भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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सर्वसारं निरालम्बं रहस्यं वज्रसूचिकम्। तेजो नादध्यानविद्यायोगतत्त्वात्मबोधकम्॥ परिव्राट् त्रिशिखी सीता चूड़ा निर्वाणमण्डलम्। दक्षिण शरभं स्कन्दं महानारायणाद्वयम्॥ रहस्यं रामतपनं वासुदेवञ्च मुद्गलम्। शाण्डिल्यं पैङ्गलं भिक्षुमहच्छारीरकं शिखा॥ तुरीयातीतसंन्यासपरिव्राजाक्षमालिका। अव्यक्तैकाक्षरं पूर्णा सूर्याक्षाध्यात्मकुण्डिका॥ सावित्र्यात्मा पाशुपतं परंब्रह्मावधूतकम्। त्रिपुरातापनं देवी त्रिपुरा कठभावना। हृदयं कुण्डली-भस्मरुद्राक्षगणदर्शनम्॥ तारसारमहावाक्यपञ्चब्रह्माग्नि होत्रकम्। गोपालतपनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम्॥ शाठ्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम्। कलिजावालिसौभाग्यरहस्येकाश्रुमुक्तिका॥" अर्थात् ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरिय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, कैवल्य, जावाल, श्वेताश्वतर, हंस, आरूणि, गर्भ, नारायण, परमहंस, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, अथर्व शिरा, अथर्व शिखा, मैत्रायणी, कौषितकी ब्राह्मण, वृहज्जावाल, कालाग्निरुद्र, मैत्रेय, सुबाल, क्षुरिका, मन्त्रिका, सर्वसार, निरालम्ब, राम रहस्य, वज्रसूचिका, तेजो बिन्दु, नाद बिन्दु, ध्यान बिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, आत्मबोध, नारद परिव्राजक, त्रिशिखी ब्राह्मण, सीता, योग चूड़ामणि, निर्वाण, मण्डल ब्राह्मण, दक्षिणामूर्ति, शरभ, स्कन्द, महानारायण, अद्वय तारक, शुकरहस्य, रामतापनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैङ्गल, भिक्षुक, महा, शारीरक, योग शिखा, तुरीयातीत अवधूत, संन्यास, परमहंस-परिव्राजाक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, अन्नपूर्णा, सूर्य, अक्षी, अध्यात्म, कुण्डिका, सावित्रि, आत्मा, पाशुप्रात ब्राह्मण, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापनी, देवी, त्रिपुरा, कठ रुद्र, भावना, रुद्र हृदय, योग कुण्डलिनी, भस्म जावाल, रुद्राक्ष जावाल, गणपति, तारसार, महावाक्य, पञ्चब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, गोपालतापनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, वराह, शाठ्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड़, कलिसन्तरण, जाबालि, सौभाग्य लक्ष्मी, सरस्वती रहस्य, बह्वृच, दर्शन, नृसिंहतापनी और मुक्तिका-ये १०८ उपनिषद् हैं। 'मुख्यवृत्ति' अर्थात् अभिधा-वृत्ति है। जिस शक्तिके द्वारा कोष-व्याकरणादिमें प्रसिद्ध अर्थका बोध होता है, वह 'अभिधा' है। 'गौणवृत्ति' का अर्थ है लक्षणावृत्ति। जिस शक्तिके द्वारा किसी प्रयोजनके लिये अथवा बहुप्रयोगके कारण वास्तविक अर्थसम्बन्धीय अन्य अर्थका बोध होता है, वह 'लक्षणा-वृत्ति' है। 'भाष्य'-जैसे, “सूत्रस्थं पदमादाय वाक्यैः सूत्रानुसारिभिः। स्व-पदानि च वर्णन्त्ये भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥” अर्थात् “भाष्य तत्त्वको जाननेवालोंने उसे भाष्य कहा है जिसमें सूत्रमें स्थित पदोंको लेकर सूत्रका अनुसरण करनेवाले वाक्योंके द्वारा अपने पद (शब्दों) का वर्णन किया जाता है।”

४२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत