद्धान्त २/१०८ | कलियुगे युगधर्म ३/४० | 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण ३/५३ ए सब सिद्धान्त गूढ़ ४/२३१ | कल्मष-द्विरद नाशे ३/३१ | कृष्ण एक सर्वाश्रय २/९४ ए सब सिद्धान्त शुन २/११६ | कहिबार योग्य नहे ५/२११ | कृष्ण-कर्त्ता, माया ताँर ५/६४ ए सब सिद्धान्त हय ४/२३४ | काम-अन्धतमः ४/१७१ | कृष्ण कहे, - 'आमि ४/१२१ एसब सिद्धान्ते सेइ ४/२३३ | कामगन्धहीन स्वाभाविक ४/२०९ | कृष्ण कहेन- "ब्रह्मा २/३४ ए-सबाके शास्त्रे कहे ६/९५ | काम, प्रेम,-दोँहाकार ४/१६४ | कृष्णकान्तागण देखि ४/७४ ए सबार दर्शनेते २/५२ | कामेर तात्पर्य-निज ४/१६६ | कृष्णकार्य करे विप्र ५/१७१ | कायमनोवाक्ये ताँर भक्ति ६/९० | कृष्णके कराइल नाना ५/१५२ ऐ | कायव्यूह करि' करेन ६/९३ | कृष्णके कराय ४/८१ ऐछे अवतरे कृष्ण ४/१२ | कायव्यूहरूप ताँर ४/७९ | कृष्णके कहये केह २/११३ ऐश्वर्यज्ञान-हीन, केवल ६/६१ | कार अवतार ? २/७९ | कृष्णके तुलसीजल ३/१०४ ऐश्वर्यज्ञानेते सब ४/१७ | कारण-समुद्र माया ५/५७ | कृष्ण, कृष्ण-अवतारेर ५/१५ ऐश्वर्यज्ञाने विधि भजन ३/१७ | कारणाब्धि-गर्भोदक २/४९ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे सबे ५/१९१ ऐश्वर्य-ज्ञाने सब ३/१६ | काशीते लेखक शूद्र ७/४५ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा ७/१४९ ऐश्वर्य-शिथिल ३/१६, ४/१७ | काँहा आछे मही, शिर ५/११७ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलिया ५/१८९ | कि कारणे आमा-सबार ७/६७ | कृष्ण-गुण-लीला गाय ६/७९ क | कि देखिनु, कि शुनिनु ५/१९८ | कृष्ण, गुरुद्वय, भक्त १/३२ कतेक शुनिब प्रभु ७/५० | किन्तु कृष्णेर येइ ४/९ | कृष्णदास-अभिमाने ये ६/४३ कण्ठे करि' एइ श्लोक ७/७५ | किन्तु कृष्णेर सुख हय ४/१९४ | कृष्णदास-भाव बिनु ६/७५ कनिष्ठ-भावे आपनाते ६/९७ | किबा रूप, गुण, लीला ५/१९३ | 'कृष्णदास हओ'-जीवे ६/४२ कभु असङ्गत नहे ७/१०५ | किबा मन्त्र दिला गोसाञि ७/८१ | कृष्णनाम उपदेशि' तार' ७/९२ कभु कोन अङ्गे देखि ५/१६६ | किम्बा, 'कान्ति'-शब्दे ४/९३ | कृष्णनाम-परायण, परम ५/२२८ कभु कृष्ण करे ताँर ५/१३६ | किम्बा, कृष्णपूजा ४/८४ | कृष्ण-नाम-प्रेम दिया ७/१६३ कभु गुरु, कभु सखा ५/१३५ | किम्बा, दोँहा ना मानिञा ५/१७७ | 'कृष्णनाम-महामन्त्रे एइ ७/८३ कभु मिले, कभु ना ४/३१ | किम्बा, प्रेमरसमय कृष्णेर ४/८६ | कृष्णनाम हैते पाबे ७/७३ कभु यदि एइ प्रेमार ४/१३५ | किम्बा, 'सर्वलक्ष्मी' ४/९१ | कृष्णनामे ज्ञानाच्छन्न ७/७९ कमलनयनेर तँहो, याते ६/३० | किशोरस्वरूप कृष्ण २/९९ | कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु ७/९७ 'कमलाक्ष' बलि' धरे ६/३० | कृपा करि व्यास ३/८१ | कृष्णनामेर फल-'प्रेमा' ७/८६ करिब विविधविध ४/२७ | कृष्ण-अवतार हेतु ३/९१ | कृष्ण-निजशक्ति राधा ४/७१ करिबार कथा नहे ५/२१७ | कृष्ण अवतारिया यँहो ५/१४८ | कृष्णपादपद्म भावि' ३/१०७ करिया कल्मष नाश ३/६१ | कृष्ण अवतारे ज्येष्ठ ५/१५२ | कृष्णप्रेम दिया कैला ७/१६७ कर्त्तव्य अवश्य एइ ४/३५ | कृष्ण अवतीर्ण हैला ४/७ | कृष्णप्रेम-भावित याँर ४/७१ कलिकाले कैछे हबे ३/९९ | कृष्ण आदि नरनारी ४/१४७ | कृष्णप्रेमा सेइ पाय ७/१०० पद्य-सूची | ४६१

[ कृष्ण-गुरु

कृष्णप्रेमे उन्मत्त, विह्वल ६/७९कृष्णेर आनन्दामृतसागरे ७/९०कैशोर-वयसे काम, ४/१९५
कृष्णप्रेमेर एइ एक ६/५२कृष्णेर आह्वान करेन ३/१०८कोटि अंश, कोटि शक्ति ६/१३
कृष्णप्रेमेर स्वभावे दास्य ६/८०कृष्णेर कलार कला ५/१३७कोटि अश्वमेध एक ३/७८
कृष्णबिनु अन्यत्र तार ७/१४३कृष्णेर चरण-प्राप्त्ये ७/८७कोटिकाम जिनि' रूप ४/२४२
कृष्ण बिनु ताँर मुखे ३/५४कृष्णेर चरणे यदि हय ७/१४३कोटि कोटि ब्रह्माण्डे २/१५
कृष्णभक्तिगन्धहीन ३/९५कृष्णेर नामकरणे ३/३५कोटिचन्द्र जिनि' मुख ५/१८८
कृष्णभक्तिर बाधक-यत १/९४कृष्णेर प्रतिज्ञा एक ४/१७७कोटि नेत्र नाहि दिल ४/१५१
'कृष्णमन्त्र' जप' सदा ७/७२कृष्णेर प्रेयसी व्रजे ६/६४कोटी ब्रह्मसुख नहे ६/४३
कृष्णमन्त्र हैते हवे ७/७३कृष्णेर महिमा कहि २/११९कोटि ब्रह्माण्ड करेन ६/११
कृष्णामयी-कृष्ण यार ४/८५कृष्णेर माधुर्य्यरस ४/४९,कोटीसूर्य्यचन्द्र जिनि १/८५
कृष्णामधुर्यरे ४/१४७, ७/११६/१०४, ७/१४४कोन कारणे यबे ४/३८
कृष्ण यदि अंश हैत २/८४कृष्णेर माधुर्य्ये कृष्णे ४/१५८कौमार, पौगण्ड, आर ४/१९२
कृष्ण यदि पृथिवीते ३/९२कृष्णेर वल्लभा राधा ४/२१८क्रीड़ा करे एइ २/९९
कृष्ण यबे अवतरे ५/१३१कृष्णेर विचार एक ४/२३८क्रीड़ार सहाय यैछे ४/७३
कृष्ण लागि' आर सब ४/१७५कृष्णेर शरीरे २/९४कु
कृष्णवर्ण-शब्देर ३/५४कृष्णेर शेषता पाञा ५/१२४
कृष्ण वश करिबेन ३/१०२कृष्णेर सकल वाञ्छा ४/९३क्ष
कृष्णवाञ्छा-पूर्त्तिरूप करे ४/८७कृष्णेर समता हैते बड़ ६/९८क्षणेके बसिला आचार्य ६/८५
कृष्णविग्रह यैछे विभूत्यादि ५/१४कृष्णेर सहाय, गुरु ४/२१०क्षणे क्षणे बाड़े दोंहे ४/१४२
कृष्णविषयक प्रेमा-परम ७/८४कृष्णेर स्वयं भगवत्ता २/८३क्षम अपराध,-पूर्वे ये ७/१४८
कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय ५/६०कृष्णेर स्वरूप, आर २/९६क्षीरोदकतीरे याइ' करेन ५/११४
कृष्ण-शोभा देखि' ४/१९२कृष्णेर स्वरूपेर हय २/९७
कृष्णसङ्गे युद्ध करे ६/६२कृष्णेरे कराय यैछे ४/७३
कृष्णसाम्ये नहे ताँर ६/१०१केबा एड़ाइबे प्रभुर ७/३७गङ्गाजले तुलसी ३/१०७
कृष्णसुखतात्पर्य मात्र ४/१६६केशव-भारतीर शिष्य, ७/६६गदाधर-पण्डितादि १/४१, ७/१७
कृष्णसुख लागि ४/१७२केह केह एड़ाइल, प्रतिज्ञा ७/३२गवाक्षर रन्ध्रे येन त्रसरेणु ५/७०
कृष्णसुखहेतु करे ४/१६९, १७४,केह ताँरे बोले यदि ३/५५गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोंहे ५/७६
१७५केह पापे, केह पुण्ये ३/९६गाहि, नाचि नाहि आमि ७/९६
कृष्णावलोकन बिना नेत्रे ४/१५४केह माने, केह ना माने ६/८३गीता-विष्णुपुराणादि ७/११७
कृष्णे गाढ़ प्रेम १/१०७केहो कहे, कृष्ण २/११३, ११४,गीता-भागवते कैल ६/२७
कृष्णेन्द्रियप्रीति-इच्छा ४/१६५५/१२९, १३०गुणावतार तेंहो ६/७७
कृष्णे भक्ति कर-इहाय ७/१०१केहो कहे, परव्योमे २/११५गुणातीत विष्णु-स्पर्श ५/१०४
कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान ४/६७केहो कोनमत कहे २/११२गुणार्णव मिश्र-नामे ५/१६८
कृष्णेर अङ्गेर प्रभा ५/३२केहो बोले, कृष्ण ५/१२९गुरु कृष्णरूप हन १/४५

४६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत