श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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प्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची
[वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण]
अ
| स्तम्भ १ | सन्दर्भ | स्तम्भ २ | सन्दर्भ | स्तम्भ ३ | सन्दर्भ |
|---|---|---|---|---|---|
| अंश-अवतार, आर | १/६५ | अतएव 'कृष्ण'-शब्द | २/८२ | अद्वैत-आचार्य-कोटि | ६/२० |
| अंश-अवतार-पुरुष | १/६६ | अतएव गोपीगणेर नाहि | ४/१७२ | अद्वैत आचार्य गोसाञि | ३/७३, ५/१४७, ६/६ |
| 'अंश' ना कहिया, केने | ६/२४ | अतएव चैतन्य गोसाञि | २/११० | अद्वैत आचार्य प्रकट | ३/९४ |
| अंश-शक्त्यावेशरूपे | २/९८ | अतएव तुमि हओ | २/३९ | अद्वैत आचार्य-प्रभुर | १/३९ |
| अंश' हैते 'अङ्ग', यात | ६/२४ | अतएव नाम हैल अद्वैत | ६/२८ | अद्वैत, नित्यानन्द | ३/७१, ६/१०३ |
| अंशांशि-रूपे शास्त्रे | ५/१५४ | अतएव निस्तारिला | ५/२०९ | अद्वैत-प्रसादे लोक | ६/११२ |
| अंशिनी राधा हैते | ४/७६ | अतएव विष्णु तखन | ४/१३ | अद्वैत-महिमा अनन्त | ६/११३ |
| अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ | ६/९६ | अतएव ब्रह्मवाक्ये | २/५८ | अद्वैत-रूपे 'उपादान' | ६/१६ |
| अंशेर अंश येइ, 'कला' | ५/७३ | अतएव भक्तगणे करि | ४/२३७ | अधम जीवेर यैछे | ५/१५८ |
| अकृष्णवरणे ताँर | ३/५६ | अतएव मधुर रस कहि | ४/४६ | अधमेरे दिल प्रभु | ५/२३० |
| अगण्य, अनन्त यत | ५/६७ | अतएव 'राधिका'-नाम | ४/८७ | अनन्त, अपार-तार | ५/५२ |
| अग्नि, ज्वालाते-यैछे | ४/९७ | अतएव श्रीकृष्णचैतन्य | ५/१३३ | 'अनन्त' कहिते नारे | ५/४७ |
| अग्निशक्त्ये लौह यैछे | ५/६० | अतएव विप्र आगे | २/७८ | अनन्त ब्रह्माण्ड बहु | २/४३ |
| अङ्ग-उपाङ्ग-नाम | ३/५९ | अतएव समस्तेर | ४/९५ | अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि | ६/८ |
| अङ्गप्रभा, अंश | २/६ | अतएव सर्वपूज्या, | ४/८९ | अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र | ६/७७ |
| 'अङ्ग'-शब्दे अंश | ३/७, ३/६७, ६/२१ | अतएव सूर्य ताँर | २/२७ | अनन्तरूपे एकरूप | २/१०० |
| 'अङ्ग'-शब्देर अर्थ | ३/६६ | अतएव सेइ भाव | ४/५० | अनन्त वैभव ताँर | ५/११५ |
| अङ्गने बसिया तेंहो | ५/१६९ | अतएव सेइ सुख | ४/१९५ | अनन्तशय्याते ताँहा | ५/१०० |
| अङ्गेर अवयव | ३/६७, ७१ | अतएव हओ तुमि | २/४२ | अनन्त स्फटिके यैछे | २/१९ |
| अङ्गोपाङ्ग अस्त्र | ३/६६ | अति गूढ़ हेतु सेइ | ४/१०४ | अनायासे हय निज | १/२१ |
| अङ्गोपाङ्ग तीक्ष्ण | ३/७२ | अतिहीन-ज्ञाने करे | ४/२४ | अनुकूलवाते यदि पाय | ४/२५३ |
| अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ | ५/९० | अतृप्त हइया करे | ४/१५० | अनुवाद आगे, पाछे | २/७ |
| अज्ञान-तमेर नाम | १/९० | अत्यन्त निगूढ़ एइ | ४/१६० | 'अनुवाद' कहि तारे | २/७६ |
| अतएव अधीश्वर तुमि | २/४१ | अथवा, कृष्णके तिँहो | ३/५३ | अनुवाद ना कहिया | २/७५ |
| अतएव आर सब | ६/८२ | अथवा भक्तेर वाक्य | ५/१२७ | अनेक प्रकाश हय | १/७६ |
| अतएव कहि किछु | ४/२३२ | 'अद्भुत, अनन्त, पूर्ण | ४/१३८ | अन्तरङ्ग-भक्त करि' | ७/१७ |
| अतएव काम-प्रेमे | ४/१७१ | अद्वयज्ञान तत्त्ववस्तु | २/६५ | अन्तरात्मा-रूपे तिँहो | ५/८५ |
| अतएव कृष्ण मूल | ५/६१ | अद्वितीय, नन्दात्मज | ७/७ | ||
| अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर | ६/३२ |
[footer] पद्य-सूची | ४५७
[ अन्त-आमार
अन्तर्धान करि' मने ३/१३ अन्तर्धान कैल प्रभु ५/१९६ अन्तर्यामी, भक्तश्रेष्ठ १/४७ अन्य अवतारे सब ३/६४ अन्येरे आछुक कार्य ६/१०५ अन्येरे का कथा, व्रजे ६/५४ अन्येरे सङ्गमे आमि ४/२५८ अन्योन्ये विलासे रस ४/५६ अपराध क्षम, मोरे २/३३ अपराध क्षमाइते २/३१ अपराध क्षमाइल, डुबिल ७/३७ अपवित्र स्थाने बैस ७/६३ अपूर्व माधुरी कृष्णेर ४/१५७ अलौकिक कर्म ३/८४ अवतरि' कैल एबे ६/२६ अवतरि' प्रभु प्रचारिल ४/१०२ अवतार-अवतारी ५/१२८ अवतारकाले दोंहे ५/१५३ अवतारगणेर भक्तभावे ६/१०९ अवतार सब-पुरुषेर २/७० अवतारी कृष्ण यैछे ४/७६ अवतारी नारायण, कृष्ण २/६१ अवतारीर देहे सब २/११२ अवतारेर आर एक ४/१०३ अवतारेर एइ वाञ्छा ४/२२१ अवतीर्ण हञा करेन ३/६ अवतीर्ण हैला कृष्ण ३/२९ अवतीर्ण हैला गौर ३/११२ अवधूत गोसाञिर एक ५/१६१ अविचिन्त्य-शक्तियुक्त ७/१२४ अविदग्ध विधि ४/१५० अभक्त-उष्ट्र 'अयन'-शब्देते कहे २/३८ “अर्धकुक्कुटी-न्याय” ५/१७६
अर्ध स्वरूप ना मानिले ७/१४० अशेष-विशेष कैल ४/२२५ अष्टादशाक्षर-मन्त्रे करे ५/२२१ अष्टाविंश चतुर्युगे ३/१० असमोध्वर्माधुर्य ४/२४२ असम्भव নহে, सत्य २/११४, ५/१३० असुरसंहार-आनुषङ्ग ४/३६ असुरस्वभाव कृष्णे ३/८९
आ
आकार-स्वरूप-भेदे ४/७९ आकारे त' भेद नाहि १/६९ आगे अनुवाद कहि २/७५ आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ७/१२० आचार्य-कल्पित अर्थ ७/१३६ आचार्य गोसाञि ३/९१, ५/१४८ आचार्य गोसाञि चैतन्येर ६/३६ आचार्य गोसाञिर गुण ६/३५ आचार्य-गोसाञिरे प्रभु ६/३९ आचार्यचरणे मोर कोटि ६/११४ आचार्य-हुङ्कारे पाप ३/७५ आजानुलम्बित-भुज ३/४४ आत्म-सुख-दुःखे ४/१७४ आत्मान्तर्यामी याँरे २/१८ आत्मा हैते कृष्ण, भक्ते ६/९९ आत्मा हैते कृष्णेर भक्त ६/९८ आत्मैन्द्रियप्रीति-वाञ्छा ४/१६५ आद्य-अवतार करे ५/५६ आद्य कायव्यूह, कृष्ण ५/५ आद्यावतार, महापुरुष ५/८२ आनन्दसमुद्रे डुबे, किछुइ ४/२५४ आनन्दांशे ह्लादिनी, सदंशे ४/६२ आनन्दे विह्वल आमि ५/१९४
आनिया कृष्णेरे करों ३/१०१ आनुषङ्ग-कर्म एइ ४/१४ आनुषङ्गे कैल सब ४/२२३ आनेर कि कथा, बलदेव ६/७४ आपन-माधुर्य-पाने ६/१०५ आपना आस्वादिते ४/१४८, ७/११ आपनाके करेन ताँर ६/४१ आपनाके बड़ माने ४/२२ आपनाके भृत्य करि' ५/१३७ आपना लुकाइते कृष्ण ३/८७ आपणार एक अंश ५/५५ आपणार कथा लिखि ५/२३३ आपनि आचरि' ३/२०, ९८, ४/४१ आपनि करिमु भक्तभाव ३/२० आपनि श्रीकृष्ण यदि ३/९८ आपने आस्वादे प्रेम ४/३९ आपने करेन कृष्णलीलार ५/९ आपने दक्षिण देश ७/१६६ आपने चैतन्यरूपे २/१०९ आपने ना कैले धर्म ३/२१ आपने पुरुष-विश्वेर ६/१६ आपने प्रकाशानन्द ७/६५ आमाके आनन्द दिबे ४/२३९ आमाके त' ये ये भक्त ४/१९ आमा बिना अन्ये ३/२६ आमार आलये अहोरात्र ५/१६२ आमार दर्शने कृष्ण ४/१९१ आमार दर्शने राधा सुखे ४/२५० आमार व्रजेर रस सेइ ४/२५७ आमार माधुर्य ४/१४१, १४३ आमार माधुर्यामृत ४/१३९ आमार मोहिनी राधा ४/२६१
४५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
आमार-एइ ]
आमार सङ्गे राधा ४/२५५ आमारे ईश्वर माने ४/१८ आमा हइते आनन्दित ४/२३९ आमा हैते कोटिगुण ४/१३३ आमा हैते गुणी बड़ ४/२४१ आमा हैते यार हय ४/२४० आमा हैते राधा पाय ४/२६२ आमि गोप, तुमि २/३४ आमि त' जगते बसि ५/८९ आमि यैछे परस्पर ४/१२७ आमिह ना जानि ४/३० आर यत सब देख ७/८ आयाम, विस्तार, दुइ ५/९७ आर अद्भुत-चित्त १/१०१ आर अर्धे कैल ५/९८ आर एक अङ्ग ताँर ६/३६ आर एक अद्भुत गोपी ४/१८४ आर एक एक मूर्त्ये ६/२० आर एक गोपीप्रेमेर ४/१९७ आर एक शुन ताँर ५/१५८ आर एक हेतु, शुन ४/६ आर दिने गेला प्रभु ७/५८ आर भागवत-भक्त १/९९ आर यत चैतन्य ४/२२८ आर यत सब, -ताँर ६/८१ आर येइ सुने, तार ७/११४ आर विशेषणे तार ३/५५ आर शुद्धभक्त कृष्ण ४/२०४ आर सब अवतार ४/१० आर सब गोपीगण ४/२१७ आर सब परिषद ५/१४३ आराम, आवास, यज्ञ ५/१२३ आरे आरे कृष्णदास ५/१९५ आवेशे आपन भाव ४/१०९
आर्ष-विज्ञवाक्ये नाहि २/८६ आश्चर्य भाण्डार, प्रेम ७/२४ आश्रयजातीय सुख ४/१३४ आश्रय जानिते कहि २/९३ आसि' निवेदन करे चरणे ७/५३ आस्वादिते हय लोभ ४/१४४
इ इच्छाय अनन्तमूर्त्ति ६/९ इच्छाय जगद्रूपे पाय ७/१२४ इथिमध्ये चन्द्रशेखर ७/४९ इत्थे किछु अपराध ना ६/११४ इथे भक्तभाव धरे चैतन्य ७/१२ इथे यत जीव २/४४ इदानीं द्वापरे तिँहो ३/३८ इहाँ आइस, गोसाँई ७/६३ इहाके कहिये कृष्णेर १/७० इहा जानि' रामदासेर ५/१७४ इहार श्रवणे हय चैतन्य ७/१६८ इहा वड किबा सुख ४/२३६ इहा शुनि' बले सर्व ७/१०३ इहा शुनि रहे प्रभु ईषत् ७/५२ इहा हैते कृष्णे २/११७ इहाँ त' द्विभुज २/२९ इहाँ वेणु धरे, तिँहो २/२९
ई ईश्वर-सारूप्य पाय ६/३१ ईश्वरस्वरूप भक्त १/६१ ईश्वरस्वरूप प्रणव ७/१२८ ईश्वरे अभेद, तेजि 'अद्वैत' ६/२५ ईश्वरेर 'अङ्ग', अंश ६/२३ ईश्वरेर अचिन्त्यशक्ति ७/१२७ ईश्वरेर अवतार १/६५
ईश्वरेर वाक्ये नाहि ७/१०७ ईश्वरेर शक्ति हय १/७९ ईश्वरेर शक्त्ये तबे हुये ६/१९ ईश्वरेर सेवा बिना नाहि ५/१२०
उ उछलिल प्रेमवन्या ७/२५ 'उठ', 'उठ' बलि' मोरे ५/१८३ उठि' ताँर रूप देखि' ५/१८३ उठिला संन्यासी सब ७/६१ उड़िया पड़िते चाहे, प्रेमे ४/२५३ उत्सवान्ते गेला तिँहो ५/१७२ उत्तम, अधम, किछु ५/२०८ उन्मत्त हइया नाचे, इति ७/८८ उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व ७/८९ उपनिषत्-सहित सूत्र ७/१०८ उपनिषद् कहे ताँरे २/१२ उपपुराणेह शुनि ३/८१ उपर्युधो व्यापियाछे ५/१८ 'उपादान' अद्वैत करेन ६/१७ उपासना-भेदे जानि २/२७ उपेक्षा करिया कारो ना ७/४३ उपेक्षा करिया कैल मथुरा ७/४४ उलूके ना देखे ३/८५ उल्लास-उपरि लेखों ५/१६०
ए ए अर्थ ना जानि' २/६० ए नवेर उत्पत्ति २/९३ एइ आज्ञा पाञा नाम ७/७७ एइ एक, शुन आर ४/१३७ एइ एक हेतु, शुन २/३९ एइ चन्द्र सूर्य दुइ १/१०२ एइ चिन्ति' रहे कृष्ण ४/१३६
पद्य-सूची | ४५९
[ एइ-एसब एइ छह गुरु १/३७ | एइमत सर्वसूत्रे ७/१४७ | एकलि राधाते ताहा ४/२४१ एइ छह तत्त्वेर १/३३ | एइमते ताँ-सबार क्षमि' ७/१५० | एकले ईश्वर-तत्त्व चैतन्य ७/१० एइ छह तैं हों १/४३ | एइमते नानारूप करे २/६२ | एक वस्तु मागों, देह ७/५३ एइ छह-रूपे हय २/१०० | एइरूपे नित्यानन्द ५/१३४ | एकात्तर चतुर्युगे ३/८ एइ त' कहिल ताँर ५/१७९ | एइ लागि' करे ४/१८३ | एके त' प्रकाश हय १/६८ एइ त' गीतार अर्थ ५/९० | एइ वाञ्छा यैछे ४/३६ | एकेते विश्वास, अन्ये ना ५/१७६ 'एइ त' द्वितीय सूत ५/१७० | एइ शुद्धभक्ति लञा ४/२७ | एके मानि' आरे ना ५/१७७ एइ त' सिद्धान्त ३/२१ | एइ श्लोक तत्त्व-लक्षण २/५९ | एत कहि' विवर्त्त-वाद ७/१२२ एइ त' स्वरूपगण २/१०४ | एइ श्लोकेर अर्थे तुमि २/६६ | एत चिन्ति' निवे दिलाम ७/८० एइ ताँर वाक्ये आमि ७/९५ | एइ सब गुण लञा ३/४७ | एत बलि' एक श्लोक ७/७५ एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे ७/१४६ | एइ सब रसनिय्यास ४/३२ | एत बलि' एक श्लोक ७/९३ एइ तिन ठाकुर १/१९ | एइ सब शास्त्रागम ३/३८ | एत बलि' नाचे गाय ५/१७१ एइ तिन तत्त्व ७/१३, १५ | एइ सब हय श्रीकृष्णोर ६/९४ | एत बलि' नाचे, गाय ६/८५ एइ तिन तृष्णा मोर ४/२६६ | एइ सुखे गोपीर ४/१९१ | एत बलि' मने किछु ७/३३ एइ तिन लोके कृष्ण ५/२५ | एइ सुखे मग्न रहे वृक्ष ४/२५२ | एत भावि' आचार्य ३/१०६ एइ दुइ हेतु हैते ४/१६ | एइ हेतु गोपी-प्रेमे ४/१९५ | एत भावि' कलिकाले ३/२९ 'एइ देह कैलुँ आमि ४/१८२ | एक अङ्गाभासे करे ५/६६ | एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे ७/९० एइ द्वारे करिब ४/३२ | एक अङ्गे जाड्य ताँर ५/१६६ | एत मूर्त्तिभेद करि' कृष्ण ५/१२४ एइ पश्चतत्त्वरूपे ७/१६३ | एक अद्भुत समकाले १/१०१ | एत लञा सृजे पुरुष ६/१३ एइ प्रेमद्वारे नित्य ४/१३९ | एकइ चिच्छक्ति ताँर ४/६१ | एत शुनि' गुरु मोरे ७/८२ एइ बलि' प्रेरिला मोरे ५/१९६ | एकइ विग्रह, किन्तु २/२८ | एत शुनि' हासि' प्रभु ७/१०२ एइभावे येइ मोरे ४/२१ | एकइ विग्रह यदि १/६९, १/७६ | ए तिनेर चरण १/१९ एइमत अनुभव आमार ४/२४९ | एकइ स्वरूप ताँर ५/१९ | 'एते'-शब्दे अवतारेर २/८० एइ मत गाय, नाचे ६/५० | एकइ स्वरूप दों हे ५/५ | ए दर्पणेर आगे नव ४/१४१ एइ मत गीतातेह पुनः ५/८८ | एक एक मूर्त्ये करेन ६/९ | ए देह-दर्शन-स्पर्शे ४/१८३ एइ मत चैतन्य-कृष्ण ४/३७ | एक कणा स्पर्शि मात्र ५/१५७ | ए विरोधेर एकमात्र देखि ४/१८९ एइ मत चैतन्यगोसाञि ५/१४३ | एक कृष्ण-सर्वसेव्य ६/८१ | एमते कृष्णेरे ३/१०८ एइ मत जगतेर सुखे ४/२४८ | एक नित्यानन्द बिनु ५/२०७ | एमन निर्गुण-मोरे ५/२०७ एइ मत दुइ भाइ १/८९ | एक भागवत बड़ १/९९ | ए माधुर्यामृत सदा येइ ४/१४९ एइमत परस्पर पड़े ४/१९३ | एक महाप्रभु, आर प्रभु ७/१४ | एसब कृष्णेर शुद्ध ४/६५ एइ मत पूर्वे कृष्ण ४/११९ | एकमात्र 'अंशी' -कृष्ण ६/९६ | एसब पण्डितलोक परम ६/४९ एइमते प्रतिसूत्रे करेन ७/१३४ | एक मुख्यतत्त्व, तिन २/६४ | एसब प्रमाणे जानि ५/१२६ एइमत प्रतिसूत्रे सहस्रार्थ ७/१३३ | एक लक्ष्मीगण १/७९, ४/७४ | एसब लइया करेन ६/३८ एइमत भक्तभाव करि' ४/४१ | एकला ईश्वर कृष्ण ५/१४२ | एसब लइया चैतन्यप्रभुर ६/३८ ४६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
एसब-कृष्ण ] एसब शुनिया प्रभु हासे ७/४३ | कलियुगे कृष्ण-नाम ३/५० | कृष्ण-आलिङ्गन पाइनु ४/२५२ ए सब सिद्धान्त २/१०८ | कलियुगे युगधर्म ३/४० | 'कृष्ण' एइ दुइ वर्ण ३/५३ ए सब सिद्धान्त गूढ़ ४/२३१ | कल्मष-द्विरद नाशे ३/३१ | कृष्ण एक सर्वाश्रय २/९४ ए सब सिद्धान्त शुन २/११६ | कहिबार योग्य नहे ५/२११ | कृष्ण-कर्त्ता, माया ताँर ५/६४ ए सब सिद्धान्त हय ४/२३४ | काम-अन्धतमः ४/१७१ | कृष्ण कहे, - 'आमि ४/१२१ एसब सिद्धान्ते सेइ ४/२३३ | कामगन्धहीन स्वाभाविक ४/२०९ | कृष्ण कहेन- "ब्रह्मा २/३४ ए-सबाके शास्त्रे कहे ६/९५ | काम, प्रेम,-दोँहाकार ४/१६४ | कृष्णकान्तागण देखि ४/७४ ए सबार दर्शनेते २/५२ | कामेर तात्पर्य-निज ४/१६६ | कृष्णकार्य करे विप्र ५/१७१ | कायमनोवाक्ये ताँर भक्ति ६/९० | कृष्णके कराइल नाना ५/१५२ ऐ | कायव्यूह करि' करेन ६/९३ | कृष्णके कराय ४/८१ ऐछे अवतरे कृष्ण ४/१२ | कायव्यूहरूप ताँर ४/७९ | कृष्णके कहये केह २/११३ ऐश्वर्यज्ञान-हीन, केवल ६/६१ | कार अवतार ? २/७९ | कृष्णके तुलसीजल ३/१०४ ऐश्वर्यज्ञानेते सब ४/१७ | कारण-समुद्र माया ५/५७ | कृष्ण, कृष्ण-अवतारेर ५/१५ ऐश्वर्यज्ञाने विधि भजन ३/१७ | कारणाब्धि-गर्भोदक २/४९ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' कहे सबे ५/१९१ ऐश्वर्य-ज्ञाने सब ३/१६ | काशीते लेखक शूद्र ७/४५ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा ७/१४९ ऐश्वर्य-शिथिल ३/१६, ४/१७ | काँहा आछे मही, शिर ५/११७ | 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलिया ५/१८९ | कि कारणे आमा-सबार ७/६७ | कृष्ण-गुण-लीला गाय ६/७९ क | कि देखिनु, कि शुनिनु ५/१९८ | कृष्ण, गुरुद्वय, भक्त १/३२ कतेक शुनिब प्रभु ७/५० | किन्तु कृष्णेर येइ ४/९ | कृष्णदास-अभिमाने ये ६/४३ कण्ठे करि' एइ श्लोक ७/७५ | किन्तु कृष्णेर सुख हय ४/१९४ | कृष्णदास-भाव बिनु ६/७५ कनिष्ठ-भावे आपनाते ६/९७ | किबा रूप, गुण, लीला ५/१९३ | 'कृष्णदास हओ'-जीवे ६/४२ कभु असङ्गत नहे ७/१०५ | किबा मन्त्र दिला गोसाञि ७/८१ | कृष्णनाम उपदेशि' तार' ७/९२ कभु कोन अङ्गे देखि ५/१६६ | किम्बा, 'कान्ति'-शब्दे ४/९३ | कृष्णनाम-परायण, परम ५/२२८ कभु कृष्ण करे ताँर ५/१३६ | किम्बा, कृष्णपूजा ४/८४ | कृष्ण-नाम-प्रेम दिया ७/१६३ कभु गुरु, कभु सखा ५/१३५ | किम्बा, दोँहा ना मानिञा ५/१७७ | 'कृष्णनाम-महामन्त्रे एइ ७/८३ कभु मिले, कभु ना ४/३१ | किम्बा, प्रेमरसमय कृष्णेर ४/८६ | कृष्णनाम हैते पाबे ७/७३ कभु यदि एइ प्रेमार ४/१३५ | किम्बा, 'सर्वलक्ष्मी' ४/९१ | कृष्णनामे ज्ञानाच्छन्न ७/७९ कमलनयनेर तँहो, याते ६/३० | किशोरस्वरूप कृष्ण २/९९ | कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु ७/९७ 'कमलाक्ष' बलि' धरे ६/३० | कृपा करि व्यास ३/८१ | कृष्णनामेर फल-'प्रेमा' ७/८६ करिब विविधविध ४/२७ | कृष्ण-अवतार हेतु ३/९१ | कृष्ण-निजशक्ति राधा ४/७१ करिबार कथा नहे ५/२१७ | कृष्ण अवतारिया यँहो ५/१४८ | कृष्णपादपद्म भावि' ३/१०७ करिया कल्मष नाश ३/६१ | कृष्ण अवतारे ज्येष्ठ ५/१५२ | कृष्णप्रेम दिया कैला ७/१६७ कर्त्तव्य अवश्य एइ ४/३५ | कृष्ण अवतीर्ण हैला ४/७ | कृष्णप्रेम-भावित याँर ४/७१ कलिकाले कैछे हबे ३/९९ | कृष्ण आदि नरनारी ४/१४७ | कृष्णप्रेमा सेइ पाय ७/१०० पद्य-सूची | ४६१
[ कृष्ण-गुरु
| कृष्णप्रेमे उन्मत्त, विह्वल ६/७९ | कृष्णेर आनन्दामृतसागरे ७/९० | कैशोर-वयसे काम, ४/१९५ |
| कृष्णप्रेमेर एइ एक ६/५२ | कृष्णेर आह्वान करेन ३/१०८ | कोटि अंश, कोटि शक्ति ६/१३ |
| कृष्णप्रेमेर स्वभावे दास्य ६/८० | कृष्णेर कलार कला ५/१३७ | कोटि अश्वमेध एक ३/७८ |
| कृष्णबिनु अन्यत्र तार ७/१४३ | कृष्णेर चरण-प्राप्त्ये ७/८७ | कोटिकाम जिनि' रूप ४/२४२ |
| कृष्ण बिनु ताँर मुखे ३/५४ | कृष्णेर चरणे यदि हय ७/१४३ | कोटि कोटि ब्रह्माण्डे २/१५ |
| कृष्णभक्तिगन्धहीन ३/९५ | कृष्णेर नामकरणे ३/३५ | कोटिचन्द्र जिनि' मुख ५/१८८ |
| कृष्णभक्तिर बाधक-यत १/९४ | कृष्णेर प्रतिज्ञा एक ४/१७७ | कोटि नेत्र नाहि दिल ४/१५१ |
| 'कृष्णमन्त्र' जप' सदा ७/७२ | कृष्णेर प्रेयसी व्रजे ६/६४ | कोटी ब्रह्मसुख नहे ६/४३ |
| कृष्णमन्त्र हैते हवे ७/७३ | कृष्णेर महिमा कहि २/११९ | कोटि ब्रह्माण्ड करेन ६/११ |
| कृष्णामयी-कृष्ण यार ४/८५ | कृष्णेर माधुर्य्यरस ४/४९, | कोटीसूर्य्यचन्द्र जिनि १/८५ |
| कृष्णामधुर्यरे ४/१४७, ७/११ | ६/१०४, ७/१४४ | कोन कारणे यबे ४/३८ |
| कृष्ण यदि अंश हैत २/८४ | कृष्णेर माधुर्य्ये कृष्णे ४/१५८ | कौमार, पौगण्ड, आर ४/१९२ |
| कृष्ण यदि पृथिवीते ३/९२ | कृष्णेर वल्लभा राधा ४/२१८ | क्रीड़ा करे एइ २/९९ |
| कृष्ण यबे अवतरे ५/१३१ | कृष्णेर विचार एक ४/२३८ | क्रीड़ार सहाय यैछे ४/७३ |
| कृष्ण लागि' आर सब ४/१७५ | कृष्णेर शरीरे २/९४ | कु |
| कृष्णवर्ण-शब्देर ३/५४ | कृष्णेर शेषता पाञा ५/१२४ | |
| कृष्ण वश करिबेन ३/१०२ | कृष्णेर सकल वाञ्छा ४/९३ | क्ष |
| कृष्णवाञ्छा-पूर्त्तिरूप करे ४/८७ | कृष्णेर समता हैते बड़ ६/९८ | क्षणेके बसिला आचार्य ६/८५ |
| कृष्णविग्रह यैछे विभूत्यादि ५/१४ | कृष्णेर सहाय, गुरु ४/२१० | क्षणे क्षणे बाड़े दोंहे ४/१४२ |
| कृष्णविषयक प्रेमा-परम ७/८४ | कृष्णेर स्वयं भगवत्ता २/८३ | क्षम अपराध,-पूर्वे ये ७/१४८ |
| कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय ५/६० | कृष्णेर स्वरूप, आर २/९६ | क्षीरोदकतीरे याइ' करेन ५/११४ |
| कृष्ण-शोभा देखि' ४/१९२ | कृष्णेर स्वरूपेर हय २/९७ | |
| कृष्णसङ्गे युद्ध करे ६/६२ | कृष्णेरे कराय यैछे ४/७३ | ग |
| कृष्णसाम्ये नहे ताँर ६/१०१ | केबा एड़ाइबे प्रभुर ७/३७ | गङ्गाजले तुलसी ३/१०७ |
| कृष्णसुखतात्पर्य मात्र ४/१६६ | केशव-भारतीर शिष्य, ७/६६ | गदाधर-पण्डितादि १/४१, ७/१७ |
| कृष्णसुख लागि ४/१७२ | केह केह एड़ाइल, प्रतिज्ञा ७/३२ | गवाक्षर रन्ध्रे येन त्रसरेणु ५/७० |
| कृष्णसुखहेतु करे ४/१६९, १७४, | केह ताँरे बोले यदि ३/५५ | गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोंहे ५/७६ |
| १७५ | केह पापे, केह पुण्ये ३/९६ | गाहि, नाचि नाहि आमि ७/९६ |
| कृष्णावलोकन बिना नेत्रे ४/१५४ | केह माने, केह ना माने ६/८३ | गीता-विष्णुपुराणादि ७/११७ |
| कृष्णे गाढ़ प्रेम १/१०७ | केहो कहे, कृष्ण २/११३, ११४, | गीता-भागवते कैल ६/२७ |
| कृष्णेन्द्रियप्रीति-इच्छा ४/१६५ | ५/१२९, १३० | गुणावतार तेंहो ६/७७ |
| कृष्णे भक्ति कर-इहाय ७/१०१ | केहो कहे, परव्योमे २/११५ | गुणातीत विष्णु-स्पर्श ५/१०४ |
| कृष्णे भगवत्ता-ज्ञान ४/६७ | केहो कोनमत कहे २/११२ | गुणार्णव मिश्र-नामे ५/१६८ |
| कृष्णेर अङ्गेर प्रभा ५/३२ | केहो बोले, कृष्ण ५/१२९ | गुरु कृष्णरूप हन १/४५ |
४६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
गुरु-जीवेर ] गुरुतत्त्व कहियाछि ७/३ गुरुवर्ग,-नित्यानन्द ५/१४४ गुरु, वैष्णव, भगवान् १/२० गुरु मोरे मूर्ख देखि' ७/७१ गुरुरूपे कृष्ण कृपा १/४५ गुरु-सम-लघुके कराय ६/५२ गोप-गोपीसङ्गे याँहा ५/२१ गोपिका जानेन कृष्णेर ४/२११ गोपिका-दर्शने ४/१८७, १९० गोपिकार सुखे ४/१८९ गोपिका हयेन प्रिया ४/२१० गोपीगण करेन यबे ४/१८६ गोपीगणेर प्रेमेर ४/१६२ गोपीप्रेमे करे कृष्ण ४/१९८ गोपी-शोभा देखि' कृष्णेर ४/१९२ गोलोके व्रजेर सह ३/५ गोविन्दसर्वस्व ४/८२ गोविन्दानन्दिनी, राधा ४/८२ गोविन्देर प्रतिमूर्त्ति ५/७३ गौड़देशे पूर्व-शैले १/८६ गौणवृत्त्ये येबा भाष्य ७/१०९ गौणार्थ करिल, मुख्य ७/११० गौणार्थ व्याख्या करे सब ७/१३३ ग्रन्थेर आरम्भे करि १/२० ग्रामे ग्रामे कैला ७/१६६ घ घटेर कारण-चक्र ५/६४ घटेर निमित्त-हेतु यैछे ५/६३ घोर नरकेते पड़े ५/२२६ च चतुर्भुज, पीतवास, यैछे ६/३१ चन्दनलेपित-अङ्ग ५/१८७ चन्दनेर अङ्गद-बाला ३/४६ चब्बिश वत्सर छिला ७/३४ चर्मचक्षे देखे ताँरे ५/२० चर्मचक्षे देखे यैछे २/१३ चारि भाव-भक्ति ३/१९ चारि भावे भक्त यत ३/११ चारि मुक्ति दिया करे ५/३० चारिपाशे बेड़ि आछे ५/१९० चारि प्रेम, चतुर्विध ४/४२ चारि हस्त हय ३/४२ चिच्छक्ति-आश्रय तिहो ५/४२ चिच्छक्ति-विलास एक ५/४३ चिच्छक्ति, स्वरूपशक्ति २/१०१ चित्स्वरूप, ताँहा नाहि ५/३३ चित्त दृढ़ हञा लागे २/११८ चिदंशे संवित्-यारे ज्ञान ४/६२ चिदानन्द-देह, ताँर ७/११३ चिद्विभूति आच्छादिया ७/११२ चिदैश्वर्य-परिपूर्ण, अनूर्ध्व ७/१११ चिन्तामणि-भूमि, कल्प ५/२० चिन्मय-जल सेइ परम ५/५४ चिरकाल नाहि करि ३/१४ चैतन्य-कृष्ण-अवतार ३/८३ चैतन्य-कृष्णेर सैन्य ३/६४ चैतन्यगोसाञिके आचार्य ६/४१ चैतन्यगोसाञि मोरे करे ६/५१ चैतन्यप्रभुते ताँर सुदृढ़ ५/१७३ चैतन्यगोसाञिके आचार्य ६/४१ चैतन्यप्रभुर् महिमा कहि २/११९ चैतन्य-महिमा जानि २/११८ चैतन्यसिंहेर नवद्वीपे ३/३० चैतन्येर अवतारे एइ ३/१०९ चैतन्येर दास मुञि ६/८४ चैतन्येर दासे जाने एइ ४/२२६ चैतन्येर दास्य-प्रेमे ६/४७ चैतन्येर दास्ये सबाय ६/४९ चौद्दभुवने याँर सबे ५/२२२ चौद्द मन्वन्तर ब्रह्मार ३/८ छ छत्र, पादुका, शय्या ५/१२३ ज जगतेर भाग्ये गौड़े १/१०२ जगत्कारण नहे, प्रकृति ५/५९ जगत् डुबाइते आमि ७/३१ जगत् डुबिल, जीवेर ७/२७ जगत्-पालक तिँहो ५/११२ जगत्-मङ्गल अद्वैत ६/१२ जगतमोहन कृष्ण, ताँहार ४/९५ जगाइ माधाइ हैते ५/२०५ जड़ हइते कभु नहे ६/१८ जपिते जपिते मन्त्र करिल ७/८१ जय जय नित्यानन्द ५/२०० जल-तुलसी दिया करे ६/९२ जल-तुलसीर सम ३/१०५ जलशायी अन्तर्यामी ३/६९ जले भरि' अर्द्ध ताहा ५/९८ जीवकीट कोथाय पाइबेक ६/३५ जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्ण ७/११७ 'जीव'-नाम तटस्थाख्य ५/४५ जीव निस्तारिल कृष्ण ६/२७ जीव निस्तारिते ऐछे २/२२ जगतेर उपादान 'प्रधान' ५/५८ जीवरूप वीर्य तात ५/६५ जीवशक्ति तटस्थाख्य २/१०३ जीव-हृदि, जले वैसे २/४७ जीवेर ईश्वर-पुरुषादि २/४० पद्य-सूची | ४६३
[ जीवेर-ताँहार
| जीवेर कल्मष-तमो ३/५९ | तथापिह मोर हय दास ६/५१ | ताँर शिक्षा लागि' प्रभु ७/४७ |
| जीवेर निदान तुमि २/३७ | तथि लागि' पीतवर्ण ३/४० | ताँर सम 'गुरु' कृष्णेर ६/५४ |
| जीवेर स्वरूप-यैछे ७/११६ | तपन-मिश्रेर घरे भिक्षा ७/४६ | ताँर सुखे सुखवृद्धि ४/१९४ |
| जीवे साक्षात् नाहि १/५८ | तप्तहेम-सम कान्ति ३/४१ | ताँरा दास्यभावे करे चरण ६/६२ |
| ज्ञानमार्गे लइते नारे २/१३ | तबु पूर्वपक्ष कर २/१०८ | ताँरे कहे,-प्राकृत ७/११३ |
| ज्ञानयोगमार्गे ताँरे भजे २/२६ | तबे अवतरि' करे जगत् ५/११५ | ताँरे क्षीरोदशायी कहि २/११० |
| ज्येष्ठ-भावे अशीते हय ६/९७ | तबे आत्मा बेचि' ३/१०६ | ताँरे 'निर्विशेष' कहि ७/१४० |
| तबे एइ प्रेमानन्देर ४/१३५ | ताँरे शिखाइल सब ७/४८ | |
| ड | तबे चित्ते हय मोर ४/२३५ | ताँ-सबार कथा रहु ६/६८ |
| डुभृञ् धातुर अर्थ ३/३३ | तबे त' भ्रातारे आमि ५/१७४ | ताँ'सबार चरणे मोर १/४१ |
| तबे धैर्य धरि' मने ७/७९ | ताँ सबार नाहि निजसुख ४/१८८ | |
| त | तबे निज भक्त कैल ७/३९ | ताँ'सबार पादपद्मे १/३७ |
| तटस्थ हइया हृदि विचार ४/४४ | तबे विपरीत हैत २/८४ | ताँहाइ प्रकट कैल ५/९९ |
| तत्काले आमार भ्रातार ५/१७८ | तबे ये देखिये गोपीर ४/१८१ | ताँहाके 'अनन्त' कहि ५/१२६ |
| तत तत बाड़े जल ७/२८ | तबे सब संन्यासी ७/१५१ | ताँहाकेइ प्रेमे कराय ६/५५ |
| ततरूपे पुरुष करे सबाते ५/६७ | तबे सूत-गोसाञि मने २/६९ | ताँहा क्षीरोदधि-मध्ये ५/१११ |
| तत्त्ववस्तु-कृष्ण १/९६ | तबे से 'अद्वैत'-नाम ३/१०१ | ताँहा नाहि निजसुख ४/१९९ |
| 'तत्त्वमसि'-वाक्य हय ७/१२९ | तबे हासि' प्रभु मोरे ५/१९४ | ताँहा बिनु सुखहेतु ४/२१८ |
| तत्त्व येन ईश्वरेर ७/११६ | तमोनाश करि' १/८९, ९५ | ताँहा ये रामेर रूप ५/४२ |
| तथापि अचिन्त्यशक्त्ये ७/१२५ | ताँर अंश 'पुरुष' हय ५/७४ | ताँहा सबा हैते २/४० |
| तथापि कहिये ताँर कृपा ५/१५९ | ताँर अधिष्ठात्री शक्ति ४/९१ | ताँहा स्वप्ने देखा दिला ५/१८१ |
| तथापि गुरुर धर्म ४/१२९ | ताँर अवतार ६/८७, ८८ | ताँहार अङ्गेर शुद्ध २/१२ |
| तथापि जानिये आमि १/४४ | ताँर अवतार साक्षात् ६/७ | ताँहार चरण आगे १/३५ |
| तथापि जीवेर कृपाय ५/२९ | ताँर एक स्वरूप ५/७४ | ताँहार चरण-कृपा के ५/२२७ |
| तथापि तत्स्पर्श नाइ २/५४ | ताँर घरे रहिला प्रभु ७/४५ | ताँहार चरणपद्मे १/३८ |
| तथापि ताँहाते रहु मोर ६/५८ | ताँर तत्त्व-नाम-गुण, ६/३२ | ताँहार चरणाश्रित, सेइ ७/२ |
| तथापि ताँहार भक्त ३/८७ | ताँर दोष नाहि, तैं हो ७/११४ | ताँहार द्वितीय देह ५/४ |
| तथापि नहिल तिन ४/१२० | ताँर धन, ताँर ४/१८२ | ताँहार नाहिक दोष ७/११० |
| तथापि प्रकृति-सह ५/८६ | ताँर नाभिपद्म हैते ५/१०२ | ताँहार पदारविन्दे १/४२ |
| तथापि बाड़ये सुख ४/१८८ | ताँर पादपद्मे कोटि १/३९ | ताँहार प्रकाश-भेद ६/९० |
| तथापि सर्वदा वाम्य ४/१३० | ताँर पादपद्म वन्दो १/४० | ताँहार प्रथम वाञ्छा ४/१२१ |
| तथापि से क्षणे क्षणे ४/१२८ | ताँर भक्त-भक्ति १/१०८ | ताँहार प्रसादे एइ १/९५ |
| तथापि स्वच्छता तार ४/१४० | ताँर युगावतार जानि' ३/३५ | ताँहार प्रसादे मोर २/१६ |
| तथापिह मणि रहे ७/१२६ | ताँर शक्ति ताँर सह ४/८६ | ताँहार प्रेरणाय ताँरे ७/५७ |
४६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
ताँहार-दर्पण ] ताँहार विभूति, देह ७/११२ | ताहाते प्रमाण कृष्ण ४/१७९ | तैँह श्रीकृष्ण-ऐछे २/८५ ताँहार विशेष-ज्ञान २/८१ | ताहातेओ हओ तुमि २/४६ | तैँहो आपकाने करेन ६/७५ ताँहार श्रीमुखवाणी ६/५६ | ताहा देख, साक्षी तुमि २/४४ | तैँहो ईश्वर-हेन यदि ६/५७ ताँहार हुङ्कारे कैल ४/२७० | ताहा देखि' पाँचजनेर ७/२७ | तैँहो करेन कृष्णेर दास्य ६/७८ ताँहार हृदये भक्तभाव ६/८९ | ताहा देखि' महाप्रभु करेन ७/३१ | तैँहो कृष्णेर प्रकाश २/५८ ताँहार हृदये ताँर १/१०० | ताहार इयत्ता कहि ६/११५ | तैँहो दास्य-सुख मागे ६/४५ ताँहारा आपकाने करे ६/६५ | ताहार उपरिभागे ५/१६ | तैँहो ब्रह्मा हञा सृष्टि ५/१०३ ताँहाराओ आपकाने ६/७१ | ताहार 'कल्मष' नाम ३/६० | तैँहो भक्ति प्रचारिला ७/१६५ ताँहा सर्व लभ्य हय ५/२३१ | ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' ५/५१ | तैँहो याँर दासी हैञा ६/६९ ताते जानि, मोते आछे ४/२६१ | ताहार ये आत्मा २/३६ | तैँहो रति-मति मागे ६/५६ ताम्बूलचर्वित यबे करे ४/२५४ | ताहार वैभव २/१०१, १०२ | तैछे इँह अवतार, सब २/७९ तार ऋण शोधिते ३/१०५ | ताहा शिखाइब लीला ४/२६५ | तैछे कृष्ण अवतार-भितरे २/८१ तार पापक्षय हय ३/६३ | ताहार श्रवणे नाश हय ७/१०९ | तैछे जगतेर कर्त्ता ५/६३ तार प्रेमे वश आमि ४/१८ | ताहारे निर्जिते भागवत २/६२ | तैछे जीवे गोविन्देर २/१९ तार मध्ये कृष्णचन्द्रेर २/६८ | ताहा हइते कोटिगुण ४/१२६ | तैछे परव्योमे नाना ५/३७ तार मध्ये मोक्षवाञ्छा १/९२ | ताहा हैते कोटिगुण ४/१८७ | तैछे सब अवतारेर कृष्ण २/९० तार मध्ये ब्रजे नाना ४/८१ | ताहा हैते राधा-सङ्गे ४/२५८ | तोमाके देखिये यैछे ७/१०३ तार मध्ये श्रीराधार ४/४८ | तिँहो याँर अंश ५/४८ | तोमाके निन्दये यत ७/५१ तारा आसि' प्रभु-पाय ७/३६ | तिनसुख आस्वादिते हब ४/२६८ | तोमार ईश्वर-कृष्णे ६/५८ तारे कहे, केने कर २/७३ | तिनेर स्मरणे हय १/२१ | तोमार अर्थे २/८७ तारे से से भावे ४/१९ | तिलफुल-जिनि नासा ३/४४ | तोमार दर्शने सर्व २/४५ ता-सबा डुबाइते पातिब ७/३२ | तुमि कोन् बड़ लोक ४/२५ | तोमार नाभिपद्म हैते २/३२ ताहा आस्वादिते आमि ४/२६२ | तुमि ना देखिले २/४५ | तोमार प्रभावे सबार ७/१०५ ताहा आस्वादिते यदि ४/१२० | तुमि नारायण-शुन २/३५ | तोमार प्रेमेते आमि ७/९१ ताहाञि सकल लोक ७/१५८ | तुमि पिता-माता २/३२ | तोमार महिमा-कोटि ६/११५ ताहा छाड़ि' कर केने ७/६९ | तुमि मूल नारायण २/५६ | तोमार माधुरी देखि' ७/१०४ ताहा देखि' क्रुद्ध हञा ५/१६९ | तुमि यदि आइस, पूर्ण ७/५४ | तोमार वचन शुनि' ७/१०४ ताहा देखि' लोकेर हय ५/१६७ | तुमि ये खण्डिले अर्थ ७/१३५ | तोमार शक्तिते ताँरा २/४१ ताहा देखि' सुखे आमि ४/२५६ | तुरीय कृष्णेर नाहि २/५२ | तोमा-सबार सम्प्रदाये ७/६४ ताहाते आइला तैँहो ५/१६२ | तुरीय, विशुद्धसत्त्व ५/४८ | त्रिजगते इहार केह ४/१३८ ताहाते आपन भक्तगण ३/२८ | तृष्णाशान्ति नहे ४/१४९ | ताहाते जानेन प्रभुर ४/१०५ | तैँह आसि' कृष्णरूपे २/७२ | द ताहाते निमेष,-कृष्ण ४/१५१ | तैँह चतुर्भुज, इँह २/६१ | दण्डवत् हैया आमि ५/१८२ ताहाते प्रकट हैला ४/२७२ | तैँह तोमार प्रकाश २/५७ | दर्पणाद्ये देखि' यदि ४/१४४ पद्य-सूची | ४६५
[ दश-निरन्तर
| दश देह धरि' करे ६/७६ | दैर्घ्य-विस्तारे येइ ३/४२ | नाम-सङ्कीर्त्तन-सर्व १/९६ |
| दाड़िम्ब बीज-सम दन्ते ५/१८८ | दोँहार ये सम-रस ४/२५७ | ना याह संन्यासि-गोष्ठी ७/५५ |
| दामोदरस्वरूप हैते ४/१०४ | द्वारकाते रुक्मिण्यादि ६/७१ | नारायण अंशी येइ २/८५ |
| दास-भाव-सम नहे ६/४४ | द्वारका-मथुरा-गोकुल ५/१६ | नारायण, चतुर्व्यूह ४/११ |
| दास-सखा-पिता-माता ३/१२ | द्वारकार चतुर्व्यूह द्वितीय ५/४० | नारायणरूपे करेन विविध ५/२६ |
| दास्य-भावे आनन्दित ६/४६ | 'द्वितीय चतुर्व्यूह' एइ ५/४१ | नारायणरूपे सेइ तनु ५/२७ |
| दास्य, सख्य, वात्सल्य ३/११, ४/४२ | नारायणेर नाभिनाले ५/११० | |
| ध | 'नार'-शब्द कहे २/३८ | |
| दीप हैते यैछे बहु २/८९ | धरणीर मध्ये सप्त ५/११० | नारेर अयन याते २/४२, २/४६ |
| दुइजन लञा प्रभुर ५/१४६ | धर्म-अर्थ-काम-वाञ्छा १/९० | निजगण लञा खेले ५/२५ |
| दुइनाम-मिलने हैल ६/२९ | धर्म छाड़ि' रागे दुँहे ४/३१ | निज निज भाव सबे ४/४३ |
| दुइ पाशे राधा ललिता ५/२१५ | धर्म स्थापन करे, अधर्म ५/११३ | निजपादपद्म प्रभु दिला ५/१८२ |
| दुइ प्रभु सेवे महाप्रभुर ७/१४ | धैर्य धरिते नारि, हैलाम ७/७८ | निज-प्रेमानन्दे कृष्ण ४/२०१ |
| दुइ भाइ एकतनु ५/१७५ | निज-प्रेमास्वादे मोर ४/१२६ | |
| दुइ भाइ हृदयेर १/९८ | न | निजभावे करे कृष्ण ४/४३ |
| दुइ भागवत द्वारा १/१०० | 'नन्दसुत' बलि' २/९ | निज सृष्टिशक्ति प्रभु ६/१९ |
| दुइ भागवत-सङ्गे १/९८ | नवद्वीपे शचीगर्भ-शुद्ध ४/२७२ | निजाङ्ग-स्वेदजल ५/९६ |
| दुइरूपे हय भगवानेर १/६८ | नवमेघ-जिनि कण्ठध्वनि ३/४१ | नित्यानन्द अवधूत ६/४७ |
| दुइ लीला चैतन्येर ३/४८ | नमस्कार करिते, का'र ५/१६४ | नित्यानन्द-गुणे लेखाय ५/२३३ |
| दुइ सेनापति कैल ७/१६४ | ना आमि जगते बसि ५/८९ | नित्यानन्द गोसाञि ३/७३ |
| दुइ सेनापति बुलेन ३/७४ | ना करे वेदान्त-श्रवण ७/४१ | नित्यानन्द-दया मोरे ५/२१६ |
| दुइ हेतु अवतरि' ४/३९ | ना कहिले, केह इहार ४/२३१ | नित्यानन्द ना मान, ५/१७५ |
| दुई वस्तु भेद नाहि ४/९६ | नाच, गाओ, भक्तसङ्गे ७/९२ | नित्यानन्द पूर्ण करे ५/१५६ |
| दुँहार रूपगुणे दुँहार ४/३० | ना जानि राधार प्रेमे ४/१२३ | नित्यानन्द-प्रति ताँर ५/१७३ |
| दुःख ना मानिह यदि ७/१०२ | नाना अवतार करे ५/८० | नित्यानन्द प्रभु, मोर ५/१६० |
| दुःखी हञा प्रभु-पाय ७/४९ | नाना-भक्तभावे करेन ६/१०८ | नित्यानन्द-प्रभुर गुण ५/२३४ |
| दुस्त्यज आर्यपथ ४/१६८ | नाना यत्न करि आमि ४/२६३ | नित्यानन्द बलि' यबे ५/१६७ |
| दूर हैते पुरुष करे ५/६५ | नाना रत्नराशि हय ७/१२६ | नित्यानन्द-महिमा-सिन्धु ५/१५७ |
| देखिया ना देखे ३/८५ | नानारूपे विलसये चतुर्व्यूह ५/२३ | नित्यानन्दराय-प्रभुर १/४० |
| देखिलेन, बसियाछेन ७/५८ | ना पारि सहिते, एबे ७/५० | नित्यानन्द-स्वरूप पूर्वे ५/१४९ |
| देवगणे ना पाय याँहार ५/११४ | नाम-प्रेममाला गाँथि ४/४० | नित्यानन्द-स्वरूपेर ५/१९३ |
| 'देवी' कहि द्योतमाना, ४/८४ | नाम बिना कलिक़ाले ३/९९, ७/७४ | निन्दक, पाषण्डी, यत ७/२९ |
| देहकान्त्ये हय तैंहो ३/५६ | 'निमित्तांशे' करे तैंहो ६/१७ | |
| देहे आत्मबुद्धि-हय ७/१२३ | नाम लैते लैते मोर ७/७७ | निरन्तर कहे शिव ६/७८ |
४६६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
निरन्तर-प्रभुर ]
निरन्तर कृष्णनाम ७/९५ निरन्तर देखि सबार ६/९४ निरन्तर सदैन्ये ३/१०० निरुपाधि प्रेम याँहा, ४/२०० निरवधि गुण गान, अन्त ५/१२१ निर्विशेष ज्योतिर्बिम्ब ५/३७ निर्विशेष-ब्रह्म सेइ ५/३८ निर्मल, उज्ज्वल, शुद्ध ४/२०९ निःशङ्के कहिये, तार ४/२३७ निश्वास सहिते हय ५/६८ निषेध करिते नारे, ५/१५१ नृत्यकाले परि' ३/४६ नैहाटि-निकटे ५/१८१ 'न्यग्रोधपरिमण्डल' ३/४३
प पञ्चतत्त्व अवतीर्ण चैतन्येर ७/४ पञ्चतत्त्व-एक वस्तु ७/५ पञ्चतत्त्व लञा करेन ७/४ पञ्चतत्त्वेर विचार किछु ६/११७ पञ्चमपुरुषार्थ सेइ प्रेम ७/१४४ पञ्चविंशति वर्षे कैल ७/३४ पञ्चम पुरुषार्थ-प्रेमानन्द ७/८५ पञ्चरूप धरि' करेन ५/८ पञ्चाशत कोटि-योजन ५/११९ पट्टवस्त्र शिरे, पट्टवस्त्र ५/१८५ पडुया, पाषण्डी, कर्मी ७/३६ परकीयभावे अति रसेर ४/४७ परम ईश्वर कृष्ण २/१०६ परमप्रेयसी लक्ष्मी हृदये ६/४५ परव्योम-मध्ये करि' ५/२६ परव्योमेते वैसे नारायण २/२३ परव्योमे नारायण २/७१ परस्पर बाड़े, केह ४/१९३
परस्पर वेणुगीते हरये ४/२५१ परिणाम-वादे ईश्वर ७/१२२ परिभाषारूपे इहार २/५९ पाँचे मिलि' लूटे प्रेम ७/२१ पागल हइलाङ आमि, ७/८० पात्रापात्र-विचार नाहि ७/२३ पाद-प्रक्षालिया बसिला ७/५९ पायेते नूपुर बाजे, कण्ठे ५/१८ पारिषदगण एक १/६४ पारिषदगणे देखि' सब ५/१९१ पालयिता विष्णु,-ताँर ५/१११ पाषण्डदलनवाना ३/७५ पिता माता गुरु ३/९३, ४/२७१, ६/८० पिता-माता बालकेर २/३३ पृच्छिल, — “तोमार नाम ७/६६ पुनः पुनः पियाइया हय ७/२२ पुनरपि श्वास यबे प्रवेशे ५/६९ पुरीषेर कीट हैते मुञि ५/२०५ पुरीसह सर्वलोक हैल ७/१५५ पुरुष ईश्वर ऐछे द्विमूर्त्ति ६/१५ पुरुष-नासाते यबे बाहिराय ५/६८ 'पुरुषेर अंश' पाछे २/८० पुरुषेर लोमकूपे ब्रह्माण्डरे ५/७० पुषिल, धरिल प्रेम ३/३३ पूर्णज्ञान पूर्णानन्द २/८ 'पूर्णतत्त्व' याँरे कहे २/२४ पूर्ण भगवान् अवतरे ४/१० पूर्ण भगवान् कृष्ण ३/५ पूर्णानन्दमय आमि ४/१२२ 'पूर्णानन्द-रसस्वरूप सबे ४/२३८ पूर्वपक्ष कहे, —तोमार २/७१ पूर्व-प्रेमभाण्डारेर मुद्रा ७/२० पूर्वे करियाछि एइ ६/१०८
पूर्वे व्रजे कृष्णेर त्रिविध ४/१९२ पूर्वे यैछे कृष्णके केहो ५/१२८ पूर्वे यैछे कैल सर्व ६/२६ पूर्वे येन तिनभावे व्रजे ५/१३५ पूर्वे येन पृथिवीर ४/७ पृथिवीते अवतरि' ३/२८ पृथिवी धरेन येइ शेष ६/९३ पृथ्वी यैछे घटकुलेर २/३७ पौगण्ड सफल कैल ४/१९३ प्रकटिया देखे ३/९५ प्रकाशविशेषे तँह २/१० प्रकाशानन्द-नामे संन्यासी ७/६२ प्रकृति-कारण, यैछे ५/६१ प्रकृतिर पार 'परव्योम' ५/१४ प्रकृति सहिते ताँर उभय ५/८६ 'प्रणव' महावाक्य-ताहा ७/१३० 'प्रणव' से महावाक्य ७/१२८ प्रत्यक्ष ताँहार ३/५८ प्रत्यक्षे देखह नाना ३/८४ प्रथमलीलाय ताँर ३/३२ प्रथमे करेन गुरुवर्गेर ३/९२ प्रथमे करेन सबार ३/९३ प्रभावे आकर्षिल सब ७/६१ प्रभावे देखिये तोमा ७/७० प्रभु कहे, —“आमि हइ ७/६४ प्रभु-आज्ञा हैल ५/१९८ प्रभु कहे, “वेदान्त सूत्र ७/१०६ प्रभु कहे, —“शुन, श्रीपाद ७/७१ प्रभुके कहिल किछु ७/६२ प्रभुके देखिते आइसे ७/१५४ प्रभु-गुरु करि' माने ५/१४७ प्रभु यबे या'न विश्वेश्वर ७/१५७ प्रभुर उपाङ्ग-श्रीवासादि ६/३७ प्रभुर कृपाते सुखे ५/१९९
पद्य-सूची | ४६७
[ प्रभुर-भिक्षा प्रभुर प्रशंसा करे सब ७/१५४ प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' ७/९९ प्रभु हासि' निमन्त्रण कैल ७/५६ प्राकृत करिया माने ७/११५ प्राकृत चिन्तामणि ताहे ७/१२५ प्राकृताप्राकृत-सृष्ट्ये २/३६ प्राकृत-वस्तुते यदि ७/१२७ प्राभव-वैभव-रूपे २/९७ प्रिया यदि मान करि' ४/२६ प्रीतिविषयसुखे ४/२०० प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रय ४/१९९ प्रेम-नाम प्रचारिते ४/५ प्रेमनेत्रे देखे ताँर ५/२१ प्रेमभक्ति शिखाइते आपने ४/९९ प्रेमरस आस्वादिब ४/२६४ प्रेमरस-निर्यास करिते ४/१५ प्रेमवन्याय डुबाइल जगत्नेरे ७/२६ प्रेमसेवा परिपाटी ४/२११ प्रेमार स्वभावे करे चित्त ७/८७ प्रेमार स्वभावे भक्त हासे ७/८८ प्रेमा हैते कृष्ण हय ७/१४५ प्रेमा हैते पाय कृष्णेर ७/१४५ प्रेमे का'रे वंशी मारे ५/१६४ प्रेमे मत्त अङ्ग दाहिने ५/१८९ प्रेमे मत्त नित्यानन्द ५/२०८ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम ४/४९ ब बलदेव देखि' ये ना ५/१७० बसाइला सभामध्ये ७/६५ बसिया करिला किछु ७/६० बहिर्वस्तु घट-पट १/९७ बहु कान्ता बिना नहे ४/८० बाल्य-पौगण्ड-धर्म २/९८ बाहु तुलि' प्रभु बले ७/१५९ बाहु तुलि' हरि ३/६१ बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप ४/७७ बुझिबे रसिक भक्त ४/२३२ बुद्धिर गोचर नहे ४/१८५ बृहद्वस्तु 'ब्रह्म' कहि ७/१३८ ब्रह्म-आत्मरूपे ताँरे २/२६ ब्रह्म, आत्मा २/६, ६५ ब्रह्म-ज्ञानादिक सब ४/६७ ब्रह्म, परमात्मा २/१० 'ब्रह्म'-शब्दे मुख्य अर्थे ७/१११ ब्रह्मसायुज्य-मुक्तेर ताँहा ५/३१ ब्रह्मा कहे—'जले २/४८ ब्रह्माण्ड-प्रमाण पश्चाशत् ५/९७ ब्रह्माण्डवृन्देर आत्मा २/५० ब्रह्माण्डे प्रकाश ताँर ५/१९ ब्रह्मादि आनन्द यार नहे ७/८५ ब्रह्मानन्द तार आगे ७/९७ ब्रह्मा बलेन,-'तुमि किना २/३५ ब्रह्मा, विष्णु, शिव १/६७ ब्रह्मार एकदिने तिँहो ३/६ भ भक्त-अवतार तँहि ६/११० 'भक्त-अवतार' ताँर ७/१३ 'भक्त-अवतार'-पद ६/९५ भक्त-अभिमान मूल ६/८६ भक्त आदि क्रमे १/८२ भक्तगण-कोकिलेर ४/२३४ भक्त बलि' अभिमान ६/८७ भक्तभाव अङ्गीकरि' ६/१०३, १०७ भक्तभाव बिनु नहे ताहा ६/१०६ भक्तभावमय ताँर शुद्ध ७/१० भक्तभाव हैते अधिक ६/१०९ भक्तभावे करे ताँर ६/१०१ भक्तवत्सल, सुशील ३/४५ भक्त सहिते हय १/८१ 'भक्तस्वरूप' ताँर ७/१२ भक्ति-उपदेश बिनु ६/२८ भक्तिगन्ध नाहि ३/९६ भक्ति प्रचारिया सब ६/९२ भक्तिबिना जगत्नेर ३/१४ भक्तिभावे शिरे धरि ४/२२८ भक्तियोगे भक्त पाय २/२५ भक्तिर विरोधी कर्म ३/६० भक्तिरसे भरिल ३/३२ भक्तेर इच्छाय ३/१०९, १११ भक्तेर हृदये १/६१ भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये ७/१४१ भगवानेर गुण कहे, ५/१२२ भगवानेर भक्त यत १/३८ भगवानेर सत्ता हय ४/६४ 'भवेत्' क्रिया विधिलिङ्; ४/३५ भाइके भर्त्सिनु मुञि ५/१८० भागवत, भारतशास्त्र ३/८३ 'भागवतसन्दर्भ'-ग्रन्थेर ३/७९ भागवतेर सार एइ-बले ७/९३ भाग्ये सेइ प्रेमा तोमाय ७/८६ भाव आस्वादिते दोँ हे ४/५७ भावग्रहणेर हेतु करिल ४/५३ भावुक सब सङ्गे लजा ७/६८ भावुक हइया फेरे ७/४२ भावेर परमकाष्ठा ४/६८ भारहरण-काल ताते ४/९ भाल हैल, पाइले तुमि ७/९१ भिक्षा करि' महाप्रभु ७/१५२ भिक्षा करिलेन सबे ७/१५१ ४६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
भितरे-याँर ]
| भितरे प्रवेशि' देखे सब ५/९५ | माया-अंशे कहि तारे ५/६२ | मोर भ्रमे तमालेर करे ४/२५१ |
| भितरे सूर्येर रथ-आदि ५/३४ | मायाकार्य नहे—सब ३/७० | मोर भ्राता-सने ताँर ५/१७२ |
| भिन्न भिन्न लिखियाछि १/१०९ | मायाद्वारा सृष्टि करे २/४९ | मोर वंशी-गीत आकर्षये ४/२४४ |
| भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा २/८६, ७/१०७ | 'माया'—निमित्त-हेतु ६/१४ | मोर रूपे आप्यायित ४/२४३ |
| भ्रममय चेष्टा, आर ४/१०७ | मायार सम्बन्ध नाहि ६/२३ | मोरे अनुग्रह कर ७/५५ |
| म | मायावादिगण ताँरे ७/४० | मो-हेन अधमे दिला ५/२१० |
| मङ्गल-चरित्र सदा ६/१२ | मायावादी, कर्मनिष्ठ ७/२९ | मौन धरि' रहे लक्ष्मण ५/१५१ |
| मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर ५/७८ | माया यैछे दुइ अंश ६/१४ | य |
| मथुराते पाठाइल रूप ७/१६४ | मायाशक्ति बहिरङ्गा २/१०२ | यत यत पिये, तृष्णा ७/२१ |
| मथुरा देखिया पुन: ७/४४ | मायाशक्ति रहे कारण ५/५७ | यत यत प्रेमवृद्धि करे ७/२८ |
| मथुरा-द्वारकाय निजरूप ५/२३ | माया हैते जन्मे तबे ५/६६ | यतेक पालाञाछिल ७/३५ |
| मन्त्र गुरु आर १/३५ | मायिक भूतेर तथि ५/५३ | यत्ने आस्वादिते नारि ४/१३४ |
| मन्मथ-मन्मथरूपे ५/२१३ | मीनकेतन रामदास हय ५/१६१ | यथेष्ट विहरि' कृष्ण ३/१३ |
| मन्माधुर्य, राधार प्रेम ४/१४२ | मुख्य तिनशक्ति २/१०३ | यद्यपि आमार गन्धे ४/२४५ |
| महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो ५/५६ | मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल ७/१३१ | यद्यपि आमार गुरु १/४४ |
| महदनुभव, याते सुदृढ़ ६/५३ | मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ ७/१०८ | यद्यपि आमार रसे ४/२४६ |
| महातेजोमय वपु कोटि ७/६० | मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु ७/१३७ | यद्यपि आमार स्पर्श ४/२४७ |
| महापुरुषावतारी तेंहो ५/७५ | मुख्यार्थ व्याख्या कर ७/१३७ | यद्यपि करिल रस ४/१९९ |
| महाप्रेममय तिँहो बसिला ५/१६३ | 'मुञ्जि ताँर भक्त'—मने ६/९१ | यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर ५/७८ |
| महाभावस्वरूपा श्रीराधा ४/६९ | मुञ्जि ये चैतन्यदास ६/४४ | यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ा ५/२९ |
| महावाक्ये करि' ७/१३० | 'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि ७/७२ | यद्यपि तिनॆर माया २/५४ |
| महाविष्णुर अंश—अद्वैत ६/२५ | मूर्ख संन्यासी निज-धर्म ७/४२ | यद्यपि निर्मल राधार ४/१४० |
| महाविष्णु सृष्टि करेन ६/७ | मूर्च्छित हइया मुञ्जि ५/१९७ | यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर २/१०५ |
| महासङ्कर्षण—सब जीवेर ५/४५ | मूढ़लोक नाहि जाने ६/१०२ | यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो ५/८५ |
| महिषीगण प्राभव ४/७८ | मूल एक दीप २/८९ | यद्यपि सांख्य माने ६/१८ |
| महिषी-विवाहे यैछे १/७० | मूल भक्त-अवतार ६/११० | यबे येइ भाव उठे ४/११० |
| माता, पिता, स्थान ४/६५ | मृगमद, तार गन्ध ४/९७ | याते नित्यानन्दतत्त्व जाने ५/१२ |
| माता मोरे पुत्रभावे ४/२४ | मो-अधमे दिल ५/२१७ | यार आगे तृणतुल्य चारि ७/८४ |
| माधव-ईश्वर-पुरी ३/९४ | मो-पापिष्ठे आनिलेन ५/२१० | याँर अंश करि' करे ५/१०६ |
| माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य ६/३९ | मो-विषये गोपीगणेर ४/२९ | याँर एकफणे रहे सर्षप ५/११९ |
| माधुर्य प्रकाशि' करेन ५/२१९ | मोर चित्त-घ्राण हरे ४/२४५ | याँर द्वारा कैल प्रभु ६/३४ |
| माधुर्य बाड़ाय ४/१९८ | मोर नाम लय येइ ५/२०६ | याँर ध्यान निज-लोके ५/२२१ |
| मोर नाम शुने येइ ५/२०६ | याँर पदधूलि करे उद्धव ६/६४ | |
| मोर पुत्र, मोर सखा, ४/२१ |
पद्य-सूची | ४६९
[ याँर-रूपे याँर प्राणधन-नित्यानन्द ५/२२९ | युग-मन्वन्तरावतार ४/११ | राङ्गा यष्टि हस्ते दोले ५/१९० याँर प्रेमगुणे कृष्ण ६/६९ | ये आगे पड़ये, तारे ५/२०९ | रात्रे प्रलाप करे स्वरूपेर ४/१०९ याँर भगवत्ता हैते अन्येर २/८८ | येइ कहे, से पाषण्डी ३/७८ | राधाकृष्ण एक आत्मा, ४/५६ याँर भाव-शुद्धसख्य ६/७४ | येइ जन कृष्ण देखे ४/१५४ | राधाकृष्ण ऐछे सदा एकइ ४/९८ याँर माधुरीते करे लक्ष्मी ५/२२३ | येइ जपे, तार कृष्णे ७/८३ | राधाकृष्ण-भक्ति बिने ५/२२९ याँर हय, ताँर नाहि २/९६ | येई याँहा पाय, ताँहा ७/२३ | राधा-पूर्णशक्ति, कृष्ण ४/९६ याँ-सबार ऊपरे कृष्णेर ६/६५ | येइ येइ रूपे जाने, सेइ ५/१३२ | राधाप्रेम तैछे सदा ४/१२७ याँ-सबा लञा ७/१८, ७/१९ | “ये किछु कहिले तुमि ७/१०० | राधा-प्रेमा विभु-यार ४/१२८ याँहाके त' कला कहि ५/७५ | ये नयन देखिते अश्रु ५/१६५ | राधाभाव अङ्गीकरि' ४/२६८ याँहा याँहा नेत्र पड़े ४/८५ | ये ना माने, तार ६/८३ | राधा-भाव-कान्ति दुइ ४/९९ याँहार कृपाते पाइनु ५/२०० | ये पुरुष सृष्टि-स्थिति ६/८ | राधार अधर-रसे आमा ४/२४६ याँहार छटाय नाशे ३/५८ | ये-प्रकारे हय ४/१९७ | राधार वचने हरे आमार ४/२४४ याँहार तुलसीदले, याँहार ६/३३ | ये बले आमारे करे ४/१२३ | राधार दर्शने ४/२४३, २५० याँहार प्रकाशे सर्व १/८७ | येबा अज्ञे करे ताँरे ५/२२५ | राधासह क्रीड़ा रस ४/२१७ याँहार महिमा नहे ६/६ | येबा केह अन्य जाने, ४/१६१ | राधिका करेन कृष्णेर ४/९४ याँहार हुङ्कारे कैल ६/१११ | ये यैछे भजे ४/१७७ | राधिकादि लञा कैल ४/११४ याहार श्रवणे मन ४/१५७ | ये लागि कहिते भय, ४/२३६ | राधिकार प्रेम-गुरु, ४/१२४ याँहा हइते विघ्ननाश १/१०३ | यैछे कहि,–एइ विप्र २/७७ | राधिकार प्रेमे आमा ४/१२२ याँहा हैते पाइनु रघुनाथ ५/२०२ | यैछे तैछे कहि किछु ७/१७० | राधिकार भावकान्ति ४/२६७ याँहा हैते पाइनु रूप ५/२०१ | यैछे बलदेव १/७८ | राधिकार भाव-वर्ण ४/२७१ याँहा हैते पाइनु श्रीराधा ५/२०४ | यैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि १/७८ | राधिकार भावमूर्त्ति प्रभुर ४/१०६ याँहा हैते विश्वोत्पत्ति, ५/४६ | योगमाया करिबेक ४/२९ | राधिकार भाव यैछे ४/१०८ यार एक कणा ५/५४ | | राधिकार रूप-गुण ४/२४८ यार ये लक्षण ताहा २/६९ | र | राधिकार स्पर्शे आमा ४/२४७ यारे यैछे नाचाय, से ५/१४२ | रत्नमण्डप, ताहे ५/२१८ | राधिका-स्वरूप हइते ४/१४५ याहा वइ गुरुवस्तु नाहि ४/१२९ | रस आस्वादिते आमि ४/२६४ | राधिका हयेन कृष्णेर ४/५९ याहा वइ सुनिर्मल ४/१३० | रस आस्वादिते तत्त्व ७/५ | राम-लक्ष्मण-कृष्ण ५/१५३ याहा हैते कृष्णभक्ति १/९२ | रसमय-मूर्त्ति कृष्ण ४/२२२ | रामेर चरित्र सब ५/१५० याहा हैते हय १/२४, ४/५८ | रसिक-शेखर कृष्ण ४/१६ | रासविलासी साक्षात् ५/२१२ युगधर्मकाल हैल ४/३८ | रसिकशेखर कृष्णेर ४/१०३ | रासादिक-लीला प्रभु ५/२२० युगधर्म नाम-प्रेम कैल ४/२२० | रहिते नाहिक स्थान ५/९५ | रासादि-लीलाय तिन ४/११५ युगधर्मप्रवर्त्तन नहे ४/३७ | रागमार्ग भक्ति लोके ४/१५ | रासादि-विलासी, व्रज ७/८ युगधर्म-प्रवर्त्तन हय ३/२६ | रागमार्गे भक्त भक्ति करे ४/२६५ | रुद्ररूप धरि' करे जगत् ५/१०५ युगधर्म प्रवर्त्तामु ३/१९ | रागमार्गे भजे येन ४/३३ | रूपे, गुणे, सौभाग्ये ४/२१४ ४७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
text लक्षणा-शुद्ध ]
ल विधि-भक्त्ये व्रजभाव ३/१५ वैभवगण येन ताँर ४/७७
विधि, भव, नारदादि ६/४६ वैष्णवेर गुरु तेँहो ६/२९
लक्षणा करिले स्वतः ७/१३२ ‘विधेय’ कहिये तारे २/७६ व्यक्त करि’ भागवते ३/५० लक्ष लक्ष लोक ७/१५६, १५७ विप्र-अनुवाद, इहार २/७७ व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी २/५१ लक्ष्मीगण ताँर वैभव ४/७८ विप्र बलि’ जानि, तार २/७८ ‘व्यास भ्रान्त’-बलि’ ७/१२१ लघुभ्राता हैया करे रामेर ५/१४९ विरुद्धार्थ कह तुमि २/८७ व्यासरूपे कैल ताहा ७/१०६ लज्जा, धैर्य, देहसुख ४/१६७ विशुद्ध निर्मल प्रेम ४/१६२ व्यासेर सूत्रेते कहे ७/१२१ लीला-अन्ते सुखे इँहार ४/२५६ विश्व-सृष्टि करे ‘निमित्त’ ६/१५ व्रजवधूगणेर एइ भाव ४/४८ लीलारस आस्वादिते ४/९८ विषयजातीय सुख आमार ४/१३३ व्रज बिना इहार ४/४७ लीलार सहाय लागि’ ४/८० विष्णुद्वारे कृष्ण करे ४/१३ व्रजाङ्गनारूप आर ४/७५ लुकाइते नारे कृष्ण ३/८९ विष्णुनिन्दा आर नाहि ७/११५ व्रजे क्रीड़ा करे ३/१२ लुटिया, खाइया, दिया ७/२४ विष्णुरूप हञा करे ५/१०४ व्रजे गोपीगण आर १/८० लोकगति देखि’ ३/९७ विस्तारे ना वणि १/१०५ व्रजेन्द्रनन्दन याँते १/८० लोकधर्म, वेदधर्म ४/१६७ वृन्दावन जाइते प्रभु ७/४० व्रजे ये विहरे १/८५ लोक निस्तारिया प्रभुर ७/१६० वृन्दावन-पुरन्दर ५/२१२ व्रजेर निर्मल राग ४/३३ लोके उपदेशे,—‘हओ ६/५० वृन्दावने पाठाइला ७/१६० व्रजेर सहिते हय ३/१० लौकिक-लीलाते धर्म ६/४० वृन्दावने वैसे यत ५/२२८ लौह आर हेम यैछे ४/१६४ वृन्दावने याह,—ताँहा ५/१९५ श वृन्दावने योगपीठे ५/२१८ व वेदगुह्य कथा एइ ५/१५९ शक्ति-एइ छयरूपे १/३२ वेद, भागवत, उपनिषद् २/२४ शक्ति सञ्चारिया तारे ५/५९ वक्तव्य-बाहुल्य १/१०५ “वेदमय-मूर्ति तुमि ७/१४८ शक्त्यावेश-अवतार १/६६, ६७ वस्तुतः परिणाम-वाद ७/१२३ वेदस्तुति हैते हरे ४/२६ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म ५/२८ वस्तुनिर्देश, आशीर्वाद १/२२ वेदान्त ना शुन केने ७/१०१ शतमुखे बलि, तबु ना ४/२५५ वस्तु प्रकाशिया करे १/८८ वेदान्त-पठन, ध्यान ७/६९ शरीर-विशेष ताँर ६/१० वाञ्छा भरि’ आस्वादिल ४/११४ वैकुण्ठ-बाहिरे एक ५/३२ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति ३/४५ वाक्ये कहे, ‘मुञ्जि चैतन्येर ६/९१ वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ५/५१ शास्त्रविरुद्धार्थ कभु ना २/७३ वात्सल्य-आवेशे कैल ४/११३ वैकुण्ठ-बाहिरे हय ५/३१ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ ६/१०२ वाम-पार्श्वे श्रीराधिका ५/२२० वैकुण्ठ बेड़िय़ा एक आछे ५/५२ श्वास-सह ब्रह्माण्ड ५/६९ वाराणसीपुरी आइला ७/१५५ वैकुण्ठादि-पुरे याँर ५/२२२ शिक्षागुरुके त’ जानि १/४७ वासुदेव-सङ्कर्षण ५/२४, ४१ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ४/२८ शिक्षागुरु हय कृष्ण १/५८ विचार करिये यदि ४/१४५ वैकुण्ठके याय चतुर्विध ३/१७ शिङ्गा वांशी बाजाय केह ५/१९२ विचार करेन, लोकेर ३/९७ वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल ५/५३ शिशु वत्स हरि’ २/३१ विचारि’ देखिये यदि ४/२४९ ‘वैवस्वत’-नाम एइ ३/९ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण ३/३७ विचारिते एई श्लोक ३/१०२ शुद्धवात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान ६/५५ विजातीय-भावे नहे ४/२६६
पद्य-सूची | ४७१
[ शुद्ध-सबे
| 'शुद्धभक्त'-तत्त्वमध्ये ताँ ७/१६ | श्री-भू-नीला-शक्ति ५/२८ | ५/१३२ |
| शुद्धभावे करिब ३/१०० | श्रीमदनगोपाल-श्रीगोविन्द ५/२११ | सकल सम्भवे ताँते २/१११, |
| शुद्धसत्त्वमय यत वैकुण्ठ ५/४३ | श्रीराधा-मदनमोहन प्रभु ५/२१६ | ५/१२७ |
| शुन उद्धव, सत्य, कृष्ण ६/५७ | श्रीराधा-ललिता-सङ्गे ५/२१३ | सङ्कर्षण-अवतार-कारण ६/८९ |
| शुनि' चमत्कार हैल ७/१३४ | श्रीराधिका हैते ४/७५ | सखा शुद्धसख्ये करे ४/२५ |
| शुनि' देखि' आनन्दित ७/१५३ | श्रीरामेर दास्य तिँहो ६/८८ | सच्चिदानन्द, पूर्ण, कृष्णेर ४/६१ |
| शुनिते ना पारि, फाटे ७/५१ | श्रीरूप-कृपाय पाइनु ५/२०३ | सज्जन, दुर्जन, पङ्गु ७/२६ |
| शुनिले खण्डिबे चित्तेर १/१०७ | श्रीरूप, सनातन, भट्ट १/३६ | सत्य एइ हेतु ४/६ |
| शुनिले जानिबे सब १/१०९ | श्रीवास, हरिदास, रामदास ६/४८ | सत्य-त्रेता-कलिकाले ३/३७ |
| 'शेष'-रूपे करे कृष्णेर ५/१० | श्रीवासादि, आर यत ५/१४४ | सत्य, त्रेता, द्वापर ३/७ |
| शेषलीलाय धरे नाम ३/३४ | श्रीवासादि परिषद ३/७४ | सदा आमा नाना नृत्य ४/१२४ |
| शेषलीलाय प्रभुर कृष्ण ४/१०७ | श्रीवासादि यत कोटि ७/१६ | सनकादि भागवत शुने ५/१२२ |
| शेष-शयन-जले करिल ५/९९ | सनातन-कृपाय पाइनु ५/२०३ | |
| श्याम-चिक्कण कान्ति, ५/१८४ | ष | सनातन गोसाञि आसि' ७/४७ |
| षड्विधैश्वर्य ताँहा सकल ५/४४ | सन्धिनी सार अंश ४/६४ | |
| श्र | षड्विधैश्वर्यपूर्ण, परतत्त्व ७/१३८ | संन्यास-आश्रम प्रभु ७/३३ |
| श्रवणादि भक्ति-कृष्ण ७/१४१ | षडैश्वर्यपूर्ण लक्ष्मीकान्त २/२३ | संन्यास करिया प्रभु कैला ७/३५ |
| श्रवणे, दर्शने आकर्षये ४/१४८ | संन्यासी हइया कर नर्त्तन ७/६८ | |
| श्रीअङ्ग, श्रीमुख येइ ३/६३ | स | संन्यासी हइया करेन ७/४१ |
| श्रीकृष्णचैतन्य आर प्रभु १/८७ | सङ्कर्षणेर विभूति सब ५/४४ | सब अवताररे करि २/६८ |
| श्रीकृष्णचैतन्य गोसाञि ४/२२२, | सङ्कीर्त्तन प्रचारिया सब ६/११२ | सब अण्डे प्रवेशिला ५/९४ |
| ४/४२५ | सङ्कीर्त्तन-प्रवर्त्तक ३/७६ | सब निस्तारिते करे ७/३८ |
| श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु स्वयं १/४२ | सङ्कीर्त्तन-यज्ञे ताँरे ३/७६ | सब रस हैते शृङ्गारे ४/४४ |
| श्रीकृष्णचैतन्यरूपे कैल ४/१०० | संन्यासीर सङ्गे नाहि ७/४६ | सब श्रोतागणेर करि २/११६ |
| श्रीकृष्णचैतन्यरूपे सर्व ६/१०७ | संन्यासीरे कृपा लागि' ७/५६ | सब श्रोता-वैष्णवेरे १/३० |
| श्रीकृष्ण जानाये सब ३/३४ | सकल जगते मोरे ३/१५ | सबाकारे कृष्णनाम ७/१५० |
| श्रीगोलोक, श्वेतद्वीप ५/१७ | सकल जीवेर तिँहो हुये ५/११२ | सबा नमस्करि' गेला पाद ७/५९ |
| श्रीगोविन्द बसियाछेन ५/२१९ | सकल वेदेर हय ७/१३९ | सबा निस्तारिते प्रभु कृपा ७/३८ |
| श्रीचैतन्य-नित्यानन्द १/१०८ | सकल वैष्णव ताँर ५/१६३ | सबार आश्रय कृष्ण २/१०४ |
| श्रीचैतन्य-सेइ कृष्ण ५/१५६ | सकल वैष्णव, शुन १/३१ | सबा लञा निज-कार्य ५/१४५ |
| श्रीजीव, गोपालभट्ट १/३६ | सकल संन्यासी कहे ७/१३५, | सबा हैते सकलांशे ६/६८ |
| श्रीदामादि ब्रजे यत ६/६१ | १४७ | सबे आसि' कृष्ण-अङ्गे ४/१२ |
| श्रीबलराम गोसाञि मूल ५/८ | सकल संन्यासी मुञि ७/५४ | सबे एड़ाइल मात्र काशीर ७/३९ |
| श्रीभागवत-आदि शास्त्रेर ७/४८ | सकल सम्भवे कृष्ण २/११५, | सबे परिषद, सबे ५/१४५ |
४७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सम्प्रदाय-सेइ ] सम्प्रदाय-अनुरोधे तत्त्व ७/१३६ | सहस्र विस्तीर्ण याँर ५/११८ | सेइकाले श्रीअद्वैत करेन ४/२७० सम्बन्ध, अभिधेय ७/१४६ | सहाय करेन ताँर लइया ६/११ | सेइ कृष्ण अवतारी २/१०९ सम्यक् आस्वादिते नारे ४/१५८ | साक्षात् कन्दर्प, यैछे ५/१८४ | सेइ कृष्ण अवतीर्ण २/९, सर्व-अवतार-बीज ५/८२, | साक्षात् व्रजेन्द्रसुत ५/२२५ | ६/८२, ७/९ ५/१०१ | साताइश चतुर्युग गेले ३/९ | सेइ कृष्ण-नवद्वीपे ५/६ सर्व अवतार-लीला ५/१३३ | साधनभक्ति हैते हय ७/१४२ | सेइ कृष्णनाम कभु ७/९६ सर्व-अवतारी कृष्ण ५/४ | साधिलेन निजवाञ्छा ४/५० | सेइकाले एक विप्र ७/५२ 'सर्वकान्ति'-शब्देर ४/९४ | सावरणे प्रभुरे १/४३ | सेइ क्षणे वृन्दावने करिनु ५/१९९ सर्वग, अनन्त, ब्रह्म ५/१५ | साम्प्रदायिक संन्यासी तुमि ७/६७ | सेइ गीत-श्लोके सुख ४/११० सर्वग, अनन्त, विभु ५/१८ | सायुज्य ना लय भक्त ३/१८ | सेइ गोपीगण-मध्ये ४/२१४ सर्वगुणखनि कृष्णकान्ता ४/६९ | सायुज्येर अधिकारी ताँहा ५/३८ | सेइ गोविन्द भजि आमि २/१६ सर्वचतुर्व्यूह-अंशी, तुरीय ५/२४ | सार्टि, सारूप्य आर ३/१८ | सेइ चारियुगे दिव्य ३/७ सर्वत्याग करि करे ४/१६९ | सालोक्य-सामीप्य-सार्टि ५/३० | सेइजन आह्लादिते पारे ४/२४० सर्वत्र मागिये १/२५ | सिंहग्रीव, सिंहवीर्य ३/३० | सेइ जले कैल अर्थ ५/९६ सर्वदा ईश्वर-तत्त्व ५/८८ | 'सिद्धलोक' नाम तार ५/३३ | सेइ त' अंशरे कहि ५/८१ सर्वपालिका, सर्व ४/८९ | सिद्धान्त बलिया चित्ते २/११७ | सेइ त' अनन्त, याँर ५/१२५ सर्व वेदसूत्रे करे कृष्णेर ७/१३१ | सुखवाञ्छा नाहि ४/१८६ | सेइ त' 'अनन्त' 'शेष' ५/१२० सर्वभावे करिल कृष्ण, ४/२६९ | सुवर्ण-कुण्डल कर्णे ५/१८६ | सेइ त' कारणार्णवे ५/५५ सर्वमन्त्रसार नाम, -एइ ७/७४ | सुवलित हस्त, पद ५/१८४ | सेइत' गोविन्द २/२२ सर्व-यज्ञ हैते ३/७७ | सूर्य चन्द्र बाहिरेर १/९७ | सेइ त' पुरुष याँर 'अंश' ५/९१ सर्वरूपे आस्वाद्ये कृष्ण ५/११ | सूर्यचन्द्र हरे यैछे १/८८ | सेइ त' पुरुष अनन्त ५/९४ सर्वलक्ष्मीगणेर तिँहो ४/९० | सूर्य जिनि' मणिगण करे ५/११८ | सेइ त' भक्तेर वाक्य २/१११ सर्वलक्ष्मीगणेर शोभा ४/९२ | सूर्यमण्डल येन बाहिरे ५/३४ | सेइ त' मायार दुइविध ५/५८ सर्व-सौन्दर्य-कान्ति ४/९२ | सूर्य येन सविग्रह २/२५ | सेइ त' सुमेधा ३/७७ सर्वांश आसि' तबे ५/१३१ | स्थितिकर्त्ता विष्णु ४/८ | सेइ तिनजनेर तुमि २/५६ सर्वाश्रय ईश्वरेर करि ७/१२९ | सृष्टिलीला-कार्य करे ५/९ | सेइ तिन जलशायी २/५० सर्वाश्रय, सर्वाद्भुत, ऐश्वर्य ५/४७ | सृष्टि-स्थिति-प्रलय ५/१०५ | सेइ तिन सुख कभु नहे ४/२६७ सर्वोपरि श्रीगोकुल ५/१७ | सृष्ट्यादि-निमित्ते येइ ५/८१ | सेइ तिनेर अंशी २/५७ सहस्र-चरण-हस्त ५/१०१ | सृष्ट्यादिक सेवा,-ताँर ५/१० | सेइ दुइ एक एबे ४/५७ सहस्रनामे कैल ताँर ३/४७ | से आनन्देर प्रति ४/२०१ | सेइ दुइ जगतेरे १/८६ सहस्र मस्तक ताँर ५/१०० | सेइ अंश लज्ञा ज्येष्ठ ५/१५४ | सेइ दुइ प्रभुर करि १/१०३ सहस्र-वदने करे कृष्ण ५/१२१ | सेइ अपराधे तार ५/२२६ | सेइ दुइ, याँर अंश ५/७६ सहस्रवदने येँहो शेष ६/७६ | सेइ अभिमान-सुखे ६/४२ | सेइ द्वारे आचण्डाले ४/४० 'सहस्रवदने' शेष नाहि ५/२३४ | सेह एक जीवेर १/९४ | सेइ द्वारे प्रवर्त्ताइल ४/२२६ पद्य-सूची | ४७३
[ सेइ-ह्लादिनीर सेइ নহে, याते कर्त्ता-हेतु ५/६२ सेइ नारायण कृष्णेर २/२८ सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग ६/२१ सेइ नेत्रे अविच्छिन्न बहे ५/१६५ सेइ पश्चतत्त्व मिलि' ७/२० सेइ पद्मनाले हैल चौद्द ५/१०३ सेइ पद्मे हैल ब्रह्मार ५/१०२ सेइ परव्योमे नारायणेर ५/४० सेइ परिकरगण सङ्गे ७/९ सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति ५/८० सेइ पुरुषादि-सबार २/१०५ सेइ पुरुषेर सङ्कर्षण ५/४६ सेइ प्रभु नित्यानन्द ५/१०७, ५/११६ सेइ प्रेमार आमि ४/१३२ सेइ प्रेमार राधिका ४/१३२ सेइभावे कहे—'मुञि ५/१३४ सेइ भावे मत्त प्रभु ४/१०८ सेइभावे सुख-दुःख ४/१०६ सेइ भावे हइ आमि ४/२२ सेइ बन्या ता-सबारे ७/३० सेइ बलराम-गौरसङ्गे ५/११ सेइ बलराम-सङ्गे ५/६ सेइ ब्रह्म गोविन्देर २/१५ सेइ भक्तगण हय १/६४ सेइ भावे अनुगत ताँर ६/८६ सेइभावे निजवाञ्छा ४/२२१ सेइ रस आस्वादिते ४/२२३ सेइ रात्रे प्रभु मोरे ५/१८० सेइ राधाभाव लञा ४/२२० सेइ लिखि, येइ शुनि ६/११३ सेइ विष्णु 'शेष'-रूपे ५/११७ सेइ विष्णु हय याँर ५/११६ सेइ सब अस्त्र ३/७२ सेइ सब महादक्ष धाञा ७/३० सेइ सब लभ्य एइ ५/२३२ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' ७/१४२ सेइ सिंह वसुक ३/३१ सेइ सुखमाधुर्य-घ्राणे ४/२६३ सेइ सुखे मत्त, किछु ६/१०४ सेइ सूत्र-एइ तार कैल ५/२३१ सेइ हैते संन्यासीर फिरे ७/१४९ सेतुबन्ध पर्यन्त कैला ७/१६७ से पुरुषेर अंश-अद्वैत ६/१० से प्रतिज्ञा भङ्ग हैल ४/१७९ से वैष्णवेर पदरेणु ५/२३० से मङ्गलाचरण हय १/२२ से माधुर्य बाड़े ४/१९० सेवक योगाय ताम्बूल ५/१९२ से-सब तोमार अंश २/४८ से सब पाइनु आमि ५/२३२ से से लीला करिब ४/२८ सेह गोविन्देर अंश २/१८ सेहो त' कृष्णेर ४/१८१ सेहो तोमार अंश ३/६९ स्तुति-भक्त्ये करे ताँर ६/४० स्त्री, वृद्ध, बालक, युवा ७/२५ स्थितिकर्त्ता विष्णु ४/८ स्वकीया-परकीया-रूपे ४/४६ स्वगण सहिते चैतन्येर ६/३३ स्वच्छ धौतवस्त्रे ४/१७० स्वजने करये यत्न ४/१६८ स्वतःप्रमाण वेद-प्रमाण ७/१३२ स्वतन्त्र लीलाय दुःख ५/१५० स्वप्नभङ्ग हैल, देखि ५/१९७ स्वामाधुर्य आस्वादिते ६/१०६ स्वमाधुर्य देखि' कृष्ण ४/१३७ स्वमाधुर्ये लोकेर मन ५/२१५ 'स्वयं-भगवत्ता' पिछे २/८२ स्वयं भगवान् २/८, ७०, ८८, १०६, १२०, ७/७ स्वयं भगवानेर कर्म ४/८ स्वयं-भगवानेर कृष्णत्व २/८३ स्वयंरूप कृष्णेर कायव्यूह १/८१ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि ७/१३९ स्वरूप-गोसाञि-प्रभुर ४/१०५ स्वरूप गोसाञि मात्र ४/१६० स्वरूपविग्रह कृष्णेर ५/२७ स्वरूपशक्ति—'ह्लादिनी' ४/५९ स्वसुखार्थ सालोक्य ४/२०४ स्व-स्व-प्रेम-अनुरूप ४/१४३ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु ७/८९ ह हरिध्वनि करे लोक ७/१५९ हस्तमुखनेत्र-अङ्ग ६/३७ हासाय, नाचाय, मोरे ७/८२ हासि, कान्दि, नाचि, गाइ ७/७८ हिरण्यगर्भ, अन्तर्यामी ५/१०६ हिरण्यगर्भे आत्मा २/५१ हीनाचार कर केने, इथे ७/७० हृदये धरये ये चैतन्य ४/२३३ हृदये बाड़ये प्रेम-लोभ ४/१३६ हेनकाले आइल ४/२६९ हेन चित्र-लीला करे ७/१५२ हेन जीवतत्त्व लञा ७/१२० हेन नारायण,-याँर ५/१०७ हेन प्रभु नित्यानन्द, के ५/१२५ हेन ये गोविन्द प्रभु, ५/२२७ हैते पुरुष करे मायाते ५/६५ ह्लादिनी कराय कृष्णे ४/६० ह्लादिनीर द्वारा करे ४/६० ह्लादिनीर सार 'प्रेम' ४/६८ ४७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अक्षज-अभिधा ] शब्दकोश
अ अक्षजज्ञान—इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान अघटन-घटन-पटीयसी—असम्भवको भी सम्भव तथा इसके विपरीत करनेवाली अचिद्वस्तु—जो वस्तु चित् नहीं हो अच्छेद्य—अविभाज्य, जिसका छेदन ना हो सके अच्युत—जो च्युत नहीं हो अज—अजन्मा अजागलस्तन—बकरीके गलेमें लटकनेवाली स्तनके जैसी चीज अज्ञ—ज्ञानरहित अणिमा—योगकी आठ सिद्धियोंमेंसे एक, जिसमें योगी अणुके समान सूक्ष्म हो जाता है अतिक्रम—मर्यादा, कर्त्तव्य, अधिकार आदिका उल्लंघन अतिक्रान्त—अतीत, क्रमका उल्लंघन किया हुआ अतिशय—अत्यधिक अतिशयोक्ति—किसी बातका बढ़ा-चढ़ाकर कहना अत्याज्य—नहीं त्यागने योग्य अत्युत्तम—अति उत्तम अदृष्ट—न देखा हुआ, अज्ञात अधिदैव—आराध्य देवता अधिरूढ़—बढ़ा हुआ अधिष्ठान—आधार, आश्रय अनभिज्ञ—न जाननेवाला अनवरत—निरन्तर अनायास—बिना कष्टके
अनिर्वचनीय—वचनसे ना वर्णन करने योग्य अनुक्षण—निरन्तर अनुगत—अनुगामी, अधीन अनुवर्त्तन—अनुसरण, अनुगमन अनुष्ठान—आरम्भ करना, कोई धार्मिक कृत्य अनुसन्धान—खोज, प्रयत्न अन्तर्भुक्त—किसीके अन्तर्गत होना अन्तर्भूत—अन्तर्गत अन्त्य—अन्तका, आखिरी अन्यतम—बहुतोंमें से एक, सर्वश्रेष्ठ अन्वय—वाक्यमें शब्दोंका परस्पर सम्बन्ध, मेल अन्वेषण—खोज, ढूँढना अपकार—अहित अपटुता—अकुशलता अपरा—जो श्रेष्ठ ना हो अपरिमित—अगणित, अनगिनत अपवर्ग—मोक्ष, निर्वाण अपूर्व—जो पहले ना हुआ हो, अनूठा अप्राकट्य—अप्रकट होना अप्राकृत—अलौकिक अप्रारब्ध—वैसा फल जो वर्तमान शरीरमें न भोगा जा रहा हो अप्रासङ्गिक—प्रस्तुत विषयसे असम्बद्ध, प्रसङ्गके विरुद्ध अबाध—बाधारहित अभयत्व—अभयता अभिज्ञ—जाननेवाला अभिधा—नाम, वाच्यार्थ प्रकट करनेवाली शब्द शक्ति
शब्दकोश | ४७५
[ अभिधान-इति
अभिधान-शब्दकोष अभिधेय-अर्थ या उपाय, कथनीय, विषय अभिप्राय-मूल अर्थ, तात्पर्य अभिप्रेत-उद्दिष्ट, अभिलाषित, स्वीकृत अभिवृद्धि-अभ्युदय, बढ़ना अभिव्यक्ति-प्रकट करना अभिसन्धि-जोड़, समझौता अभिसार-आगे बढ़ना, प्रियसे मिलने जाना अभिहित-कहा हुआ अभीष्ट-प्रिय, रुचिकर अभ्यस्त-बार बार अभ्यास किया गया अभ्युदय-उदय अमित-अत्यधिक अरण्य-वन अवगत-जाना हुआ अर्वाचीन-नया, बादमें उत्पन्न हुआ अवतारणा-नीचे लाना, इन्द्रियगोचर करना अवतीर्ण-अवतारके रूपमें प्रकट अवधारण-शब्दके अर्थकी सीमा बाँधना, निश्चय करना अवयव-अङ्ग, अंश अवरुद्ध-रुका हुआ अवलम्बन-आश्रय लेना, सहारा लेना अवलोकन-देखना अवशिष्ट-बचा हुआ, शेष अवस्थान-रहना, अवस्थिति अविचिन्त्य-अचिन्त्य अविच्छिन्न-अविभक्त, लगातार अविच्छिन्न तैलधारावत्-तेलकी धाराके समान अटूट अव्यय-अविकारी अव्याकृत-अव्यक्त अशेष-सम्पूर्ण अष्टसिद्धि-आठ प्रकारकी सिद्धियाँ असङ्ग-आसक्तिहीन असङ्गत-प्रसङ्गविरुद्ध, अनुचित असङ्गति-मेलका ना होना असंस्कृत-संस्कारहीन असमोर्द्ध-जिससे बड़ा और जिसके बराबर कोई नहीं हो असार-सारहीन असूया-ईर्ष्या, दूसरेके गुणमें दोष निकालना
आ आख्यायिका-कहानी आच्छन्न-ढका हुआ आत्मविषयणी-आत्म-सम्बन्धी आत्मसात्-अपने अधिकारमें आत्यन्तिक-असीम आदित्य-सूर्य आधान-स्थापन, कोई वस्तु रखनेका स्थान रखना आधिदैविक-देवताओंके द्वारा कृत आधिभौतिक-अन्य प्राणियों द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक-मानसिक, आत्म-सम्बन्धी आपाततः-अचानक, अन्तमें आप्त-पूर्ण, कुशल आम्नाय-वेद, श्रुत, परम्पराप्राप्त उपदेश आयुध-अस्त्र आरूढ़-आसीन आरोहण-चढ़ना, ऊपरकी ओर जाना आर्त्ति-क्लेश, पीड़ा आर्ष-ऋषियोंका आलोचना-गुण-दोष निरूपण आलोच्य-आलोचना योग्य आह्लादित-आनन्दित
इ इति-इस प्रकार, समाप्ति
४७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत