भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ ७/५७-६१ से विप्र जानेन, प्रभु ना या'न का'र घरे। ताँहार प्रेरणाय ताँरे अत्याग्रह करे॥ ५७॥ अनुवाद—ऐसे किसीके घर जहाँ मायावादी संन्यासियोंको निमन्त्रण दिया हो, महाप्रभु वहाँ नहीं जाते हैं—यह बात वह ब्राह्मण भली-भाँति जानता था, किन्तु स्वयं महाप्रभुकी प्रेरणासे ही उसने उनको अति आग्रहके साथ निमन्त्रण दिया॥ ५७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—तथापि महाप्रभुने संन्यासियोंपर कृपा करनेके लिये ही उस ब्राह्मणके हृदयमें प्रेरणा दी, जिसके कारण उसने अत्यन्त आग्रहके साथ उस प्रकार प्रार्थना की॥ ५७॥ संन्यासी मण्डलीके बीच महाप्रभुका गमन :— आर दिने गेला प्रभु से विप्र-भवने। देखिलेन, बसियाछेन संन्यासीर-गणे॥ ५८॥ महाप्रभुकी दीनता :— सबा नमस्करि' गेला पाद-प्रक्षालने। पाद-प्रक्षालिया बसिला सेइ स्थाने॥ ५९॥ अनुवाद—दूसरे दिन महाप्रभु उस ब्राह्मणके घर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सभी संन्यासी पहलेसे ही उपस्थित हैं। महाप्रभु उन सभीको प्रणामकर अपने चरण धोनेके लिये गये और चरण धोकर उसी स्थानपर बैठ गये॥ ५८-५९॥ महाप्रभुका ऐश्वर्य-प्रकाश और पाषण्ड-मोहन :— बसिया करिला किछु ऐश्वर्य प्रकाश। महातेजोमय वपु कोटिसूर्याभास॥ ६०॥ प्रभावे आकर्षिल सब संन्यासीर मन। उठिला संन्यासी सब छाड़िया आसन॥ ६१॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस स्थानपर बैठकर अपने ऐश्वर्यका कुछ प्रकाश किया। उनके शरीरसे इतना तेज निकला जो करोड़ों सूर्योंकी भाँति था। उनके प्रभावको देखकर वहाँ उपस्थित सभी मायावादी संन्यासियोंका मन उनके प्रति आकर्षित हो गया और वे सभी अपना-अपना आसन छोड़कर खड़े हो गये॥ ६०-६१॥ अमृतानुकणिका—विद्याके गर्वसे, साधनके गर्वसे, मान-सम्मानके गर्वसे संन्यासियोंका चित्त कुछ अधिक गर्वित था, इसलिये वे महाप्रभुकी निन्दा करते थे। कुछ ऐश्वर्य प्रकाश करनेके अतिरिक्त केवल दैन्य-विनयसे ऐसा लगता है कि किसीके गर्वका नाश नहीं होता है। किसीके गर्वको नाश करनेके लिये उसके चित्तमें उसके अपने सम्बन्धमें कुछ हेयताका अनुभव जगाना आवश्यक है। इसलिये ही महाप्रभुने अपना ऐश्वर्य प्रकाश किया। उनके ऐश्वर्यको देखकर संन्यासी स्तम्भित हो गये। पहले जो मनमें सोचते थे—'यह एक मूर्ख भावुक संन्यासी मात्र है, शास्त्र, धर्म, आचार, वेदान्तादि जानता नहीं है; यह तो नितान्त साधारण व्यक्ति है।' किन्तु उनका ऐश्वर्य देखकर अब वे सोचने लगे—'ये तो साधारण व्यक्ति नहीं है। अहो! कैसा तेज है, हमारे नेत्र चौंधिया रहे हैं। इनकी निन्दा करके हमने कितना अन्याय किया है? ऐसी शक्ति ३९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/६०-६६ ] तो हमारे पास नहीं है।' तभी उनका हृदय परिवर्त्तन हो गया। यदि महाप्रभु पहलेके समान दैन्य-विनय मात्र दिखलाते, तो वे संन्यासी यही सोचते-'यह मूर्ख संन्यासी हमारी सभामें आनेका साहस ही नहीं कर पाता है। वास्तवमें हमारी सभामें आनेकी योग्यता भी इसमें नहीं है।' गर्वित लोग विनयसे मुग्ध नहीं होते। महाप्रभु जब दैन्यवशतः चरण धोनेके स्थानपर बैठे, तब उनकी महिमा संन्यासियोंके हृदयको स्पर्श नहीं कर पा रही थी, तब वे अपनी सभामें उनको आमन्त्रित नहीं कर रहे थे। किन्तु जब उनका ऐश्वर्य देखा, तब श्रद्धासे सभी एक साथ आसन छोड़कर उठ खड़े हुए॥६०-६१॥ प्रकाशानन्द-सरस्वतीकी उक्ति :- प्रकाशानन्द-नामे संन्यासी-प्रधान। प्रभुके कहिल किछु करिया सम्मान॥६२॥ “इहाँ आइस, गोसाई, शुनह श्रीपाद। अपवित्र स्थाने बैस, किवा अवसाद॥”६३॥ अनुवाद-उन मायावादी संन्यासियोंमें प्रधान प्रकाशानन्द सरस्वती महाप्रभुको सम्मानपूर्वक कुछ कहने लगे-“हे गोसाईं! आप यहाँ आइये। सुनिये श्रीपाद! आप ऐसे अपवित्र स्थानमें क्यों बैठे हैं? क्या हमसे कोई अप्रसन्नता है?”॥६२-६३॥ महाप्रभुकी दैन्योक्ति :- प्रभु कहे,-“आमि हइ हीन-सम्प्रदाय। तोमा-सबार सम्प्रदाये बसिते ना युयाय॥”६४॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा-“मैं हीन-सम्प्रदायका हूँ, इसलिये मैं आपके सम्प्रदायमें बैठनेके योग्य नहीं हूँ॥”६४॥ अनुभाष्य-श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रवर्त्तित दशनामी दण्डि (एकदण्डी) संन्यासियोंमें से 'तीर्थ', 'आश्रम' और 'सरस्वती', ये तीन सम्प्रदाय सदाचार और सम्मानमें भी दूसरे साम्प्रदायिक संन्यासियोंसे श्रेष्ठ हैं। महाप्रभुने 'भारती'-सम्प्रदायसे संन्यास ग्रहण करनेके कारण प्रकाशानन्द सरस्वतीको उच्चसम्प्रदायमें स्थित मानकर विचार किया; अथवा ब्रह्मसंन्यासियोंकी सामाजिक-मर्यादामें वे अपने आपको उच्च मानते हैं। इसलिये महाप्रभुने वैष्णव संन्यासियोंको अमानित्व (अपने लिये सम्मानकी आशा नहीं) और मानदत्व (सभीको सम्मान देना), इस धर्मको सिखलानेके लिये उन्होंने स्वयंको हीन-सम्प्रदायके अन्तर्भुक्त कहा। शाङ्कर-साम्प्रदायिक संन्यासीगण अभी भी अन्य संन्यासियोंको 'संन्यासी' कहना नहीं चाहते, उन्हें केवल 'ब्रह्मचारी' संज्ञा देकर स्वयंमें 'गुरु' अभिमान रखते हैं॥६४॥ प्रकाशानन्दकी जिज्ञासा :- आपने प्रकाशानन्द हातेते धरिया। बसाइला सभामध्ये सम्मान करिया॥६५॥ पूँछिल,-“तोमार नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य'। केशव-भारतीर शिष्य, ताते तुम धन्य॥६६॥ सातवाँ अध्याय | ३९७

[ ७/६५-७० साम्प्रदायिक संन्यासी तुमि, रह एइ ग्रामे। कि कारणे आमा-सबार ना कर दर्शने॥ ६७॥ संन्यासी हइया कर नर्त्तन-गायन। भावुक सब सङ्गे लञा करह कीर्त्तन॥ ६८॥ वेदान्त-पठन, ध्यान, — संन्यासीर धर्म। ताहा छाड़ि' कर केने भावुकेर कर्म॥ ६९॥ प्रभावे देखिये तोमा साक्षात् नारायण। हीनाचार कर केने, इथे कि कारण॥” ७०॥ अनुवाद-यह सुनकर स्वयं प्रकाशानन्द महाप्रभुका हाथ पकड़कर सम्मानपूर्वक उन्हें सभाके बीच लाये और सम्मानपूर्वक उन्हें वहाँ बैठाया और उन्होंने पूछा- “तुम्हारा नाम 'श्रीकृष्णचैतन्य' है और केशव-भारतीके शिष्य हो, तुम धन्य हो। तुम हमारे शाङ्कर-सम्प्रदायके संन्यासी हो और इस वाराणसीमें रह रहे हो। किस कारणसे हमसे मिलते भी नहीं हो? तुम संन्यासी होकर नाचते-गाते हो और भावुकोंको साथमें लेकर सङ्कीर्तन करते हो। संन्यासीका धर्म वेदान्त-पठन और ध्यान है। इसे छोड़कर तुम यह भावुकका कार्य क्यों करते हो? तुम्हारा प्रभाव देखकर हमें ऐसा प्रतीत होता है कि तुम साक्षात् नारायण हो, किन्तु तुम ऐसा अनुचित हीन-आचरण क्यों कर रहे हो? इसका क्या कारण है?॥” ६५-७०॥ अनुभाष्य-केशव-भारतीके विषयमें जाननेके लिये वैष्णवमञ्जुषा-समाहृति (दूसरी संख्या) द्रष्टव्य है। आदिलीला ७/४१ संख्याका अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ ६६-६९॥ अमृतानुक्रमणिका - महाप्रभुने श्रीशङ्करसम्प्रदायके श्रीकेशव भारतीसे संन्यास तो ग्रहण किया, परन्तु श्रीशङ्कराचार्यके मतको ग्रहण नहीं किया। महाप्रभु संन्यासके बाद प्रेममें आविष्ट होकर वृन्दावनकी ओर जाने लगे, परन्तु आवेशमें भागवतीय त्रिदण्डी भिक्षुकका गीत गाते-गाते राढ़देशमें भ्रमण करते रहे- “एतां समास्थाय परात्मनिष्ठामुपासितां पूर्वतमैर्महद्भिः। अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥” “प्राचीनकालमें महत् लोगों द्वारा उपासित इस परात्म-निष्ठारूप भिक्षुक-आश्रमका आश्रय करके मैं श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवाके द्वारा इस दुस्तर संसाररूप तमः (अज्ञान) से तर जाऊँगा।” महाप्रभुके इस उपरोक्त वाक्यसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन्होंने भागवतीय वैष्णव त्रिदण्डी भिक्षुकका वेश ग्रहण किया था। शङ्कराचार्यके मतमें संन्यास-जिसमें सेव्य-सेवकका भाव तिरोहित होता है, अपनेको ब्रह्म कल्पना करते हैं, उस प्रकारका संन्यास महाप्रभुका उद्देश्य नहीं था। यदि उनका वैसा उद्देश्य होता, तो उन्होंने काशी जाकर मायावादी-संन्यासियोंसे सम्भाषण क्यों नहीं किया? उनका मुखतक दर्शन क्यों नहीं किया? श्रीशङ्कराचार्य-मतवादीय संन्यासियोंके कृत्य मायावाद-भाष्य पठन-पाठन, ध्यान-धारणा आदिका त्यागकर 'भावुकके कर्म', 'नृत्य-गीत' आदि कृत्य क्यों आरम्भ किये? और वे मायावादी संन्यासियोंकी भाँति परस्पर सम्भाषणमें 'नमो नारायणाय' ना कहकर क्यों 'कृष्णे मतिरस्तु'-वैष्णव-संन्यासके जैसे ३९८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

वाक्य बोलते थे? अधिक क्या, 'नमो नारायणाय' आदि वाक्योंको पाषण्डता और प्रच्छन्न नास्तिकता कहकर क्यों प्रतिपादन करते? और यदि महाप्रभु शङ्कराचार्य-मतावलम्बी संन्यासी ही होते, तब वे क्यों उनके मतवादको 'बौद्धसे अधिक वेदाश्रया नास्तिक्यवाद' आदि क्यों कहते? कौन शङ्कर-सम्प्रदायके गुरु कहलानेवाले यह उपदेश देंगे कि हरिनामक्रे अतिरिक्त अन्य कोई साधन और साध्य नहीं है, ब्रह्मानन्द प्रेमानन्द-सिन्धुके सामने एक गोखुरके समान है। मायावादी संन्यासी लोग अपनेको 'ब्रह्म' कल्पना करते हैं!—'नमो नारायणाय' कहकर नमस्कार-प्रतिनमस्कार करते हैं। किन्तु महाप्रभुका आचरण और शिक्षा क्या थी? यहाँतक कि आचार्य-संन्यासी-लीला करनेवाले वास्तवमें स्वयं-भगवान् महाप्रभुको किसीके द्वारा 'नारायण' आदि सम्बोधन करनेपर उसे यह जतला देते कि वे किसी भी प्रकारसे शङ्कराचार्य-मतवादी संन्यासी नहीं हैं,- “लोके कहे, - 'संन्यासी तुमि जङ्गम-नारायण' ॥ प्रभु कहे, - 'विष्णु' 'विष्णु', इहा ना कहिबा। जीवाधमे 'कृष्ण'ज्ञान कभु ना करिया! संन्यासी-चित्कण जीव, किरण-कण-सम। षडैश्वर्यपूर्ण कृष्ण हय सूर्योपम ॥ जीव, ईश्वर-तत्त्व-कभु नहे 'सम'। ज्वलदग्निराशि यैछे स्फुलिङ्गेर कण ॥” अर्थात् “लोग महाप्रभुको कहते—'हे संन्यासी ! आप चल-नारायण हो।' तब महाप्रभु कहते—“'विष्णु' 'विष्णु' ! ऐसा मत कहिये। मुझ जैसे अधम जीवमें श्रीकृष्णज्ञान कभी मत कीजिये। मैं, संन्यासी एक चित्कण जीव हूँ, किरणके कणके समान और कहाँ षडैश्वर्यपूर्ण श्रीकृष्ण सूर्यके समान। जीव ईश्वर तत्त्वके समान कभी नहीं हो सकता, वह प्रज्वलित अग्निकी चिङ्गारीके समान है।” श्रीचैतन्यचरितामृतम् महाकाव्य ६५-श्लोकमें महाप्रभुकी संन्यास-ग्रहण लीलाका वेश इस प्रकार दृष्ट होता है- “ततोऽन्येद्युः श्रीमान् धृतकरकदण्डः सदरुणं बहन् वासोद्वन्द्वं बहलतड़िदचिं प्रतिकृतिः। अकस्मादेकस्मिन् पथि गुरुशिखो गैरिकमयो। व्यदर्शि स्वर्णाद्रिप्रवर इव तैर्गौरशशभृत्॥” अर्थात् “तब एक दिन सौदामिनी मालाकी कान्तिके समान मूर्तिवाले, हाथमें शोभायुक्त दण्ड-कमण्डलु और प्रशस्त दो अरुण वस्त्रोंको धारण किये हुए श्रीमान् गौरचन्द्रको उन लोगोंने अकस्मात् मार्गमें सुदीर्घ शिखायुक्त गैरिकमय स्वर्ण पर्वतके समान देखा।” 'गुरुशिखः' शब्दके द्वारा संन्यासके बाद भी महाप्रभुकी सुदीर्घ शिखाका परिचय मिलता है। त्रिदण्डी संन्यासी या वैष्णव-संन्यासीकी ही शिखा होती है। महाप्रभुने शङ्कर सम्प्रदायसे दशनामी संन्यासके नामोंमें अन्यतम 'भारती' नाम ग्रहण करनेपर भी उन्होंने 'श्रीकृष्णचैतन्य', इस ब्रह्मचारी नामका ही प्रचार किया। श्रीचैतन्यभागवत (मध्य, २८वें अध्याय) में श्रीकेशव भारतीके द्वारा 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम निर्देश करनेका कारण बतलाया है- सातवाँ अध्याय | ३९९

[ ७/६५-७१ “तबे नाम थुइबारे केशव भारती। मने मने चिन्तिते लागिल महामति॥१६९॥ चतुर्दश भुवनेते एमत वैष्णव। आमार नयने नाहि हय अनुभव॥१७०॥ अतएव कोथाओ ना थाके येइ नाम। हेन नाम थुइले मोर पूर्ण हय काम॥१७१॥ मूले भारतीर शिष्य “भारती” ये हय। इँहार-से नाम थुइबारे योग्य नय॥१७२॥ यत जगतेर तुमि कृष्ण बोलाइया। कराइला चैतन्य, कीर्त्तन प्रकाशिया॥१७५॥ एतेक तोमार नाम “श्रीकृष्णचैतन्य।” सर्वलोक तोमा हैते हैला धन्य॥१७६॥” अर्थात् ‘अब महामति श्रीकेशव भारती मन-ही-मन महाप्रभुके संन्यासके योग्य नामका चिन्तन करने लगे। चौदह भुवनोंमें मैंने ऐसा वैष्णव नहीं देखा है। अतः उनका नाम ऐसा होना चाहिये जो किसीने सुना ना हो। इससे मेरी मनोवाञ्छा पूर्ण हो जायेगी। विधिके अनुसार भारतीका शिष्य ‘भारती’ होना चाहिये, किन्तु यह नाम इनके योग्य नहीं है। तब श्रीकेशव भारती महाप्रभुके वक्षपर हाथ रखकर कहने लगे-‘कीर्तन प्रकाशित करके तुमने जगत्से कृष्ण बुलवाकर सभीको चैतन्यता प्रदान की है, इसलिये तुम्हारा नाम ‘श्रीकृष्णचैतन्य’ रखा जा रहा है। सभी लोग तुम्हारे इस नामके कारण धन्य हो जायेंगे।” महाप्रभुने कभी भी शङ्कर-सम्प्रदायको स्वीकार नहीं किया। इसलिये हम यदि वास्तवमें निरपेक्ष होकर विचार करें, तो उपक्रम, उपसंहार, अभ्यास, अपूर्वताफल, अर्थवाद और उपपत्ति-इन छह लिङ्गोंके द्वारा महाप्रभुकी संन्यासलीलाके तात्पर्यका अनुसन्धानकर यह जानेंगे कि महाप्रभु कभी भी मायावादी सम्प्रदायके अन्तर्गत नहीं थे॥६६॥ प्रकाशानन्द निर्विशेष ब्रह्मवादी हैं, वे नारायणादि सविशेष स्वरूप स्वीकार ही नहीं करते। अभी किन्तु महाप्रभुने अन्तर्यामी रूपमें प्रकाशानन्दके हृदयमें बैठकर उनकी भ्रान्ति दूर की। सविशेष स्वरूप नारायणके अस्तित्वकी अनुभूति उनके हृदयमें उत्पन्न की और वही साक्षात् नारायण ही संन्यासीरूपमें उनके सम्मुख उपस्थित हैं-इसका भी अनुभव कराया। किन्तु इस प्रकार अनुभूति कराकर साथ-ही-साथ अपने प्रभावसे उसको प्रच्छन्न करके दूर कर दिया। इसलिये प्रकाशानन्दने तब जिज्ञासा की-‘तुम ऐसा हीन आचरण क्यों कर रहे हो?’ महाप्रभुने अगर उस अनुभूतिको ढका नहीं होता, तो हीन आचरणके सम्बन्धमें यह प्रश्न प्रकाशानन्दके हृदयमें उठता ही नहीं। सम्भवतः श्रीनाम महात्म्यके प्रकाशके सुयोगके लिये ही महाप्रभुने प्रकाशानन्दके साथ इस प्रकार कौतुक किया॥६५-७०॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनाम-माहात्म्य-वर्णन :- प्रभु कहे,-“शुन, श्रीपाद, इहार कारण। गुरु मोरे मूर्ख देखि’ करिल शासन॥७१॥ ४०० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/७१ ] अनुवाद—प्रकाशानन्दके वचन सुनकर महाप्रभु कहने लगे—“श्रीपाद, इसका कारण सुनो। मेरे गुरुदेवने मुझे मूर्ख जानकर मुझे डाँटकर कहा॥७१॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्यदेव वेदान्तके एकमात्र प्रतिपाद्य वास्तव-वस्तु विग्रह (स्वयं-भगवान्) हैं। उन्होंने वेदान्तपाठके अधिकार-निर्णयमें यह प्रचार किया है कि स्वयंको तृणसे नीच माननेवाले, वृक्षकी भाँति सहनशीलता गुणसम्पन्न, स्वयं अमानी और अन्योंको मानप्रदान करनेवाले व्यक्ति ही श्रौतपथके अधिकारी हैं। श्रीगुरुदेवके श्रीमुखसे निकले वाक्योंको श्रवणकर शिष्य जब उनका कीर्तन करता है, तब उस कीर्तनरूपी अभिधेय अथवा साधनसे ही प्रयोजनरूप फल उदित होता है। श्रौतवाक्योंके जिस अंशमें भजनीय वास्तव-वस्तुके विज्ञानका वर्णन हुआ है, वही श्रौतशास्त्रोंका सर्वव्यापक मूलस्थानीय मूल अंशी है। उसी अंशीके भीतर सभी अंशोंकी प्रतीति और अप्रतीति अवस्थित है। भगवान्‌के अनुशीलनकारी भक्त अपने भजनके अवलम्बनसे भजनीय-वस्तु भगवान्‌के साथ सम्बन्धयुक्त होते हैं। जहाँ भजनवृत्तिकी शिथिलता होती है, वहाँ अंशीके अनुशीलनके बदले वस्तुका आंशिक अनुशीलन होता है। भजनवृत्तिकी शिथिलताके कारण भगवान्‌के साथ भक्तमें जो विच्छिन्न (पृथक् होनेका) भाव होता है, वही आत्मस्वरूप-विस्मृति अथवा हरिसेवाकी विमुखता है। श्रीचैतन्यदेवने भक्तके निरपेक्ष, निर्मल आचरणका उपदेश करते हुए वेदान्तकी चरम परिणतिके विषयमें जिस सर्वोत्तम आदर्शका प्रदर्शन किया, उसीके ही प्रकृष्ट उदाहरणके रूपमें (शिष्यका अभिनय करनेवाले) चौदह भुवनोंके पतिकी इस पयारमें अभिमान-शून्य उक्ति है। पाण्डित्य प्रतिभामें मत्त व्यक्ति गुरुपादपद्मकी सेवामें अनधिकारी हैं अर्थात् ब्रह्मसूत्रके पठनमें अनधिकारी हैं। देहाभिमानी अभक्त लोग भगवान्‌के अनुशीलनकी चेष्टा करते हुए गुरुकी सेवा त्याग कर देते हैं (इसलिये उन्हें अभक्त ही कहा गया है)। वहाँपर सेवककी स्व-स्वरूप निरूपणमें भ्रान्तिको दूर करनेके लिये गुरुरूपी भगवान् शिष्यके निर्मल स्वरूपका वर्णन करते समय उसकी मूर्खताको अभिव्यक्त करते हैं। श्रीगुरुदेव जिस प्रकार सरल भाषामें शिष्यके मङ्गलके लिये शिष्यकी अनधिकारिताके विषयमें कहते हैं, उसमें शिष्यको आपेक्षिक दोष स्पर्श नहीं करता। क्योंकि भगवत्-तत्त्वमें अनभिज्ञता ही शिष्यकी मूर्खता है और मूर्खका स्वाभाविक धर्म शिष्यके अन्दर नित्य वर्तमान रहता है। उस स्वरूपके साथ स्वरूप-ज्ञानके अभावके कारण हम लोग कई बार कपटतापूर्वक स्वयंमें शिष्याभिमान करके शिष्य जैसे ही व्यक्तिको मुखसे 'गुरु' कहकर छल करते हैं, इससे हमारा मङ्गल नहीं होता है। समस्त वेद जिनकी चरणसेवामें नियुक्त हैं, ऐसे वेदान्तके द्वारा जानने योग्य पुरुषमें प्राकृत ज्ञान रखनेवाला व्यक्ति वास्तवमें मूर्ख ही है। प्राकृत ज्ञानसे विमूढ़ व्यक्ति वेदशास्त्रका जो वास्तव अधिष्ठान दर्शन करते हैं, वह केवल उनकी माया मोहित बुद्धिके द्वारा चालित और अपरा विद्याके अन्तर्भुक्त है। जब तक जीवका दृश्य-जगत्का गुणमय अभिमान दूर नहीं होता, तब तक उसका जो आवृत्त, अनुपयोगी, परिवर्तनशील प्राकृत ज्ञान विराजमान है, वह मूर्खताके अन्तर्गत ही है। बृहत् और पालक विष्णुवस्तुके सेवक ही वेदान्ताधिकारी हैं। मायासे परिच्छिन्न (ढकी) वस्तु आदिकी सेवाका अतिक्रम नहीं करनेसे कोई भी ब्रह्मज्ञ नहीं हो सकता। कर्माधिकारीका ब्रह्मसूत्र और सातवाँ अध्याय | ४०१

[ ७/७१ ज्ञानाधिकारीका ब्रह्मसूत्रके पठन-पाठन अधिकारसे-नित्य, शुद्ध, पूर्ण, मुक्त, चैतन्यरसविग्रह अप्राकृत-चिन्तामणि स्वरूप श्रीकृष्णनाममें अधिकार नहीं होता है। इस अप्राकृत-चिन्तामणि स्वरूप श्रीकृष्णनाममें जिसका अधिकार है, उनको पुनः प्राकृत ज्ञानसे वेदान्ताधिकार प्राप्त करना नहीं होता। नामभजनमें अनधिकारी व्यक्ति नाम और नामीमें अभिन्न बुद्धिसे रहित होकर मायावादी वैदान्तिक होनेकी चेष्टा करते हैं। वे लोग ही अप्राकृत-विचारसे श्रीगुरुदेवकी भाषामें परम मूर्ख हैं। अधिरोहवादके अवलम्बनके द्वारा वेदान्तानुशीलनके फलसे मूर्खता या जाड्य आकर उपस्थित होते हैं। और वास्तविक नामके अधिकारी ही वेदान्तके उस पार नित्य अवस्थित हैं। इस प्रसङ्गमें श्रीमद्भागवतमें— “अहो वत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्त्तते नाम तुभ्यम्। तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते॥” अर्थात् “हे भगवन्! जिसके मुखमें आपके नामका सदा कीर्तन होता रहता है, वह चाण्डाल कुलमें उत्पन्न होनेपर भी सर्वश्रेष्ठ है। जो आपके नामका कीर्तन करते हैं, उन्होंने ही सब प्रकारकी तपस्या की है, उन्होंने ही सब प्रकारके यज्ञ किये हैं, उन्होंने ही समस्त तीर्थोंमें स्नान किया है, इसलिये वे ही आर्योंमें गिनने योग्य हैं।” आदि श्लोक और “ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदोऽप्यथर्वणः। अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥” अर्थात् “जिसने 'हरि', इन दो अक्षरोंका उच्चारण किया है, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया है।” आदि श्लोक आलोचनीय हैं। मूढ़ साहजिक सम्प्रदाय अपनेको वैष्णव मानकर वेदान्तको अहंग्रहोपासक केवलाद्वैतवादियोंकी विचरण-भूमि अर्थात् वेदान्तको केवल उनके अध्ययनका विषय मानते हैं। किन्तु 'वेदान्त' वैकुण्ठ-हरिजनोंकी ही एकमात्र विचरण भूमि है। प्राकृत सहजियागण इस सरल बातको समझ नहीं पाते कि चार सम्प्रदायोंके वैष्णवाचार्योंने ब्रह्मसूत्र-वेदान्तके भाष्य श्रीमद्भागवतके अनुगमनसे जिन सब वैदान्तिक प्रबन्धोंकी रचना की है, उन प्रबन्धोंको दुःसङ्ग मानकर परित्याग नहीं करना चाहिये। इसलिये वे लोग वास्तव शुद्धवैष्णव और वैष्णवाचार्योंको ज्ञानमिश्र और कर्ममिश्र बिद्धभक्तके रूपमें कल्पनाकर नरकगामी होते हैं तथा स्वयं मायावादी और विष्णुसेवा-रहित हो जाते हैं। प्राकृत ज्ञानके द्वारा वेदान्ताधिकारसे श्रीकृष्ण-मन्त्र जपकी सार्थकताकी उपलब्धि नहीं होती। जो लोग प्राकृत ज्ञानसे विमुग्ध हैं, वे लोग ही संसारमें सम्पूर्णरूपसे आबद्ध हैं। भोक्ता और भोग्य—ये दो तत्त्व (स्वयंको भोक्ता और संसारकी समस्त वस्तुओंको अपनी भोग्य वस्तु माननेका विचार) उन लोगोंको संसारमें बद्ध करनेमें समर्थ हैं और ये बाह्य विषयोंसे उनकी मननवृत्तिको संयत करने नहीं देते॥७१॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुको साधारण मनुष्य मानकर प्रकाशानन्दने जो कुछ प्रश्न किये, महाप्रभु एक-एक करके उनके उत्तर दे रहे हैं। प्रकाशानन्दकी धारणा थी—श्रीकृष्णचैतन्य मूर्ख संन्यासी है; इसलिये महाप्रभुने भी स्वयंको मूर्ख कहकर उनका उत्तर देना प्रारम्भ किया। ४०२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/७१-७३ ] महाप्रभुकी दैन्योक्ति प्रकाशानन्दकी धारणाके अनुकूल होनेके कारण वह ध्यानपूर्वक महाप्रभुकी बात सुनने लगा। महाप्रभु यदि पहले ही प्रकाशानन्दकी बातका प्रतिवाद करके अपने पाण्डित्य, ध्यान एवं वेदान्त-पाठादिकी अपेक्षा श्रीनाम-सङ्कीर्त्तनके प्राधान्यको प्रमाणित करने लगते, तो घमण्डी प्रकाशानन्दके अभिमानको चोट पहुँचती तथा महाप्रभुके प्रति उसकी विरक्ति और अवज्ञा और भी बढ़ जाती । तब वह धैर्य और ध्यान देकर महाप्रभुकी बातको नहीं सुनता। इसलिये महाप्रभुने इस दैन्यसे जैसे 'सूई होकर घुसी और कुल्हाड़ी होकर बाहर निकली'-इस न्यायसे प्रतिपक्षको जय करनेका एक अपूर्व कौशल दिखाया। विशेषतः यही वैष्णवोचित व्यवहारका भी परिचायक है॥७१॥ 'मूर्ख तुमि, तोमार नाहि वेदान्ताधिकार। 'कृष्णमन्त्र' जप' सदा, -एइ मन्त्र सार ॥ ७२ ॥ मन्त्र और महामन्त्र-श्रीनाममें लीलाकी विचित्रता :- कृष्णमन्त्र हैते हबे संसार-मोचन। कृष्णनाम हैते पाबे कृष्णेर चरण ॥ ७३ ॥ अनुवाद- 'तुम मूर्ख हो, वेदान्तमें तुम्हारा अधिकार नहीं है। इसलिये इस 'कृष्णमन्त्र' का सदा जप करो, यह वेदान्तका सार है। श्रीकृष्णमन्त्रके (गुरुसे प्राप्त दीक्षामन्त्रके) जपसे इस भौतिक संसारसे मुक्ति मिल जाती है (अर्थात् अपने स्वरूपका ज्ञान होता है) और श्रीकृष्णनामसे (मुख्य फल प्रेमके द्वारा) श्रीकृष्णके चरणोंकी सेवाकी प्राप्ति होती है॥७२-७३॥ अनुभाष्य- जीव जिस समय दिव्यज्ञान प्राप्त करता है, उस समय द्वितीयाभिनिवेशसे मुक्त होकर अधोक्षज-सेवामें प्रवृत्त होता है। मुकुन्दसेवा ही बाह्यजगत्की चेष्टा-निवृत्तिका एकमात्र उपाय और उपेय है। जीव मन्त्र जप करते-करते अप्राकृत अनुभूतिके फलसे बाह्य भोगमय जगत्-प्रतीतिसे निरस्त होकर पाँच प्रकार रतियोंमेंसे किसी एक प्रकारकी रतिका आश्रयकर सामग्रीके संयोगसे रससेवा-प्रभावसे विशुद्ध सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें भजनीयका आस्वादन करता है। वैसा अनुष्ठान दोनों उपाधियोंका भोगमात्र नहीं है अर्थात् प्राकृत स्थूल और सूक्ष्म देहके भोगका विषय नहीं है। नाम-नामी अभिन्न हैं-इस दिव्यज्ञान-लाभके लिये आनुष्ठानिकभावसे वास्तवरूपमें उसमें अवस्थित होनेपर ही नामकीर्त्तनकारी साक्षात् श्रीकृष्णसेवा प्राप्त करते हैं। उस समय उनकी चतुर्थ्यन्तपद या वैयाकरणकी सम्बन्ध-निर्णायिका भाषा शिथिल हो जाती है अर्थात् श्रीकृष्ण नाममें चतुर्थ्यन्तपद ना लगाकर उच्चारण करे, जैसे 'कृष्णाय'के स्थानपर 'कृष्ण' ही कहे, तो भी सम्बोधनकी पदोद्दिष्ट वास्तव वस्तु (अर्थात् नामके द्वारा नामी) तत्क्षणात् सत्त्वोज्ज्वल हृदयमें अवरुद्ध हो जाती है। उस समय सम्बोधन-पदके द्वारा अबाध (बाधारहित) सेवा करनेकी योग्यता प्राप्त होती है। सभी शास्त्र और सभी दिव्यज्ञानात्मक मन्त्र जीवको सम्पूर्ण रूपसे मुक्त करवाकर साक्षात् श्रीकृष्णसेवामें नियुक्त कराते हैं। [महाप्रभुने कहा] मुझ मूर्खने इन सब बातोंका श्रीगुरुदेवसे श्रवण किया है। उन्होंने यह भी उपदेश दिया था कि श्रीव्यासोक्त “लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत-संहिताम्" आदि नामभजनके सोपानरूप श्रीमद्भागवत आदिका अध्ययन, अध्यापना और विचार, नामसेवाके तात्पर्यमें ही पर्यवसित होते हैं। नाम और सातवाँ अध्याय | ४०३

[ ७/७२-७४ नामी, जो अभिन्न वस्तु हैं और मायाप्रयास-रहित व्यक्तियोंके लिये ही एकमात्र ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) है—यही गुरुपादपद्मसे प्राप्त दिव्यज्ञान है। श्रीगुरुपादपद्मके आश्रयसे पहले तक (श्रीकृष्ण और अपने) साम्बन्धिक-विचारसे मैं मूर्ख था, किन्तु सेवोन्मुख होकर ही बन्धमोक्षविदकी (बन्धनसे मुक्त होनेकी प्रक्रियाके ज्ञाताकी) चेष्टा अपनेमें देख पा रहा हूँ। 'कृष्णनाम'—शब्दसे यहाँपर नामाभास अथवा नामापराध उद्दिष्ट नहीं हुआ है॥७३॥ अमृतानुकणिका—वेदान्तका सार कृष्णमन्त्र ही समस्त साधनोंका सार है और वेदान्तका भी सार है। (हःभःविः-१/१५५-१५६)— “मन्त्रास्तु कृष्णदेवस्य साक्षाद्भगवतो हरेः। सर्वावतारबीजस्य सर्वतो वीर्य्यवत्तमाः॥ सर्वेषां मन्त्रवर्याणां श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते। विशेषात् कृष्णमनवो भोगमोक्षैकसाधनम्॥” अर्थात् “समस्त अवतारोंके बीजस्वरूप साक्षात् भगवान् हरि श्रीकृष्णदेवके मन्त्रसमूह अत्यधिक प्रभाव सम्पन्न हैं। समस्त श्रेष्ठ मन्त्रोंमें वैष्णव मन्त्र ही श्रेष्ठ हैं, विशेषतः श्रीकृष्णमन्त्र भोग-मोक्षको प्रदान करनेवाला है।” (हःभःविः-१/१५८-१५९)— “कृष्ण एव परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह। स्मृतिमात्रेण तेषां वै भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ तत्रापि भगवत्तं स्वां तन्वतो गोपलीलया। तस्य श्रेष्ठतमा मन्त्रास्तेष्वप्यष्टादशाक्षरः॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण ही सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। श्रीकृष्ण स्मरणमात्रसे ही भुक्ति एवं मुक्ति प्रदान करते हैं। तथापि अपनी भगवत्ताका प्रकाश गोपलीलासे ही करते हैं। उनका ही श्रेष्ठतम मन्त्र—अष्टदशाक्षर मन्त्र है।” अष्टाक्षर मन्त्रके प्रसङ्गमें (हःभःविः-१/१३१) में भी कहा है कृष्णमन्त्र ही “सर्ववेदान्तसारार्थः” है।” महाप्रभु भङ्गीसे मायावादी संन्यासियोंको जतला रहे हैं कि श्रीकृष्णमन्त्र समस्त साधनोंका सार होनेसे ध्यान और वेदान्त-पाठादि साधन अङ्गोंका अनुष्ठान निष्प्रयोजनीय है, इसलिये वे ध्यान अथवा वेदान्तका पाठ नहीं करते हैं॥७२॥ कलियुगमें श्रीकृष्णनाम ही एकमात्र उपास्य :- नाम बिना कलिकालॆ नाहि आर धर्म। सर्वमन्त्रसार नाम,—एइ शास्त्रमर्म॥७४॥ अनुवाद—कलियुगमें नामके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। सभी मन्त्रोंका सार यह श्रीकृष्णनाम ही है, यही शास्त्रोंका निगूढ़ अर्थ है॥७४॥ अनुभाष्य—सत्य, त्रेता और द्वापर, इन तीनों युगोंमें श्रौतपन्थाका आदर था, किन्तु इस कलिकालकी प्रवृत्तिके साथ अश्रौत या तर्कपन्था उत्पन्न हुआ है। वास्तव-सत्यके (शिष्य-परम्पराके द्वारा) अवरोहणके विषयमें सन्देह करके इन्द्रियज्ञानकी प्रबलतामें जिस तर्कपन्थाकी उत्पत्ति हुई है, वह श्रुतिविरोधी है। श्रीकृष्णनाम वैकुण्ठवस्तु होनेके कारण वास्तव-वस्तु श्रीकृष्णके साथ ४०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/७४ ] सम्पूर्ण अभिन्न है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण वास्तववस्तु श्रीकृष्ण जिस प्रकार नित्य, शुद्ध, पूर्ण, मुक्त, चैतन्यरसविग्रह और अप्राकृत चिन्तामणि हैं, वैकुण्ठनाम भी ठीक उसी प्रकार है। कृष्णेतर प्राकृत नामसे पृथक् होनेपर भी श्रीकृष्णनाम स्वयं वैकुण्ठवस्तु है। इस नाममें तर्कपन्थियोंका कोई अधिकार नहीं है। एकमात्र नामभजनसे ही स्थूल और सूक्ष्म, औपाधिक धर्म-द्वय निरस्त होता है। इसलिये तर्कपन्थाकी प्रबलताके समय अन्य प्रकारके कुण्ठ-धर्मसमूह (जागतिक धर्म) भी तर्कपन्थामें बाधक होते हैं। केवल स्वयं नाम ही तर्कपन्थियोंके तर्कातीत नामी वस्तु हैं। वैकुण्ठवस्तुका नाम ही प्राकृत भोगचिन्तापर मननधर्मोंसे जीवोंको त्राण करनेमें समर्थ कहा गया है—इसलिये यह सर्वमन्त्रोंका सार है। जड़वस्तुका नाम, रूप, गुण, भाव और क्रिया—ये सभी तर्कपन्थाके अधीन हैं, किन्तु वैकुण्ठवस्तु उस प्रकार नहीं है। उस वैकुण्ठनामका अप्राकृत रूप, गुण, परिकर-वैशिष्ट्य और लीला अद्वयज्ञानमें अवस्थित है। मायावादी लोग इन्द्रिय-ज्ञानसे वस्तुके नाम, रूप, गुणमें भेद मानकर द्वैतविचारके हेयत्वमें अधःपतित होते हैं। इसलिये उनके उपदेष्टा “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, और “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” अर्थात् “यह सब कुछ ही ब्रह्म है” आदि महावाक्योंके द्वारा उनको प्राकृत-विचारसे मुक्त करते हैं। श्रीनामाश्रयके अतिरिक्त नामापराधके द्वारा कभी भी इन्द्रियोंके भोगमय तर्कपन्थासे छुटकारा नहीं पाया जा सकता॥७४॥ मन्त्रमाहात्म्य (नारदपञ्चरात्रमें)— “त्रयो वेदाः षडङ्गानि छन्दांसि विविधाः सुराः। सर्वमष्टाक्षरान्तःस्थं यच्चान्यदपि वाङ्मयम्। सर्ववेदान्तसारार्थः संसारार्णवतारणः॥” अर्थात् “अष्टाक्षर मन्त्रके अन्दर ही तीनों वेद, उनके छह अङ्ग (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और छन्द), विविध छन्द (वैदिक साहित्य) और सभी देवता तथा जो कुछ और भी अन्य वाङ्मय है, वह सब समाहित है। यह अष्टाक्षर मन्त्र सभी वेदान्तोंका सार है और संसार समुद्रसे तारनेवाली नौका है।” (कलिसन्तरणोपनिषद्)— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोड़शकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परोपायाः सर्ववेदेषु दृश्यते॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे; ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता।” मुण्डकोपनिषद्भाष्ये श्रीमध्वधृतवचनम्— “द्वापरीयैर्यजैर्विष्णुः पञ्चरात्रैश्च केवलम्। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” सातवाँ अध्याय | ४०५

[ ७/७२-७६ अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” 'कृष्णमन्त्र' और 'कृष्णनाम' सम्बन्धमें श्रीजीवगोस्वामी प्रभु भक्तिसन्दर्भमें (२८४ संख्या)— “ननु भगवन्नामात्मका एव मन्त्राः; तत्र विशेषेण नमः शब्दाद्यलङ्कृताः श्रीभगवता श्रीमदृषिभिश्चाहितशक्तिविशेषाः, श्रीभगवता सममात्मसम्बन्धविशेषप्रतिपादकाश्च। तत्र केवलानि श्रीभगवन्नामान्यपि निरपेक्षाण्येव परमपुरुषार्थफलपर्यन्तदानसमर्थानि। ततो मन्त्रेषु नामतोऽप्यधिकसामर्थ्ये लब्धे कथं दीक्षाद्यपेक्षा? उच्यते-यद्यपि स्वरूपतो नास्ति, तथापि प्रायः स्वभावतो देहादिसम्बन्धेन कदर्यशीलानां विक्षिप्तचित्तानां जनानां तत्सङ्कोचीकरणाय श्रीमदृषिप्रभृतिभिरर्चनमार्गे क्वचित् क्वचित् काचित् काचिन्मर्यादा स्थापितास्ति।” “यदि कहो, — 'मन्त्रसमूह तो भगवन्नामात्मक है; मन्त्रकी विशेषता यह है कि मन्त्र भगवन्नामके साथ 'नमः', 'स्वाहा' शब्दादिके द्वारा भूषित अर्थात् नामानुगत्य भावयुक्त है। मन्त्रोंमें भगवान्की इच्छासे श्रीनारदादि ऋषियोंने शक्तिविशेष समर्पित की है। मन्त्रसमूह श्रीभगवान्के साथ मन्त्रोच्चारणकारीका सम्बन्धविशेष स्थापित करते हैं। मन्त्रमें भगवान्के जो अन्यभाव-अपेक्षारहित नामसमूह हैं (अर्थात् नमः, स्वाहा आदि शब्दोंसे अलङ्कृत ना होकर भी तथा ऋषियोंके द्वारा समर्पित शक्तिकी अपेक्षा ना रखते हुए भी), वे ही परमपुरुषार्थफल (श्रीकृष्णप्रेम) तक दान करनेमें समर्थ हैं। ऐसा होनेपर नामकी अपेक्षा मन्त्रको अधिक समर्थ कहकर नामकीर्तनकारीकी उस मन्त्रमें दीक्षाकी अपेक्षा क्यों है?' इसके उत्तरमें कह रहे हैं- 'यद्यपि नामकारीकी दीक्षाकी अपेक्षा स्वरूपतः नहीं है, तथापि प्रायः ही स्वाभाविक भोगपर देहादि सम्बन्ध रहनेके कारण बुरे स्वभावसे विक्षिप्तचित्तवाले मानवगणकी उस-उस बुरे स्वभाव और चित्तकी चञ्चलताको सङ्कुचित करनेके लिये श्रीनारदादि ऋषिओंने अर्चनमार्गमें कहीं-कहीं मन्त्रमें कुछ-कुछ मर्यादाकी स्थापना की है।' बद्धजीवके जड़-अहङ्काररूप भोगकी निवृत्तिके लिये मन्त्रसिद्धिकी आवश्यकता है। 'नमः' शब्दमें 'म'कारका अर्थ - अहङ्कार है; 'न'कारका अर्थ-तन्निवृत्ति (उससे निवृत्ति) है, अर्थात् मन्त्रसिद्धिके फलसे जीवको अप्राकृत अनुभूति लाभ होती है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने भी 'नामाष्टक'में - 'अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं' कहकर हरिनामको आह्वान किया है॥७२-७४॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। कण्ठे करि' एइ श्लोक करिह विचारे ॥ ७५ ॥ अनुवाद- यह कहकर मेरे गुरुदेवने मुझे एक श्लोक सिखलाया और कहा कि इसे कण्ठस्थ करके इसपर विचार करो ॥ ७५ ॥ हरेर्नाम श्लोक :- बृहन्नारदीय वचन (३८/१२६) - हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ ७६ ॥ अनुवाद - कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ ७६ ॥ ४०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/७६-८२ ] अमृतप्रवाह भाष्य—कलियुगमें हरिनामके अतिरिक्त और गति नहीं है; हरिनाम ही एकमात्र गति है॥७६॥ अनुभाष्य—[सत्ययुगे ध्यानरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [त्रेतायां यज्ञे यज्ञेश्वरयजनरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव; [द्वापरे अर्चनरूपा गतिः], कलौ नास्त्येव केवलं हरेर्नाम एव। [विशेषतः] कलौ अन्यथा गतिः नास्त्येव (अन्य-साधनानां निरर्थकत्वात्)। श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें ध्यान नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; त्रेतायुगमें यज्ञेश्वर भगवान्के उद्देश्यसे यज्ञके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें यज्ञ नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; द्वापरयुगमें अर्चनके द्वारा गति होती है, किन्तु कलियुगमें अर्चन नहीं, केवल नामके द्वारा ही गति होती है; विशेषतः कलियुगमें अन्य सभी साधन निरर्थक हैं॥७६॥ नामग्रहणका फल :— एइ आज्ञा पाञा नाम लइ अनुक्षण। नाम लैते लैते मोर भ्रान्त हैल मन॥७७॥ धैर्य धरिते नारि, हैलाम उन्मत्त। हासि, कान्दि, नाचि, गाइ, यैछे मदमत्त॥७८॥ अनुवाद—गुरुदेवकी यह आज्ञा पाकर मैं निरन्तर नामका जप करने लगा। नाम लेते-लेते मेरा मन भ्रान्त हो गया अर्थात् नामके अतिरिक्त सब कुछकी विस्मृति हो गयी। तभीसे मैं धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ। मैं उन्मत्त होकर पागल व्यक्तिकी भाँति कभी हँसता, रोता, नाचता और गाता हूँ॥७७-७८॥ तबे धैर्य धरि' मने करिलाम विचार। कृष्णनामे ज्ञानाच्छन्न हइल आमार॥७९॥ नामग्रहणके फलस्वरूप निज-अवस्थाके दर्शनसे विस्मय :— पागल हइलाङ् आमि, धैर्य नाहि मने। एत चिन्ति' निवेदिलाम गुरुर चरणे॥८०॥ 'किवा मन्त्र दिला गोसाञि, किवा तार बल। जपिते जपिते मन्त्र करिल पागल॥८१॥ हासाय, नाचाय, मोरे कराय क्रन्दन।' एत शुनि' गुरु मोरे बलिला वचन॥८२॥ अनुवाद—तब मैंने कुछ धैर्य धारण करके मनमें विचार किया कि इस श्रीकृष्णनामसे मेरा ज्ञान ढक गया है। नाम ग्रहण करते-करते मैं पागल हो गया हूँ और मनमें धैर्य धारण नहीं कर पा रहा हूँ। ऐसा सोचकर मैंने श्रीगुरुदेवसे निवेदन किया—'हे गुरुदेव ! आपने कैसा मन्त्र दिया है और कैसा उसका बल है, जपते-जपते जिसने मुझे पागल कर दिया है? कभी यह मन्त्र मुझे हँसाता है, कभी नचाता है और कभी रुलाता है।' यह सुनकर मेरे गुरुदेव बोले॥७९-८२॥ सातवाँ अध्याय | ४०७

[ ७/८३-८५ श्रीकृष्णनामका धर्म :- 'कृष्णनाम-महामन्त्रेर एइ त' स्वभाव। येइ जपे, तार कृष्णे उपजये भाव॥८३॥ अनुवाद—'श्रीकृष्णनाम महामन्त्रका यही स्वभाव है। जो इस महामन्त्रका जप करता है, यह उसमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न कर देता है॥८३॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके नाम गान करनेसे वही श्रीनाम शिष्यके कर्णकुहरमें (कानोंमें) प्रविष्ट होता है। श्रीगुरुदेवके अनुसरणमें सुने हुए श्रीनामको श्रद्धाके साथ हृदयमें स्थापितकर जपके द्वारा नामकी पूजा की जाती है। श्रीनाम पूजित होनेपर वे स्वयं ही अपने स्वाभाविक धर्मका विस्तारकर नामजपकारीको कीर्त्तनका अधिकार प्रदान करते हैं। उसी समयमें ही वे (नामजपकारी) नाम गान करके समग्र जगत्को शिष्य करनेमें समर्थ होते हैं। जगत् नामकीर्त्तनके शासन प्रभावसे श्रीकृष्णनाम-जप आरम्भ करता है। जपते-जपते जपकारीकी हास्य, क्रन्दन, नृत्य और कीर्त्तनादि नामभजनकी प्रणाली परिस्फुट होती है। परन्तु कोई-कोई मूर्खतावशतः “हरेकृष्ण” सोलह नाम-बतीस अक्षरको महामन्त्र ना जानकर उसे केवल जप्यमन्त्र मानकर उस महामन्त्रके (उच्च) कीर्त्तनमें बाधा प्रदान अर्थात् निषेध करते हैं। इसलिये प्रेमको प्राप्त किये हुए व्यक्ति श्रीकृष्णनाम गान करके भक्तोंके साथ श्रीकृष्णनामका सम्यक् कीर्त्तन अर्थात् सभी मिलकर सङ्कीर्त्तन करते हैं; उस प्रकार कीर्त्तनके फलस्वरूप जगत्के सभी लोग श्रीकृष्णनामका उपदेश लाभ करते हैं। नाम-श्रवण, नाम-कीर्त्तनके साथ ही साथ नाम-स्मरण होता है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम जपके प्रभावसे श्रीकृष्णवस्तुमें सेवाप्रवृत्तिका उदय होता है—इसीको ही 'भाव' नामसे कहा जाता है। जातभाव लोग अविद्या-बन्धनग्रस्त तथा अनर्थयुक्त नहीं होते हैं। वे लोग जातरति हैं, इसलिये भावके साथ चार सामग्रियोंके सम्मिलनमें उदित रसका आस्वादन करते हैं। भावकी घनीभूत अवस्था ही 'प्रेम' है। श्रीकृष्णनाम—महामन्त्र है। पाञ्चरात्रिक मन्त्रसमूह—'मन्त्र' नामसे जाने जाते हैं। भगवन्नाम 'महामन्त्र' के रूपमें प्रसिद्ध है॥८३॥ चतुर्वर्ग और श्रीकृष्णप्रेम :- कृष्णविषयक प्रेमा—परम पुरुषार्थ। यार आगे तृणतुल्य चारि पुरुषार्थ॥८४॥ पञ्चम पुरुषार्थ—प्रेमानन्दामृतसिन्धु। ब्रह्मादि आनन्द यार नहे एक बिन्दु॥८५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णविषयक प्रेम प्राप्त करना ही परम पुरुषार्थ है, जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ तिनकेकी भाँति हैं। पञ्चम पुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेम आनन्दके अमृतका समुद्र है, जिसके एक बिन्दुके साथ भी ब्रह्मानन्दकी तुलना नहीं हो सकती॥८४-८५॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेम जीव-प्रयोजनका सर्वश्रेष्ठ भाव है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी जीवके प्रयोजनके साथ पञ्चम पुरुषार्थ प्रेमकी तुलना करनेपर तारतम्यसे भुक्ति-मुक्तिकामियोंके द्वारा प्राप्त वस्तुओंको नश्वर और नगण्य रूपमें जाना जा सकता है। नश्वर उपाधिगत ४०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/८४-८५ ] अस्मितामें (अर्थात् इस नश्वर देहमें 'मैं' के भावमें) बुभुक्षु (भुक्तिकामी) और मुमुक्षु (मुक्तिकामी) का धर्म अवस्थित है। परन्तु भगवत्प्रेम आत्माका नित्य, अविकृत धर्म है; इसलिये भुक्ति-मुक्तिरूप चतुर्वर्गके प्रयोजन-विचारका मूल्य प्रेमकी तुलनामें कुछ भी नहीं है॥८४॥ अमृताणुकणिका-शास्त्रमें चार पुरुषार्थ वर्णित हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गसे प्राप्त जड़सुखसे चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षके द्वारा प्राप्त ब्रह्मसुखका अपूर्व वैशिष्ट्य है। यह ब्रह्मसुख निर्विशेष ब्रह्मानन्द है। निर्विशेष ब्रह्ममें स्वरूपशक्तिका विलास नहीं होनेसे आनन्दकी वैचित्री नहीं है। आस्वादन-चमत्कारिताकी वैचित्री भी नहीं है। यह ब्रह्मसुख केवल आनन्दसत्ता मात्र है। इसलिये ब्रह्मानन्द लोभनीय होनेपर भी परम लोभनीय वस्तु नहीं है। वह वस्तु क्या है? जिस वस्तुमें ब्रह्मतत्त्वकी चरमतम अभिव्यक्ति है, वही परम लोभनीय वस्तु है। श्रुतिमें ब्रह्मको रसस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मकी स्वाभाविक स्वरूपशक्तिकी अभिव्यक्तिके तारतम्यके अनुसार ही रसका भी तारतम्य होता है। रसका विकास जितना अधिक होगा आस्वाद्यका, आस्वादन-चमत्कारिताका और लोभनीयताका विकास भी उतना अधिक होगा। निर्विशेष ब्रह्ममें शक्तिका विकास न्यूनतम होनेके कारण रसका भी न्यूनतम विकास है। शक्तिके असमोध्र्व विकासके कारण श्रीकृष्णमें रसका चरमतम विकास है। इसलिये श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादनजनित आनन्द निर्विशेष-ब्रह्मानन्दकी अपेक्षा कोटि-कोटि गुना अधिक लोभनीय है। श्रीमद्भागवत (१/७/१०)- “आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥” अर्थात् “ब्रह्मानन्द-सुखमें मग्न एवं आत्मामें ही रमण करनेके कारण जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है, वे मुनिगण भी क्रोध-मोह-अहङ्कारादिसे मुक्त होकर निष्काम भावसे अमित-विक्रम श्रीहरिकी भक्ति करते रहते हैं, क्योंकि भगवान् श्रीहरिके गुण ही ऐसे हैं जिससे वे आत्मारामगणोंको भी आकर्षित कर लेते हैं।” इस माधुर्यका आकर्षण इतना अधिक है कि पतिव्रता शिरोमणि लक्ष्मी भी इसके प्रति आकर्षित हो जाती हैं। श्रीकृष्णकी असमोध्र्व माधुरीका आस्वादन करनेका एकमात्र उपाय प्रेमाभक्ति है। ब्रह्म-सायुज्य-प्राप्त जीवोंमें भी इस प्रेमकी प्राप्तिके लिये भजनकी कथा सुनी जाती है। “मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते। नृसिंहतापनी (२/५/१६) का शङ्करभाष्य।” मुक्त पुरुषोंके भगवद्भजनकी बात वेदान्तमें भी देखी जाती है। “आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्॥ ब्रह्मसूत्र ४/१/१२॥” इसके गोविन्द भाष्यमें लिखा है-किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तितक उपासना कर्त्तव्य है' और किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तिके बाद भी उपासना कर्त्तव्य है।' इस परस्पर विरुद्ध उपदेशकी मीमांसाके उद्देश्यसे ही व्यासदेवजीने इस वेदान्त सूत्रमें कहा है-'आप्रायणात्'-मुक्तिलाभ तक उपासना अवश्य ही करनी चाहिये। 'तत्रापि'-मोक्षावस्थामें भी अर्थात् मुक्तिलाभके बाद भी उपासना करनी होगी। 'हि'-क्योंकि, 'दृष्टम्'-श्रुतियोंमें सब समय ही उपासनाकी विधि दिखलायी देती है। मुक्तावस्थामें भी उपासनाका कारण यह है कि श्रुतियाँ कहती हैं-सर्वावस्थामें ही सब समय ही (इसलिये मुक्तावस्थामें भी) उपासना करेंगे, जैसे सौपर्ण सातवाँ अध्याय | ४०९

[ ७/८४-८८ श्रुतिमें कहा है—'सर्वदा एनम् उपासित यावद्विमुक्तिः। मुक्ता अपि हि एनम् उपासते॥' प्रश्न हो सकता है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान कहाँ लिखा है और फल भी क्या है? इसके उत्तरमें कह रहे है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान ना होनेपर भी और विधान नहीं है—ऐसा कहकर फलकी बात ना उठनेपर भी वस्तुके सौन्दर्य प्रभावसे ही मुक्त व्यक्ति भजनमें प्रवृत्त होते हैं। जैसे पीलियाका रोगी मिश्री खानेके फलस्वरूप पीलिया ठीक हो जानेपर भी मिश्रीके मिठासकी ओर आकृष्ट होकर उसकी मिश्री खानेकी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि भगवान्‌के सौन्दर्य, माधुर्य आदिके द्वारा आकृष्ट होकर मुक्त व्यक्ति भी भगवद्भजन करते हैं। “मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्॥” इस (१/३/२) वेदान्तसूत्रसे यही बात जानी जाती है। इस सूत्रके अर्थमें श्रीजीव गोस्वामीने लिखा है—“मुक्तानामेव सतामुपसृप्यं ब्रह्म यदि स्यात्तदेवाक्लेशेन सङ्गच्छते। अर्थात् ब्रह्ममुक्त-साधुओंकी उपसृप्य अर्थात् गति, इस प्रकार अर्थ करनेपर ही अक्लेशसे अर्थसङ्गति होती है। सर्वसम्वादिनी। १३० पृः।" उक्त सूत्रके माधवभाष्यमें भी कहा गया है, “मुक्तानां परमा गतिः।—ब्रह्म मुक्त पुरुषोंकी भी परमा गति है।” इन सबसे भी समझा जाता है—रसस्वरूप परब्रह्मकी उपासनाके लिये मुक्त पुरुषोंकी लालसा जाग्रत होती है। इस परम लोभनीय वस्तुके आस्वादनका एकमात्र उपाय प्रेम है, इसलिये यह चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। इस श्रीकृष्णप्रेमरूपी पुरुषार्थके द्वारा जो वस्तु प्राप्त की जाती है, वह ही चरमतम काम्य वस्तु है, इसलिये यह पुरुषार्थ भी परम पुरुषार्थ है॥८४॥ श्रीकृष्णनामका फल :— कृष्णनामेर फल—'प्रेमा,' सर्वशास्त्रे कय। भाग्ये सेइ प्रेमा तोमाय करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—सभी शास्त्र कहते हैं कि प्रेम ही श्रीकृष्णनामका फल है। परम सौभाग्यसे तुम्हारे भीतर यह प्रेम उदित हुआ है॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'धर्म', 'अर्थ', 'काम', 'मोक्ष',—ये चार प्रकारके पुरुषार्थ हैं। श्रीकृष्णप्रेम पञ्चम पुरुषार्थ है। इसके एक बिन्दुके साथ मोक्षकी प्रथमावस्था ब्रह्मानन्दादिकी तुलना नहीं हो सकती। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष,—ये सब श्रीकृष्णनामके फल नहीं हैं। सभी शास्त्रोंके अनुसार श्रीकृष्णप्रेम ही श्रीकृष्णनामका एकमात्र फल है॥८४-८६॥ श्रीकृष्णप्रेमका धर्म :— प्रेमार स्वभावे करे चित्त-तनु क्षोभ। कृष्णेर चरण-प्राप्त्ये उपजाय लोभ॥८७॥ प्रेमार स्वभावे भक्त हासे, कान्दे, गाय। उन्मत्त हइया नाचे, इति-उति धाय॥८८॥ अनुवाद—प्रेमका यह स्वभाव है कि वह साधकके चित्त और शरीरको क्षोभित करके उनमें दिव्य लक्षणोंको प्रकाश करता है तथा उसके हृदयमें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्तिका लोभ उत्पन्न करता है। प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी गान करता है और कभी पागलकी भाँति नाचता तथा कभी इधर-उधर भागता है॥८७-८८॥ ४१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

अनुभाष्य - श्रीकृष्णप्रेमहीन अभक्तगण जो अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता दिखाकर हास्य, क्रन्दन, नृत्य और गीत आदिमें उन्मत्त होते हैं, यह उनके अमङ्गल प्राप्तिका ही परिचय मात्र है। कृत्रिम शारीरिक और इन्द्रिय-चाञ्चल्य भजनशील साधकोंके लिये सम्पूर्णरूपसे परित्यागका विषय है। आत्माकी स्वाभाविकी वृत्तिके उदयमें जो भाव और प्रेम उपस्थित होता है, उससे ही हास्य, क्रन्दन, गान, नृत्य और उत्कण्ठा उदित होते हैं। ये सभी सेवोन्मुख भक्तकी अकृत्रिम (स्वाभाविक) चेष्टा है। अजातप्रेम व्यक्तियोंकी भक्तोंकी उच्चपदवी ग्रहण करनेकी धृष्टता जगत्में अनर्थ या जञ्जाल लाती है। श्रील जीवप्रभुकृत प्रीतिसन्दर्भ (संख्या ६६)में- “भगवत्प्रीतिरूपा वृत्तिर्मायादिमयी न भवति; किन्तु स्वरूपशक्त्यानन्दरूपा, यदानन्दापराधीनः श्रीभगवानपीति।” तथा (संख्या ६९)में- “तदेवं प्रीतिलक्षणं चित्तद्रवस्तस्य च रोमहर्षादिकम्। कथञ्चिज्जातेऽपि चित्तद्रवे रोमहर्षादिके वा न चेदाशयशुद्धिस्तदापि न भक्तेः सम्यगाविर्भाव इति ज्ञापितम्। आशयशुद्धिर्नाम चान्यतात्पर्य परित्यागः प्रीतितात्पर्यञ्च। अतएवानिमित्ता स्वाभाविकी चेति तद्विशेषणम्।” भगवत्-प्रेमरूपी वृत्ति कभी भी मायामयी नहीं, अपितु आनन्दरूपा स्वरूपशक्ति है; क्योंकि श्रीभगवान् भी आनन्द-पराधीन हैं। वैसा होनेपर इस प्रकार प्रीतिका लक्षण ही चित्तका द्रवित होना और उसके फलस्वरूप रोमहर्षादि विकारका प्रकट होना है। कुछ परिमाणमें चित्त-द्रवित या रोमहर्षादि होनेपर भी अन्तःकरण-शुद्ध ना होनेपर भक्तिका सम्यक् आविर्भाव नहीं हुआ है, ऐसा समझना होगा। 'अन्तःकरण-शुद्धि' का अर्थ श्रीकृष्णसेवासे इतर अन्य तात्पर्यका परित्याग और श्रीकृष्णसे प्रीति-तात्पर्य है। इसलिये 'अहैतुकी' और 'स्वाभाविकी' इसका विशेषण है॥८८॥ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु, गदगद, वैवर्ण्य। उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥८९॥ एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे नाचाय। कृष्णेर आनन्दामृतसागरे भासाय ॥ ९० ॥ अनुवाद - स्वेद अर्थात् शरीरमें पसीना आना, कम्प, रोमाञ्च अर्थात् रोमावली पुलकित होना, नेत्रोंसे अश्रु बहना, वाणी गद्गद् होना, वैवर्ण्य अर्थात् रङ्गका परिवर्तित होना - ये सात्त्विकभाव और उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष और दैन्य - ये व्यभिचारीभाव, इस भावोंमें प्रेम भक्तोंको नचाता है और उन्हें श्रीकृष्णके आनन्दामृतरूपी समुद्रमें डुबो देता है ॥ ८९-९० ॥ शिष्यके प्रति गुरुका कर्त्तव्योपदेश :- भाल हैल, पाइले तुमि परमपुरुषार्थ। तोमार प्रेमेते आमि हैलाङ कृतार्थ ॥ ९१ ॥ नाच, गाओ, भक्तसङ्गे कर सङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम उपदेशि' तार' सर्वजन ॥ ९२ ॥ अनुवाद - यह बहुत अच्छा हुआ कि तुमने परमपुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त किया है और

[ ७/९१-९४ तुम्हारे इस प्रेम प्राप्त होनेसे मैं भी कृतार्थ हो गया हूँ। अब नाचो-गाओ और भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन करो। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करो॥'९१-९२॥ अनुभाष्य-जिन लोगोंने श्रीगुरुदेवकी दृष्टिमें अधिकार प्राप्त किया है, उन्हींको ही श्रीगुरुदेव सजातीय-आशयस्निग्ध भजनपरायण हरिभक्तोंके साथ नृत्य, गीत और सङ्कीर्तनादिमें अधिकार प्रदान करते हैं। वे लोग ही श्रीगुरुदेवका पदानुसरण करके अपने भजन-ज्ञानसे जगत् उद्धार कार्योंमें नियुक्त होते हैं। अनधिकारी व्यक्ति निर्जनमें श्रीकृष्णनाम जप करेंगे। इस प्रकार उपासनामें अन्यके साथ सङ्गादि नहीं है। अधिकार होनेपर ही जनसङ्ग अशुभफल नहीं ला सकता; पक्षान्तरमें, बहिर्मुखलोग भी नामकी कृपा प्राप्त करनेमें समर्थ होते हैं। इस प्रसङ्गमें-“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः”* या “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्ध कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”** आदि श्लोक आलोच्य हैं॥९२॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। भागवतेर सार एइ-बले बारे बारे॥९३॥ अनुवाद-श्रीगुरुदेवने यह कहकर मुझे एक श्लोक सिखलाया और बार-बार कहा कि यह श्लोक श्रीमद्भागवतका सार है॥९३॥ महाभागवतकी अवस्था :- श्रीमद्भागवत (११/२/४०) एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥९४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥९४॥ अनुभाष्य-वसुदेवजीके द्वारा श्रीनारद मुनिसे भगवद्धर्म सुननेकी इच्छा करनेपर उन्होंने ऋषभदेवके नौ पुत्र नवयोगेन्द्र और विदेहराज निमिके उपाख्यानका वर्णन किया। इस प्रसङ्गमें नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम 'कवि'ने निमि महाराजसे कहा- *“श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये।” (भाः १०/३३/३१) **“विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य' कहलाता है।” (भःरःसिः १/२/२५५) ४१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

एवंव्रतः (श्रवणकीर्त्तनादिरूपं सेवनव्रतं यस्य सः) स्वप्रियनामकीर्त्या (स्वस्य प्रियस्य भगवतः नामकीर्त्तनादिना) जातानुरागः (जातः अनुरागः यस्य सः जातरतिः, अतएव) द्रुतचित्तः (उत्कण्ठितहृदयः) उन्मादवत् लोकबाह्यः (लोकानां बाह्यः हास्यनिन्दास्तुत्यादिषु अपेक्षारहितः सन्) उच्चैः हसति, अथो रोदिति, रौति (क्रोशति), गायति, नृत्यति च। श्लोक-भावानुवाद—जिसने श्रीकृष्णविषयक श्रवण-कीर्तनादि सेवाव्रत धारण किया है, अपने प्रियतम श्रीकृष्णके नाम-कीर्तनादिसे वह जातरति भक्त हृदयमें प्रबल उत्कण्ठाके कारण लोगोंके हास्य-निन्दा-स्तुति आदिसे अनपेक्षित उन्मत्तकी भाँति कभी उच्च हास्य, कभी रोदन, कभी चीत्कार, कभी गान और नृत्य करता है॥९४॥ अमृतानुकणिका—'एवंव्रत'-इस प्रकार भजन करते-करते उसके फलस्वरूप प्रेमभक्तियोगमें संसार-धर्मसे अतीत चेष्टाएँ-इस प्रकार व्रत जिनका है, उन्हें यहाँ एवंव्रत कहा गया है। भक्तिके अङ्गोंमें भी नाम-सङ्कीर्तन सर्वोत्कृष्ट है। 'स्वप्रियनामकीर्त्या'—अपने प्रिय नामके कीर्तनके द्वारा। स्वप्रिय नाम शब्दके दो प्रकार अर्थ हो सकते हैं—अपने प्रिय जो श्रीकृष्ण हैं उनका नाम अथवा अपना प्रिय जो भगवत्-नाम; श्रीहरिके असंख्य नाम हैं, उनमेंसे जो नाम जिस भक्तको सर्वपेक्षा प्रिय है, वही नाम। जैसे श्रीहरिभक्तिविलास (११/३०४)— “सर्वार्थशक्तियुक्तस्य देवदेवस्य चक्रिणः। यथाभिरोचते नाम तत् सर्वार्थेषु कीर्त्तयेत्॥” अर्थात् “भगवान् देवादेव चक्रधारी सर्वार्थ-शक्तिविशिष्ट हैं, इसलिये अपने अभिरुचि अनुरूप उनके नामोंका कीर्तन विषय-सिद्धि हेतु करना चाहिये।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामी लिखते हैं— “यस्य च यन्नाम्नि प्रीतिः तेन तदेव सेव्य, तेनैव तस्य सर्वार्थसिद्धिरित्याह।” अर्थात् “जिसकी जिस नाममें प्रीति है, वही उसके सेव्य हैं और उन्हींसे उसकी सर्वार्थ सिद्धि होती है।” निरन्तर नामकीर्तनके फलसे चित्तकी समस्त मलिनता पूर्णतया दूर होकर जिसके चित्तमें प्रेमका आविर्भाव होता है, उसे ही जातानुराग अथवा जातप्रेम भक्त कहते हैं। “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय। श्रवणादि-शुद्ध चित्ते करये उदय॥” 'द्रुतचित्त'—प्रेमके उदय होनेपर श्रीकृष्ण दर्शन प्राप्तिकी भक्तके हृदयमें बलवती उत्कण्ठा जाग्रत होती है। बलवती तीव्र उत्कण्ठारूप अग्निके तापसे भक्तका चित्त द्रवीभूत हो जाता है। उस तीव्र उत्कण्ठाके फलस्वरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी विषयमें भक्तका अभिनिवेश नहीं रहता। इसलिये वह 'लोकबाह्य'—लोकापेक्षाशून्य अर्थात् मान-अपमान आदि विषयमें असावधान हो जाता है। 'मेरे इस प्रकार आचरणको देखकर लोग क्या कहेंगे?'-इस प्रकारका विचार उसके मनमें नहीं आता। 'उन्मादवत्'—पागलके जैसे। किसी भी प्रकारसे लोकापेक्षा ना करके जो मनमें आये, वही जो व्यक्ति बोलता अथवा करता है, उसको ही लोग साधारणतः उन्मादी या पागल कहते हैं। जातप्रेम भक्तका लक्षण भी उसी प्रकार है, किन्तु वह उन्माद नहीं है। उन्मादित व्यक्तिका और जातप्रेम भक्तका भेद इस प्रकार है—उन्मादित व्यक्तिकी लोक-अनपेक्षा उसकी मस्तिष्ककी विकृतिका फल है। किन्तु जातप्रेम भक्तकी लोक-अनपेक्षा मस्तिष्ककी विकृतिका फल नहीं, परन्तु श्रीकृष्ण विषयमें ऐकान्तिक निविष्ट-चित्तताके कारण अन्य समस्त विषयोंसे अनाकृष्ट

[ ७/९४-९६ होकर श्रीकृष्ण विषयमें चित्तवृत्तिसमूह केन्द्रीभूत होनेका फल है। यद्यपि बाह्य दृष्टिसे दोनोंके लक्षण प्रायः एक जैसे दिखायी देते हैं, तथापि जातप्रेम भक्तको उन्माद ना कहकर उन्मादवत् कहा गया है। जातप्रेम भक्तका हृदय प्रायः श्रीकृष्णकी किसी-न-किसी एक लीलामें आविष्ट रहता है। आविष्ट अवस्थामें उसकी अनुभूति इस प्रकार होती है—जैसे वह श्रीकृष्णकी लीलास्थानमें निकट ही है और लीलाके अनुकूल आचरण भी कर रहा है। उस समय उसको यह ज्ञान नहीं रहता कि वह इस प्राकृतिक ब्रह्माण्डमें है, इसलिये इस जगत्का कोई भी विषय उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता। 'हसति'—हास्योद्दीपक किसी भी लीलाकी स्फूर्तिसे जातप्रेम भक्त कभी भी 'हो-हो' शब्दसे उच्च स्वरसे हँसने लगता है। जैसे बालक श्रीकृष्णने माखनचोरी करनेके लिये किसी गोपीके घरमें प्रवेश किया। गृहस्वामिनी वृद्धा गोपी उनकी आहट पाकर 'माखन चोरको पकड़ो', 'माखन चोरको पकड़ो', कहती हुयी दौड़ती हुई आयी। उसके शब्दोंको सुनकर श्रीकृष्ण भयसे भागनेकी चेष्टा करने लगे। जातप्रेम भक्तके चित्तमें इस लीलाकी स्फूर्ति होनेपर भागते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् अनुभव करके वह हास्यको संवरण नहीं कर पाता और हँसने लगता है। 'रोदिति'—और कभी ऐसी लीलाकी स्फूर्तिमें जब वह श्रीकृष्णके साक्षात् दर्शन करता है, तो स्फूर्तिके तिरोहित होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णको नहीं देख पानेके कारण दुःखसे हाय-हाय श्रीकृष्ण कहाँ गये, अभी तो यहाँ थे, अब कहाँ चले गये? मैने तो अपने हाथमें एक महानिधि प्राप्तकी थी, किस स्थानपर और किस प्रकारसे वह मेरे हाथसे छूट गयी, क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आदि बोलते-बोलते वह आर्त्तिमें रोने लगता है। 'रौति'—कभी श्रीकृष्ण विरहमें अधीर होकर “हे प्रभु! आप कहाँ हो? एक बार दर्शन दे दो, मेरी बातका उत्तर तो दो, आदि बोलते हुए वह कभी चीत्कार करता है। 'गायति'—कभी श्रीकृष्णके रूप, गुण, लीला आदिका गुणगान करते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करता है। 'नृत्यति'—श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करके आनन्दके उद्रेकके कारण नृत्य करने लगता है। यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि जातप्रेम भक्तका हास्य-रोदन-नृत्य-गीत आदि उसकी इच्छाके अधीन नहीं है। भूतग्रस्त व्यक्तिका जैसे अपने ऊपर कोई वश नहीं होता, जातप्रेम भक्त भी अपनी इच्छासे ऐसा आचरण नहीं करता। बाजीगर जैसे पुतलियोंको नचाता है, प्रेम भी वैसे ही जातप्रेम भक्तको नृत्य कराता है। विवश चित्तसे भक्त यह सब करता है, अथवा प्रेमके उदय होनेपर जो अनिर्वचनीय आनन्दका आविर्भाव होता है, उसकी ही प्रेरणासे भक्त कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता है॥९४॥ गुरुकी आज्ञासे भजनमें दृढ़ चेष्टा :— एइ ताँर वाक्ये आमि दृढ़ विश्वास धरि'। निरन्तर कृष्णनाम सङ्कीर्त्तन करि॥९५॥ भजनके फलस्वरूप स्वतः कर्तृत्वमय श्रीनाम-प्रभुकी कृपा :— सेइ कृष्णनाम कभु गाओयाय, नाचाय। गाहि, नाचि नाहि आमि आपन-इच्छाय॥९६॥ ४१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

७/९५-९७ ] अनुवाद—अपने गुरुदेवके इस वाक्यमें दृढ़तापूर्वक विश्वास रखकर मैं निरन्तर श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करता हूँ। वही श्रीकृष्णनाम कभी मुझसे गान कराता है, तो कभी मुझे नचाता है। मैं अपनी इच्छासे यह नृत्य-गीतादि नहीं करता हूँ॥ ९५-९६॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके वचनोंपर विश्वास ना कर पानेके कारण जो व्यक्ति अपने अधिकारका विपर्यय करते हैं, वे नाम-सङ्कीर्तनमें अधिकार प्राप्त नहीं कर पाते। “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिनकी श्रीभगवान्में पराभक्ति है और श्रीभगवान्के समान ही श्रीगुरुदेवके प्रति भी शुद्धभक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें श्रुतियोंके सभी मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं।” इस श्रुतिवाक्यका समर्थन करते हुए श्रीगौरसुन्दरने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन प्रारम्भ किया था। आनुगत्य धर्मकी रीतिके अनुसार उन्होंने गुरुदेवकी अवज्ञा ना करते हुए निरन्तर ही नामसङ्कीर्तन किया। वैसे श्रीकृष्णनाम-प्रभुके कीर्तनने स्वयं इच्छा-शक्तिका सञ्चालन करते हुए श्रीगौरसुन्दरकी नृत्य-गीत करनेमें रुचि उत्पन्न की थी। श्रीगौरसुन्दरने श्रीनामको कोई जड़पदार्थ समझकर उसके प्रति अनुग्रहपूर्वक कीर्तन नहीं किया। जो लोग अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता-वशतः श्रीकृष्णनामको अपने खिलौनेकी भाँति समझते हैं और श्रीनामसेवाके बदले नामके प्रभु बनकर कर्तृत्व दिखाना चाहते हैं, वे लोग भजनके बदले कर्मफलभोगमें वशीभूत होकर पित्तवृद्धि करवाकर शारीरिक अस्वस्थताको आमन्त्रित करते हैं। (महाप्रभुकी उक्ति)—'मैं हिताहित-विवेकहीन मूर्ख हूँ। वेदान्तका शुद्ध अर्थ अन्वेषण करते समय श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रचारित मायावाद-कुतर्क आकर मेरी नैसर्गिक भजनवृत्तिको नष्ट कर देगा—इसी आशङ्कासे मैंने जाना कि मेरा शाङ्कर-व्याख्यायुक्त वेदान्तमें अधिकार नहीं है। इसलिये मैं श्रीकृष्णमन्त्र जपके द्वारा ही संसारके अनर्थोंसे निवृत्त होकर मुक्तकुलोंके उपास्य श्रीकृष्णनामको ग्रहण करता हूँ जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। विवादमय कलिकालमें नामग्रहणके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। श्रीगुरुदेवसे यह सब आज्ञा प्राप्त करके नामग्रहणके फलसे मैं उन्मत्तप्रायः हो गया था। बादमें पुनः उनसे प्रश्नकर मैं यह जान पाया कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-फल-आकाङ्क्षाकारियोंकी क्षुद्र आशाकी अपेक्षा परम-कल्याणकारी परमपुरुषार्थरूप प्रेमाधिकार प्राप्त होनेपर जीवका जो कल्याण होता है, उसकी तुलना नहीं है। जात-प्रेम व्यक्ति अपने स्वभावसे लोकलज्जाकी उपेक्षाकर उच्चस्वरसे हास्य, रोदन, गान और नर्तनादिके साथ श्रीकृष्णकीर्तन करते हैं, इसीको ही मैं 'भागवतजीवन'के (भक्तके जीवनके) रूपमें जानता हूँ। मैंने कृत्रिमरूपसे कपटताका आश्रयकर कोई कार्य नहीं किया। गुरुदेवके वाक्योंमें दृढ़विश्वासयुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन करता हूँ। श्रीनामने ही मुझे कौपीनधारी वैदान्तिकोंके गाम्भीर्यके प्रतिपक्षमें (विरोधमें) गायक और नर्तक बना दिया। इसमें मेरा स्वतःकर्त्तृत्व या प्रेरणा अल्पमात्र है—यह सब कुछ श्रीनामप्रभुकी कृपा ही है॥ ९५-९६॥ ब्रह्मानन्द और श्रीकृष्णप्रेमानन्दका पार्थक्य :— कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु-आस्वादन। ब्रह्मानन्द तार आगे खातोदक-सम ॥ ९७॥ सातवाँ अध्याय | ४१५