श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 468, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ७/१११-११५ यह अज्ञान समष्टि और व्यष्टि भेदसे एक तथा अनेक रूपोंमें व्यवहृत होता है। यह समष्टि उत्कृष्ट उपाधिविशिष्ट होनेपर 'विशुद्धसत्त्व-प्रधान' नाम प्राप्त करता है। विशुद्धसत्त्व-प्रधान अज्ञानमें प्रतिफलित होनेसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, सदसदव्यक्त, जीवसमूहके अन्तर्यामी, जगत्के कारण 'ईश्वर' नामसे कहलाते हैं। 'ईश्वर'—सभी अज्ञानका प्रकाशक होनेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं।” इनके मतमें, ईश्वरत्व प्राकृत-सत्त्वका अज्ञानसे उत्पन्न विकारमात्र है। जीव मलिन-सत्त्वप्रधान और व्यष्टि-उपाधिविशिष्ट है। मध्यलीला, २५/३३-३४ संख्या द्रष्टव्य हैं॥१११-११३॥ आदेशपालक शङ्करका दोष ना रहनेपर भी उनके भाष्यके श्रवणसे जीवोंका सर्वनाश :- ताँर दोष नाहि, तेंहो आज्ञाकारी दास। आर येइ सुने, तार हय सर्वनाश ॥११४॥ अनुवाद-वेदान्तका इस प्रकार भाष्य करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे भगवान्के आज्ञाकारी दास हैं। किन्तु जो इस भाष्यका श्रवण करेगा, उसका सर्वनाश होगा॥११४॥ अनुभाष्य-मध्यलीला ६/१६९ संख्या द्रष्टव्य है॥११४॥ मायाधीश विष्णुको मायिक-मानना ही पाषण्डता :- प्राकृत करिया माने विष्णु-कलेवर। विष्णुनिन्दा आर नाहि इहार उपर ॥११५॥ अनुवाद-विष्णुके सच्चिदानन्दमय दिव्य कलेवरको प्राकृत अर्थात् पञ्चभौतिक माननेसे अधिक विष्णुनिन्दा नहीं हो सकती है॥११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विषयको पढ़ते ही जो अर्थ मुख्यरूपसे अर्थात् स्पष्टरूपसे प्रकाशित होता है, उसे 'मुख्यार्थ' कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद्में- “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते” (५/१) अर्थात् “अप्राकृत सच्चिदानन्द भगवान् जो पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, उनसे जितने अवतार आविर्भूत होते हैं, वे भी पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं।” श्वेताश्वतर उपनिषद्में- “विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणः” अर्थात् “आदिपुरुष भगवान्में विचित्र शक्तियाँ हैं”; “स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात् प्रपञ्च परिवर्ततेऽयम्। धर्मावहं पापनुदं भगेशं” (६/६), अर्थात् “पीपल वृक्षके समान जो संसार अथवा माया है, भगवान् उससे सम्पूर्णरूपसे अतीत हैं अर्थात् संसार वृक्षरूप माया उन्हें कभी भी स्पर्श नहीं कर पाती। वे केवल मायातीत नहीं हैं, अपितु वे मायाधीश हैं। माया उनकी ही बहिरङ्गा शक्ति है और उनके अधीन है। भगवान् स्वयं अप्राकृत गुणोंसे युक्त हैं और वे अपने भक्तोंको मायाके सभी दोषोंसे मुक्त करते हैं”; “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” (३/८) ४२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत