भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

७/१०८-१०९ ] उपनिषद् एवं सूत्रका प्रतिपाद्य सविशेष-तत्त्व ही श्रेष्ठ है-यह मुख्या (अभिधा) वृत्तिका अवलम्बन करके प्रदर्शित हुआ है। निर्विशेषवादी गौणी (लक्षणा) वृत्तिका अवलम्बन करके जो तत्त्वाभास प्रदर्शन करते हैं, वह 'तत्त्ववाद' के बदले 'मायावाद' नामसे प्रसिद्ध है। श्रीविष्णुस्वामीके शुद्धाद्वैत-विचारको दबाकर श्रीशङ्कराचार्यके केवलाद्वैतविचारका व्यापक प्रचार होने लगा। तब श्रौत-पथका अवलम्बनकर श्रीरामानुजाचार्यने 'विशिष्टाद्वैतवाद' और श्रीमध्वचार्यपादने 'तत्त्ववाद' के द्वारा अतात्त्विकोंके तर्कपन्थामूलक सिद्धान्तका खण्डन किया। महाप्रभुने अभिधा-वृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके अर्थोंका आदर किया है। श्रीशङ्कराचार्यने लक्षणावृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके जिन अर्थोंको अपने भाष्यमें लिखा है, उसके द्वारा सर्वनाश होता है। जैसे पद्मपुराणमें कहा गया है- “शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम्। येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥ अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम्। कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥ सर्वकर्मपरिभ्रंशात्रैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते। परात्म-जीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥” अर्थात् “हे देवि सुनो ! मैं तामस शास्त्रका क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे ज्ञानियोंका भी अधःपतन हो जाता है। वेद वचनोंका लोकनिन्दित हीन अर्थ दिखलाते हुए इस शास्त्रमें कर्मका स्वरूपतः त्याज्यत प्रतिपादित किया गया है। इसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करनेसे ही निष्काम कर्मसे प्राप्त होनेवाले ज्ञान (नैष्कर्म्य) की प्राप्तिका वहाँ वर्णन किया गया है। तथा मेरे द्वारा यहाँ परमात्मा और जीवके ऐक्यका प्रतिपादन किया गया है।” अन्त्यलीला, २/९४-९९ संख्या द्रष्टव्य है॥१०८-१०९॥ अमृतानुकणिका—शब्दकी तीन वृत्तियाँ हैं-मुख्य, लक्षणा और गौणी। किसी भी शब्दकी स्वाभाविक शक्तिके द्वारा जो अर्थ प्रतिपन्न होता है, शब्द उच्चारण करने मात्रसे ही उसका जो अर्थ मनमें उदित होता है, उसे शब्दका मुख्यार्थ कहते हैं। शब्दकी जिस वृत्ति या शक्तिके द्वारा जिस मुख्यार्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसे मुख्यवृत्ति कहते हैं। जैसे 'गौ'-शब्द उच्चारण करनेसे ही, गलकम्बल (गलेके नीचे झूलते मांसपिण्ड), पूँछ, सींग आदि चार पैरोंके जन्तु-विशेषका विचार मनमें आता है। यह जन्तु-विशेष ही गौ-शब्दका मुख्यार्थ है। और गौ-शब्दकी जिस वृत्तिके द्वारा इस अर्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको गौ-शब्दकी मुख्यवृत्ति कहते हैं। जिस धातु और प्रत्ययके योगसे कोई शब्द निष्पन्न होता है, उस धातु और प्रत्ययके अर्थयोगसे शब्दके जो-जो अर्थ प्राप्त होते हैं, वे ही उस शब्दके मुख्यार्थ हैं। और जिस वृत्तिके द्वारा इस मुख्य शब्दकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको ही मुख्यवृत्ति कहते है। मुख्यार्थको 'अभिधावृत्ति' का अर्थ भी कहा जाता है। 'अभिधा' - अभिधा न्यायमते शब्दशक्तिः। मीमांसामते विधिसमवेतविधिव्यापारीभूतपदार्थः। तस्या लक्षणम्-स मुख्योऽर्थस्तत्रस्तत्र मुख्योव्यापारोऽस्याभिधोच्यते। इति शब्दकल्पद्रुमधृत काव्यप्रकाशवचनम्॥ 'लक्षणावृत्ति' - मुख्य अर्थकी सङ्गति ना होनेपर वाच्यसम्बन्धविशिष्ट अन्य पदार्थकी सातवाँ अध्याय | ४२१