भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 470

[ ७/११५-११७ अनुभाष्य—सविशेष तत्त्ववस्तु ही विष्णु हैं। विष्णुकी प्रकृति ही प्राकृत जड़-जगत्की मूल है। विवर्तवाद विचारसे निर्विशेष-ब्रह्मकी प्रकृति या मायाशक्तिका वास्तविक अस्तित्व नहीं पाया जाता है। विष्णुमायाके सम्बन्धमें शास्त्रोंने बहुत वर्णन किया है। 'विष्णु'-मायासे उत्पन्न कोई देव-विशेष नहीं हैं। जो लोग इस प्रकार मानते हैं, उनकी विष्णुके विषयमें विपरीत धारणा है। विष्णुकी गणना प्राकृत-देवोंमें कभी भी नहीं हो सकती। जो लोग इस प्रकारसे भ्रान्त होते हैं, वे लोग ही विष्णुको प्राकृत देवताके रूपमें जानते हैं। श्रीभगवान्ने गीता (७/१४) में जीवोंके भवबन्धन-मोचनके लिये कहा है— “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥” अर्थात् “यह जीव-विमोहिनी एवं त्रिगुणात्मिका मेरी बहिरङ्गा शक्ति निश्चय ही दुस्तरा है, परन्तु जो मेरा ही आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस मायाको पार कर जाते हैं।” विष्णु-वैकुण्ठ वस्तु हैं। उनको प्रकृतिसे उत्पन्न देवता माननेसे वस्तुनिर्देश-सम्बन्धमें अपराध होता है—यही उनकी निन्दा है। विष्णु-अधोक्षज वस्तु हैं, उन्हें प्राकृत वस्तुकी भाँति जड़-इन्द्रियोंके द्वारा जाना नहीं जा सकता। उनके देह-देहीके मध्यमें अद्वयज्ञान अवस्थित है (अर्थात् उनकी देह और उन देहीमें कोई भेद नहीं है)। प्राकृत वस्तुओंमें देह-देहीका भेद वर्तमान है। प्राकृत वस्तुएँ भोगकी सामग्री हैं, किन्तु विष्णु नित्यकाल भोक्ता हैं। 'भोक्ता' को 'भोग्य' माननेसे अपराध होता है और जीवोंकी नित्यसेव्य-वस्तुको जीवोंके समान सेवक-ज्ञानसे परिचय देनेसे उनकी निन्दा ही होती है। आदिलीला ७/११२-११३ संख्याका अनुभाष्य और मध्यलीला २५/३५-३९ संख्या द्रष्टव्य हैं॥११५॥ तत्त्व-वस्तु-बृहत्-अग्निसदृश, जीव-उनके चिङ्गारी-कण :— तत्त्व येन ईश्वरेर ज्वलित ज्वलन। जीवेर स्वरूप-यैछे स्फुलिङ्गेर कण॥११६॥ जीव-शक्ति, श्रीकृष्ण-शक्तिमान्-तत्त्व :— जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान्। गीता-विष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण॥११७॥ अनुवाद-वास्तविक तत्त्व यह है कि यदि भगवान्‌को जलती हुई अग्निकी भाँति कहा जाय, तो जीवका स्वरूप उस अग्निके स्फुलिङ्ग-कण अर्थात् चिङ्गारीकी भाँति है। जीवतत्त्व भगवान्‌की तटस्था शक्ति है और श्रीकृष्णतत्त्व शक्तिमान् तत्त्व है। गीता और विष्णुपुराणादि इसके प्रमाण हैं॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ईश्वरके तत्त्वकी जलती हुई अग्निके साथ तुलना करनेसे अनन्त जीवोंकी उस अग्निकी चिङ्गारीके कण-स्वरूप तुलना की जाती है। तात्पर्य यह है कि, ईश्वर-चिन्मय, असीम, जलती हुई अग्निके समान हैं और अनन्त जीव उनसे चिङ्गारीके कण-स्वरूप पृथक् तत्त्व होकर निकले हैं। यहाँपर जीवके स्वरूप गठनमें मायाकी कोई क्रिया ४२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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