श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/९१-९४ तुम्हारे इस प्रेम प्राप्त होनेसे मैं भी कृतार्थ हो गया हूँ। अब नाचो-गाओ और भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन करो। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करो॥'९१-९२॥ अनुभाष्य-जिन लोगोंने श्रीगुरुदेवकी दृष्टिमें अधिकार प्राप्त किया है, उन्हींको ही श्रीगुरुदेव सजातीय-आशयस्निग्ध भजनपरायण हरिभक्तोंके साथ नृत्य, गीत और सङ्कीर्तनादिमें अधिकार प्रदान करते हैं। वे लोग ही श्रीगुरुदेवका पदानुसरण करके अपने भजन-ज्ञानसे जगत् उद्धार कार्योंमें नियुक्त होते हैं। अनधिकारी व्यक्ति निर्जनमें श्रीकृष्णनाम जप करेंगे। इस प्रकार उपासनामें अन्यके साथ सङ्गादि नहीं है। अधिकार होनेपर ही जनसङ्ग अशुभफल नहीं ला सकता; पक्षान्तरमें, बहिर्मुखलोग भी नामकी कृपा प्राप्त करनेमें समर्थ होते हैं। इस प्रसङ्गमें-“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः”* या “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्ध कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”** आदि श्लोक आलोच्य हैं॥९२॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। भागवतेर सार एइ-बले बारे बारे॥९३॥ अनुवाद-श्रीगुरुदेवने यह कहकर मुझे एक श्लोक सिखलाया और बार-बार कहा कि यह श्लोक श्रीमद्भागवतका सार है॥९३॥ महाभागवतकी अवस्था :- श्रीमद्भागवत (११/२/४०) एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥९४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥९४॥ अनुभाष्य-वसुदेवजीके द्वारा श्रीनारद मुनिसे भगवद्धर्म सुननेकी इच्छा करनेपर उन्होंने ऋषभदेवके नौ पुत्र नवयोगेन्द्र और विदेहराज निमिके उपाख्यानका वर्णन किया। इस प्रसङ्गमें नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम 'कवि'ने निमि महाराजसे कहा- *“श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये।” (भाः १०/३३/३१) **“विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य' कहलाता है।” (भःरःसिः १/२/२५५) ४१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत