भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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अर्थात् “जिस प्रकार सूर्य उदित होकर रात्रिके समस्त अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, मैं भी उसी प्रकार भगवान्‌की कृपासे मायाके तमिस्र-अन्धकारसे मुक्त हुआ और तब उनके अप्राकृत स्वरूपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त किया”; “पतिं पतीनां परमं परस्तात्” (६/७) अर्थात् “वे सब ईश्वरोंके ईश्वर हैं और सर्वश्रेष्ठ हैं”; “महान् प्रभुर्वे पुरुषः” (३/१२) अर्थात् “वे सबके प्रभु और परम पुरुष हैं”; “परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते”। (६/८) अर्थात् “उन परमेश्वरकी शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है”। ऋग्वेदमें- “तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” अर्थात् “विष्णु परम भगवान् हैं और बुद्धिमान लोग उसके चरणोंका ध्यान करते हैं”; प्रश्नोपनिषद्में- “स ईक्षांचक्रे” (६/३) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”; ऐतरेये उपनिषद्में- “स ऐक्षत” (१/१/१) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”, “स इमाँल्लोकानसृजत” (१/१/२) अर्थात् “उन्होंने भौतिक जगत्की सृष्टि की”; तलवकार उपनिषद्में- “तद्धैषां विजज्ञौ तभ्यो ह प्रादु-र्बभूव” (३/२); -इस प्रकार बहुतसे वेद वाक्योंको पढ़ने मात्रसे ही षडैश्वर्य-परिपूर्ण, असमोर्ध्व, एक परतत्त्व भगवान् ही प्रतीत होते हैं। तब जो “अपाणिपादः” (श्वेः ३/१९) आदि आकार-निषेध वाक्य पाये जाते हैं, उनके द्वारा उन्हीं भगवान्‌के आकारको चिदाकार, उनके शरीर और विभूतियोंको चिद्विभूति-यही मात्र समझना होगा। मायावादियोंके प्रमुख आचार्योंने भगवान्‌की चिद्विभूतियोंको आच्छादनकर, उनको सत्त्वगुणका विकाररूप 'निराकार' कहकर स्थिर किया है। जब भगवान् स्वयं, उनका धाम और उनके परिकर, सभी प्रकृतिसे अतीत चिदानन्दस्वरूप हैं, तब उनको किस प्रकार प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा जा सकता है? वास्तवमें अप्राकृत चिद्विभूतिमय उनका आकार ही सत्य है। इस प्रकार निराकाररूपमें वर्णन करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका क्या दोष है? क्योंकि वे तो आज्ञाकारी दास हैं। जैसे नारद पञ्चरात्रमें-“माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा।” अर्थात् “मेरे तत्त्वको तुम छुपाओ जिससे यह सृष्टि उत्तरोतर बढ़े।” किन्तु अन्य जो व्यक्ति इस प्रकार व्याख्या श्रवण करेंगे, उनका सर्वनाश होता है। विष्णुकलेवरको 'प्राकृत' माननेकी भाँति विष्णुनिन्दा और हो नहीं सकती॥१११-११५॥