भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

७/१२१ ] 'शक्तिपरिणाम-वाद' ही ब्रह्मसूत्रमें स्वीकृत :- व्यासेर सूत्रेते कहे 'परिणाम'-वाद। 'व्यास भ्रान्त'-बलि' तार उठाइल विवाद ॥१२१॥ अनुवाद—व्यासदेवने वेदान्त-सूत्रमें 'परिणाम'-वाद अर्थात् सब कुछ भगवान्‌की शक्तिका ही रूपान्तरण है, ऐसा कहा है। किन्तु शङ्कराचार्यने व्यासदेवको 'भ्रान्त' कहकर विवाद उठाया है॥१२१॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसूत्रकार श्रीवेदव्यासके “आनन्दमयोऽभ्यासात्” (ब्रः सूः १/१/१२) इस सूत्रको उपलक्ष्यकर “अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति” (ब्रः सूः १/१/१९) इस सूत्रकी व्याख्यामें श्रीशङ्कराचार्यने जो लिखा है, उसका मर्मानुवाद—“आनन्दमय-वाक्यमें 'ब्रह्म'-शब्दका संयोग नहीं रहनेके कारण उनको मुख्यब्रह्म नहीं कह सकते। आनन्दमयको यदि 'ब्रह्म' कहा जाय, तो उसे अङ्ग होनेके कारण सविशेषब्रह्म ही कहना पड़ेगा, किन्तु 'आनन्दमय' वाक्यके अन्तमें निर्विशेष-ब्रह्म अभिहित है। आनन्दमय-शब्दसे आनन्द-प्रचुर अर्थात् प्राचुर्य अर्थमें 'मयट्' प्रत्यय (जिस अर्थमें चिद्विलासवादी भागवतोंने प्रयोग किया है, वह) कहनेपर उसमें दुःखका भी अस्तित्व है, ऐसा जाना जाता है; क्योंकि 'आधिक्य' अनुसारमें ही प्रचुर-शब्दका प्रयोग होता है, अल्पता उसका लक्ष्य नहीं रहता। आनन्दमय 'शुद्ध-ब्रह्म' नहीं है, यह कहकर ही श्रुतियोंमें आनन्दमयके अभ्यासकी (पुनः पुनः उक्ति) ना करके 'आनन्दमात्र' का अभ्यास किया है। यदि आनन्दमयका ब्रह्मत्व निश्चित होता, वैसा होनेपर ना होते हुए भी आनन्दमात्रके अभ्यासको आनन्दमयाभ्यास कहकर कल्पना की जा सकती है, किन्तु अङ्ग-सम्बन्ध ना रहनेके कारण आनन्दमयका अब्रह्मत्व ही निश्चित है; इन सभी कारणोंसे एवं “आनन्दं ब्रह्म” आदि श्रुतियोंमें परब्रह्मके विषयमें आनन्द-शब्दका प्रयोग होनेके कारण स्पष्ट समझा जा रहा है कि अन्यान्य श्रुतियोंमें भी 'आनन्दमात्र' ब्रह्म ही अभ्यस्त हुआ है, 'आनन्दमय' अभ्यस्त नहीं हुआ है। यद्यपि “आनन्दमयमात्मानम्” श्रुतियोंमें आनन्दमयका ही अभ्यास दृष्टिगोचर होता है, तथापि अन्नमय आदिके मध्य आनन्दमयका उल्लेख होनेपर आनन्दमयकी भी शुद्धब्रह्म बोधकता परास्त हुई है। 'आनन्दमय' वाक्यके निकट ही “उन्होंने कामना की, मैं बहुत होऊँगा”—इस प्रकार वाक्य रहनेपर भी शुद्धब्रह्मके साथ आनन्दमयके निकट-सम्बन्ध नहीं रहनेके कारण आनन्दमयको शुद्धब्रह्म नहीं समझा जा सकता। उसके बाद “वे ही रस (स्वरूप हैं)” आदि वाक्य भी उसीके सापेक्ष होनेके कारण आनन्दमय-बोधक नहीं हैं। “प्रिय ही उनका मस्तक है” आदि विभिन्न प्रकार अङ्ग-बोधक शब्द ना रहनेके कारण, यह निश्चित हुआ है कि, 'आनन्द' ही मुख्यब्रह्म है, 'आनन्दमय' नहीं। यदि कहो, सविशेष ब्रह्म ही तो उक्त श्रुतिका अभिप्रेत है? इसके उत्तरमें—ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि यह “अवाङ्‌मानसगोचर” अर्थयुक्त श्रुतिके द्वारा निरस्त होता है, इसलिये 'आनन्दमय'-शब्दका 'मयट्'-प्रत्यय विकारबोधक है, प्राचुर्यबोधक नहीं।” श्रीपाद शङ्करने इस प्रकार सूत्रोंकी व्याख्यामें 'मयट्' प्रत्ययको निकाल देनेके लिये अर्थात् इसका व्यर्थता अथवा बाहुल्य दिखानेके लिये एक ही वक्तव्य-विषयको १२-१९ सूत्रोंमें पुनः पुनः कहनेका कितना प्रयास नहीं किया है! इस सम्बन्धमें 'सर्वसंवादिनी' ग्रन्थमें श्रीमद् जीव गोस्वामी प्रभुकी उक्ति— सातवाँ अध्याय | ४३१