भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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text लक्षणा-शुद्ध ]

           ल                    विधि-भक्त्ये व्रजभाव     ३/१५     वैभवगण येन ताँर     ४/७७
                                विधि, भव, नारदादि       ६/४६     वैष्णवेर गुरु तेँहो  ६/२९

लक्षणा करिले स्वतः ७/१३२ ‘विधेय’ कहिये तारे २/७६ व्यक्त करि’ भागवते ३/५० लक्ष लक्ष लोक ७/१५६, १५७ विप्र-अनुवाद, इहार २/७७ व्यष्टिजीव-अन्तर्यामी २/५१ लक्ष्मीगण ताँर वैभव ४/७८ विप्र बलि’ जानि, तार २/७८ ‘व्यास भ्रान्त’-बलि’ ७/१२१ लघुभ्राता हैया करे रामेर ५/१४९ विरुद्धार्थ कह तुमि २/८७ व्यासरूपे कैल ताहा ७/१०६ लज्जा, धैर्य, देहसुख ४/१६७ विशुद्ध निर्मल प्रेम ४/१६२ व्यासेर सूत्रेते कहे ७/१२१ लीला-अन्ते सुखे इँहार ४/२५६ विश्व-सृष्टि करे ‘निमित्त’ ६/१५ व्रजवधूगणेर एइ भाव ४/४८ लीलारस आस्वादिते ४/९८ विषयजातीय सुख आमार ४/१३३ व्रज बिना इहार ४/४७ लीलार सहाय लागि’ ४/८० विष्णुद्वारे कृष्ण करे ४/१३ व्रजाङ्गनारूप आर ४/७५ लुकाइते नारे कृष्ण ३/८९ विष्णुनिन्दा आर नाहि ७/११५ व्रजे क्रीड़ा करे ३/१२ लुटिया, खाइया, दिया ७/२४ विष्णुरूप हञा करे ५/१०४ व्रजे गोपीगण आर १/८० लोकगति देखि’ ३/९७ विस्तारे ना वणि १/१०५ व्रजेन्द्रनन्दन याँते १/८० लोकधर्म, वेदधर्म ४/१६७ वृन्दावन जाइते प्रभु ७/४० व्रजे ये विहरे १/८५ लोक निस्तारिया प्रभुर ७/१६० वृन्दावन-पुरन्दर ५/२१२ व्रजेर निर्मल राग ४/३३ लोके उपदेशे,—‘हओ ६/५० वृन्दावने पाठाइला ७/१६० व्रजेर सहिते हय ३/१० लौकिक-लीलाते धर्म ६/४० वृन्दावने वैसे यत ५/२२८ लौह आर हेम यैछे ४/१६४ वृन्दावने याह,—ताँहा ५/१९५ श वृन्दावने योगपीठे ५/२१८ व वेदगुह्य कथा एइ ५/१५९ शक्ति-एइ छयरूपे १/३२ वेद, भागवत, उपनिषद् २/२४ शक्ति सञ्चारिया तारे ५/५९ वक्तव्य-बाहुल्य १/१०५ “वेदमय-मूर्ति तुमि ७/१४८ शक्त्यावेश-अवतार १/६६, ६७ वस्तुतः परिणाम-वाद ७/१२३ वेदस्तुति हैते हरे ४/२६ शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म ५/२८ वस्तुनिर्देश, आशीर्वाद १/२२ वेदान्त ना शुन केने ७/१०१ शतमुखे बलि, तबु ना ४/२५५ वस्तु प्रकाशिया करे १/८८ वेदान्त-पठन, ध्यान ७/६९ शरीर-विशेष ताँर ६/१० वाञ्छा भरि’ आस्वादिल ४/११४ वैकुण्ठ-बाहिरे एक ५/३२ शान्त, दान्त, कृष्णभक्ति ३/४५ वाक्ये कहे, ‘मुञ्जि चैतन्येर ६/९१ वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ५/५१ शास्त्रविरुद्धार्थ कभु ना २/७३ वात्सल्य-आवेशे कैल ४/११३ वैकुण्ठ-बाहिरे हय ५/३१ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ ६/१०२ वाम-पार्श्वे श्रीराधिका ५/२२० वैकुण्ठ बेड़िय़ा एक आछे ५/५२ श्वास-सह ब्रह्माण्ड ५/६९ वाराणसीपुरी आइला ७/१५५ वैकुण्ठादि-पुरे याँर ५/२२२ शिक्षागुरुके त’ जानि १/४७ वासुदेव-सङ्कर्षण ५/२४, ४१ वैकुण्ठाद्ये नाहि ये ४/२८ शिक्षागुरु हय कृष्ण १/५८ विचार करिये यदि ४/१४५ वैकुण्ठके याय चतुर्विध ३/१७ शिङ्गा वांशी बाजाय केह ५/१९२ विचार करेन, लोकेर ३/९७ वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल ५/५३ शिशु वत्स हरि’ २/३१ विचारि’ देखिये यदि ४/२४९ ‘वैवस्वत’-नाम एइ ३/९ शुक्ल, रक्त, पीतवर्ण ३/३७ विचारिते एई श्लोक ३/१०२ शुद्धवात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान ६/५५ विजातीय-भावे नहे ४/२६६

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