श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/९४-९६ होकर श्रीकृष्ण विषयमें चित्तवृत्तिसमूह केन्द्रीभूत होनेका फल है। यद्यपि बाह्य दृष्टिसे दोनोंके लक्षण प्रायः एक जैसे दिखायी देते हैं, तथापि जातप्रेम भक्तको उन्माद ना कहकर उन्मादवत् कहा गया है। जातप्रेम भक्तका हृदय प्रायः श्रीकृष्णकी किसी-न-किसी एक लीलामें आविष्ट रहता है। आविष्ट अवस्थामें उसकी अनुभूति इस प्रकार होती है—जैसे वह श्रीकृष्णकी लीलास्थानमें निकट ही है और लीलाके अनुकूल आचरण भी कर रहा है। उस समय उसको यह ज्ञान नहीं रहता कि वह इस प्राकृतिक ब्रह्माण्डमें है, इसलिये इस जगत्का कोई भी विषय उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता। 'हसति'—हास्योद्दीपक किसी भी लीलाकी स्फूर्तिसे जातप्रेम भक्त कभी भी 'हो-हो' शब्दसे उच्च स्वरसे हँसने लगता है। जैसे बालक श्रीकृष्णने माखनचोरी करनेके लिये किसी गोपीके घरमें प्रवेश किया। गृहस्वामिनी वृद्धा गोपी उनकी आहट पाकर 'माखन चोरको पकड़ो', 'माखन चोरको पकड़ो', कहती हुयी दौड़ती हुई आयी। उसके शब्दोंको सुनकर श्रीकृष्ण भयसे भागनेकी चेष्टा करने लगे। जातप्रेम भक्तके चित्तमें इस लीलाकी स्फूर्ति होनेपर भागते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् अनुभव करके वह हास्यको संवरण नहीं कर पाता और हँसने लगता है। 'रोदिति'—और कभी ऐसी लीलाकी स्फूर्तिमें जब वह श्रीकृष्णके साक्षात् दर्शन करता है, तो स्फूर्तिके तिरोहित होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णको नहीं देख पानेके कारण दुःखसे हाय-हाय श्रीकृष्ण कहाँ गये, अभी तो यहाँ थे, अब कहाँ चले गये? मैने तो अपने हाथमें एक महानिधि प्राप्तकी थी, किस स्थानपर और किस प्रकारसे वह मेरे हाथसे छूट गयी, क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आदि बोलते-बोलते वह आर्त्तिमें रोने लगता है। 'रौति'—कभी श्रीकृष्ण विरहमें अधीर होकर “हे प्रभु! आप कहाँ हो? एक बार दर्शन दे दो, मेरी बातका उत्तर तो दो, आदि बोलते हुए वह कभी चीत्कार करता है। 'गायति'—कभी श्रीकृष्णके रूप, गुण, लीला आदिका गुणगान करते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करता है। 'नृत्यति'—श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करके आनन्दके उद्रेकके कारण नृत्य करने लगता है। यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि जातप्रेम भक्तका हास्य-रोदन-नृत्य-गीत आदि उसकी इच्छाके अधीन नहीं है। भूतग्रस्त व्यक्तिका जैसे अपने ऊपर कोई वश नहीं होता, जातप्रेम भक्त भी अपनी इच्छासे ऐसा आचरण नहीं करता। बाजीगर जैसे पुतलियोंको नचाता है, प्रेम भी वैसे ही जातप्रेम भक्तको नृत्य कराता है। विवश चित्तसे भक्त यह सब करता है, अथवा प्रेमके उदय होनेपर जो अनिर्वचनीय आनन्दका आविर्भाव होता है, उसकी ही प्रेरणासे भक्त कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता है॥९४॥ गुरुकी आज्ञासे भजनमें दृढ़ चेष्टा :— एइ ताँर वाक्ये आमि दृढ़ विश्वास धरि'। निरन्तर कृष्णनाम सङ्कीर्त्तन करि॥९५॥ भजनके फलस्वरूप स्वतः कर्तृत्वमय श्रीनाम-प्रभुकी कृपा :— सेइ कृष्णनाम कभु गाओयाय, नाचाय। गाहि, नाचि नाहि आमि आपन-इच्छाय॥९६॥ ४१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत