भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 510

[ प्रभुर-भिक्षा प्रभुर प्रशंसा करे सब ७/१५४ प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' ७/९९ प्रभु हासि' निमन्त्रण कैल ७/५६ प्राकृत करिया माने ७/११५ प्राकृत चिन्तामणि ताहे ७/१२५ प्राकृताप्राकृत-सृष्ट्ये २/३६ प्राकृत-वस्तुते यदि ७/१२७ प्राभव-वैभव-रूपे २/९७ प्रिया यदि मान करि' ४/२६ प्रीतिविषयसुखे ४/२०० प्रीतिविषयानन्दे तदाश्रय ४/१९९ प्रेम-नाम प्रचारिते ४/५ प्रेमनेत्रे देखे ताँर ५/२१ प्रेमभक्ति शिखाइते आपने ४/९९ प्रेमरस आस्वादिब ४/२६४ प्रेमरस-निर्यास करिते ४/१५ प्रेमवन्याय डुबाइल जगत्नेरे ७/२६ प्रेमसेवा परिपाटी ४/२११ प्रेमार स्वभावे करे चित्त ७/८७ प्रेमार स्वभावे भक्त हासे ७/८८ प्रेमा हैते कृष्ण हय ७/१४५ प्रेमा हैते पाय कृष्णेर ७/१४५ प्रेमे का'रे वंशी मारे ५/१६४ प्रेमे मत्त अङ्ग दाहिने ५/१८९ प्रेमे मत्त नित्यानन्द ५/२०८ प्रौढ़-निर्मलभाव प्रेम ४/४९ ब बलदेव देखि' ये ना ५/१७० बसाइला सभामध्ये ७/६५ बसिया करिला किछु ७/६० बहिर्वस्तु घट-पट १/९७ बहु कान्ता बिना नहे ४/८० बाल्य-पौगण्ड-धर्म २/९८ बाहु तुलि' प्रभु बले ७/१५९ बाहु तुलि' हरि ३/६१ बिम्ब-प्रतिबिम्ब-रूप ४/७७ बुझिबे रसिक भक्त ४/२३२ बुद्धिर गोचर नहे ४/१८५ बृहद्वस्तु 'ब्रह्म' कहि ७/१३८ ब्रह्म-आत्मरूपे ताँरे २/२६ ब्रह्म, आत्मा २/६, ६५ ब्रह्म-ज्ञानादिक सब ४/६७ ब्रह्म, परमात्मा २/१० 'ब्रह्म'-शब्दे मुख्य अर्थे ७/१११ ब्रह्मसायुज्य-मुक्तेर ताँहा ५/३१ ब्रह्मा कहे—'जले २/४८ ब्रह्माण्ड-प्रमाण पश्चाशत् ५/९७ ब्रह्माण्डवृन्देर आत्मा २/५० ब्रह्माण्डे प्रकाश ताँर ५/१९ ब्रह्मादि आनन्द यार नहे ७/८५ ब्रह्मानन्द तार आगे ७/९७ ब्रह्मा बलेन,-'तुमि किना २/३५ ब्रह्मा, विष्णु, शिव १/६७ ब्रह्मार एकदिने तिँहो ३/६ भ भक्त-अवतार तँहि ६/११० 'भक्त-अवतार' ताँर ७/१३ 'भक्त-अवतार'-पद ६/९५ भक्त-अभिमान मूल ६/८६ भक्त आदि क्रमे १/८२ भक्तगण-कोकिलेर ४/२३४ भक्त बलि' अभिमान ६/८७ भक्तभाव अङ्गीकरि' ६/१०३, १०७ भक्तभाव बिनु नहे ताहा ६/१०६ भक्तभावमय ताँर शुद्ध ७/१० भक्तभाव हैते अधिक ६/१०९ भक्तभावे करे ताँर ६/१०१ भक्तवत्सल, सुशील ३/४५ भक्त सहिते हय १/८१ 'भक्तस्वरूप' ताँर ७/१२ भक्ति-उपदेश बिनु ६/२८ भक्तिगन्ध नाहि ३/९६ भक्ति प्रचारिया सब ६/९२ भक्तिबिना जगत्नेर ३/१४ भक्तिभावे शिरे धरि ४/२२८ भक्तियोगे भक्त पाय २/२५ भक्तिर विरोधी कर्म ३/६० भक्तिरसे भरिल ३/३२ भक्तेर इच्छाय ३/१०९, १११ भक्तेर हृदये १/६१ भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये ७/१४१ भगवानेर गुण कहे, ५/१२२ भगवानेर भक्त यत १/३८ भगवानेर सत्ता हय ४/६४ 'भवेत्' क्रिया विधिलिङ्; ४/३५ भाइके भर्त्सिनु मुञि ५/१८० भागवत, भारतशास्त्र ३/८३ 'भागवतसन्दर्भ'-ग्रन्थेर ३/७९ भागवतेर सार एइ-बले ७/९३ भाग्ये सेइ प्रेमा तोमाय ७/८६ भाव आस्वादिते दोँ हे ४/५७ भावग्रहणेर हेतु करिल ४/५३ भावुक सब सङ्गे लजा ७/६८ भावुक हइया फेरे ७/४२ भावेर परमकाष्ठा ४/६८ भारहरण-काल ताते ४/९ भाल हैल, पाइले तुमि ७/९१ भिक्षा करि' महाप्रभु ७/१५२ भिक्षा करिलेन सबे ७/१५१ ४६८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत