श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/११०-११३ ] अर्थात् “देवि ! मायावाद अत्यन्त असत्-शास्त्र है। यह बौद्धमत है, वैदिक-वाणियोंकी आड़में प्रच्छन्न रूपसे आर्योंके धर्ममें प्रवेश कर गया है। मैं कलिकालमें ब्राह्मण-मूर्त्ति धारणकर इस मायावादका प्रचार करूँगा। मैं नास्तिकोंको मोहित करनेके लिये भगवान्को निराकार और निर्विशेष घोषित करूँगा। इसी प्रकार मैं वेदान्तकी व्याख्या भी मायावादके अनुसार करके जगत्के नाशके लिये उन्हें भगवान्से दूर कर दूँगा।” शिवपुराणमें भगवत्-वाक्य— “द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु। स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिङ्मुखान् कुरु॥” अर्थात् “कलियुगमें मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे विमुख करो॥”१०८-११०॥ अमृताणुकणिका—गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित “जैवधर्म” का अठारहवाँ अध्याय और श्रीकेशवजी गौड़ीय मठसे प्रकाशित “मायावादकी जीवनी या वैष्णव विजय” ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं॥११०॥ (३) चित्विलास-वैभवमय भगवान् ही श्रुति-प्रतिपाद्य :— ‘ब्रह्म’-शब्दे मुख्य अर्थे कहे—‘भगवान्’। चिदैश्वर्य-परिपूर्ण, अनूर्ध्व-समान॥१११॥ ताँहार विभूति, देह, —सब चिदाकार। चिद्विभूति आच्छादिया कहे ‘निराकार’॥११२॥ तत्त्ववस्तुको निराकार और विष्णु-शरीरादिको मायिक-विकार कहना ही ‘मायावाद’ :— चिदानन्द-देह, ताँर स्थान, परिवार। ताँरे कहे,—प्राकृत-सत्त्वेर विकार॥११३॥ अनुवाद—‘ब्रह्म’ शब्दका मुख्य अर्थ है ‘भगवान्’, जो चित्-ऐश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और उनसे बड़ा अथवा उनके समान कोई नहीं है। उनकी विभूतियाँ (धाम-परिकरादि) और विग्रह (शरीर)—ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने उनकी चित्-विभूतियोंको आच्छादनकर उनको ‘निराकार’ बतलाया है। भगवान्का शरीर, धाम और परिकर, ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने इनको प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा है॥१११-११३॥ अनुभाष्य—सदानन्दयोगीन्द्रकृत ‘वेदान्तसार’ में— “वस्तु सच्चिदानन्दमद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादि-सकलजड़समूहः अवस्तु। अज्ञानन्तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधिभावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्ति। इदमज्ञानं समष्टिव्यष्ट्यभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते। इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्व-प्रधानम्; एतदुपहितं चैतन्यं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्व-सर्वनियन्तृत्त्वादिगुणकं सदसद्व्यक्तमन्तर्यामिजगत्कारणमीश्वर इति च व्यपदिश्यते। सकलाज्ञानावभासकत्वादस्य सर्वज्ञत्वम्।” शाङ्कर-वेदान्तिक सदानन्दने अपने ‘वेदान्तसार’ ग्रन्थमें संक्षेपमें शङ्करमतका तात्पर्य लिखा है। यह अब शाङ्कर-सम्प्रदायका अतिमान्य प्रामाणिक आधार है। “सच्चिदानन्द अद्वयवस्तु ही ब्रह्म है; अज्ञानादि सभी जड़समूह ही अवस्तु है। ‘अज्ञान’ कहनेपर सत् और असत्से पृथक्, अनिर्वचनीय, त्रिगुणात्मक, ज्ञानविरोधी भावरूप जो कुछ हैं, उन्हीं सभीको समझना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ४२५