श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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भितरे-याँर ]
| भितरे प्रवेशि' देखे सब ५/९५ | माया-अंशे कहि तारे ५/६२ | मोर भ्रमे तमालेर करे ४/२५१ |
| भितरे सूर्येर रथ-आदि ५/३४ | मायाकार्य नहे—सब ३/७० | मोर भ्राता-सने ताँर ५/१७२ |
| भिन्न भिन्न लिखियाछि १/१०९ | मायाद्वारा सृष्टि करे २/४९ | मोर वंशी-गीत आकर्षये ४/२४४ |
| भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा २/८६, ७/१०७ | 'माया'—निमित्त-हेतु ६/१४ | मोर रूपे आप्यायित ४/२४३ |
| भ्रममय चेष्टा, आर ४/१०७ | मायार सम्बन्ध नाहि ६/२३ | मोरे अनुग्रह कर ७/५५ |
| म | मायावादिगण ताँरे ७/४० | मो-हेन अधमे दिला ५/२१० |
| मङ्गल-चरित्र सदा ६/१२ | मायावादी, कर्मनिष्ठ ७/२९ | मौन धरि' रहे लक्ष्मण ५/१५१ |
| मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर ५/७८ | माया यैछे दुइ अंश ६/१४ | य |
| मथुराते पाठाइल रूप ७/१६४ | मायाशक्ति बहिरङ्गा २/१०२ | यत यत पिये, तृष्णा ७/२१ |
| मथुरा देखिया पुन: ७/४४ | मायाशक्ति रहे कारण ५/५७ | यत यत प्रेमवृद्धि करे ७/२८ |
| मथुरा-द्वारकाय निजरूप ५/२३ | माया हैते जन्मे तबे ५/६६ | यतेक पालाञाछिल ७/३५ |
| मन्त्र गुरु आर १/३५ | मायिक भूतेर तथि ५/५३ | यत्ने आस्वादिते नारि ४/१३४ |
| मन्मथ-मन्मथरूपे ५/२१३ | मीनकेतन रामदास हय ५/१६१ | यथेष्ट विहरि' कृष्ण ३/१३ |
| मन्माधुर्य, राधार प्रेम ४/१४२ | मुख्य तिनशक्ति २/१०३ | यद्यपि आमार गन्धे ४/२४५ |
| महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो ५/५६ | मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल ७/१३१ | यद्यपि आमार गुरु १/४४ |
| महदनुभव, याते सुदृढ़ ६/५३ | मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ ७/१०८ | यद्यपि आमार रसे ४/२४६ |
| महातेजोमय वपु कोटि ७/६० | मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु ७/१३७ | यद्यपि आमार स्पर्श ४/२४७ |
| महापुरुषावतारी तेंहो ५/७५ | मुख्यार्थ व्याख्या कर ७/१३७ | यद्यपि करिल रस ४/१९९ |
| महाप्रेममय तिँहो बसिला ५/१६३ | 'मुञ्जि ताँर भक्त'—मने ६/९१ | यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर ५/७८ |
| महाभावस्वरूपा श्रीराधा ४/६९ | मुञ्जि ये चैतन्यदास ६/४४ | यद्यपि केवल ताँर क्रीड़ा ५/२९ |
| महावाक्ये करि' ७/१३० | 'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि ७/७२ | यद्यपि तिनॆर माया २/५४ |
| महाविष्णुर अंश—अद्वैत ६/२५ | मूर्ख संन्यासी निज-धर्म ७/४२ | यद्यपि निर्मल राधार ४/१४० |
| महाविष्णु सृष्टि करेन ६/७ | मूर्च्छित हइया मुञ्जि ५/१९७ | यद्यपि ब्रह्माण्डगणेर २/१०५ |
| महासङ्कर्षण—सब जीवेर ५/४५ | मूढ़लोक नाहि जाने ६/१०२ | यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो ५/८५ |
| महिषीगण प्राभव ४/७८ | मूल एक दीप २/८९ | यद्यपि सांख्य माने ६/१८ |
| महिषी-विवाहे यैछे १/७० | मूल भक्त-अवतार ६/११० | यबे येइ भाव उठे ४/११० |
| माता, पिता, स्थान ४/६५ | मृगमद, तार गन्ध ४/९७ | याते नित्यानन्दतत्त्व जाने ५/१२ |
| माता मोरे पुत्रभावे ४/२४ | मो-अधमे दिल ५/२१७ | यार आगे तृणतुल्य चारि ७/८४ |
| माधव-ईश्वर-पुरी ३/९४ | मो-पापिष्ठे आनिलेन ५/२१० | याँर अंश करि' करे ५/१०६ |
| माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य ६/३९ | मो-विषये गोपीगणेर ४/२९ | याँर एकफणे रहे सर्षप ५/११९ |
| माधुर्य प्रकाशि' करेन ५/२१९ | मोर चित्त-घ्राण हरे ४/२४५ | याँर द्वारा कैल प्रभु ६/३४ |
| माधुर्य बाड़ाय ४/१९८ | मोर नाम लय येइ ५/२०६ | याँर ध्यान निज-लोके ५/२२१ |
| मोर नाम शुने येइ ५/२०६ | याँर पदधूलि करे उद्धव ६/६४ | |
| मोर पुत्र, मोर सखा, ४/२१ |
पद्य-सूची | ४६९