भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

नहीं है, अर्थात् कोई प्राकृत कार्यकलाप नहीं है। यदि कहो कि इस प्रकार चित्कणोंके गठनका क्या प्रयोजन है? तो सुनो, ईश्वरकी विचित्र स्वरूपशक्तिकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है—असीम-क्रियाप्रवृत्ति और अणु-क्रियाप्रवृत्ति। असीम-क्रियाप्रवृत्तिसे ईश्वर-स्वरूप और चित्जगत्रूप वैकुण्ठतत्त्व है; इस प्रवृत्तिको 'चित्शक्ति' कहा जाता है। अणु-क्रियाप्रवृत्तिसे अणुचैतन्यरूप अनन्त जीव प्रकट होते हैं; इस प्रवृत्तिको 'जीवशक्ति' कहा जाता है। स्वरूप-शक्तिकी यदि ये दो वृत्तियाँ नहीं रहतीं, तो भगवान्की पूर्णतामें कमी आ जाती। पूर्णेश्वर्यमय भगवान्के शक्तिगत अणुक्रियारूप जीवका अस्तित्व अनिवार्य और अत्याज्य है। इसलिये जीवतत्त्वसे ही श्रीकृष्णतत्त्वमें शक्तिमत्ता (विलास) है। जीवतत्त्वके ना रहनेसे श्रीकृष्णकी पूर्ण-शक्तिमत्ता स्वीकृत नहीं होगी। ईशितव्यके (सेवकके) अभावसे ईशिताका (स्वामीका) अभाव होता है॥११७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (७/५)— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥११८॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पञ्चभूतरूप स्थूल-जगत् है तथा मन, बुद्धि और अहङ्कार-रूप लिङ्ग-जगत् है। इस आठ प्रकारसे विभक्त प्रकृति—'अपरा' अथवा 'जड़ा' है; इसका नाम 'माया-प्रकृति' है। इससे पृथक् मेरी और एक 'परा-प्रकृति' है। यही प्रकृति ही जीवस्वरूप होकर इस जगत्में परिपूर्ण है। तात्पर्य यह है,—भगवान् ही एक मात्र वस्तु हैं; उनकी एक 'स्वरूप' अथवा 'आत्म'-शक्ति है। उसी स्वरूप-शक्तिसे पृथक्-प्राय, अर्थात् उसकी छायाकी भाँति जो शक्ति प्रतीत होती है, उसका नाम 'माया-शक्ति' है। स्थूल और लिङ्गमय जड़ ब्रह्माण्डोंकी इस 'माया' से सृष्टि हुई है। जीवतत्त्व मायासे अतीत है। जीवकी शुद्धसत्ता, शुद्ध-अहङ्कार और मनोवृत्ति—सभी मायासे अतीत किसी परा-शक्तिसे गठित है, इसलिये 'जीव' के निर्माण कार्यमें मायाका कोई अधिकार नहीं था। माया-जगत्में प्रविष्ट जीवकी जो जड़-भावान्वित अणुबुद्धि और अहङ्कार प्रतीत हो रहा है, वही केवल मायाका कार्य है। इसी मायाके सम्बन्धसे शुद्ध होकर अपने स्वरूपमें जीवके अवस्थानको 'मुक्ति' कहा जाता है। मुक्ति होनेपर माया-निर्मित अहङ्कार तक नहीं रहता है और जीवकी स्वतःसिद्ध जो भी चिन्मयी वृत्ति है, वह सब शुद्धरूपमें कार्य कर सकती है। इसलिये जीव भगवान्की एक शक्तिविशेष है॥११८॥ अनुभाष्य—इयम् अपरा (अचित्प्रकृतिः जड़त्वात् निकृष्टा)। इतः (जड़प्रकृतेः) अन्यां परां (चिन्मयीं) जीवभूतां (जीवस्वरूपां) मे (मम) प्रकृतिं विद्धि (जानीहि)। हे महाबाहो, यया (चेतनया जीवाख्याया शक्त्या) इदं (जड़ं) जगत् धार्यते (स्वभोगाय गृह्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अचित् प्रकृति जड़ होनेके कारण निकृष्टा है। मेरी अन्य एक जीव-स्वरूपा प्रकृतिको इससे श्रेष्ठ जानो। हे महाबाहो! जीव कहलानेवाली चेतन शक्ति इस जड़ जगत्को अपने भोगके लिये ग्रहण करती है॥११८॥

[ ७/११९-१२० चित्, जीव और माया-ये तीन प्रकारकी विष्णुशक्ति :- विष्णुपुराण (६/७/६०)- विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ११९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है ॥ ११९ ॥ अनुभाष्य-विष्णुशक्ति (विष्णोः स्वरूपशक्तिः) परा (चित्स्वरूपा) प्रोक्ता; तथा क्षेत्रज्ञाख्या (जीवशक्तिः च) परा प्रोक्ता; अन्या अविद्या कर्मसंज्ञा (कर्म यस्याः संज्ञा सा) तृतीया मायाशक्तिः इष्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ ईश्वरको जीवकी भाँति अज्ञानमय-बोध ही मायावाद :- हेन जीवतत्त्व लञा लिखि' परतत्त्व। आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ईश्वर-महत्त्व ॥ १२० ॥ अनुवाद-ऐसे जीवतत्त्वको शङ्कराचार्यने परतत्त्व (ब्रह्म) के रूपमें वर्णन किया है। इसके द्वारा उन्होंने सर्वश्रेष्ठ ईश्वरकी महिमाको आच्छादित कर दिया है ॥ १२० ॥ अनुभाष्य-ईश्वर, जीव और प्रकृतिस्वरूपको अनिर्वचनीय तथा अज्ञानके रूपमें लिखकर शङ्कराचार्यने ईश्वरके अलौकिक श्रेष्ठत्वका आच्छादन किया है। श्रीरामानुजपाद 'वेदान्तसार' में- “ननु 'आत्मा वा इदमग्रासीत्' इति प्राक्सृष्टेः एकत्वावधारणात् कथं सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्टस्य नारायणस्य कारणत्वम् ? उच्यते-'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति। परित्यक्तस्थूलाकाराणां सूक्ष्माकारापत्त्या ब्रह्मणि वृत्तिः प्रतिपाद्यते, न तु स्वरूपनिवृत्तिः; 'अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे देवे एकीभवति' इति तमःशब्द-वाच्यायाः प्रकृतेः परमात्मन्येकीभाव-श्रवणात्। पृथग्ग्रहणरहितत्वेन वृत्तिरेकीभावः; स एव लय-शब्दार्थः; यथा-वृक्षे लीनाः पतङ्गाः, वने लीनाः सारङ्गाः।” यदि कहो, 'जगत् सृष्टिके पहले केवलमात्र आत्मा थीं' (बृः आः १/४/१), ऐसा होनेसे किस प्रकारसे सूक्ष्म चिदचित्-शक्तिविशिष्ट नारायणका जगत्के मूल-कारण होना सम्भव होता ? इसके उत्तरमें कहा जा सकता है, “जिनसे ये भूतसमूह उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा पालित और जिनमें प्रविष्ट होते हैं” (तैः भृः प्रथम अ.) इस तैत्तिरीय-वाक्यसे प्रमाणित होता है कि सभी जीव अपने स्थूल जड़ आकारका परित्यागकर मुक्तावस्थामें सूक्ष्माकार ग्रहणकर ब्रह्ममें अपनी-अपनी वृत्ति (अवस्थिति) प्रमाणित करते हैं, उनका स्वरूप ध्वंस नहीं होता, क्योंकि अविनाशी आत्मा तमः-शब्दवाच्या प्रकृतिमें लीन होनेपर प्रकृतिका ब्रह्मके साथ अभेद (एकीभाव) होता है। उस समय प्रकृतिके साथ ब्रह्मकी पृथक्ता ना रहनेके कारण प्रकृतिका सत्त्व ब्रह्ममें ही अवस्थान करता है। 'लय' शब्दसे इस प्रकार ही समझना होगा जैसे, वृक्षमें स्थित पक्षी अथवा वनमें स्थित मृगसमूह वृक्षमें अथवा वनमें लीन अथवा अन्तर्निविष्ट होते हैं ॥ १२० ॥ ४३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२१ ] 'शक्तिपरिणाम-वाद' ही ब्रह्मसूत्रमें स्वीकृत :- व्यासेर सूत्रेते कहे 'परिणाम'-वाद। 'व्यास भ्रान्त'-बलि' तार उठाइल विवाद ॥१२१॥ अनुवाद—व्यासदेवने वेदान्त-सूत्रमें 'परिणाम'-वाद अर्थात् सब कुछ भगवान्‌की शक्तिका ही रूपान्तरण है, ऐसा कहा है। किन्तु शङ्कराचार्यने व्यासदेवको 'भ्रान्त' कहकर विवाद उठाया है॥१२१॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसूत्रकार श्रीवेदव्यासके “आनन्दमयोऽभ्यासात्” (ब्रः सूः १/१/१२) इस सूत्रको उपलक्ष्यकर “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति” (ब्रः सूः १/१/१९) इस सूत्रकी व्याख्यामें श्रीशङ्कराचार्यने जो लिखा है, उसका मर्मानुवाद—“आनन्दमय-वाक्यमें 'ब्रह्म'-शब्दका संयोग नहीं रहनेके कारण उनको मुख्यब्रह्म नहीं कह सकते। आनन्दमयको यदि 'ब्रह्म' कहा जाय, तो उसे अङ्ग होनेके कारण सविशेषब्रह्म ही कहना पड़ेगा, किन्तु 'आनन्दमय' वाक्यके अन्तमें निर्विशेष-ब्रह्म अभिहित है। आनन्दमय-शब्दसे आनन्द-प्रचुर अर्थात् प्राचुर्य अर्थमें 'मयट्' प्रत्यय (जिस अर्थमें चिद्विलासवादी भागवतोंने प्रयोग किया है, वह) कहनेपर उसमें दुःखका भी अस्तित्व है, ऐसा जाना जाता है; क्योंकि 'आधिक्य' अनुसारमें ही प्रचुर-शब्दका प्रयोग होता है, अल्पता उसका लक्ष्य नहीं रहता। आनन्दमय 'शुद्ध-ब्रह्म' नहीं है, यह कहकर ही श्रुतियोंमें आनन्दमयके अभ्यासकी (पुनः पुनः उक्ति) ना करके 'आनन्दमात्र' का अभ्यास किया है। यदि आनन्दमयका ब्रह्मत्व निश्चित होता, वैसा होनेपर ना होते हुए भी आनन्दमात्रके अभ्यासको आनन्दमयाभ्यास कहकर कल्पना की जा सकती है, किन्तु अङ्ग-सम्बन्ध ना रहनेके कारण आनन्दमयका अब्रह्मत्व ही निश्चित है; इन सभी कारणोंसे एवं “आनन्दं ब्रह्म” आदि श्रुतियोंमें परब्रह्मके विषयमें आनन्द-शब्दका प्रयोग होनेके कारण स्पष्ट समझा जा रहा है कि अन्यान्य श्रुतियोंमें भी 'आनन्दमात्र' ब्रह्म ही अभ्यस्त हुआ है, 'आनन्दमय' अभ्यस्त नहीं हुआ है। यद्यपि “आनन्दमयमात्मानम्” श्रुतियोंमें आनन्दमयका ही अभ्यास दृष्टिगोचर होता है, तथापि अन्नमय आदिके मध्य आनन्दमयका उल्लेख होनेपर आनन्दमयकी भी शुद्धब्रह्म बोधकता परास्त हुई है। 'आनन्दमय' वाक्यके निकट ही “उन्होंने कामना की, मैं बहुत होऊँगा”—इस प्रकार वाक्य रहनेपर भी शुद्धब्रह्मके साथ आनन्दमयके निकट-सम्बन्ध नहीं रहनेके कारण आनन्दमयको शुद्धब्रह्म नहीं समझा जा सकता। उसके बाद “वे ही रस (स्वरूप हैं)” आदि वाक्य भी उसीके सापेक्ष होनेके कारण आनन्दमय-बोधक नहीं हैं। “प्रिय ही उनका मस्तक है” आदि विभिन्न प्रकार अङ्ग-बोधक शब्द ना रहनेके कारण, यह निश्चित हुआ है कि, 'आनन्द' ही मुख्यब्रह्म है, 'आनन्दमय' नहीं। यदि कहो, सविशेष ब्रह्म ही तो उक्त श्रुतिका अभिप्रेत है? इसके उत्तरमें—ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि यह “अवाङ्‌मानसगोचर” अर्थयुक्त श्रुतिके द्वारा निरस्त होता है, इसलिये 'आनन्दमय'-शब्दका 'मयट्'-प्रत्यय विकारबोधक है, प्राचुर्यबोधक नहीं।” श्रीपाद शङ्करने इस प्रकार सूत्रोंकी व्याख्यामें 'मयट्' प्रत्ययको निकाल देनेके लिये अर्थात् इसका व्यर्थता अथवा बाहुल्य दिखानेके लिये एक ही वक्तव्य-विषयको १२-१९ सूत्रोंमें पुनः पुनः कहनेका कितना प्रयास नहीं किया है! इस सम्बन्धमें 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थमें श्रीमद् जीव गोस्वामी प्रभुकी उक्ति— सातवाँ अध्याय | ४३१

[ ७/१२१-१२६ “यदि च सूत्रकारस्य वेदान्तार्थानभिज्ञतां निगूढ़मभिप्रायता, तत्प्रमाद-मार्जन- स्वचातुरी-व्यङ्ग-भङ्ग्या तत् “आनन्दमय”-सूत्रमेवं व्याख्येयम्- 'आनन्दमयः' इत्यत्र "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते इति, तथा विकारसूत्रे (१/१/१३) च 'विकार'-शब्देनावयवः, 'प्राचुर्य'-शब्देन 'सादृश्यं' व्याख्येयम्, तदा सूत्रकारस्याशाब्दिकतैव च प्रसज्येत-तत्तच्छब्दादिभिस्तत्तदर्थानभिधानात्। 'मयट्'-प्रत्यय-विकार-प्राचुर्यशब्दानामनन्तरनिर्दिष्टानामन्यार्थत्वं न वा बालकस्यापि हृदयमारोहति।” “शङ्कराचार्यका भाष्य पाठ करके यह धारणा होती है कि उनका निगूढ़ अभिप्राय यही है कि सूत्रकार श्रीवेदव्यास वेदान्तका अर्थ समझनेमें अनभिज्ञ थे। इसलिये सूत्रकार आचार्य श्रीवेदव्यासके प्रमादका मार्जन करनेके उद्देश्यसे श्रीशङ्करने अपनी चातुर्य शैलीसे 'आनन्दमय' सूत्रकी इस प्रकार व्याख्या की है- 'आनन्दमय' आदि श्रुतिवाक्योंमें "ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा", इस श्रुतिवाक्यमें मुख्यब्रह्म ही 'उपदिष्ट' है; १/१/१३ सूत्रमें विकार-शब्दसे 'अवयव (अङ्ग)' और 'प्राचुर्य' शब्दसे 'सादृश्य' व्याख्या करूँगा। इस प्रकार व्याख्या होनेसे सूत्रकार (व्यासदेव) को जो शब्दज्ञान नहीं था, उसकी ही सम्भावना होती है; क्योंकि, उनके द्वारा व्यवहृत-शब्दके द्वारा वेदान्तका वैसा अर्थ नहीं होता है। मयट्-प्रत्ययसे उत्पन्न विकार-प्राचुर्य-शब्दादिके पश्चात् निर्दिष्ट शब्दसमूहका अन्य अर्थ हो ही क्या सकता है? यह बात तो एक बालकके हृदयमें भी आती है! अर्थात् मयट्-प्रत्ययमें 'विकार' और 'प्राचुर्यार्थ' के अतिरिक्त इसमें अन्य अर्थ जोड़ना ही नितान्त भ्रम है, वह सहज ही समझा जाता है।” मध्यलीला ६/१७०-१७५ एवं मध्यलीला २५/४०-४१ संख्या द्रष्टव्य है॥१२१॥ गुरुको भ्रान्त माननेवाले मायावादियोंका 'विवर्त्तवाद' :- परिणाम-वादे ईश्वर हयेन विकारी। एत कहि' 'विवर्त्त'-वाद स्थापना ये करि॥१२२॥ 'विवर्त्त' के आश्रय :- वस्तुतः परिणाम-वाद-सेइ से प्रमाण। देहे आत्मबुद्धि-हय विवर्त्तेर स्थान॥१२३॥ विवर्त्तवादका खण्डन-(१) अचिन्त्यशक्तिमान् भगवान् :- अविचिन्त्य-शक्तियुक्त श्रीभगवान्। इच्छाय जगद्रूपे पाय परिणाम॥१२४॥ (२) प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त :- तथापि अचिन्त्यशक्त्ये हय अविकारी। प्राकृत चिन्तामणि ताहे दृष्टान्त धरि॥१२५॥ नाना रत्नराशि हय चिन्तामणि हैते। तथापिह मणि रहे स्वरूपे अविकृते॥१२६॥ अनुवाद-श्रीशङ्कराचार्यने यह कहकर कि परिणाम-वाद स्वीकार करनेसे ईश्वरको विकारी स्वीकार करना पड़ेगा, 'विवर्त्त'-वादकी स्थापना की। वास्तवमें परिणाम-वाद ही सभी शास्त्रोंके ४३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२१-१२६ ]

द्वारा प्रमाणित है, किन्तु अपने भौतिक शरीरमें आत्मबुद्धि ही विवर्त्त है। भगवान् अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं और उनकी इच्छासे ही उनकी अचित्-शक्ति जगत्के रूपमें परिणत होती है, किन्तु भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्तिसे अविकारी ही रहते हैं। प्राकृत चिन्तामणि इसका दृष्टान्त है। जिस प्रकार चिन्तामणि नाना प्रकारके रत्नोंको उत्पन्न करती है, तो भी चिन्तामणि अपने स्वरूपमें अविकृत ही रहती है॥१२२-१२६॥ अनुभाष्य—श्रीलजीव गोस्वामीप्रभुने अपने 'परमात्मसन्दर्भ' (५८ संख्यामें)— “तद्वादे हि सर्वमेव जीवादि-द्वैतमज्ञानेनैव स्व-स्वरूपे ब्रह्मणि कल्प्यते इति मतम्। निरहङ्कारस्य केनचिद्धर्म्मान्तरेणापि रहितस्य सर्व-विलक्षणस्य चिन्मात्रस्य ब्रह्मणस्तु नाज्ञानाश्रयत्वं, न चाज्ञानविषयत्वं न च भ्रमहेतुत्वं सम्भवतीति। परमालौकिक-वस्तुत्वादचिन्त्य-शक्तित्वन्तु सम्भवेत्। यत् खलु चिन्तामण्यादावपि दृश्यते, यया त्रिदोषघ्नौषधिवत् परस्परविरोधिनामपि गुणानां धारिण्या तस्य निरवयवत्वादिके सत्यपि सावयवादिकमङ्गीकृतं तत्र शब्दश्वास्ति प्रमाणम्। “विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणो, न चान्येषां स्तादृशः स्युः” इत्यादिकः श्वेताश्वतरोपनिषदादौ। “आत्मोश्वरोऽतर्क्यसहस्रशक्तिः” इत्यादिकः श्रीभागवतादिषु। तथा च ब्रह्मसूत्रम् (२/१/२८)—“आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि” इति। तत्र द्वैतान्यथानुपपत्त्यापि ब्रह्मण्यज्ञानादिकं कल्पयितुं न शक्यते, असम्भवादेव। ब्रह्मण्यचिन्त्यशक्ति-सद्भावस्य युक्तिलब्धत्वात् श्रुतत्वाच्च द्वैतान्यथानुपपत्तिश्च दूरे गता। ततश्चाचिन्त्यशक्तिरेव द्वैतोपपत्तौ कारणं पर्यवसीयते। तस्मान्निर्विकारादि-स्वभावेन सतोऽपि परमात्मनोऽचिन्त्यशक्त्या विश्वाकारत्वादिनार परिणामादिकं भवति, चिन्तामणयस्कान्तादीनां सर्वार्थप्रसव-लोहचालनादिवत्। तदेतदङ्गीकृतं श्रीबादरायणेन—(ब्रः सूः २/१/१७) “श्रुतेस्तु शब्द-मूलत्वात्” इति। ततस्तस्य तादृश-शक्तित्वात् प्राकृतवन्माया-शब्दस्येन्द्रजालविद्यावाचित्वमपि न युक्तम्। किन्तु 'मीयते विचित्रं निर्मीयते अनया' इति विचित्रार्थक-शक्तिवाचित्वम्। तस्मात् परमात्मपरिणाम एव शास्त्रसिद्धान्तः। ××तत्र चापरिणतस्यैव सतोऽचिन्त्यया शक्त्या परिणाम इत्यसौ सन्मात्रतावभासमानस्वरूपव्यूहरूप-द्रव्याख्यशक्तिरूपेण परिणमते, न तु स्वरूपेणेति गम्यते। यथैव चिन्तामणिः। ×× अतएव क्वचिदस्य ब्रह्मोपादानत्वं क्वचित् प्रधानोपादानत्वं श्रूयते। ×× पूर्वं खलु वारिदर्शनाद् वार्याकारा वृत्तिर्जातापि तदप्रसङ्गसमये सुप्ता तिष्ठति, तत्तुल्यवस्तुदर्शनेन तु जागर्त्ति, तद्विशेषानुसन्धानं बिना तदभेदेन स्वतन्त्रतामारोपयति, तस्मान्न वारि मिथ्या, न वा तत्स्मरणमयी तदाकारा वृत्तिर्न वा तत्ुल्यं मरीचिकादि वस्तु, किन्तु तदभेदेनारोप एव अयथार्थत्वान्मिथ्या। स्वप्ने च (ब्रः सूः ३/२/३) “मायामात्रन्तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्त-स्वरूपत्वात्” इति न्यायेन जाग्रद्दृष्टवस्त्वाकारायां मनोवृत्तौ परमात्ममाया तद्वस्तवभेदारोपयतीति पूर्ववत्। तस्माद् वस्तुतस्तु न क्वचिदपि मिथ्यात्वम्। शुद्ध आत्मनि परमात्मनि वा तादृश-तदारोप एव मिथ्या, न तु विश्वं मिथ्येति। ×× किञ्च विवर्त्तस्य ज्ञानादिप्रकरणपठितत्वेन गौणत्वात्, परिणामस्य तु स्वप्रकरण-पठितत्वेन मुख्यत्वात् ज्ञानाद्युभयप्रकरण-पठितत्वेन संदंशन्यायसिद्ध-प्राबल्याच्च परिणाम एव श्रीभागवत-तात्पर्यमिति गम्यते।” (अर्थात्) विवर्त्तमें अथवा मिथ्यावादके आश्रयमें ही 'जीवादि सभी द्वितीयभावविशिष्ट तत्त्व' ब्रह्मके निजस्वरूपमें अज्ञानके द्वारा कल्पित हुए हैं। अन्य किसी प्रकारसे धर्मरहित, सर्वविलक्षण, अहङ्कारशून्य, चिन्मात्र ब्रह्मवस्तुकी अज्ञानाश्रयकी योग्यता, अज्ञानविषयपर आश्रित होना और भ्रमित होना कभी सम्भवपर नहीं है। ब्रह्मवस्तु—परम अलौकिक वस्तु हैं, इसलिये उनमें क्षुद्र मानवोंके चिन्तनसे परे अचिन्त्य शक्तिकी सम्भावना है। प्राकृत चिन्तामणि आदि वस्तुओंमें जब अलौकिक शक्ति दिखाई देती है, तब ब्रह्ममें भी अलौकिक शक्ति निश्चय ही अवस्थित है। वात, कफ और पित्त—तीन प्रकार दोष एक साथ एक रोगीमें होनेपर जिस प्रकार परस्पर विरोधी धातुका शोधन करनेके लिये औषधिकी व्यवस्था है, उसी प्रकार परस्पर विरोधी तीन गुणोंको धारण करनेवाली शक्तिके द्वारा ब्रह्मके निराकार होनेपर भी शरीर-अङ्गादि स्वीकृत हैं।

सातवाँ अध्याय | ४३३

[ ७/१२१-१२६ इस विषयमें वेद प्रमाण है- (श्वेताश्वतर उपनिषद्) - "सनातनपुरुष विचित्रशक्ति युक्त हैं; अन्योंमें उनके जैसी शक्तियाँ नहीं है।" श्रीमद्भागवतादिमें भी “आत्मा ईश्वर अतर्क्य, सहस्रशक्तियुक्त है", ऐसा उल्लेख है। ब्रह्मसूत्रमें भी “आत्मामें इस प्रकार विचित्रता है।" (अद्वैतवादियोंके मतानुसार) ब्रह्ममें द्वैतभावकी सङ्गति ना रहनेके कारण ब्रह्ममें अज्ञानादिकी असम्भावनाकी कल्पना नहीं की जा सकती। परन्तु “ब्रह्म अचिन्त्यशक्ति-समन्वित" इस युक्ति और श्रुतिवाक्यसे उनमें द्वैतकी असङ्गति दूर होती है। ऐसा होनेसे अचिन्त्यशक्ति ही द्वैतोपपत्तिका (द्वैतके औचित्यका) कारण होना ही अवशिष्ट रहता है। इसलिये निर्विकारादि-स्वभावसम्पन्न होनेपर भी परमात्माका अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे विश्वरूपमें परिणामादि सङ्घटित होता है। जिस प्रकार चिन्तामणि स्वयं विकारयुक्त ना होकर सर्वार्थ उत्पन्न करनेमें समर्थ है, चुम्बक स्वयं विकारयुक्त ना होकर अन्य लोहोंको आकर्षण-चालनादि करानेमें समर्थ है, उसी प्रकार ब्रह्मवस्तु विकृत ना होकर ब्रह्मकी विकारयोग्य शक्ति ही विकृत होकर विश्वाकारमें परिणत होती है। ऐसा होनेपर भी ब्रह्मकी ऐसी शक्ति रहना प्राकृतकी भाँति माया-शब्दकी इन्द्रजालविद्या नहीं है। किन्तु इस मायाके द्वारा विचित्रता निर्मित होती है अर्थात् यह विचित्रताको प्रकाश करनेवाली शक्ति है। इसलिये परमात्माका परिणाम ही यह विश्व है- यही शास्त्रसिद्धान्त है। ×× अपरिणामी सत्यवस्तुकी ही अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे परिणति होती है। स्वयं प्रकाशमान् स्वरूपका ही विस्ताररूप द्रव्यनामक शक्ति है; उसी शक्तिरूपकी ही परिणति होती है, परन्तु स्वरूपका परिणाम नहीं होता। जिस प्रकार चिन्तामणि अपनी शक्तिके द्वारा अनेक पदार्थोंको प्रसव करनेपर भी स्वयं अविकृत ही रहती है। ×× इसलिये कोई-कोई इस विश्वका उपादान 'ब्रह्म' है, फिर कोई-कोई 'प्रधान' को विश्वका उपादान कहते हैं, ऐसा सुना जाता है। ×× जैसे पहले जलको देखकर जलके सम्बन्धमें हृदयमें एक धारणा उदित होती है और जलके अप्रसङ्गके समय वह भाव निद्रित रहता है। परन्तु जलके समान किसी वस्तु (मरीचिका) के दर्शनसे वह वृत्ति जाग्रत हो जाती है। उस वस्तु (मरीचिका) के विशेष अनुसन्धानके बिना उस वस्तुको पूर्व वस्तु (जल) के साथ अभेद कहकर, स्वेच्छापर होकर आरोप करनेसे (मरीचिका जलके समान दिख रही है, इस कारण) जल मिथ्या नहीं हो जाता, अथवा 'जलके समान मरीचिका' आदि वस्तु भी मिथ्या नहीं होती, किन्तु जलके साथ मरीचिकाको अभेद मानना ही अयथार्थ अथवा मिथ्या है। स्वप्नमें भी (ब्रः सूः ३/२/३) “माया-मात्र ही समस्त अप्रकाशित स्वरूप है" - इस न्यायके अवलम्बनसे जाग्रत अवस्थामें देखी वस्तुकी आकाररूपिणी मनोवृत्तमें परमात्माकी माया पूर्व उदाहरणके जैसे उन वस्तुओंके अभेदका आरोप कर देती है, इसलिये वस्तुतः कुछ भी मिथ्या नहीं है। इसलिये शुद्धात्मा परमात्मामें उस प्रकारका आरोप ही मिथ्या है, विश्व मिथ्या नहीं है। ×× और भी विवर्त्तवादका उदाहरण ज्ञानादि-प्रकरणमें उल्लिखित होनेपर वह गौण है और परिणामवादका स्वप्रकरणमें पाठ होनेपर उसे मुख्य कहा गया है। तथा शक्तिपरिणामवादका ज्ञान-प्रकरण और स्वप्रकरण दोनोंमें पठित होनेसे सन्दंश (चिमटा)-न्यायसिद्ध-प्रबलताके कारण शक्ति-परिणामको ही श्रीभागवतका तात्पर्य कहकर जाना जाता है॥१२१-१२६॥ ४३४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२७ ] (३) शक्ति-परिणत होनेपर भी स्वयं विकार-रहित :— प्राकृत-वस्तुते यदि अचिन्त्यशक्ति हय। ईश्वरेर अचिन्त्यशक्ति,—इथे कि विस्मय॥ १२७॥ अनुवाद—यदि एक प्राकृत वस्तु चिन्तामणिमें ऐसी अचिन्त्यशक्ति है, तो ईश्वरमें भी अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ १२७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीवतत्त्व शक्तिविशेष है। उस जीवतत्त्वको ‘अणुचैतन्य’ रूपमें सिद्ध ना कर ‘ब्रह्म’-रूपमें सिद्ध करनेसे अवश्य ही भ्रममय सिद्धान्त होगा। श्रीशङ्कराचार्यने ईश्वरकी आज्ञाके अनुसार ईश्वरतत्त्वको आच्छादन करनेके अभिप्रायसे जीवतत्त्वके साथ परतत्त्वका ऐक्य स्थापितकर भ्रममय सिद्धान्तका प्रचार किया है। व्याससूत्र अर्थात् वेदान्तसूत्रमें वस्तुतः (शक्ति)-परिणामवाद स्वीकृत हुआ है। श्रीशङ्कराचार्यने परिणाम-वादसे ‘ईश्वरको विकारी कहना होगा’—यह वितर्क उठाया और परिणाम-वाद माननेसे वेदव्यासको ‘भ्रान्त’ मानना होगा—यह युक्ति विचारकर ‘विवर्त्तवाद’ को स्थापित किया। ब्रह्मसूत्रके द्वितीय अध्यायके प्रथमपादमें “तदनन्यत्वमारम्भण-शब्दादिभ्यः” इस चौदहवें सूत्रके भाष्यमें “वाचारम्भणं विकारो नामधेयं” (छाः ६/१/४) आदि वेदवाक्योंका उदाहरण देकर उन्होंने परिणाम-वादको दोषयुक्त विकार-वाद कहकर वितर्क किया है। वास्तवमें ब्रह्मसूत्रमें ईश्वरकी इच्छामात्र उनकी अचिन्त्यशक्तिके कार्य-विकारके रूपमें है, इस प्रकार परिणाम-वाद प्रदर्शित हुआ है। परिणामका लक्षण यह है—“स-तत्त्वतोऽन्यथा-बुद्धिर्विकार इत्युदाहृतः।” एक सत्य-तत्त्वसे अन्य एक सत्य-तत्त्वके उदय होनेपर, उसे अन्य वस्तुके रूपमें मानना ‘विकार’ अर्थात् परिणाम है। ‘ब्रह्म’ एक सत्यवस्तु है, उनसे ‘जीव’रूप एक सत्यवस्तु और ‘मायिक-ब्रह्माण्ड’रूप एक सत्यवस्तु पृथक् रूपमें प्रकट हुई हैं, ऐसा माननेको ब्रह्मका ‘विकार’ या ‘परिणाम’ कहा जाता है। विकार या परिणामका उदाहरण यह है—‘दूध’ एक सत्य पदार्थ है, वही दूध अन्य एक सत्य पदार्थ ‘दही’के रूपमें विकृत होता है। “ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” (छाः ६/८/७) इस प्रकार वेदवाक्यके द्वारा ‘ब्रह्म ही यह जगत् है’, इसमें कोई संशय नहीं होता है। ब्रह्मकी एक अचिन्त्यशक्ति है, वह “परस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते” (श्वेः ६/८) वेदवाक्यसे प्रमाणित होता है। उस शक्तिसे ब्रह्मका सत्यधर्म ही जगत्-रूपमें परिणत होता है—इस प्रकारके सिद्धान्तमें किसी प्रकारका दोष नहीं हो सकता। (छाः ६/२/१)—“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, (छाः ६/२/३)—“तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय” अर्थात् “अद्वयज्ञानतत्त्व भगवान्‌की ईक्षणशक्तिसे उनकी इच्छानुसार जगत्‌की समस्त वस्तुओंकी सृष्टि हुई”, (छाः ६/८/४)—“सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः” अर्थात् “हे सौम्य! ब्रह्म ही समस्त जीवोंका एकमात्र मूल आधार हैं”, (छाः ६/८/७)—“ऐतदात्म्यमिदं सर्वं” अर्थात् “वे अनादिरादि ब्रह्म अथवा भगवान् इस पृथ्वीपर सभीके एकमात्र मूल अथवा आधार हैं”; आदि छान्दोग्य-वाक्योंमें वह ब्रह्म अपनी पराशक्तिसे इस चित्-जड़ात्मक जगत्‌के रूपमें परिणत होता है,—यही प्रसिद्ध है। जगत् और जीव ‘उपादेय’ हैं तथा ब्रह्म ‘उपादान’ है। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” अर्थात् “जिनसे ये सब प्राणी उत्पन्न सातवाँ अध्याय | ४३५

[ ७/१२७-१२८ हुए हैं” (तैः, भूः १ अः), इस वेदवाक्यमें ब्रह्मका उपादानत्व और जीव तथा जड़का उपादेयत्व स्वीकृत हुआ है। परिणाम-वादका यथार्थ मर्म ना समझ पानेसे यह 'जगत्' और 'जीव' पृथक् सत्य तत्त्व हैं, यह समझ नहीं आता है। 'सन्मूलाः सौम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः” (छाः ६/८/४) आदि वाक्योंसे स्पष्ट होता है कि 'जीव' और 'जड़जगत्' निश्चितरूपमें सत्यवस्तु हैं। ऐसा कहनेपर ब्रह्ममें विकार होगा—इस निरर्थक भयसे, रस्सीमें साँपकी अथवा सीपमें रजतके भ्रमकी भाँति मिथ्या-स्वरूप जीव और जगत्की कल्पना करना वञ्चना मात्र है। परन्तु माण्डूक्य़ादि उपनिषदमें 'रस्सीमें सर्पबुद्धि' और 'सीपमें रजतबुद्धि', ये जो उदाहरण देखे जाते हैं, वे केवल विशेष स्थितिके लिये हैं। जीव शुद्धचित्कण है। मानव देहप्राप्त जीव इस जड़ शरीरमें जो आत्मबुद्धि करता है, वही 'विवर्त्त' का स्थान है। 'विवर्त्त' की परिभाषा इस प्रकार है—“अतत्त्वतोऽन्यथाबुद्धिर्विवर्त्त इत्युदाहृतः।” अर्थात् जो वस्तु जैसी नहीं है, उसको वैसी वस्तुके रूपमें माननेका नाम 'विवर्त्त' है। जीवके लिये 'विवर्त्त' एक महादोष है, बद्धजीव उस विवर्त्तबुद्धि-दोषसे दूषित है। इस प्रकारके विवर्त्त-दोषको मूल-विश्वतत्त्वमें और जीवतत्त्वमें आरोपित करना नितान्त निकृष्ट विचार है। अचिन्त्य-शक्तिको भूल जानेपर ही इस प्रकारके भ्रमका उदय होता है। भगवान् जिस प्रकार जगत्के रूपमें परिणत हुए हैं, उसका एक सामान्य दृष्टान्त है। अनेक लोग कहते हैं—प्राकृत जगत्में 'चिन्तामणि' नामक एक निधि है, वह अनेकों प्रकारके रत्नोंको उत्पन्न करके भी स्वयं अविकृत-स्वरूपमें रहती है। एक प्राकृत वस्तुमें यदि इस प्रकार अचिन्त्यशक्ति रहती है, तो ईश्वरकी उससे जो अनन्तगुणा एक अचिन्त्यशक्ति है, इसमें आश्चर्यका विषय क्या है?॥१२०-१२७॥ वेदवृक्षका बीज प्रणव ही महावाक्य और ईश्वर-स्वरूप :- 'प्रणव' से महावाक्य—वेदेर निदान। ईश्वरस्वरूप प्रणव—सर्वविश्व-धाम ॥ १२८ ॥ अनुवाद—प्रणव (ॐकार) वेदोंका महावाक्य है और वेदके मन्त्रोंका आधार है। प्रणव भगवत्-स्वरूप है और समस्त जगत्का धामस्वरूप (आधार) है॥१२८॥ अनुभाष्य—गीतामें— “ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥” (८/१३) अर्थात् “जो व्यक्ति सभी इन्द्रियरूप द्वारोंको विषयोंसे संयमितकर, मनको हृदयमें निरोधकर, भ्रूद्वयके मध्यमें प्राणवायुको स्थापित करते हुए आत्मविषयक समाधिरूप योगस्थैर्यसहित 'ॐ'—इस एकाक्षर ब्रह्मवाचक शब्दका उच्चारण करते-करते तथा मुझे ध्यान करते-करते देहत्यागपूर्वक प्रयाण करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं।” “वेद्यं पवित्रमोङ्कारः” (९/१७) अर्थात् “मैं ज्ञेय वस्तु हूँ, मैं शोधक हूँ, मैं ॐकार हूँ।” “ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः” (१७/२३)। अर्थात् “ब्रह्मके तीन प्रकारके निर्देशक नाम कहे गये हैं—ॐ, तत् और सत्।” ४३६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

(छाः उः १/१/१, १/४/१)— “ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति हृद्गायति। तस्योपव्याख्यानम्” अर्थात् “भक्त साधक ओम् (अ-उ-म) को उद्गीथ् (परमात्माका तीन अक्षरोंका नाम) जानकर उनका अनुशीलन करेंगे। पहले इस ओम् (अ-उ-म) का उच्चारण करके वेदाध्ययन आरम्भ करेंगे।” (अथर्वशिखा २)— “प्रणवः सर्वान् प्राणान् प्रणामयति नामयति, चैतस्मात् प्रणवश्चतुर्द्धाऽवस्थित इति वेद देवयोनिर्ध्येयाश्चेति संवर्त्ता सर्वेभ्यो दुःखभयेभ्यः संतारयति, तारणात् तानि सर्वाणीति विष्णुः सर्वान् जयति।” अर्थात् “प्रणव ही सभी प्राणोंको प्राणवान और नामयुक्त (ज्ञेय) बनाता है। इस प्रकार प्रणव चार रूपोंमें स्थित है—वेद, देवयोनि, ध्येय और संवर्त्ता। सम्पूर्ण दुःखोंसे तारण करनेवालेको संवर्त्ता कहते हैं। विष्णु ही सबको तारते हैं, इसलिये वे संवर्त्ता कहलाते हैं। वे सर्वोर्ध्व (सबसे ऊपर) विराजमान हैं।” (माण्डूक्य १)— “ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्; तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव, यच्चान्यत्रिक-कालातीतं तदप्योङ्कार एव।” अर्थात् “ॐ वेद अथवा उपनिषद्का रहस्य प्रकाशक शब्दब्रह्म है और यह परब्रह्मका स्वरूप है। जो सृष्टिके पूर्व वर्तमान हैं, भविष्य अर्थात् प्रलयके अन्तमें भी जिनकी नित्य अवस्थिति है, उनका ही प्रकाशक शब्दब्रह्मस्वरूप ॐकार है।” (तैः, शिः, ८वाँ अ.)— “ओमिति ब्रह्म। ओमितीदं सर्व। ओमिति सामानि गायन्ति। ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मैवापाप्नोति।” अर्थात् “यह ॐ ब्रह्म है। यह ॐ ही सब कुछ है। ॐ के साथ ही सभी साम-गान होता है। ॐ के साथ ही ब्राह्मण पढ़ाना आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि मुझे ब्रह्मकी प्राप्ति हो तथा वे ब्रह्मको प्राप्त करते हैं।” श्रीभगवत् संदर्भ (संख्या-४८) में- “श्रुतौ च प्रणवमुद्दिश्य-“ओमित्येतद् ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम, यस्मादुच्चार्यमाण एव संसारभयात् तारयति, तस्मादुच्यते तार इति।” तस्माद् भगवत्स्वरूपमेव नाम। स्पष्टोश्लोकं श्रीमन्नारदपञ्चरात्रेऽष्टाक्षरमुद्दिश्य-“व्यक्तं हि भगवानेव साक्षान्नारायणः स्वयम्। अष्टाक्षर-स्वरूपेण मुखेषु परिवर्त्तते॥” इति; माण्डूक्योपनिषत्सु (४/४-७) च प्रणवमुद्दिश्य-“ॐकार एवेदं सर्वम्। ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्।” “प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः। अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः॥ सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च। एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम्॥ प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदये स्थितम्। सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति॥ अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः। ॐकारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः॥” न तु परमेश्वरस्यैव तत्तद्योग्यतासम्भवाद् वर्णमात्रस्य तथोक्तिः स्तुतिरूपैवेति मन्तव्यम्। अवतारान्तरवत् परमेश्वरस्यैव वर्णरूपेणावतारोऽयमिति अस्मिन्नर्थे तेनैव श्रुतिवलेनाङ्गीकृते तदभेदेन तत्-सम्भवात्। तस्मान्नामनामिनोरभेद एव।” अर्थात् ‘ॐ’ यही परब्रह्मका सबसे श्रेष्ठ घनिष्ठ (मधुरतम) नाम है; उच्चारणके आरम्भसे ही जो जीवको संसार-भयसे परित्राण करता है, इसलिये वह ‘तार’ नामसे भी प्रसिद्ध है। [श्रीधरस्वामिपादने श्रीमद्भागवतकी अपनी टीकाके प्रारम्भमें, ॐकारसे आरम्भ होनेके कारण

[ ७/१२८ श्रीमद्भागवतको 'ताराङ्कुर' नाम दिया है।] इसलिये श्रीनाम साक्षात् भगवत्स्वरूप ही है। अष्टाक्षर मन्त्रको उद्देश्य करके श्रीनारदपञ्चरात्रमें स्पष्टरूपसे कहा है,—"यह प्रसिद्ध है कि भगवान् श्रीनारायण स्वयं ही अष्टाक्षरस्वरूपमें जीवोंके मुखमें साक्षात् उदित होते हैं।" प्रणवको उद्देश्य करके माण्डूक्योपनिषदमें भी— "चित्-दर्शनमें जो कुछ दिखलायी देता है, सब कुछ ही ओंकार—'ॐ' यही अक्षर है।" "ब्रह्मका और एक अविर्भाव—प्रणव है; उसे परमवस्तु कहा जाता है। वह अपूर्व, अबाध, अबाह्य, परम और अव्यय है। वह सभीका आदि, मध्य और अन्त है। इस प्रकारसे प्रणवको जानकर जीव अमृत भोग करता है। सभीके हृदयमें अवस्थित प्रणवको ईश्वर-स्वरूप जानना चाहिये। ॐ-कारको सर्वव्यापी विभु अर्थात् विष्णु-स्वरूप माननेसे बुद्धिमान् व्यक्तिको और शोक करना नहीं पड़ता अर्थात् उसकी और शूद्रता नहीं रहती। ॐ जड़-मात्राहीन होकर भी अनन्त-मात्रायुक्त हैं; उनसे ही जड़ीय द्वैतज्ञानका उपशम होकर अद्वयज्ञान प्राप्त होता है, इसलिये वे परममङ्गल-स्वरूप हैं।" यहाँ पर ऐसा विचार नहीं करना चाहिये कि परमेश्वरके लिये (प्रणव) अवताररूपमें ये सभी मङ्गल विधान असम्भव होनेके कारण एक जड़ीय वर्ण या अक्षरमात्रकी इस प्रकार उक्तिमें वास्तव सत्य नहीं है—यह केवल स्तुतिरूप मात्र है। वास्तवमें, परमेश्वरके अन्यान्य अवतारोंकी भाँति यह प्रणव ही उनका एक वर्णरूपी अवतार है; क्योंकि यह अर्थ पूर्वोक्त श्रुतिवचनके बलसे ही स्वीकृत होकर उनसे अभिन्न होनेके कारण तत्सम्भावना-हेतु यही अर्थ ही ठीक है। इसलिये भगवान्का नाम और नामी-भगवान्—परस्पर अभिन्न हैं, इसमें सन्देह नहीं है। ॐ अथवा प्रणव ही वेदका निदानस्वरूप महावाक्य हैं। प्रति वैदिक मन्त्रके आदिमें और अन्तमें प्रणव निहित हैं। प्रणव—ईश्वरस्वरूप है। "अकारेणोच्यते कृष्णः सर्वलोकैक-नायकः। उकारेणोच्यते राधा मकारो जीववाचकः॥" अर्थात् अ-कार उच्चारणसे सर्वलोकोंके नायक श्रीकृष्ण, उ-कार उच्चारणसे उनकी स्वरूपशक्ति श्रीराधाको समझना चाहिये तथा म-कार जीव-वाचक है॥ १२८॥ अमृतानुकणिका—वर्णनीय विषयसमूह जिस वाक्यमें होता है, उसको महावाक्य कहते हैं। श्रीरामचन्द्रके सम्बन्धमें समस्त वर्णनीय विषय रामायणमें हैं। इसलिये 'रामायण' श्रीराम-विषयक महावाक्य हुआ। इसी प्रकार महाभारत कुरु-पाण्डवों सम्बन्धी महावाक्य है। किन्तु रामायण, महाभारतादि अपेक्षित महावाक्य हैं—विशेष-विशेष विषयके सम्बन्धमें महावाक्य मात्र हैं। किन्तु निरपेक्ष महावाक्य वह होगा जो प्राकृत और अप्राकृत जगत्का जहाँ जो कुछ भी है, उस समस्तको ही लक्ष्य करे, वह समस्त उसके अन्तर्भुक्त हो। श्रील जीवगोस्वामीने सर्वसम्वादिनीमें कहा है,—"वाक्य समुदायको महावाक्य कहते है। उपक्रम (ग्रन्थकी भूमिका), उपसंहार (ग्रन्थके अन्तमें सारांश), अभ्यास (पुनः-पुनः उल्लेख), अपूर्वता (अद्भुत अथवा अज्ञात), फल, अर्थवाद (किसी उद्देश्यका प्रकटीकरण) और उपपत्ति (युक्ति-प्रमाण अथवा सिद्धान्त)—ये सब शास्त्र-तात्पर्य निर्णयके उपाय हैं। अर्थात् उपक्रम और उपसंहारका एकरूपत्व, अभ्यास, अपूर्वता, फल, प्रशंसा और युक्तित्व—इन छह उपायोंके द्वारा ही शास्त्रका तात्पर्य निर्णय करना होता है। इस प्रकारसे अन्वय-व्यतिरेक विचारप्रणालीके ४३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१२८ ] अवलम्बनसे गतिसामान्यके द्वारा भी महावाक्यके अर्थका निर्णय करना कर्त्तव्य है। श्रील जीवगोस्वामीकी इस उक्तिसे जाना जाता है—वेद-वेदान्त-उपनिषद्-पुराण-इतिहासादिका मुख्य वक्तव्य विषयसमूह सूक्ष्मरूपमें जिसके मध्यमें (बीजके मध्यमें वृक्षके जैसे) अवस्थित, जिसकी बात इन समस्त शास्त्रोंमें अन्वयी और व्यतिरेकी प्रणालीसे तथा उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा भी प्रतिपादित हो, वही महावाक्य है। इस प्रकारका लक्षण एकमात्र प्रणवमें (ओंकार ‘ॐ’ में) ही है और किसी वाक्यमें ही नहीं है। प्रणव या ब्रह्मसे ही समस्त शास्त्रोंका उद्भव हुआ है—सभी श्रुतियाँ यही कहती हैं। मैत्रेयी उपनिषद्— “अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् यद् ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेदः अथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणम्। (६/३२)॥” अर्थात् चारों वेद, इतिहास, पुराणादि ये प्रणव या ब्रह्मसे प्रादुर्भूत हुए हैं, प्रणवकी ही अभिव्यक्ति हैं, ये समस्त शास्त्र सूक्ष्मरूपमें प्रणवके ही अन्तर्निहित हैं। इसलिये प्रणव ही समस्त शास्त्र-वाक्योंका समष्टि रूप ही है। प्रणव ही महावाक्य है। समस्त शास्त्र ही अन्वयी-व्यतिरेकी भावसे इस प्रणव या ब्रह्मके विषयमें ही कहते हैं, इन समस्त शास्त्रोंमें उपक्रम-उपसंहारादिके द्वारा इन्हीं प्रणव अथवा ब्रह्मको प्रतिपादित किया गया है। इसलिये प्रणव ही महावाक्य है। यह परिदृश्यमान् जगत् और जगत्के जीवसमूह प्रणवसे ही उद्भूत हुए हैं, इसलिये प्रणवके साथ इनका एक नित्य, अकाट्य सम्बन्ध है, इसलिये प्रणव ही सम्बन्ध-तत्त्व है। उपरोक्त श्रुति प्रमाणोंसे यही सूचित होता है। किन्तु किसी कारणसे जगत्में स्थित जीव प्रणवके साथ अपने इस नित्य सम्बन्धकी बात भूल गया है। इसी सम्बन्धकी स्मृतिको जाग्रत करनेके लिये जगत्के सृष्टि-स्थिति-विनाशके एकमात्र कारणरूप प्रणवकी उपासनाकी बात भी श्रुतियोंमें दिखायी देती है। “एष आत्मा श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः”, “सर्वे वेदा यत्पदमानमन्ति” आदि श्रुति वाक्योंमें ब्रह्मस्वरूप प्रणवकी उपासनाके विषयमें कहा गया है। श्रुतियोंके सभी वाक्य प्रणवकी उपासनाके उपदेशसे अभिधेय-तत्त्वकी बात ही कहते हैं। इस उपासनाका क्या फल होगा, यह भी श्रुतियाँ बतलाती हैं। कठोपनिषद्— “एतद् हि एव अक्षरं ब्रह्म एतद् एव अक्षरं परम्। एतद् हि एव अक्षरं ज्ञात्वा यो यद् इच्छति अस्य तत्॥ एतद् आलम्बनं श्रेष्ठम् एतद् आलम्बनं परम्। एतद् आलम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते॥” अर्थात् “उपासनाके द्वारा प्रणवको जान लेनेपर उनकी उपलब्धि होती है; जो जैसी इच्छा करता है, वह वही लाभ करता है। जीव इच्छा करनेपर प्रणवरूप ब्रह्मके लोकको भी प्राप्त कर सकता है।” इन सब श्रुति-वाक्योंसे प्रणवकी उपासनाके फलस्वरूप प्रयोजन तत्त्वकी बात ही कही गयी है। इस प्रकार यह देखा गया है—सम्बन्ध-तत्त्व, अभिधेय-तत्त्व और प्रयोजन-तत्त्व, प्रणवके ही अन्तर्भुक्त हैं। वेद-वेदान्त-उपनिषदादि समस्त शास्त्रोंका प्रतिपाद्य भी ये तीन तत्त्व ही हैं। ये तीनों तत्त्व ही प्रणवके अन्तर्निहित होनेसे प्रणव ही ‘वाक्यसमुदायः’-रूप महावाक्य है—यही प्रमाणित हुआ है॥१२८॥ सातवाँ अध्याय | ४३९

[ ७/१२९-१३२ ईश्वर-वाच्य, प्रणव-वाचक; 'तत्त्वमसि आदि'- वेदके एक अंशके सूचकमात्र :- सर्वाश्रय ईश्वरेर करि प्रणव उद्देश। 'तत्त्वमसि'-वाक्य हय वेदेर एकदेश ॥ १२९ ॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' सभीके आश्रय ईश्वरको ही लक्ष्य करता है, किन्तु 'तत्त्वमसि' वेदका यह वाक्य एकदेशीय है॥ १२९॥ अनुभाष्य—'तत्त्वमसि' श्रुति—छान्दोग्य उपनिषद् (६/८/१६) में—“स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति” ऐसा देखा जाता है। श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित चार वैदिक महावाक्योंमें 'तत्त्वमसि' एक है॥ १२९॥ 'प्रणव' महावाक्य—ताहा करि' आच्छादन। महावाक्ये करि' 'तत्त्वमसिं'र स्थापन ॥ १३० ॥ वेदादि शास्त्रोंमें अभिधा-वृत्तिके द्वारा श्रीकृष्ण ही स्वीकृत :- सर्व वेदसूत्रे करे कृष्णेर अभिधान॥ मुख्यवृत्ति छाड़ि' कैल लक्षणा-व्याख्यान॥ १३१॥ अनुवाद—महावाक्य 'प्रणव' को आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि' को महावाक्यके रूपमें स्थापित किया है। सभी वैदिक सूत्रोंमें अभिधावृत्तिसे श्रीकृष्णको ही प्रतिपाद्यक विषयके रूपमें वर्णन किया गया है, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने शास्त्रोंकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर लक्षणा-वृत्तिका ही व्याख्यान किया है॥ १३०-१३१॥ अनुभाष्य—“वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते॥” अर्थात् वेद, रामायण, पुराण और महाभारत, आदि-अन्त-मध्य सर्वत्र हरिका ही गायन करते हैं॥ १३१॥ निरपेक्ष शब्द-प्रमाण ही सर्वश्रेष्ठ :- स्वतःप्रमाण वेद—प्रमाण-शिरोमणि। लक्षणा करिले स्वतःप्रमाणता-हानि॥ १३२॥ अनुवाद—स्वतः प्रमाणित वेद ही सभी प्रमाणोंके शिरोमणि स्वरूप हैं, किन्तु लक्षणा-वृत्तिसे अर्थको ग्रहण करनेसे स्वतःप्रमाणता लुप्त हो जाती है॥ १३२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रणव वेदका मूलवाक्य है, इसलिये वही एकमात्र ब्रह्मवाचक महावाक्य है। 'प्रणव'—ईश्वरके स्वरूपको व्यक्त करनेवाला शब्द है, इसलिये यह ईश्वरका नित्यनाम है। 'सर्वविश्वधाम'—सर्वाश्रय ईश्वरको लक्ष्य करता है। तब जो 'तत्त्वमसि' (छाः ६/८/७), “इदं सर्वं यदयमात्मा”, “ब्रह्मेदं सर्वं” (बृः आः २/५/१), “आत्मैवेदं सर्वं” (छाः ७/२५/२), “नेह नानास्ति किञ्चन” (कठः २/१/११, बृः आः ४/४/१९) आदि वाक्योंको 'महावाक्य' कहा गया है, यह एक बड़ा भ्रम है। क्योंकि उनमें प्रधान-वाक्यके रूपमें 'तत्त्वमसि' एक प्रादेशिक वाक्य मात्र है, इस कारण 'तत्त्वमसि' शब्दमें जो कहा गया है, वह केवल वेदका एकदेश-व्यापी उपदेश ४४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

है। जो वेदका सर्वदेश-व्यापी है, वही महावाक्य है, इसलिये 'प्रणव' के अतिरिक्त और कोई भी 'महावाक्य' नहीं हो सकता। इस तत्त्वको आच्छादनकर श्रीशङ्कराचार्यने 'तत्त्वमसि'को महावाक्य कहा है। ऐसे कल्पित महावाक्यका अवलम्बन करके वेदकी सर्वत्र मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधा-वृत्तिको छोड़कर जो लक्षणा अथवा गौणवृत्तिके द्वारा व्याख्या की जा रही है, उसमें सर्ववेदसूत्रके श्रीकृष्णतत्त्व-व्याख्यानको अकारण तिरस्कृत किया जा रहा है। वेद जब स्वतःप्रमाण हैं, तब उसके शब्दार्थोंमें लक्षणावृत्तिको जोड़ना उसके स्वतःसिद्ध प्रमाणको लुप्त करना मात्र है॥१२८-१३२॥ अनुभाष्य—आदिलीला ७/१०८ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥१३२॥ शङ्करकी व्याख्या लक्षणा-वृत्तिके आधारपर, अतः काल्पनिक :- एइमत प्रतिसूत्रे सहजार्थ छाड़ि़या। गौणार्थ व्याख्या करे सब कल्पना करिया॥१३३॥ महाप्रभुके द्वारा प्रत्येक सूत्रके शाङ्कर-भाष्यका खण्डन और संन्यासियोंका चमत्कृत होना :- एइमते प्रतिसूत्रे करेन दूषण।” शुनि' चमत्कार हैल संन्यासीर गण॥१३४॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके सभी सूत्रोंके सहज अर्थको छोड़कर अपनी कल्पनाके अनुसार गौणार्थकी व्याख्या की है। इस प्रकार श्रीशङ्कराचार्यने वेदान्तके प्रत्येक सूत्रको दूषित किया है।” महाप्रभुकी ऐसी व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी चमत्कृत हो गये॥१३३-१३४॥ संन्यासियोंकी स्वीकारोक्ति और साम्प्रदायिक भाव :- सकल संन्यासी कहे,—“शुनह श्रीपाद। तुमि ये खण्डिले अर्थ, ए नहे विवाद॥१३५॥ आचार्य-कल्पित अर्थ,—इहा सबे जानि। सम्प्रदाय-अनुरोधे तत्त्व इहा मानि॥१३६॥ अभिधा-वृत्तिसे व्याख्या करनेके लिये महाप्रभुसे अनुरोध :- मुख्यार्थ व्याख्या कर, देखि तोमार बल।” मुख्यार्थे लागा'ल प्रभु सूत्रसकल॥१३७॥ अनुवाद—सभी संन्यासी कहने लगे,—“श्रीपाद सुनिये! आपने जो श्रीशङ्कराचार्यके विचारोंका खण्डन किया है, उससे हमारा कोई विवाद नहीं है। यह श्रीशङ्कराचार्यका कल्पित अर्थ है, यह हम सब जानते हैं, किन्तु सम्प्रदायसे जुड़े होनेके कारण हम इसे तत्त्वके रूपमें मानते हैं। आप सूत्रोंकी मुख्यार्थसे व्याख्या कीजिये, तब हम आपका बल देखेंगे।” यह सुनकर महाप्रभु सभी सूत्रोंका मुख्यार्थ करने लगे॥१३५-१३७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे श्रीकृष्णचैतन्य! आपने जो पूर्वोक्त विचारोंको दिखलाकर श्रीशङ्कराचार्यके अर्थका खण्डन किया है, वह निरर्थक विवाद नहीं है अर्थात् भाग्यवान् व्यक्ति ही उसको 'सत्य' के रूपमें ग्रहण करता है॥१३५॥

[ ७/१३८-१४० महाप्रभुकी व्याख्या- (१) भगवान् श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' :- “बृहद्वस्तु 'ब्रह्म' कहि—'श्रीभगवान्'। षड्विधैश्वर्यपूर्ण, परतत्त्वधाम॥ १३८॥ स्वरूप-ऐश्वर्ये ताँर नाहि मायागन्ध। सकल वेदेर हय भगवान् से 'सम्बन्ध' ॥ १३९॥ ताँरे 'निर्विशेष' कहि, चिच्छक्ति ना मानि'। अर्द्ध स्वरूप ना मानिले पूर्णता हय हानि॥ १४०॥ अनुवाद-बृहद-वस्तु 'ब्रह्म' ही साक्षात् 'श्रीभगवान्' है। वे षडैश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और परतत्त्वके धाम हैं। उनका स्वरूप चिदानन्दमय है और उनका ऐश्वर्य उनकी चित्-शक्तिका विकार है, इसलिये उसमें मायाकी गन्ध भी नहीं है। सभी वेदोंका 'सम्बन्ध' श्रीभगवान्से ही है अर्थात् वेदोंका तात्पर्य भगवान्के साथ 'सम्बन्ध' को जानना ही है। उनको निर्विशेष कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। इस प्रकार उनके आधे स्वरूपको ही मानना वास्तवमें उनके पूर्ण स्वरूपको नकारना है॥ १३८-१४०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-बृहदारण्यक (५/१) में- "पूर्णमदः” आदि वाक्योंमें षडैश्वर्यपूर्ण परतत्त्वको बृहद्-वस्तु कहा गया है। सभी पुराणोंमें भगवत्-शब्दसे उन सभी लक्षणोंका वर्णन हुआ है। इसलिये वेदोंमें जहाँ-जहाँपर 'ब्रह्म' कहा गया है, वहाँ-वहाँपर 'श्रीभगवान्' शब्द देनेपर ही शब्द चरितार्थ होता है अर्थात् शब्दका मुख्यार्थ प्रकाश होता है। इसलिये सम्पूर्ण वेदोंमें भगवान् ही एकमात्र सम्बन्ध हैं। भगवान् निर्विशेष गुणको क्रोड़ीभूत करके नित्य-सविशेष हैं। उनको 'निर्विशेष' कहना उनकी चित्-शक्तिको नहीं मानना है। ब्रह्म चित्-शक्तियुक्त सविशेष हैं, इसलिये आधे स्वरूपको ना मानना पूर्णको ही नहीं मानना है॥ १३८-१४०॥ अनुभाष्य-श्रीरामानुजपादने 'वेदार्थसंग्रह'में- “ज्ञानेन धर्मेण स्वरूपमपि निरूपितं, न तु ज्ञानमात्रं ब्रह्मेति कथमिदमवगम्यते इति चेत्? “यः सर्वज्ञः सर्वविद्", इत्यादि ज्ञातृत्व-श्रुतेः, “पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते”, “विज्ञातारमरे केने विजानीयात्" इत्यादि श्रुतिशतसमधिगतमिदं ज्ञानस्य धर्ममात्रत्वाद्धर्ममात्रस्यैकस्य वस्तुत्वप्रतिपादनानुपपत्तेश्च। अतः सत्यज्ञानादिपदानि स्वार्थभूतज्ञानादिविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपादयन्ति। तत्त्वमिति द्वयोरपि पदयोः स्वार्थप्रहाणेन निर्विशेषवस्तु-स्वरूपोपस्थापनपरत्वे मुख्यार्थ-परित्यागश्च। ऐक्य तात्पर्यनिश्चयात्र लक्षणादोषः 'सोऽयं देवदत्तः' इतिवत्। ××अपिच अर्थभेद-तत्संसर्गविशेष- बोधनकृत-पदवाक्यस्वरूपता-लब्धप्रमाणभावस्य शब्दस्य निर्विशेष-वस्तुबोधनासामर्थ्यान्न निर्विशेषवस्तुनि शब्दः प्रमाणम्। निर्विशेष इत्यादि शब्दास्तु केनचिद्विशेषेण विशिष्टतयावगतस्य वस्तुनो वस्त्वन्तरावगत-विशेषनिषेधकतया बोधकाः।" ज्ञानके द्वारा, धर्मके द्वारा ब्रह्मका स्वरूप निर्णय होता है। 'ब्रह्म केवल ज्ञानमात्र हैं', ऐसा नहीं है। यदि कहो, इससे किस प्रकार अवगत हुआ जाता है? 'जो सर्वज्ञ और सर्वविद् हैं' आदि ब्रह्मके ज्ञातृत्व-विषयक श्रुति, 'इस ब्रह्मकी पराशक्ति वेदोंमें विभिन्न प्रकारकी सुनी जाती है', 'विज्ञाता ब्रह्मको किस रूपमें जाना जाय'- आदि सैंकड़ों श्रुतियोंके द्वारा यह समझा जाता है। ज्ञान-धर्ममात्र है, इसलिये केवल एक धर्ममात्रके द्वारा ही वस्तुत्व (अर्थात् केवल एक ज्ञानमात्रसे ही ब्रह्मत्व) प्रतिपादन होनेसे वह सङ्गत नहीं होता। इसलिये ('सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म'- इस प्रकारसे) सत्य, ज्ञानादि सभी पद अपने अर्थभूत ज्ञानादिविशिष्टको ही ब्रह्मके रूपमें ४४२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

प्रतिपादन करते हैं। 'तत्' और 'त्वम्'—इन दो पदोंके भी अपने अर्थ लोप करके निर्विशेष वस्तुके स्वरूपको स्थापन करनेसे मुख्यार्थ (अभिधा-गत अर्थ) का परित्याग होता है। उनका एक-तात्पर्य निश्चित करनेके लिये 'वह एक देवदत्त' न्यायसे लक्षणा-दोष नहीं होता ('एकतात्पर्य' के अर्थसे त्वं-पदार्थ रूप जीवका अन्तर्यामि-सूत्रमें सर्वकारण-रूप तत्-पदार्थ परब्रह्मका जीवात्मत्वसे विरोध नहीं होता)। × × और भी यह है कि अर्थभेद और उसके संसर्ग-विशेषसे प्रकाशित, पद और वाक्यकी स्वरूपतासे जो प्रमाणरूप शब्द प्राप्त होता है, उससे शब्दकी निर्विशेष-वस्तुके परिचय ज्ञापनकी सामर्थ्य नहीं होनेपर निर्विशेष वस्तुमें 'शब्द'-प्रमाण नहीं होता, ऐसा कहना होगा। 'निर्विशेष' आदि शब्द किन्तु किसी विशेषणके द्वारा विशिष्ट रूपसे ज्ञात वस्तुके सम्बन्धमें अन्य अवगत वस्तुकी विशेषताकी निषेधकता मात्र ज्ञापन करता है॥ १४०॥ (२) श्रवणादि साधन-भक्ति ही उपाय अथवा 'अभिधेय' :— भगवान्-प्राप्ति-हेतु ये करि उपाय। श्रवणादि भक्ति—कृष्णप्राप्त्येरे सहाय॥ १४१॥ सेइ सर्ववेदेर 'अभिधेय' नाम। साधनभक्ति हैते हय प्रेमेर उद्गम॥ १४२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १४१-१४२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन भगवत्-तत्त्वके चरणोंका आश्रय पानेके उपाय साधन-भक्तिको सभी वेदोंमें 'अभिधेय' कहा गया है। श्रवणादि नवधा-साधनभक्तिसे श्रीकृष्णप्रेमका उद्गम होता है॥ १४१-१४२॥ (३) श्रीकृष्णप्रेम ही उपेय, 'प्रयोजन' अथवा पञ्चम पुरुषार्थ :— कृष्णेर चरणे यदि हय अनुराग। कृष्णबिनु अन्यत्र तार नाहि रहे राग॥ १४३॥ पञ्चमपुरुषार्थ सेइ प्रेम-महाधन। कृष्णेर माधुर्य-रस कराय आस्वादन॥ १४४॥ प्रेमा हैते कृष्ण हय निज भक्तवश। प्रेमा हैते पाय कृष्णेर सेवा-सुखरस॥ १४५॥ अनुवाद—यदि एक बार श्रीकृष्णके चरणोंमें अनुराग हो जाता है, तो श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कहीं भी साधकका अनुराग नहीं रहता है। वही श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी महाधन ही पञ्चम पुरुषार्थ है। वह प्रेम श्रीकृष्णके माधुर्य-रसका आस्वादन कराता है। प्रेमसे ही श्रीकृष्ण अपने भक्तके द्वारा वशीभूत हो जाते हैं। प्रेमसे भक्तको श्रीकृष्णका सेवा-सुखरस मिलता है॥ १४३-१४५॥ सम्बन्धामिधेय-प्रयोजन ही ब्रह्मसूत्रके प्रतिपाद्य :— सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन-नाम। एइ तिन अर्थ सर्वसूत्रे पर्यवसान॥”१४६॥ सातवाँ अध्याय | ४४३

[ ७/१४६-१४९ अनुवाद—सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन, इन तीन अर्थोंमें ही वेदान्तके सभी सूत्रोंका पर्यवसान है अर्थात् उनमें इन तीन विषयोंका ही वर्णन है॥”१४६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मैं कौन हूँ? और यह जड़ ब्रह्माण्ड क्या है? एवं भगवत्-वस्तु क्या है? तथा हमारा आपसमें क्या सम्बन्ध है?—इन चार प्रश्नोंका सद्-अर्थ पानेसे 'सम्बन्ध-ज्ञान' होता है। जिसे सम्बन्धज्ञान प्राप्त हो गया है, उस पुरुषका कर्त्तव्य क्या है? उस कर्त्तव्यको जाननेके बाद उस कर्त्तव्यके अवलम्बनको ही सभी शास्त्रोंके 'अभिधेय' के रूपमें जानना होगा। कर्त्तव्य अनुष्ठानके पश्चात् जो फल प्राप्त किया जाता है, उसीका नाम ही 'प्रयोजन' है। ब्रह्मसूत्रमें ये तीन अर्थ ही उपदिष्ट हुए हैं॥१४६॥ इति अमृतप्रवाह भाष्ये सप्तम परिच्छेद। सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। सभी सूत्रोंकी व्याख्या सुनकर संन्यासियोंकी स्तुति :- एइमत सर्वसूत्रेर् व्याख्यान शुनिया। सकल संन्यासी कहे विनय करिया॥ १४७॥ “वेदमय-मूर्त्ति तुमि,—साक्षात् नारायण। क्षम अपराध,—पूर्वे ये कैलुँ निन्दन॥”१४८॥ अनुवाद—इस प्रकार सब (वेदान्त) सूत्रोंकी मुख्य अर्थके द्वारा व्याख्या सुनकर सभी संन्यासी विनयपूर्वक कहने लगे— “आप वेदोंकी साक्षात् मूर्त्ति हैं और साक्षात् नारायण हैं। हम लोगोंने पहले आपकी निन्दा करके जो अपराध किया था, उसे कृपा क्षमा करें॥”१४८॥ उन सबका निरन्तर श्रीकृष्णनाम-ग्रहण :- सेइ हैते संन्यासीर फिरे गेल मन। 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा करये ग्रहण॥ १४९॥ अनुवाद—तबसे सभी संन्यासियोंका हृदय परिवर्तन हो गया और वे सभी 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम सदा जप करने लगे॥ १४९॥ अनुभाष्य—उस समय काशीवासी एकदण्डी शाङ्करसम्प्रदायके संन्यासियोंके नेता श्रीप्रकाशानन्द सरस्वती थे। कोई-कोई भ्रमवशतः इनके साथ श्रीरङ्गक्षेत्रवासी, बादमें काम्यवनवासी श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीको एक करनेका प्रयास करते हैं। श्रीप्रबोधानन्द सरस्वतीपाद महीशूर देशसे आये रङ्गक्षेत्रप्रवासी रामानुजीय त्रिदण्डी स्वामी हैं। वे 'श्रीचैतन्यान्द्रामृत', 'राधारससुधानिधि', 'सङ्गीतमाधव', 'वृन्दावनशतक', 'नवद्वीपशतक' आदि ग्रन्थोंके प्रणेता हैं। व्येङ्कटभट्ट, तिरुमलय भट्ट और प्रबोधानन्द, ये तीन भाई हैं। श्रीमन्महाप्रभुने इनको १४३३ शकाब्दमें चातुर्मास्यके समय रामानुजीय सम्प्रदायमें दीक्षितके रूपमें देखा था। अल्प समय बाद १४३५ शकाब्दमें काशीमें उनको शाङ्कर-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त देखना नितान्त अयौक्तिक है। इस विषयमें श्रीभक्तिरत्नाकर-ग्रन्थ द्रष्टव्य है॥ १४९॥ अमृतानुकणा—'कोई-कोई मायावादी काशीवासी प्रकाशानन्दके साथ वैष्णवाग्रगण्य प्रबोधानन्दको एक करनेके लिये प्रयास करते हैं, किन्तु हम उनकी बातमें किसी भी प्रकार विश्वास नहीं ४४४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१४९ ] कर पाये। क्योंकि प्रकाशानन्द-नामक मायावादी काशीवासी संन्यासीके सम्बन्धमें श्रीचैतन्यभागवत मध्यखण्ड तृतीय अध्यायमें इस प्रकार उल्लेख है— “एइरूपे नवद्वीपे प्रभु विश्वम्भर। भक्तिमुखे भासे लइ सर्व अनुचर॥३॥ गुप्त वाक्ये तुष्ट हइ' वराह-ईश्वर। वेदप्रति क्रोध करि बलये उत्तर॥३५॥ काशीते पड़ाय बेटा 'प्रकाशानन्द'। सेई बेटा करे मोर अङ्ग खण्ड खण्ड॥३७॥ बाखानये—वेद मोर, विग्रह ना माने।” ३८क। अर्थात् “इस प्रकार महाप्रभु नवद्वीपमें अपने परिकरोंके साथ भक्तिसुखके आनन्दमें डूबे जा रहे थे। उन्होंने एक दिन मुरारि गुप्तके घरमें अपना वराहरूप प्रकट किया और मुरारि गुप्तकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए। तभी वेदोंके प्रति क्रोध प्रकाशित करते हुए बोले,—काशीमें बेटा प्रकाशानन्द पढ़ाता है; पढ़ाता क्या है, मेरे शरीरके खण्ड-खण्ड करता है। वेदोंकी व्याख्या करता है, परन्तु मेरा विग्रह नहीं मानता।” (‘श्रीचैतन्यचन्द्रामृतम्’ ग्रन्थकी श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद कृत ‘भूमिका’)—“यह घटना १४२५ शकाब्द और १४३० शकाब्दके बीचमें सङ्घटित हुई। महाप्रभुने १४३३ शकाब्दमें श्रीरङ्गम्में शुभागमनकर (श्रीव्येङ्कट भट्टादि) तीनों भाईयोंमें श्रीप्रबोधानन्दपादको देखा था। वे लोग उस समय ‘श्री’-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त श्रीरामानुजीय वैष्णव थे। इसलिये वे विशिष्टाद्वैतवादी नित्य श्रीनारायण-विग्रहके सेवक थे; और प्रकाशानन्द—उस समय शङ्कर-प्रवर्त्तित मायावादके अग्रगण्य सेवक थे। इन दो व्यक्तियोंको एक करनेकी चेष्टा या एक समान करनेका प्रयास पागलपन मात्र है। ×× श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके परमाराध्य चाचा और गुरुदेवको नित्यसिद्ध भक्तकुलचूड़ामणि ना कहकर विष्णु-वैष्णव विरोधी मायावादी और बद्धजीव कहकर लाञ्छना एवं निन्दा करनेसे भीषण नरकगामी वैष्णव-अपराध होता है। ×× श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वतीने अपने दैन्य और विनयके वशमें होकर श्रीगोपालभट्टके द्वारा अपनी व्यक्तिगत कथाकी श्रीचैतन्यचरितामृतमें आलोचना करनेके लिये निषेध किया था और श्रील कविराज गोस्वामीने उनके आदेशका उल्लङ्घन नहीं किया, इस कारण अभी यह विपत्ति दिखायी दे रही है।” कोई-कोई अपनी नवीनता प्रकाश करनेके लिये ‘भक्तमाल’ नामक एक सहजिया-ग्रन्थका उदाहरण देकर कहते हैं कि महाप्रभुने ही स्वयं श्रीप्रकाशानन्दका नाम ‘प्रबोधानन्द’ रखकर उनको वृन्दावन भेजा था। पुनः कोई-कोई उस वाक्यकी अप्रामाणिकता और भी परिस्फुट करनेके लिये ‘अद्वैतप्रकाश’ नामक एक अवैध-ग्रन्थका आश्रय लेते हैं,—जहाँपर काशीमें प्रकाशानन्द नहीं, प्रबोधानन्दके ही उद्धारका वर्णन हुआ है। और भी श्रीचैतन्यमहाप्रभुके विषयमें सर्वापेक्षा प्रामाणिक ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवत, श्रीचैतन्यचरितामृत आदि ग्रन्थोंमें काशीमें प्रबोधानन्द-उद्धार अथवा प्रकाशानन्दके नामका कोई परिवर्त्तनादि तिलमात्र भी दिखायी नहीं देता है। विशेषतः जहाँपर श्रीचैतन्यचरितामृतमें आदिखण्डके सातवें अध्याय और मध्यखण्डके पचीसवें अध्यायमें दो बार ‘प्रकाशानन्द-उद्धार’ का विस्तृतरूपसे वर्णन हुआ है, और भी वहाँपर इस प्रकार सातवाँ अध्याय | ४४५

[ ७/१४९

वक्तव्यका सामान्यतम आभास भी देखा नहीं जाता है। दूसरी ओर श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थ (मध्यलीला १/२०७-२०८) में-“शुनि' महाप्रभु कहे,-शुन, दबिरखास। तुमि दुईभाई मोर पुरातन दास॥ आजि हैते दुँहार नाम 'रूप'-'सनातन'।”—इस प्रकार श्रीरूप-सनातनके विषयमें नाम परिवर्तनका उल्लेख स्पष्ट दिखायी देता है। वहाँपर 'प्रकाशानन्द-उद्धार' दो बार विस्ताररूपसे वर्णन होनेपर भी उनका नाम-परिवर्तन एक भी पयारमें प्रकाशित ना रहनेके कारण प्रकाशानन्दका प्रबोधानन्दमें रूपान्तरकी कल्पना नितान्त ही निरर्थक है। कोई कहते हैं-श्रीप्रबोधानन्दपादके दैन्यवशतः उनके विषय प्रकाश करनेके लिये निषेध करनेपर, यह नाम उल्लेखित नहीं हुआ है। इस निषेध आज्ञामें कोई सन्देह नहीं है; यह सत्य है, किन्तु इस विषयमें यदि श्रीप्रबोधानन्द ही पहले प्रकाशानन्द थे, तो 'प्रकाशानन्द-उद्धार' प्रसङ्ग प्रबोधानन्दपादके सम्बन्धमें ही होनेपर ग्रन्थकार उसे सम्पूर्णरूपसे गोपन रखते। यदि कहो, वह उद्धार-लीला विशेष गुरुत्वपूर्ण होनेके कारण अवश्य ही उल्लेख-योग्य है, ऐसा होनेपर हमारा यह कथन है कि, उस समय यदि प्रकाशानन्दका नाम परिवर्तन हुआ होता, तो वह (नाम-परिवर्तन) उस उद्धार-लीलाका ही अपरिहार्य (जिसे छोड़ा नहीं जा सकता) अङ्ग होनेपर वह कभी भी अप्रकाशित नहीं रह सकता था। श्रीप्रकाशानन्दके उद्धारके बाद महाप्रभुका उनको वृन्दावनमें भेजना भी नितान्त ही काल्पनिक है। प्रकाशानन्द-उद्धारके समय श्रील सनातन गोस्वामी काशीमें उपस्थित थे। महाप्रभुने काशीसे पुरी यात्रा करनेसे पहले उनको वृन्दावन जानेके लिये आदेश किया था, यह श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी वर्णित उस 'उद्धार-लीला' में दो स्थानोंमें देखा जाता है,—“लोक-निस्तारिया प्रभुर चलिते हैल मन। वृन्दावने पाठाइला श्रीसनातन।” (आदिलीला ७/१६०) और “सनातने कहिला—तुमि याह वृन्दावन।” (मध्यलीला २५/१७५)। यदि वहाँपर महाप्रभु प्रकाशानन्दका उद्धार करनेके बाद उन्हें वृन्दावन भेजते, तो ग्रन्थकारका इस बातको गोपन करनेका कोई कारण नहीं हो सकता। अपितु उस प्रसङ्गका ध्यानपूर्वक पाठ करनेसे देखा जाता है कि, श्रीप्रकाशानन्द अपने सजातीय शिष्योंको लेकर गौरप्रेममें प्लावित हरिकीर्त्तनसे मुखरित 'द्वितीय नदीया नगर' के रूपमें परिणत उसी काशीमें ही परमसुखसे नाम-सङ्कीर्त्तन और श्रीमद्भागवत आलोचनामें ही मग्न हुए थे। (चैतन्यचरितामृत मध्यलीला २५/१५८-१६०)— “सब काशीवासी करे नाम-सङ्कीर्त्तन॥ संन्यासी, पण्डित करे भागवत-विचार। वाराणशीपुर प्रभु करिला निस्तार॥ वाराणशी हैल द्वितीय नदीया नगर॥” इसलिये वहाँपर श्रीतपनमिश्रादि गौरभक्तोंकी भाँति श्रीप्रकाशानन्दका भी काशी-परित्यागका कोई कारण नहीं था। श्रीमद् प्रबोधानन्द-रचित 'श्रीचैतन्यचन्द्रामृत'-ग्रन्थके विभिन्न श्लोकों और विशेषतः उनके 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ज्ञानमार्ग तथा मायावादके उल्लेखके कारण कोई-कोई विचार करते हैं कि वे पहले काशीके मायावादी प्रकाशानन्द थे। श्रीचैतन्यचन्द्रामृतमें ग्रन्थकारने महाप्रभुकी असमोध्वं महिमाको अन्वय-व्यतिरेकके रूपमें विचार करते हुए

४४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/१४९ ] कर्ममार्गकी, योगमार्गकी, स्वर्गाभिलाषाकी, शास्त्राभ्यासकी, पुत्र-स्त्री-आसक्त विषयियोंकी, 'अहं-ब्रह्म'वादियोंकी, तपस्वियोंकी, गयाके कर्मकाण्डकी, काशीके ज्ञानकाण्डादिकी तुच्छता दिखलायी है। कभी-कभी उन्होंने स्वयंको भी उन सभी भक्तिके प्रतिकूल आचरणादिमें निमग्न और गौरप्रेमसे वञ्चित कहकर हृदयविदारक विभिन्न प्रकार आत्मग्लानि प्रकाश की है। इसी प्रकार वैष्णवोचित दैन्यका तात्पर्य ना समझकर एवं सरल अन्तःकरणके अभावके कारण वे लोग उक्त ग्रन्थकार (श्रीप्रबोधानन्द) को शुद्धभक्ति प्रतिकूल सभी मार्गोंकी निन्दा करते हुए देखकर भी जब भी ज्ञानमार्गकी बात निन्दाके रूपमें उल्लेख करते देखा है, तभी उनको मायावादीके साँचेमें आबद्धकर काशीके प्रकाशानन्दके रूपमें प्रस्तुत करनेकी चेष्टा की है। वे लोग इस प्रकार स्वयंको तथा दूसरोंको भी ठग रहे हैं। 'राधारस-सुधानिधि'-ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें ग्रन्थकारने मायावाद-तापसन्तप्त हृदयको राधारस-रूप सुधानिधि (चन्द्र) के द्वारा शीतलकारी गौरसिन्धुका जयगान किया है— “स जयति गौरपयोधिर्मायावादताप-सन्तप्तम्। हृन्नथ उदशीतलयद् यो राधारस-सुधानिधिना॥” (उन लोगोंका कहना है)—'मायावाद-तापसन्तप्तम्'-इसीसे ही क्या ग्रन्थकारका पहले 'काशीवासी मायावादी प्रकाशानन्द' होनेका परिचय प्रकाशित नहीं होता? 'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थमें —जिसमें विशेषरूपसे 'प्रकाशानन्द-उद्धार' वर्णित हुआ है, उसमें कहीं भी प्रकाशानन्दके निकट महाप्रभुके द्वारा 'राधारस' के सम्बन्धमें कोई आलोचना ही करना नहीं देखा जाता है। प्रबलरूपसे निर्विशेष विचारग्रस्त विष्णु-वैष्णव-विद्वेषीयोंके निकट महाप्रभुने केवल ब्रह्मसूत्रके शाङ्करभाष्य खण्डनकर वास्तवभाष्यके रूपमें श्रीमद्भागवतको ही स्थापन करते हुए सम्बन्ध-अभिधेय- प्रयोजनतत्त्वकी व्याख्या की, किन्तु इन सबसे भी श्रेष्ठ जो परमनिगूढ़ 'राधारस'-सम्पुट है, उसका उद्घाटन नहीं किया। प्रकाशानन्द उद्धारके बाद महाप्रभुने मात्र पाँच दिनों तक काशीमें अवस्थानकर पुरीकी यात्रा की थी—“एइमत दिन पञ्च लोक निस्तारिया। आर दिन चलिला प्रभु उद्विग्न हञा॥” (मध्यलीला २५/१७०)। तत्पश्चात् (महाप्रभु और प्रकाशानन्द) दोनोंके साक्षात्कारका अन्य कोई प्रमाण नहीं पाया जाता है। इसलिये प्रकाशानन्दका मायावाद-सन्तप्त हृदय गौरप्रसादसे शीतल हुआ था, इसमें सन्देह नहीं है, किन्तु वह निश्चितरूपमें 'राधारस'-वशतः नहीं। दूसरी ओर, महाप्रभुने श्रीरङ्गमें दीर्घ चातुर्मास्यकाल रहकर व्येङ्कटभट्ट, त्रिमल्लभट्ट एवं श्रीप्रबोधानन्दपादके निकट भगवान्‌के ऐश्वर्यविचारकी अपेक्षा माधुर्यविचारकी पराकाष्ठा तथा गोपियोंकी अपार महिमा एवं उनमें श्रीराधाका ही श्रीकृष्णवशीकारित्व (केवल श्रीराधा ही श्रीकृष्णको सम्पूर्णरूपसे वशीभूत कर सकती हैं) प्रकाशकर उनको श्रीलक्ष्मी-नारायणकी उपासनासे क्रमशः गोपीनाथ तथा राधानाथ-श्रीकृष्णके प्रति अनुरक्त किया था। उस समय मुखसे वेदोंको स्वीकार करनेपर भी जीवके नित्य विष्णु-सेवकत्वका परिचय अस्वीकारकर श्रीविष्णुसेवा-विनाशकारी मायावादकी जो भीषण प्रबलता थी, और उससे श्रीनारायण-सेवानिष्ठ प्रबोधानन्दपादका हृदय जो सर्वदा सन्तप्त हो रहा था, वह श्रीगौरसिन्धुसे उदित श्रीराधारस-चन्द्रकी किरणोंसे अर्थात् श्रीराधाकी विष्णुसेवाचेष्टाकी पराकाष्ठा सन्दर्शनसे परमशीतल हुआ था—इसमें सातवाँ अध्याय | ४४७

[ ७/१४९-१५६ कोई सन्देह नहीं है। इसलिये किसी प्रकारसे ही काशीके श्रीप्रकाशानन्द और नित्यसिद्ध भगवत्-पार्षद श्रीप्रबोधानन्दको एक करनेका प्रयास सिद्ध नहीं हो सकता॥ १४९॥ महाप्रभुके द्वारा अपराध-क्षमा और कृपा :- एइमते ताँ-सबार क्षमि' अपराध। सबाकारे कृष्णनाम करिला प्रसाद॥ १५०॥ सबका मिलकर महाप्रसाद-सम्मान :- तबे सब संन्यासी महाप्रभुके लैया। भिक्षा करिलेन सबे, मध्ये बसाइया॥ १५१॥ भिक्षा करि' महाप्रभु आइला वासाघर। हेन चित्र-लीला करे गौराङ्ग-सुन्दर॥ १५२॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभुने सभीका अपराध क्षमाकर सभीको 'श्रीकृष्ण'-नाम देकर कृपा की। तब सभी संन्यासियोंने महाप्रभुको अपने बीचमें बैठाकर महाप्रसाद ग्रहण किया। महाप्रसाद ग्रहण करनेके बाद महाप्रभु अपने वासस्थानपर लौट आये। श्रीगौराङ्ग-सुन्दर इस प्रकारकी अद्भुत लीलाएँ करते हैं॥ १५०-१५२॥ महाप्रभुकी वदान्य-लीलासे भक्तोंका आनन्द :- चन्द्रशेखर, तपनमिश्र, आर सनातन। शुनि' देखि' आनन्दित सबाकार मन॥ १५३॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखर, श्रीतपनमिश्र और श्रीसनातन गोस्वामी आदि सभी भक्तलोग श्रीमन्महाप्रभुकी इस प्रकारकी लीलाओंको सुनकर तथा देखकर अत्यन्त आनन्दित हुए॥ १५३॥ प्रभुके देखिते आइसे सकल संन्यासी। प्रभुर प्रशंसा करे सब वाराणसी॥ १५४॥ महाप्रभुके पदार्पणसे काशी धन्या :- वाराणसीपुरी आइला श्रीकृष्णचैतन्य। पुरीसह सर्वलोक हैल महाधन्य॥ १५५॥ असंख्य लोगोंका महाप्रभु-दर्शन :- लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुके देखिते। महाभिड़ हैल द्वारे, नारे प्रवेशिते॥ १५६॥ अनुवाद-वहाँके सभी संन्यासी महाप्रभुके दर्शन करनेके लिये आने लगे और वाराणसीके सभी लोग महाप्रभुकी प्रशंसा करने लगे। श्रीकृष्णचैतन्यके वाराणसीमें पदार्पण करनेसे वाराणसीपुरी और वहाँके निवासी सभी धन्य हो गये। महाप्रभुके दर्शनके लिये लाखों-लाखों लोग आने लगे। वहाँ इतनी भीड़ हो जाती कि गृहके भीतर प्रवेश करना बहुत कठिन हो जाता था॥ १५४-१५६॥ अमृतानुकणिका—भगवान् विष्णुके आदेशसे असुर-मोहन निर्विशेषवाद प्रचारक शङ्करावतार आचार्य शङ्करने मायावादका प्रचार किया, तो भी वे शुद्ध स्वरूपमें 'वैष्णव' हैं। इसलिये उन ४४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत