श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवंव्रतः (श्रवणकीर्त्तनादिरूपं सेवनव्रतं यस्य सः) स्वप्रियनामकीर्त्या (स्वस्य प्रियस्य भगवतः नामकीर्त्तनादिना) जातानुरागः (जातः अनुरागः यस्य सः जातरतिः, अतएव) द्रुतचित्तः (उत्कण्ठितहृदयः) उन्मादवत् लोकबाह्यः (लोकानां बाह्यः हास्यनिन्दास्तुत्यादिषु अपेक्षारहितः सन्) उच्चैः हसति, अथो रोदिति, रौति (क्रोशति), गायति, नृत्यति च। श्लोक-भावानुवाद—जिसने श्रीकृष्णविषयक श्रवण-कीर्तनादि सेवाव्रत धारण किया है, अपने प्रियतम श्रीकृष्णके नाम-कीर्तनादिसे वह जातरति भक्त हृदयमें प्रबल उत्कण्ठाके कारण लोगोंके हास्य-निन्दा-स्तुति आदिसे अनपेक्षित उन्मत्तकी भाँति कभी उच्च हास्य, कभी रोदन, कभी चीत्कार, कभी गान और नृत्य करता है॥९४॥ अमृतानुकणिका—'एवंव्रत'-इस प्रकार भजन करते-करते उसके फलस्वरूप प्रेमभक्तियोगमें संसार-धर्मसे अतीत चेष्टाएँ-इस प्रकार व्रत जिनका है, उन्हें यहाँ एवंव्रत कहा गया है। भक्तिके अङ्गोंमें भी नाम-सङ्कीर्तन सर्वोत्कृष्ट है। 'स्वप्रियनामकीर्त्या'—अपने प्रिय नामके कीर्तनके द्वारा। स्वप्रिय नाम शब्दके दो प्रकार अर्थ हो सकते हैं—अपने प्रिय जो श्रीकृष्ण हैं उनका नाम अथवा अपना प्रिय जो भगवत्-नाम; श्रीहरिके असंख्य नाम हैं, उनमेंसे जो नाम जिस भक्तको सर्वपेक्षा प्रिय है, वही नाम। जैसे श्रीहरिभक्तिविलास (११/३०४)— “सर्वार्थशक्तियुक्तस्य देवदेवस्य चक्रिणः। यथाभिरोचते नाम तत् सर्वार्थेषु कीर्त्तयेत्॥” अर्थात् “भगवान् देवादेव चक्रधारी सर्वार्थ-शक्तिविशिष्ट हैं, इसलिये अपने अभिरुचि अनुरूप उनके नामोंका कीर्तन विषय-सिद्धि हेतु करना चाहिये।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामी लिखते हैं— “यस्य च यन्नाम्नि प्रीतिः तेन तदेव सेव्य, तेनैव तस्य सर्वार्थसिद्धिरित्याह।” अर्थात् “जिसकी जिस नाममें प्रीति है, वही उसके सेव्य हैं और उन्हींसे उसकी सर्वार्थ सिद्धि होती है।” निरन्तर नामकीर्तनके फलसे चित्तकी समस्त मलिनता पूर्णतया दूर होकर जिसके चित्तमें प्रेमका आविर्भाव होता है, उसे ही जातानुराग अथवा जातप्रेम भक्त कहते हैं। “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय। श्रवणादि-शुद्ध चित्ते करये उदय॥” 'द्रुतचित्त'—प्रेमके उदय होनेपर श्रीकृष्ण दर्शन प्राप्तिकी भक्तके हृदयमें बलवती उत्कण्ठा जाग्रत होती है। बलवती तीव्र उत्कण्ठारूप अग्निके तापसे भक्तका चित्त द्रवीभूत हो जाता है। उस तीव्र उत्कण्ठाके फलस्वरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी विषयमें भक्तका अभिनिवेश नहीं रहता। इसलिये वह 'लोकबाह्य'—लोकापेक्षाशून्य अर्थात् मान-अपमान आदि विषयमें असावधान हो जाता है। 'मेरे इस प्रकार आचरणको देखकर लोग क्या कहेंगे?'-इस प्रकारका विचार उसके मनमें नहीं आता। 'उन्मादवत्'—पागलके जैसे। किसी भी प्रकारसे लोकापेक्षा ना करके जो मनमें आये, वही जो व्यक्ति बोलता अथवा करता है, उसको ही लोग साधारणतः उन्मादी या पागल कहते हैं। जातप्रेम भक्तका लक्षण भी उसी प्रकार है, किन्तु वह उन्माद नहीं है। उन्मादित व्यक्तिका और जातप्रेम भक्तका भेद इस प्रकार है—उन्मादित व्यक्तिकी लोक-अनपेक्षा उसकी मस्तिष्ककी विकृतिका फल है। किन्तु जातप्रेम भक्तकी लोक-अनपेक्षा मस्तिष्ककी विकृतिका फल नहीं, परन्तु श्रीकृष्ण विषयमें ऐकान्तिक निविष्ट-चित्तताके कारण अन्य समस्त विषयोंसे अनाकृष्ट