श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१२१-१२६ इस विषयमें वेद प्रमाण है- (श्वेताश्वतर उपनिषद्) - "सनातनपुरुष विचित्रशक्ति युक्त हैं; अन्योंमें उनके जैसी शक्तियाँ नहीं है।" श्रीमद्भागवतादिमें भी “आत्मा ईश्वर अतर्क्य, सहस्रशक्तियुक्त है", ऐसा उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रमें भी “आत्मामें इस प्रकार विचित्रता है।" (अद्वैतवादियोंके मतानुसार) ब्रह्ममें द्वैतभावकी सङ्गति ना रहनेके कारण ब्रह्ममें अज्ञानादिकी असम्भावनाकी कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु “ब्रह्म अचिन्त्यशक्ति-समन्वित" इस युक्ति और श्रुतिवाक्यसे उनमें द्वैतकी असङ्गति दूर होती है। ऐसा होनेसे अचिन्त्यशक्ति ही द्वैतोपपत्तिका (द्वैतके औचित्यका) कारण होना ही अवशिष्ट रहता है। इसलिये निर्विकारादि-स्वभावसम्पन्न होनेपर भी परमात्माका अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे विश्वरूपमें परिणामादि सङ्घटित होता है। जिस प्रकार चिन्तामणि स्वयं विकारयुक्त ना होकर सर्वार्थ उत्पन्न करनेमें समर्थ है, चुम्बक स्वयं विकारयुक्त ना होकर अन्य लोहोंको आकर्षण-चालनादि करानेमें समर्थ है, उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु विकृत ना होकर ब्रह्मकी विकारयोग्य शक्ति ही विकृत होकर विश्वाकारमें परिणत होती है। ऐसा होनेपर भी ब्रह्मकी ऐसी शक्ति रहना प्राकृतकी भाँति माया-शब्दकी इन्द्रजालविद्या नहीं है। किन्तु इस मायाके द्वारा विचित्रता निर्मित होती है अर्थात् यह विचित्रताको प्रकाश करनेवाली शक्ति है। इसलिये परमात्माका परिणाम ही यह विश्व है- यही शास्त्रसिद्धान्त है। ×× अपरिणामी सत्यवस्तुकी ही अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे परिणति होती है। स्वयं प्रकाशमान् स्वरूपका ही विस्ताररूप द्रव्यनामक शक्ति है; उसी शक्तिरूपकी ही परिणति होती है, परन्तु स्वरूपका परिणाम नहीं होता। जिस प्रकार चिन्तामणि अपनी शक्तिके द्वारा अनेक पदार्थोंको प्रसव करनेपर भी स्वयं अविकृत ही रहती है। ×× इसलिये कोई-कोई इस विश्वका उपादान 'ब्रह्म' है, फिर कोई-कोई 'प्रधान' को विश्वका उपादान कहते हैं, ऐसा सुना जाता है। ×× जैसे पहले जलको देखकर जलके सम्बन्धमें हृदयमें एक धारणा उदित होती है और जलके अप्रसङ्गके समय वह भाव निद्रित रहता है। परन्तु जलके समान किसी वस्तु (मरीचिका) के दर्शनसे वह वृत्ति जाग्रत हो जाती है। उस वस्तु (मरीचिका) के विशेष अनुसन्धानके बिना उस वस्तुको पूर्व वस्तु (जल) के साथ अभेद कहकर, स्वेच्छापर होकर आरोप करनेसे (मरीचिका जलके समान दिख रही है, इस कारण) जल मिथ्या नहीं हो जाता, अथवा 'जलके समान मरीचिका' आदि वस्तु भी मिथ्या नहीं होती, किन्तु जलके साथ मरीचिकाको अभेद मानना ही अयथार्थ अथवा मिथ्या है। स्वप्नमें भी (ब्रः सूः ३/२/३) “माया-मात्र ही समस्त अप्रकाशित स्वरूप है" - इस न्यायके अवलम्बनसे जाग्रत अवस्थामें देखी वस्तुकी आकाररूपिणी मनोवृत्तमें परमात्माकी माया पूर्व उदाहरणके जैसे उन वस्तुओंके अभेदका आरोप कर देती है, इसलिये वस्तुतः कुछ भी मिथ्या नहीं है। इसलिये शुद्धात्मा परमात्मामें उस प्रकारका आरोप ही मिथ्या है, विश्व मिथ्या नहीं है। ×× और भी विवर्त्तवादका उदाहरण ज्ञानादि-प्रकरणमें उल्लिखित होनेपर वह गौण है और परिणामवादका स्वप्रकरणमें पाठ होनेपर उसे मुख्य कहा गया है। तथा शक्तिपरिणामवादका ज्ञान-प्रकरण और स्वप्रकरण दोनोंमें पठित होनेसे सन्दंश (चिमटा)-न्यायसिद्ध-प्रबलताके कारण शक्ति-परिणामको ही श्रीभागवतका तात्पर्य कहकर जाना जाता है॥१२१-१२६॥ ४३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत