श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/१२१-१२६ “यदि च सूत्रकारस्य वेदान्तार्थानभिज्ञतां निगूढ़मभिप्रायता, तत्प्रमाद-मार्जन- स्वचातुरी-व्यङ्ग-भङ्ग्या तत् “आनन्दमय”-सूत्रमेवं व्याख्येयम्- 'आनन्दमयः' इत्यत्र "ब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा" इति स्वप्रधानमेव ब्रह्मोपदिश्यते इति, तथा विकारसूत्रे (१/१/१३) च 'विकार'-शब्देनावयवः, 'प्राचुर्य'-शब्देन 'सादृश्यं' व्याख्येयम्, तदा सूत्रकारस्याशाब्दिकतैव च प्रसज्येत-तत्तच्छब्दादिभिस्तत्तदर्थानभिधानात्। 'मयट्'-प्रत्यय-विकार-प्राचुर्यशब्दानामनन्तरनिर्दिष्टानामन्यार्थत्वं न वा बालकस्यापि हृदयमारोहति।” “शङ्कराचार्यका भाष्य पाठ करके यह धारणा होती है कि उनका निगूढ़ अभिप्राय यही है कि सूत्रकार श्रीवेदव्यास वेदान्तका अर्थ समझनेमें अनभिज्ञ थे। इसलिये सूत्रकार आचार्य श्रीवेदव्यासके प्रमादका मार्जन करनेके उद्देश्यसे श्रीशङ्करने अपनी चातुर्य शैलीसे 'आनन्दमय' सूत्रकी इस प्रकार व्याख्या की है- 'आनन्दमय' आदि श्रुतिवाक्योंमें "ब्रह्मपुच्छ प्रतिष्ठा", इस श्रुतिवाक्यमें मुख्यब्रह्म ही 'उपदिष्ट' है; १/१/१३ सूत्रमें विकार-शब्दसे 'अवयव (अङ्ग)' और 'प्राचुर्य' शब्दसे 'सादृश्य' व्याख्या करूँगा। इस प्रकार व्याख्या होनेसे सूत्रकार (व्यासदेव) को जो शब्दज्ञान नहीं था, उसकी ही सम्भावना होती है; क्योंकि, उनके द्वारा व्यवहृत-शब्दके द्वारा वेदान्तका वैसा अर्थ नहीं होता है। मयट्-प्रत्ययसे उत्पन्न विकार-प्राचुर्य-शब्दादिके पश्चात् निर्दिष्ट शब्दसमूहका अन्य अर्थ हो ही क्या सकता है? यह बात तो एक बालकके हृदयमें भी आती है! अर्थात् मयट्-प्रत्ययमें 'विकार' और 'प्राचुर्यार्थ' के अतिरिक्त इसमें अन्य अर्थ जोड़ना ही नितान्त भ्रम है, वह सहज ही समझा जाता है।” मध्यलीला ६/१७०-१७५ एवं मध्यलीला २५/४०-४१ संख्या द्रष्टव्य है॥१२१॥ गुरुको भ्रान्त माननेवाले मायावादियोंका 'विवर्त्तवाद' :- परिणाम-वादे ईश्वर हयेन विकारी। एत कहि' 'विवर्त्त'-वाद स्थापना ये करि॥१२२॥ 'विवर्त्त' के आश्रय :- वस्तुतः परिणाम-वाद-सेइ से प्रमाण। देहे आत्मबुद्धि-हय विवर्त्तेर स्थान॥१२३॥ विवर्त्तवादका खण्डन-(१) अचिन्त्यशक्तिमान् भगवान् :- अविचिन्त्य-शक्तियुक्त श्रीभगवान्। इच्छाय जगद्रूपे पाय परिणाम॥१२४॥ (२) प्राकृत चिन्तामणिका दृष्टान्त :- तथापि अचिन्त्यशक्त्ये हय अविकारी। प्राकृत चिन्तामणि ताहे दृष्टान्त धरि॥१२५॥ नाना रत्नराशि हय चिन्तामणि हैते। तथापिह मणि रहे स्वरूपे अविकृते॥१२६॥ अनुवाद-श्रीशङ्कराचार्यने यह कहकर कि परिणाम-वाद स्वीकार करनेसे ईश्वरको विकारी स्वीकार करना पड़ेगा, 'विवर्त्त'-वादकी स्थापना की। वास्तवमें परिणाम-वाद ही सभी शास्त्रोंके ४३२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत