श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं है, अर्थात् कोई प्राकृत कार्यकलाप नहीं है। यदि कहो कि इस प्रकार चित्कणोंके गठनका क्या प्रयोजन है? तो सुनो, ईश्वरकी विचित्र स्वरूपशक्तिकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है—असीम-क्रियाप्रवृत्ति और अणु-क्रियाप्रवृत्ति। असीम-क्रियाप्रवृत्तिसे ईश्वर-स्वरूप और चित्जगत्रूप वैकुण्ठतत्त्व है; इस प्रवृत्तिको 'चित्शक्ति' कहा जाता है। अणु-क्रियाप्रवृत्तिसे अणुचैतन्यरूप अनन्त जीव प्रकट होते हैं; इस प्रवृत्तिको 'जीवशक्ति' कहा जाता है। स्वरूप-शक्तिकी यदि ये दो वृत्तियाँ नहीं रहतीं, तो भगवान्की पूर्णतामें कमी आ जाती। पूर्णेश्वर्यमय भगवान्के शक्तिगत अणुक्रियारूप जीवका अस्तित्व अनिवार्य और अत्याज्य है। इसलिये जीवतत्त्वसे ही श्रीकृष्णतत्त्वमें शक्तिमत्ता (विलास) है। जीवतत्त्वके ना रहनेसे श्रीकृष्णकी पूर्ण-शक्तिमत्ता स्वीकृत नहीं होगी। ईशितव्यके (सेवकके) अभावसे ईशिताका (स्वामीका) अभाव होता है॥११७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (७/५)— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥११८॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पञ्चभूतरूप स्थूल-जगत् है तथा मन, बुद्धि और अहङ्कार-रूप लिङ्ग-जगत् है। इस आठ प्रकारसे विभक्त प्रकृति—'अपरा' अथवा 'जड़ा' है; इसका नाम 'माया-प्रकृति' है। इससे पृथक् मेरी और एक 'परा-प्रकृति' है। यही प्रकृति ही जीवस्वरूप होकर इस जगत्में परिपूर्ण है। तात्पर्य यह है,—भगवान् ही एक मात्र वस्तु हैं; उनकी एक 'स्वरूप' अथवा 'आत्म'-शक्ति है। उसी स्वरूप-शक्तिसे पृथक्-प्राय, अर्थात् उसकी छायाकी भाँति जो शक्ति प्रतीत होती है, उसका नाम 'माया-शक्ति' है। स्थूल और लिङ्गमय जड़ ब्रह्माण्डोंकी इस 'माया' से सृष्टि हुई है। जीवतत्त्व मायासे अतीत है। जीवकी शुद्धसत्ता, शुद्ध-अहङ्कार और मनोवृत्ति—सभी मायासे अतीत किसी परा-शक्तिसे गठित है, इसलिये 'जीव' के निर्माण कार्यमें मायाका कोई अधिकार नहीं था। माया-जगत्में प्रविष्ट जीवकी जो जड़-भावान्वित अणुबुद्धि और अहङ्कार प्रतीत हो रहा है, वही केवल मायाका कार्य है। इसी मायाके सम्बन्धसे शुद्ध होकर अपने स्वरूपमें जीवके अवस्थानको 'मुक्ति' कहा जाता है। मुक्ति होनेपर माया-निर्मित अहङ्कार तक नहीं रहता है और जीवकी स्वतःसिद्ध जो भी चिन्मयी वृत्ति है, वह सब शुद्धरूपमें कार्य कर सकती है। इसलिये जीव भगवान्की एक शक्तिविशेष है॥११८॥ अनुभाष्य—इयम् अपरा (अचित्प्रकृतिः जड़त्वात् निकृष्टा)। इतः (जड़प्रकृतेः) अन्यां परां (चिन्मयीं) जीवभूतां (जीवस्वरूपां) मे (मम) प्रकृतिं विद्धि (जानीहि)। हे महाबाहो, यया (चेतनया जीवाख्याया शक्त्या) इदं (जड़ं) जगत् धार्यते (स्वभोगाय गृह्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अचित् प्रकृति जड़ होनेके कारण निकृष्टा है। मेरी अन्य एक जीव-स्वरूपा प्रकृतिको इससे श्रेष्ठ जानो। हे महाबाहो! जीव कहलानेवाली चेतन शक्ति इस जड़ जगत्को अपने भोगके लिये ग्रहण करती है॥११८॥