श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ
| स्तम्भ १ | सन्दर्भ | स्तम्भ २ | सन्दर्भ | स्तम्भ ३ | सन्दर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| अंश-अवतार, आर | १/६५ | अतएव 'कृष्ण'-शब्द | २/८२ | अद्वैत-आचार्य-कोटि | ६/२० |
| अंश-अवतार-पुरुष | १/६६ | अतएव गोपीगणेर नाहि | ४/१७२ | अद्वैत आचार्य गोसाञि | ३/७३, ५/१४७, ६/६ |
| 'अंश' ना कहिया, केने | ६/२४ | अतएव चैतन्य गोसाञि | २/११० | अद्वैत आचार्य प्रकट | ३/९४ |
| अंश-शक्त्यावेशरूपे | २/९८ | अतएव तुमि हओ | २/३९ | अद्वैत आचार्य-प्रभुर | १/३९ |
| अंश' हैते 'अङ्ग', यात | ६/२४ | अतएव नाम हैल अद्वैत | ६/२८ | अद्वैत, नित्यानन्द | ३/७१, ६/१०३ |
| अंशांशि-रूपे शास्त्रे | ५/१५४ | अतएव निस्तारिला | ५/२०९ | अद्वैत-प्रसादे लोक | ६/११२ |
| अंशिनी राधा हैते | ४/७६ | अतएव विष्णु तखन | ४/१३ | अद्वैत-महिमा अनन्त | ६/११३ |
| अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ | ६/९६ | अतएव ब्रह्मवाक्ये | २/५८ | अद्वैत-रूपे 'उपादान' | ६/१६ |
| अंशेर अंश येइ, 'कला' | ५/७३ | अतएव भक्तगणे करि | ४/२३७ | अधम जीवेर यैछे | ५/१५८ |
| अकृष्णवरणे ताँर | ३/५६ | अतएव मधुर रस कहि | ४/४६ | अधमेरे दिल प्रभु | ५/२३० |
| अगण्य, अनन्त यत | ५/६७ | अतएव 'राधिका'-नाम | ४/८७ | अनन्त, अपार-तार | ५/५२ |
| अग्नि, ज्वालाते-यैछे | ४/९७ | अतएव श्रीकृष्णचैतन्य | ५/१३३ | 'अनन्त' कहिते नारे | ५/४७ |
| अग्निशक्त्ये लौह यैछे | ५/६० | अतएव विप्र आगे | २/७८ | अनन्त ब्रह्माण्ड बहु | २/४३ |
| अङ्ग-उपाङ्ग-नाम | ३/५९ | अतएव समस्तेर | ४/९५ | अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि | ६/८ |
| अङ्गप्रभा, अंश | २/६ | अतएव सर्वपूज्या, | ४/८९ | अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र | ६/७७ |
| 'अङ्ग'-शब्दे अंश | ३/७, ३/६७, ६/२१ | अतएव सूर्य ताँर | २/२७ | अनन्तरूपे एकरूप | २/१०० |
| 'अङ्ग'-शब्देर अर्थ | ३/६६ | अतएव सेइ भाव | ४/५० | अनन्त वैभव ताँर | ५/११५ |
| अङ्गने बसिया तेंहो | ५/१६९ | अतएव सेइ सुख | ४/१९५ | अनन्तशय्याते ताँहा | ५/१०० |
| अङ्गेर अवयव | ३/६७, ७१ | अतएव हओ तुमि | २/४२ | अनन्त स्फटिके यैछे | २/१९ |
| अङ्गोपाङ्ग अस्त्र | ३/६६ | अति गूढ़ हेतु सेइ | ४/१०४ | अनायासे हय निज | १/२१ |
| अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण | ३/७२ | अतिहीन-ज्ञाने करे | ४/२४ | अनुकूलवाते यदि पाय | ४/२५३ |
| अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ | ५/९० | अतृप्त हइया करे | ४/१५० | अनुवाद आगे, पाछे | २/७ |
| अज्ञान-तमेर नाम | १/९० | अत्यन्त निगूढ़ एइ | ४/१६० | 'अनुवाद' कहि तारे | २/७६ |
| अतएव अधीश्वर तुमि | २/४१ | अथवा, कृष्णके तिँहो | ३/५३ | अनुवाद ना कहिया | २/७५ |
| अतएव आर सब | ६/८२ | अथवा भक्तेर वाक्य | ५/१२७ | अनेक प्रकाश हय | १/७६ |
| अतएव कहि किछु | ४/२३२ | 'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण | ४/१३८ | अन्तरङ्ग-भक्त करि' | ७/१७ |
| अतएव काम-प्रेमे | ४/१७१ | अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु | २/६५ | अन्तरात्मा-रूपे तिँहो | ५/८५ |
| अतएव कृष्ण मूल | ५/६१ | अद्वितीय, नन्दात्मज | ७/७ | ||
| अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर | ६/३२ |
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