श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१०८-११० मुख्यार्थ “विक्रमशाली पशुविशेष” से “पशुविशेष” अंश त्यागकर “विक्रमशाली” अंश ग्रहण किया है, इसलिये इस अर्थको जहदजहत्-लक्षणा अर्थ भी माना गया है। पूर्वोक्त आलोचनासे यह स्पष्ट समझा जाता है कि लक्षणावृत्ति और गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेसे युक्ति और कल्पनाका सहारा लेना होता है। मुख्यवृत्तिमें युक्ति और कल्पनाकी सहायता ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है। साधारणतः जिस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करनेसे शब्द अथवा वाक्यकी अर्थ सङ्गति नहीं होती, उसी स्थानपर ही लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करना होता है। जिस ग्रन्थमें भ्रम-प्रमादादि दोष रहते हैं, ग्रन्थकारकी मर्यादाकी रक्षाके लिये भ्रम-प्रमादादिको ढकनेके उद्देश्यसे उस ग्रन्थकी व्याख्यामें लक्षणावृत्ति या गौणीवृत्ति अवलम्बनका प्रयोजन होता है। किन्तु वेदान्तसूत्रमें ये सब दोष नहीं हैं, इसलिये लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे उसकी व्याख्याका कोई प्रयोजन नहीं है। जिस स्थानपर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है, उस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे ही वास्तव अर्थ प्राप्त होता है; उस स्थानपर अपनी कल्पनाके द्वारा लक्षणा या गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेपर मुख्यार्थ जो वाक्यका वास्तविक अर्थ है, वह प्रच्छन्न हो जाता है। श्रीपाद शङ्कराचार्यने वेदान्त सूत्रका जो भाष्य किया है, उसमें उन्होंने मुख्यवृत्ति त्यागकर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे ही सूत्रोंके अर्थ किये हैं। इससे सूत्रोंके मुख्यार्थ प्रच्छन्न हो गये और उनके कल्पित अर्थको ही प्रधान्य प्राप्त हुआ है। इसलिये शङ्कराचार्यके भाष्य सुननेपर वेदान्तके वास्तविक अर्थको नहीं जाना जा सकता। इसलिये उसको श्रवण करनेसे किसीका भी उपकार तो होगा नहीं, कल्पित व्याख्या सुननेसे वरन् यथेष्ट अपकार ही होगा॥१०८-१०९॥ ताँहार नाहिक दोष, ईश्वर-आज्ञा पाञा। गौणार्थ करिल, मुख्य अर्थ आच्छादिया ॥ ११०॥ अनुवाद—वास्तवमें श्रीशङ्कराचार्यका इसमें कोई दोष नहीं है, उन्होंने भगवान्के आदेशसे ही वेदान्तके मुख्य अर्थका आच्छादनकर गौणार्थका प्रचार किया है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये प्रधानशास्त्र (वेदान्तसूत्र और उपनिषद्) मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधावृत्तिके द्वारा जिस तत्त्वकी शिक्षा देते हैं, वही परम महत्वपूर्ण है। श्रीशङ्कराचार्यने इस शास्त्रकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर गौणवृत्ति अर्थात् लक्षणावृत्तिके द्वारा केवलाद्वैतवाद-सिद्धान्तके आधारपर जो भाष्य लिखा है, उसे श्रवण करनेसे सभी परमार्थिक कार्योंका नाश होता है। यदि कहें कि साक्षात् शिवजीके अवतार श्रीशङ्करस्वामीने इस प्रकार अवैध कार्य क्यों किया? तो सुनो, ईश्वरकी आज्ञासे ही इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण उनका दोष नहीं है। जैसे पद्मपुराणमें श्रीमहादेवने पार्वतीजीसे कहा है— “मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते। मयैव कल्पितं देवी कलौ ब्राह्मणरूपिणा॥ ब्रह्मणश्चापरं रूपं निर्गुणं वक्ष्यते मया। सर्वस्वं जगतोऽप्यस्य मोहनार्थं कलौ युगे॥ वेदान्ते तु महाशास्त्रे मायावादमवैदिकम्। मयैव वक्ष्यते देवि जगतां नाशकारणात्॥” ४२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत