भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 511

भितरे-याँर ]

भितरे प्रवेशि' देखे सब ५/९५माया-अंशे कहि तारे ५/६२मोर भ्रमे तमालेर करे ४/२५१
भितरे सूर्येर रथ-आदि ५/३४मायाकार्य नहे—सब ३/७०मोर भ्राता-सने ताँर ५/१७२
भिन्न भिन्न लिखियाछि १/१०९मायाद्वारा सृष्टि करे २/४९मोर वंशी-गीत आकर्षये ४/२४४
भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा २/८६, ७/१०७'माया'—निमित्त-हेतु ६/१४मोर रूपे आप्यायित ४/२४३
भ्रममय चेष्टा, आर ४/१०७मायार सम्बन्ध नाहि ६/२३मोरे अनुग्रह कर ७/५५
मायावादिगण ताँरे ७/४०मो-हेन अधमे दिला ५/२१०
मङ्गल-चरित्र सदा ६/१२मायावादी, कर्मनिष्ठ ७/२९मौन धरि' रहे लक्ष्मण ५/१५१
मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर ५/७८माया यैछे दुइ अंश ६/१४
मथुराते पाठाइल रूप ७/१६४मायाशक्ति बहिरङ्गा २/१०२यत यत पिये, तृष्णा ७/२१
मथुरा देखिया पुन: ७/४४मायाशक्ति रहे कारण ५/५७यत यत प्रेमवृद्धि करे ७/२८
मथुरा-द्वारकाय निजरूप ५/२३माया हैते जन्मे तबे ५/६६यतेक पालाञाछिल ७/३५
मन्त्र गुरु आर १/३५मायिक भूतेर तथि ५/५३यत्ने आस्वादिते नारि ४/१३४
मन्मथ-मन्मथरूपे ५/२१३मीनकेतन रामदास हय ५/१६१यथेष्ट विहरि' कृष्ण ३/१३
मन्माधुर्य, राधार प्रेम ४/१४२मुख्य तिनशक्ति २/१०३यद्यपि आमार गन्धे ४/२४५
महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो ५/५६मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल ७/१३१यद्यपि आमार गुरु १/४४
महदनुभव, याते सुदृढ़ ६/५३मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ ७/१०८यद्यपि आमार रसे ४/२४६
महातेजोमय वपु कोटि ७/६०मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु ७/१३७यद्यपि आमार स्पर्श ४/२४७
महापुरुषावतारी तेंहो ५/७५मुख्यार्थ व्याख्या कर ७/१३७यद्यपि करिल रस ४/१९९
महाप्रेममय तिँहो बसिला ५/१६३'मुञ्जि ताँर भक्त'—मने ६/९१यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर ५/७८
महाभावस्वरूपा श्रीराधा ४/६९मुञ्जि ये चैतन्यदास ६/४४यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ा ५/२९
महावाक्ये करि' ७/१३०'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि ७/७२यद्यपि तिनॆर माया २/५४
महाविष्णुर अंश—अद्वैत ६/२५मूर्ख संन्यासी निज-धर्म ७/४२यद्यपि निर्मल राधार ४/१४०
महाविष्णु सृष्टि करेन ६/७मूर्च्छित हइया मुञ्जि ५/१९७यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर २/१०५
महासङ्कर्षण—सब जीवेर ५/४५मूढ़लोक नाहि जाने ६/१०२यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो ५/८५
महिषीगण प्राभव ४/७८मूल एक दीप २/८९यद्यपि सांख्य माने ६/१८
महिषी-विवाहे यैछे १/७०मूल भक्त-अवतार ६/११०यबे येइ भाव उठे ४/११०
माता, पिता, स्थान ४/६५मृगमद, तार गन्ध ४/९७याते नित्यानन्दतत्त्व जाने ५/१२
माता मोरे पुत्रभावे ४/२४मो-अधमे दिल ५/२१७यार आगे तृणतुल्य चारि ७/८४
माधव-ईश्वर-पुरी ३/९४मो-पापिष्ठे आनिलेन ५/२१०याँर अंश करि' करे ५/१०६
माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य ६/३९मो-विषये गोपीगणेर ४/२९याँर एकफणे रहे सर्षप ५/११९
माधुर्य प्रकाशि' करेन ५/२१९मोर चित्त-घ्राण हरे ४/२४५याँर द्वारा कैल प्रभु ६/३४
माधुर्य बाड़ाय ४/१९८मोर नाम लय येइ ५/२०६याँर ध्यान निज-लोके ५/२२१
मोर नाम शुने येइ ५/२०६याँर पदधूलि करे उद्धव ६/६४
मोर पुत्र, मोर सखा, ४/२१

पद्य-सूची | ४६९

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 511, कुल 2549 में से · BharatKosha