भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 490

[ ७/१४९-१५६ कोई सन्देह नहीं है। इसलिये किसी प्रकारसे ही काशीके श्रीप्रकाशानन्द और नित्यसिद्ध भगवत्-पार्षद श्रीप्रबोधानन्दको एक करनेका प्रयास सिद्ध नहीं हो सकता॥ १४९॥ महाप्रभुके द्वारा अपराध-क्षमा और कृपा :- एइमते ताँ-सबार क्षमि' अपराध। सबाकारे कृष्णनाम करिला प्रसाद॥ १५०॥ सबका मिलकर महाप्रसाद-सम्मान :- तबे सब संन्यासी महाप्रभुके लैया। भिक्षा करिलेन सबे, मध्ये बसाइया॥ १५१॥ भिक्षा करि' महाप्रभु आइला वासाघर। हेन चित्र-लीला करे गौराङ्ग-सुन्दर॥ १५२॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने सभीका अपराध क्षमाकर सभीको 'श्रीकृष्ण'-नाम देकर कृपा की। तब सभी संन्यासियोंने महाप्रभुको अपने बीचमें बैठाकर महाप्रसाद ग्रहण किया। महाप्रसाद ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीगौराङ्ग-सुन्दर इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ १५०-१५२॥ महाप्रभुकी वदान्य-लीलासे भक्तोंका आनन्द :- चन्द्रशेखर, तपनमिश्र, आर सनातन। शुनि' देखि' आनन्दित सबाकार मन॥ १५३॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर, श्रीतपनमिश्र और श्रीसनातन गोस्वामी आदि सभी भक्तलोग श्रीमन्महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीलाओंको सुनकर तथा देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ १५३॥ प्रभुके देखिते आइसे सकल संन्यासी। प्रभुर प्रशंसा करे सब वाराणसी॥ १५४॥ महाप्रभुके पदार्पणसे काशी धन्या :- वाराणसीपुरी आइला श्रीकृष्णचैतन्य। पुरीसह सर्वलोक हैल महाधन्य॥ १५५॥ असंख्य लोगोंका महाप्रभु-दर्शन :- लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुके देखिते। महाभिड़ हैल द्वारे, नारे प्रवेशिते॥ १५६॥ अनुवाद-वहाँके सभी संन्यासी महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आने लगे और वाराणसीके सभी लोग महाप्रभुकी प्रशंसा करने लगे। श्रीकृष्णचैतन्यके वाराणसीमें पदार्पण करनेसे वाराणसीपुरी और वहाँके निवासी सभी धन्य हो गये। महाप्रभुके दर्शनके लिये लाखों-लाखों लोग आने लगे। वहाँ इतनी भीड़ हो जाती कि गृहके भीतर प्रवेश करना बहुत कठिन हो जाता था॥ १५४-१५६॥ अमृतानुकणिका—भगवान् विष्णुके आदेशसे असुर-मोहन निर्विशेषवाद प्रचारक शङ्करावतार आचार्य शङ्करने मायावादका प्रचार किया, तो भी वे शुद्ध स्वरूपमें 'वैष्णव' हैं। इसलिये उन ४४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत