भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 472

[ ७/११९-१२० चित्, जीव और माया-ये तीन प्रकारकी विष्णुशक्ति :- विष्णुपुराण (६/७/६०)- विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ११९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है ॥ ११९ ॥ अनुभाष्य-विष्णुशक्ति (विष्णोः स्वरूपशक्तिः) परा (चित्स्वरूपा) प्रोक्ता; तथा क्षेत्रज्ञाख्या (जीवशक्तिः च) परा प्रोक्ता; अन्या अविद्या कर्मसंज्ञा (कर्म यस्याः संज्ञा सा) तृतीया मायाशक्तिः इष्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ ईश्वरको जीवकी भाँति अज्ञानमय-बोध ही मायावाद :- हेन जीवतत्त्व लञा लिखि' परतत्त्व। आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ईश्वर-महत्त्व ॥ १२० ॥ अनुवाद-ऐसे जीवतत्त्वको शङ्कराचार्यने परतत्त्व (ब्रह्म) के रूपमें वर्णन किया है। इसके द्वारा उन्होंने सर्वश्रेष्ठ ईश्वरकी महिमाको आच्छादित कर दिया है ॥ १२० ॥ अनुभाष्य-ईश्वर, जीव और प्रकृतिस्वरूपको अनिर्वचनीय तथा अज्ञानके रूपमें लिखकर शङ्कराचार्यने ईश्वरके अलौकिक श्रेष्ठत्वका आच्छादन किया है। श्रीरामानुजपाद 'वेदान्तसार' में- “ननु 'आत्मा वा इदमग्रासीत्' इति प्राक्सृष्टेः एकत्वावधारणात् कथं सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्टस्य नारायणस्य कारणत्वम् ? उच्यते-'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति। परित्यक्तस्थूलाकाराणां सूक्ष्माकारापत्त्या ब्रह्मणि वृत्तिः प्रतिपाद्यते, न तु स्वरूपनिवृत्तिः; 'अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे देवे एकीभवति' इति तमःशब्द-वाच्यायाः प्रकृतेः परमात्मन्येकीभाव-श्रवणात्। पृथग्ग्रहणरहितत्वेन वृत्तिरेकीभावः; स एव लय-शब्दार्थः; यथा-वृक्षे लीनाः पतङ्गाः, वने लीनाः सारङ्गाः।” यदि कहो, 'जगत् सृष्टिके पहले केवलमात्र आत्मा थीं' (बृः आः १/४/१), ऐसा होनेसे किस प्रकारसे सूक्ष्म चिदचित्-शक्तिविशिष्ट नारायणका जगत्के मूल-कारण होना सम्भव होता ? इसके उत्तरमें कहा जा सकता है, “जिनसे ये भूतसमूह उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा पालित और जिनमें प्रविष्ट होते हैं” (तैः भृः प्रथम अ.) इस तैत्तिरीय-वाक्यसे प्रमाणित होता है कि सभी जीव अपने स्थूल जड़ आकारका परित्यागकर मुक्तावस्थामें सूक्ष्माकार ग्रहणकर ब्रह्ममें अपनी-अपनी वृत्ति (अवस्थिति) प्रमाणित करते हैं, उनका स्वरूप ध्वंस नहीं होता, क्योंकि अविनाशी आत्मा तमः-शब्दवाच्या प्रकृतिमें लीन होनेपर प्रकृतिका ब्रह्मके साथ अभेद (एकीभाव) होता है। उस समय प्रकृतिके साथ ब्रह्मकी पृथक्ता ना रहनेके कारण प्रकृतिका सत्त्व ब्रह्ममें ही अवस्थान करता है। 'लय' शब्दसे इस प्रकार ही समझना होगा जैसे, वृक्षमें स्थित पक्षी अथवा वनमें स्थित मृगसमूह वृक्षमें अथवा वनमें लीन अथवा अन्तर्निविष्ट होते हैं ॥ १२० ॥ ४३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत