श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 457, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें७/९५-९७ ] अनुवाद—अपने गुरुदेवके इस वाक्यमें दृढ़तापूर्वक विश्वास रखकर मैं निरन्तर श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करता हूँ। वही श्रीकृष्णनाम कभी मुझसे गान कराता है, तो कभी मुझे नचाता है। मैं अपनी इच्छासे यह नृत्य-गीतादि नहीं करता हूँ॥ ९५-९६॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके वचनोंपर विश्वास ना कर पानेके कारण जो व्यक्ति अपने अधिकारका विपर्यय करते हैं, वे नाम-सङ्कीर्तनमें अधिकार प्राप्त नहीं कर पाते। “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिनकी श्रीभगवान्में पराभक्ति है और श्रीभगवान्के समान ही श्रीगुरुदेवके प्रति भी शुद्धभक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें श्रुतियोंके सभी मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं।” इस श्रुतिवाक्यका समर्थन करते हुए श्रीगौरसुन्दरने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन प्रारम्भ किया था। आनुगत्य धर्मकी रीतिके अनुसार उन्होंने गुरुदेवकी अवज्ञा ना करते हुए निरन्तर ही नामसङ्कीर्तन किया। वैसे श्रीकृष्णनाम-प्रभुके कीर्तनने स्वयं इच्छा-शक्तिका सञ्चालन करते हुए श्रीगौरसुन्दरकी नृत्य-गीत करनेमें रुचि उत्पन्न की थी। श्रीगौरसुन्दरने श्रीनामको कोई जड़पदार्थ समझकर उसके प्रति अनुग्रहपूर्वक कीर्तन नहीं किया। जो लोग अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता-वशतः श्रीकृष्णनामको अपने खिलौनेकी भाँति समझते हैं और श्रीनामसेवाके बदले नामके प्रभु बनकर कर्तृत्व दिखाना चाहते हैं, वे लोग भजनके बदले कर्मफलभोगमें वशीभूत होकर पित्तवृद्धि करवाकर शारीरिक अस्वस्थताको आमन्त्रित करते हैं। (महाप्रभुकी उक्ति)—'मैं हिताहित-विवेकहीन मूर्ख हूँ। वेदान्तका शुद्ध अर्थ अन्वेषण करते समय श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रचारित मायावाद-कुतर्क आकर मेरी नैसर्गिक भजनवृत्तिको नष्ट कर देगा—इसी आशङ्कासे मैंने जाना कि मेरा शाङ्कर-व्याख्यायुक्त वेदान्तमें अधिकार नहीं है। इसलिये मैं श्रीकृष्णमन्त्र जपके द्वारा ही संसारके अनर्थोंसे निवृत्त होकर मुक्तकुलोंके उपास्य श्रीकृष्णनामको ग्रहण करता हूँ जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। विवादमय कलिकालमें नामग्रहणके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। श्रीगुरुदेवसे यह सब आज्ञा प्राप्त करके नामग्रहणके फलसे मैं उन्मत्तप्रायः हो गया था। बादमें पुनः उनसे प्रश्नकर मैं यह जान पाया कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-फल-आकाङ्क्षाकारियोंकी क्षुद्र आशाकी अपेक्षा परम-कल्याणकारी परमपुरुषार्थरूप प्रेमाधिकार प्राप्त होनेपर जीवका जो कल्याण होता है, उसकी तुलना नहीं है। जात-प्रेम व्यक्ति अपने स्वभावसे लोकलज्जाकी उपेक्षाकर उच्चस्वरसे हास्य, रोदन, गान और नर्तनादिके साथ श्रीकृष्णकीर्तन करते हैं, इसीको ही मैं 'भागवतजीवन'के (भक्तके जीवनके) रूपमें जानता हूँ। मैंने कृत्रिमरूपसे कपटताका आश्रयकर कोई कार्य नहीं किया। गुरुदेवके वाक्योंमें दृढ़विश्वासयुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन करता हूँ। श्रीनामने ही मुझे कौपीनधारी वैदान्तिकोंके गाम्भीर्यके प्रतिपक्षमें (विरोधमें) गायक और नर्तक बना दिया। इसमें मेरा स्वतःकर्त्तृत्व या प्रेरणा अल्पमात्र है—यह सब कुछ श्रीनामप्रभुकी कृपा ही है॥ ९५-९६॥ ब्रह्मानन्द और श्रीकृष्णप्रेमानन्दका पार्थक्य :— कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु-आस्वादन। ब्रह्मानन्द तार आगे खातोदक-सम ॥ ९७॥ सातवाँ अध्याय | ४१५