भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 464

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प्रतीतिको लक्षणा कहते है। 'लक्षणा' - "मुख्यार्थबाधे शक्यस्य सम्बन्धे याऽन्यधीर्भवेत्। सा लक्षणा। अलङ्कारकौस्तुभ। २/१२।" जैसे “गङ्गामें घोष वास करते हैं"- यहाँपर गङ्गा-शब्दके मुख्यार्थसे भागीरथी नामक नदी विशेषको समझा जाता है। ऐसा होनेसे मुख्यार्थमें वाक्यका अर्थ इस प्रकार होगा- "भागीरथी नदीके बीचमें घोष वास करते हैं", किन्तु नदीके बीचमें वास करना सम्भव नहीं है। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती। तभी गङ्गा-शब्दका अर्थ गङ्गा-तीर करना होगा, क्योंकि गङ्गा-तीरपर वास करना सम्भव है। गङ्गा-तीरका गङ्गाके साथ सम्बन्धविशिष्ट भी है। ऐसा होनेपर उक्त वाक्यका अर्थ होगा- “गङ्गाके तीरपर घोष वास करते हैं।" यह अर्थ लक्षणावृत्तिके द्वारा प्राप्त अर्थ कहलाता है। मुख्यार्थकी असङ्गति होनेपर ही लक्षणावृत्तिका आश्रय लेना होता है। मुख्यार्थकी सङ्गति होनेपर भी यदि लक्षणावृत्तिसे अर्थ किया जाय, तब उस लक्षणासे प्राप्त अर्थ असङ्गत होगा, क्योंकि इस प्रकार अर्थ करनेकी प्रथा शास्त्र द्वारा अनुमोदित नहीं है। लक्षणाके अनेक प्रकार भेद है। श्रीपाद जीव गोस्वामीने तीन प्रकारके लक्षणाका वर्णन किया है-अजहत्स्वार्था, जहत्स्वार्था और जहदजहत्स्वार्था। “अजहत्स्वार्था-न जहति पदानि स्वार्थं यस्यां सा; अर्थात् जो लक्षणासे पदोंके निज अर्थका परित्याग ना करे।" जैसे-कौओसे दहीकी रक्षा करो। इस प्रकारका आदेश यदि किसीको दिया जाय, तो वह व्यक्ति केवल कौओंसे दहीकी रक्षा करेगा, ऐसा नहीं है। बिल्ली, कुत्ता आदि जो कोई भी दहीको नष्ट करनेके लिये आयेंगे, उन सबसे दहीकी रक्षा करेगा। मूल उद्देश्य है, दहीकी रक्षा करना। यहाँपर कौआ-शब्दके मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती है, क्योंकि मुख्यार्थ ग्रहण करनेसे केवल कौओंके उत्पातसे दहीकी रक्षा करनी है, अन्य किसी जन्तुके उपद्रवसे रक्षा नहीं करनी है, ऐसा आदेशका अभिप्राय नहीं है, क्योंकि फलस्वरूप दहीकी रक्षा नहीं होगी। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर कौआ-शब्दसे कौआ और कौओके समान उपद्रवकारी जन्तुओंसे दहीकी रक्षा करनी होगी। यहाँपर कौआ-शब्दका अर्थ कौआ तो है ही, परन्तु कौआ-शब्दसे दही नष्ट करने वाले अन्य जन्तुओंको भी समझना होगा। यहाँ कौआ-शब्द अपना अर्थ त्याग ना करके अर्थकी और भी व्यापकता धारण करता है। यह 'अजहत्स्वार्था' लक्षणाका दृष्टान्त है। “जहत्स्वार्था-जहति पदानि स्वार्थं यस्याम्; अर्थात् जिस लक्षणापें पदसमूह अपने अर्थका परित्याग करते हैं, उनको जहत्स्वार्था लक्षणा कहते है।" जैसे “मंचाः क्रोशन्ति"-मंच चीत्कार कर रहा है, यह वाक्यका मुख्यार्थ है, किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि मंच कभी चीत्कार नहीं कर सकता। तब मंच-शब्दके मुख्यार्थका त्याग करके अर्थात् मंच-शब्दका मंच अर्थ ना ग्रहण करके 'मंचस्थ-पुरुष' अर्थ ग्रहण करना होगा; मंचपर स्थित लोग चीत्कार कर रहे हैं, इस प्रकारसे अर्थ ग्रहण करना होगा। मंचपर विराजमान लोगोंका मंचके साथ सम्बन्ध है, इसलिये यहाँपर लक्षणा है और मूल शब्द मंचका त्याग किया है, इसे 'जहत्स्वार्था' लक्षणा कहते हैं। "जहदजहत्स्वार्था-वाच्यार्थैकदेशत्यागेनै कदेशवृत्तिर्लक्षणा; अर्थात् जिस लक्षणामें किसी भी शब्दके मुख्यार्थका एक अंश त्याग करके अन्य अंश ग्रहण करना होता है, उसको जहदजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं।" मायावादियोंने तत्त्वमसि वाक्यका इसी जहदजहत्-लक्षणाका आश्रय लेकर अर्थ किया है। तत्त्वमसि-तत् (वह ब्रह्म) त्वम् (तुम)

४२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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