श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/१४९ ] कर्ममार्गकी, योगमार्गकी, स्वर्गाभिलाषाकी, शास्त्राभ्यासकी, पुत्र-स्त्री-आसक्त विषयियोंकी, 'अहं-ब्रह्म'वादियोंकी, तपस्वियोंकी, गयाके कर्मकाण्डकी, काशीके ज्ञानकाण्डादिकी तुच्छता दिखलायी है। कभी-कभी उन्होंने स्वयंको भी उन सभी भक्तिके प्रतिकूल आचरणादिमें निमग्न और गौरप्रेमसे वञ्चित कहकर हृदयविदारक विभिन्न प्रकार आत्मग्लानि प्रकाश की है। इसी प्रकार वैष्णवोचित दैन्यका तात्पर्य ना समझकर एवं सरल अन्तःकरणके अभावके कारण वे लोग उक्त ग्रन्थकार (श्रीप्रबोधानन्द) को शुद्धभक्ति प्रतिकूल सभी मार्गोंकी निन्दा करते हुए देखकर भी जब भी ज्ञानमार्गकी बात निन्दाके रूपमें उल्लेख करते देखा है, तभी उनको मायावादीके साँचेमें आबद्धकर काशीके प्रकाशानन्दके रूपमें प्रस्तुत करनेकी चेष्टा की है। वे लोग इस प्रकार स्वयंको तथा दूसरोंको भी ठग रहे हैं। 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ग्रन्थकारने मायावाद-तापसन्तप्त हृदयको राधारस-रूप सुधानिधि (चन्द्र) के द्वारा शीतलकारी गौरसिन्धुका जयगान किया है— “स जयति गौरपयोधिर्मायावादताप-सन्तप्तम्। हृन्नथ उदशीतलयद् यो राधारस-सुधानिधिना॥” (उन लोगोंका कहना है)—'मायावाद-तापसन्तप्तम्'-इसीसे ही क्या ग्रन्थकारका पहले 'काशीवासी मायावादी प्रकाशानन्द' होनेका परिचय प्रकाशित नहीं होता? 'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थमें —जिसमें विशेषरूपसे 'प्रकाशानन्द-उद्धार' वर्णित हुआ है, उसमें कहीं भी प्रकाशानन्दके निकट महाप्रभुके द्वारा 'राधारस' के सम्बन्धमें कोई आलोचना ही करना नहीं देखा जाता है। प्रबलरूपसे निर्विशेष विचारग्रस्त विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीयोंके निकट महाप्रभुने केवल ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्य खण्डनकर वास्तवभाष्यके रूपमें श्रीमद्भागवतको ही स्थापन करते हुए सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनतत्त्वकी व्याख्या की, किन्तु इन सबसे भी श्रेष्ठ जो परमनिगूढ़ 'राधारस'-सम्पुट है, उसका उद्घाटन नहीं किया। प्रकाशानन्द उद्धारके बाद महाप्रभुने मात्र पाँच दिनों तक काशीमें अवस्थानकर पुरीकी यात्रा की थी—“एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा॥” (मध्यलीला २५/१७०)। तत्पश्चात् (महाप्रभु और प्रकाशानन्द) दोनोंके साक्षात्कारका अन्य कोई प्रमाण नहीं पाया जाता है। इसलिये प्रकाशानन्दका मायावाद-सन्तप्त हृदय गौरप्रसादसे शीतल हुआ था, इसमें सन्देह नहीं है, किन्तु वह निश्चितरूपमें 'राधारस'-वशतः नहीं। दूसरी ओर, महाप्रभुने श्रीरङ्गमें दीर्घ चातुर्मास्यकाल रहकर व्येङ्कटभट्ट, त्रिमल्लभट्ट एवं श्रीप्रबोधानन्दपादके निकट भगवान्के ऐश्वर्यविचारकी अपेक्षा माधुर्यविचारकी पराकाष्ठा तथा गोपियोंकी अपार महिमा एवं उनमें श्रीराधाका ही श्रीकृष्णवशीकारित्व (केवल श्रीराधा ही श्रीकृष्णको सम्पूर्णरूपसे वशीभूत कर सकती हैं) प्रकाशकर उनको श्रीलक्ष्मी-नारायणकी उपासनासे क्रमशः गोपीनाथ तथा राधानाथ-श्रीकृष्णके प्रति अनुरक्त किया था। उस समय मुखसे वेदोंको स्वीकार करनेपर भी जीवके नित्य विष्णु-सेवकत्वका परिचय अस्वीकारकर श्रीविष्णुसेवा-विनाशकारी मायावादकी जो भीषण प्रबलता थी, और उससे श्रीनारायण-सेवानिष्ठ प्रबोधानन्दपादका हृदय जो सर्वदा सन्तप्त हो रहा था, वह श्रीगौरसिन्धुसे उदित श्रीराधारस-चन्द्रकी किरणोंसे अर्थात् श्रीराधाकी विष्णुसेवाचेष्टाकी पराकाष्ठा सन्दर्शनसे परमशीतल हुआ था—इसमें सातवाँ अध्याय | ४४७