श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें७/१०८-१०९ ] असि (हो)। तत् शब्दसे सर्वज्ञता आदि गुणविशिष्ट चैतन्यको (ब्रह्मको) लक्ष्य किया गया है; त्वम् पदसे अल्पज्ञ चैतन्यको (जीवको) लक्ष्य किया गया है। चैतन्य स्वरूपसे दोनोंमें कोई भेद नहीं है, किन्तु ब्रह्म सर्वज्ञ और जीव अल्पज्ञ है, इस कारण इनका अभेद स्थापन नहीं किया जा सकता। तत् और त्वम् शब्दके मुख्यार्थसे यहाँपर भेद ही प्रतिपन्न होता है, क्योंकि एक (ब्रह्म) होनेसे सर्वज्ञ और दूसरा (जीव) होनेसे अल्पज्ञ है। इस प्रकार इनमें बहुत भेद है। परन्तु दोनोंका अभेद प्रमाणित करनेके लिये तत् (ब्रह्म)-शब्दके मुख्यार्थसे सर्वज्ञत्व-अंश त्यागकर केवल चैतन्य-अंश ग्रहण करना है और उसी प्रकार त्वम् (जीव)-शब्दके भी मुख्यार्थसे अल्पज्ञत्व-अंश त्याग करके केवल चैतन्य-अंशको ग्रहण करना है। ऐसा करनेसे तत्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है और त्वम्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है; अर्थात् तत् और त्वम् इन दोनों शब्दोंका एक ही चैतन्य-अर्थ मिलता है। दोनोंको चैतन्य कहकर दोनोंके बीचमें कोई भी भेद नहीं रहता। इस प्रकार अर्थ करके मायावादी लोग तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव और ब्रह्मका अभेदत्व प्रमाणित करते हैं। तत्-शब्दके मुख्यार्थ “सर्वज्ञ चैतन्य” से एक अंश “सर्वज्ञ” त्यागकर दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया और त्वम्-शब्दके भी मुख्यार्थ “अल्पज्ञ चैतन्य” से भी एक अंश “अल्पज्ञ” त्याग करके दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया। इसलिये यह 'जहदजहत्स्वार्था' लक्षणा हुआ है। और “चैतन्य” अर्थ ग्रहण करनेसे मुख्यार्थके साथ भी दोनों शब्दोंका सम्बन्ध रहनेपर यह लक्षणा भी हुआ। इसलिये तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव-ब्रह्मके अभेदवाचक अर्थ करनेसे जहदजहत्स्वार्था लक्षणाका ही आश्रय लेना होगा। “गौणीवृत्ति-गौणी चाभिहितार्थलक्षितगुणयुक्ते तत्सदृशे-सर्वसंवादिनीते श्रीजीव; अर्थात् मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर मुख्यार्थका कोई भी एक गुण लेकर मुख्यार्थके सादृश्ययुक्त जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, उसको गौणार्थ कहते हैं और जिस वृत्तिके द्वारा यह अर्थ प्राप्त होता है, उसे 'गौणीवृत्ति' कहते हैं।” जैसे, “सिंहोऽयम् देवदत्तः-यह देवदत्त एक सिंह है।” सिंह-शब्दके मुख्यार्थसे अत्यन्त विक्रमशाली पशुविशेषको समझा जाता है। देवदत्त एक मनुष्य है, उसके चार पैर नहीं हैं, उसकी पूँछ नहीं है, उसके रोम नहीं हैं, सिंहके जैसे उसके केशर नहीं है; इसलिये “देवदत्त एक सिंह है”—वाक्यसे “देवदत्त सिंहके समान एक पशु है” इस प्रकारका अर्थ सङ्गत नहीं होता। अर्थात् सिंह-शब्दका मुख्यार्थ यहाँ ग्रहण नहीं किया जा सकता। तब सिंह-शब्दका मुख्यार्थ त्यागकर सिंहके विक्रमशालीत्व गुणको ग्रहण करके सिंह-शब्दका अर्थ करना होगा-सिंहके समान विक्रमशाली। “यह देवदत्त सिंहके समान विक्रमशाली है”—यही इस वाक्यका अर्थ होगा। विक्रमशालीत्व-अंशमें सिंहके साथ देवदत्तका सादृश्य है। मुख्यार्थके एक गुणको लेकर यह अर्थ करनेपर इसको गौणीवृत्तिमूलक अर्थ कहा जाता है। किसी किसी व्याकरणमें गौणीवृत्तिको एक पृथक् वृत्ति स्वीकार नहीं किया है। उनके अनुसार गौणीवृत्ति भी एक प्रकारसे लक्षणा है। उनके मतमें लक्षणा दो प्रकारकी है-गौणी और शुद्धा। जिस अर्थमें मुख्यार्थके गुण सादृश्य मात्रको ग्रहण किया जाता है, वही गौणी-लक्षणासे प्राप्त अर्थ है। गुण सादृश्यके अतिरिक्त अन्य प्रकारके लक्षणाके द्वारा प्राप्त अर्थको शुद्धालक्षणालब्ध अर्थ कहा जाता है। उपरोक्त “सिंहोऽयम् देवदत्तः” वाक्यके अर्थ-प्रसङ्गमें सातवाँ अध्याय | ४२३